पश्चिमी विद्वानों का मत है कि आर्यों का एक समुदाय भारत मे लगभग 2000 इस्वी ईसा पूर्व आया। इन विद्वानों की कहानी यह है कि आर्य इण्डो-यूरोपियन बोली बोलने वाले, घुड़सवारी करने वाले तथा यूरेशिया के सूखे घास के मैदान में रहने वाले खानाबदोश थे जिन्होंने ई.पू. 1700 में भारत की सिन्धु घाटी की नगरीय सभ्यता पर आक्रमण कर के उसका विनाश कर डाला और इन्हीं आर्य के वंशजों ने उनके आक्रमण से लगभग 1200 वर्ष बाद आर्य या वैदिक सभ्यता की नींव रखी और वेदों की रचना की।
इस बात के सैकड़ों पुरातात्विक प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के के लोग बहुत अधिक सभ्य और समृद्ध थे जबकि इन तथाकथित घुड़सवार खानाबदोश आर्य जाति के विषय में कहीं कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आखिर सिन्धु घाटी के लोग इनसे हारे कैसे? यदि यह मान भी लिया जाए कि वे घुड़सवार खानाबदोश अधिक शक्तिशाली और बर्बर थे इसीलिए वे जीत गए तो सवाल यह पैदा होता है कि इस असभ्य जाति के लोग आखिर इतने सभ्य कैसे हो गए कि वेद जैसे ग्रंथों की रचना कर डाली? और यह स्वभाव से घुमक्कड़ जाति 1200 वर्षों तक कहाँ रही और क्या करती रही। दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि आर्यो के भारत मे आने का कोई प्रमाण न तो पुरातत्त्व उत्खननो से मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानो से। मजे की बात यह भी है कि उन्हीं आर्यों द्वारा रचित वेद आदि ग्रंथों में भी आर्यों के द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता पर आक्रमण करने का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। आर्य शब्द तो स्वयं ही कुलीनता और श्रेष्ठता का सूचक है फिर यह शब्द असभ्य, घुड़सवार, घुमन्तू खानाबदोश जाति के लिए कैसे प्रयुक्त हो सकता है?
वास्तविकता यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी में एब्बे डुबोइस (Abbé Dubois) नामक एक फ्रांसीसी पुरातत्ववेत्ता भारत आया। वह कितना ज्ञानी था इस बात का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रलय के विषय में पढ़कर प्रलय को नूह और उसकी नाव के साथ जोड़ने का प्रयास किया था जो कि एकदम मूर्खतापूर्ण असंगत बात थी। एब्बे की पाण्डुलिपि आज के सन्दर्भ में पूरी तरह से असामान्य हो चुकी है। इन्हीं एब्बे महोदय ने भारतीय साहित्य का अत्यन्त ही त्रुटिपूर्ण तथा कपोलकल्पित वर्णन, आकलन और अनुवाद किया जिस पर जर्मन पुरातत्ववेत्ता मैक्समूलर ने, जो कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के नाक के बाल बने हुए थे, अपनी भूमिका लिखकर सच्चाई का ठप्पा लगा दिया। मैक्समूलर के द्वारा सच्चाई का ठप्पा लग जाने ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने आर्यों के द्वारा सिन्धुघाटी सभ्यता पर आक्रमण की कपोलकल्पित कहानी को इतिहास बना दिया।
Tuesday, November 30, 2010
Monday, November 29, 2010
हम ब्लोगर इसलिए हैं क्योंकि हममें लेखन प्रतिभा है
ईश्वर ने हमें अपने विचारों को लेखनीबद्ध करने कि प्रतिभा दी है इसीलिए हम ब्लोगर हैं। जाने कितने ही लोग हैं जो चाहकर भी अपने विचारों को कागज पर उतार नहीं सकते। तीनेक साल पहले तक मैं भी स्वयं को लेखन प्रतिभा से विहीन समझता था किन्तु अभ्यास करके मैंने इस प्रतिभा को अपने भीतर विकसित कर लिया। और मुझमें जब अपने विचारों को लेखनीबद्ध करने की योग्यता आ गई तो मैं ब्लोगर बन गया।
मनुष्यमात्र का यह स्वभाव है कि वह अपनी प्रतिभा का उपयोग करता है। यह उपयोग या तो सदुपयोग हो सकता है या दुरुपयोग हो सकता है या फिर महज एक उपयोग ही हो सकता है। जब कोई अपनी योग्यता का उपयोग करता है और उस उपयोग से समाज का, राष्ट्र का या अन्य अनेक लोगों का कल्याण होता है, राष्ट्र, समाज और लोगों तक उसकी योग्यता के माध्यम से कोई सार्थक सन्देश पहुँचता है तो योग्यता का यह उपयोग निःसन्देह सदुपयोग ही होता है और यदि इसके विपरीत होता है तो दुरुपयोग। किन्तु किसी की प्रतिभा से यदि किसी का न तो कल्याण होता है और न ही राष्ट्र, समाज और लोगों को किसी प्रकार की हानि ही पहुँचती है तो यह योग्यता का महज उपयोग हुआ।
कई बार मेरे मन में प्रश्न उठता है कि मैं अपनी प्रतिभा का उपरोक्त तीन प्रकार के उपयोगों में से किस प्रकार का उपयोग कर रहा हूँ? स्वयं को ही लगने लगता है कि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग मात्र कर रहा हूँ। और शायद वह भी इसलिए क्योंकि अपनी प्रतिभा का प्रयोग करने के लिए मुझे ब्लोगर रूपी मुफ्त मंच (free plateform) मिल गया है। जी हाँ, यह सही है कि यदि मुझे ब्लोगर बनने के लिए अपनी जेब से रुपये खर्च करने पड़ते तो मैं कदापि ब्लोगर न बना होता।
मैं जानता हूँ कि जिनमें लेखन की यह प्रतिभा नहीं है वे दूसरों को पढ़ना पसन्द करते हैं। किन्तु वे लोग मुझे पढ़ने के लिए लालायित कभी नहीं होते क्योंकि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग कर रहा हूँ, सदुपयोग नहीं।
यदि कभी मैं अपनी इस प्रतिभा से राष्ट्र, समाज, भाषा तथा अन्य लोगों का किंचित मात्र भी भला कर पाया तो मैं स्वयं को धन्य मानूँगा।
मनुष्यमात्र का यह स्वभाव है कि वह अपनी प्रतिभा का उपयोग करता है। यह उपयोग या तो सदुपयोग हो सकता है या दुरुपयोग हो सकता है या फिर महज एक उपयोग ही हो सकता है। जब कोई अपनी योग्यता का उपयोग करता है और उस उपयोग से समाज का, राष्ट्र का या अन्य अनेक लोगों का कल्याण होता है, राष्ट्र, समाज और लोगों तक उसकी योग्यता के माध्यम से कोई सार्थक सन्देश पहुँचता है तो योग्यता का यह उपयोग निःसन्देह सदुपयोग ही होता है और यदि इसके विपरीत होता है तो दुरुपयोग। किन्तु किसी की प्रतिभा से यदि किसी का न तो कल्याण होता है और न ही राष्ट्र, समाज और लोगों को किसी प्रकार की हानि ही पहुँचती है तो यह योग्यता का महज उपयोग हुआ।
कई बार मेरे मन में प्रश्न उठता है कि मैं अपनी प्रतिभा का उपरोक्त तीन प्रकार के उपयोगों में से किस प्रकार का उपयोग कर रहा हूँ? स्वयं को ही लगने लगता है कि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग मात्र कर रहा हूँ। और शायद वह भी इसलिए क्योंकि अपनी प्रतिभा का प्रयोग करने के लिए मुझे ब्लोगर रूपी मुफ्त मंच (free plateform) मिल गया है। जी हाँ, यह सही है कि यदि मुझे ब्लोगर बनने के लिए अपनी जेब से रुपये खर्च करने पड़ते तो मैं कदापि ब्लोगर न बना होता।
मैं जानता हूँ कि जिनमें लेखन की यह प्रतिभा नहीं है वे दूसरों को पढ़ना पसन्द करते हैं। किन्तु वे लोग मुझे पढ़ने के लिए लालायित कभी नहीं होते क्योंकि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग कर रहा हूँ, सदुपयोग नहीं।
यदि कभी मैं अपनी इस प्रतिभा से राष्ट्र, समाज, भाषा तथा अन्य लोगों का किंचित मात्र भी भला कर पाया तो मैं स्वयं को धन्य मानूँगा।
Sunday, November 28, 2010
गद्य की विधाएँ - कहानी
अंग्रेजी में जिसे 'शार्ट स्टोरी' कहते हैं उसी का प्रचलन हिंदी में कहानी के नाम से हुआ। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है। कहानी ने अंग्रेजी से हिंदी तक की यात्रा बंगला के माध्यम से की। कहानी गद्य कथा साहित्य का एक अन्यतम भेद तथा उपन्यास से भी अधिक लोकप्रिय साहित्य का रूप है।
मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में वर्णित 'यम-यमी', 'पुरुरवा-उर्वशी', 'सौपणीं-काद्रव', 'सनत्कुमार-नारद', 'गंगावतरण', 'श्रृंग', 'नहुष', 'ययाति', 'शकुन्तला', 'नल-दमयन्ती' जैसे आख्यान कहानी के ही प्राचीन रूप हैं।
प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। 'गुणढ्य' की "वृहत्कथा" को, जिसमें 'उदयन', 'वासवदत्ता', समुद्री व्यापारियों, राजकुमार तथा राजकुमारियों के पराक्रम की घटना प्रधान कथाओं का बाहुल्य है, प्राचीनतम रचना कहा जा सकता है। वृहत्कथा का प्रभाव 'दण्डी' के "दशकुमार चरित", 'वाणभट्ट' की "कादम्बरी", 'सुबन्धु' की "वासवदत्ता", 'धनपाल' की "तिलकमंजरी", 'सोमदेव' के "यशस्तिलक" तथा "मालतीमाधव", "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "मालविकाग्निमित्र", "विक्रमोर्वशीय", "रत्नावली", "मृच्छकटिकम्" जैसे अन्य काव्यग्रंथों पर साफ-साफ परिलक्षित होता है।
इसके पश्चात् छोटे आकार वाली "पंचतंत्र", "हितोपदेश", "बेताल पच्चीसी", "सिंहासन बत्तीसी", "शुक सप्तति", "कथा सरित्सागर", "भोजप्रबन्ध" जैसी साहित्यिक एवं कलात्मक कहानियों का युग आया। इन कहानियों से श्रोताओं को मनोरंजन के साथ ही साथ नीति का उपदेश भी प्राप्त होता है। प्रायः कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और धर्म पर अधर्म की विजय दिखाई गई हैं।
किन्तु वर्तमान कहानियों पर सर्वाधिक प्रभाव अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार 'एडगर एलिन पो' का है जिनके अनुसार एक सफल कहानी में एक केन्द्रीय कथ्य होता है जिसे प्रभावशाली और सघन बनाने के लिये कहानी के सभी तत्वों - कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल, उद्देश्य - का उपयोग किया जाता है। श्री पो के अनुसार कहानी की परिभाषा इस प्रकार हैः
"कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो।"
हिंदी कहानी को सर्वश्रेष्ठ रूप देने वाले 'प्रेमचन्द' ने भी श्री पो के विचारों को स्वीकारते हुये कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की हैः
"कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।"
कहानी के तत्व
रोचकता, प्रभाव तथा वक्ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाये रखने के लिये सभी प्रकार की कहानियों में कमोबेस निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं:
कथावस्तु: किसी कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिये कथावस्तु का होना अनिवार्य है क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं - आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह।
कथोपकथन अथवा संवाद: कहानी के पात्रों के द्वारा किये गये उनके विचारों की अभिव्यक्ति को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद के द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है।
देशकाल अथवा वातावरण: कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिये देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी कहानी में शाहजहाँ और मुमताज महल को आधुनिक कार में घूमते हुये बताया जाता है तो उसे हास्यास्पद ही माना जायेगा।
भाषा-शैली: कहानीकार के द्वारा कहानी के प्रस्तुतीकरण के ढंग को उसकी भाषा शैली कहा जाता है। प्रायः अलग-अलग कहानीकारों की भाषा-शैली भी अलग-अलग होती है।
उद्देश्य: कहानी केवल मनोरंजन के लिये ही नहीं होती, उसे एक निश्चित उद्देश्य लेकर लिखा जाता है।
मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में वर्णित 'यम-यमी', 'पुरुरवा-उर्वशी', 'सौपणीं-काद्रव', 'सनत्कुमार-नारद', 'गंगावतरण', 'श्रृंग', 'नहुष', 'ययाति', 'शकुन्तला', 'नल-दमयन्ती' जैसे आख्यान कहानी के ही प्राचीन रूप हैं।
प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। 'गुणढ्य' की "वृहत्कथा" को, जिसमें 'उदयन', 'वासवदत्ता', समुद्री व्यापारियों, राजकुमार तथा राजकुमारियों के पराक्रम की घटना प्रधान कथाओं का बाहुल्य है, प्राचीनतम रचना कहा जा सकता है। वृहत्कथा का प्रभाव 'दण्डी' के "दशकुमार चरित", 'वाणभट्ट' की "कादम्बरी", 'सुबन्धु' की "वासवदत्ता", 'धनपाल' की "तिलकमंजरी", 'सोमदेव' के "यशस्तिलक" तथा "मालतीमाधव", "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "मालविकाग्निमित्र", "विक्रमोर्वशीय", "रत्नावली", "मृच्छकटिकम्" जैसे अन्य काव्यग्रंथों पर साफ-साफ परिलक्षित होता है।
इसके पश्चात् छोटे आकार वाली "पंचतंत्र", "हितोपदेश", "बेताल पच्चीसी", "सिंहासन बत्तीसी", "शुक सप्तति", "कथा सरित्सागर", "भोजप्रबन्ध" जैसी साहित्यिक एवं कलात्मक कहानियों का युग आया। इन कहानियों से श्रोताओं को मनोरंजन के साथ ही साथ नीति का उपदेश भी प्राप्त होता है। प्रायः कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और धर्म पर अधर्म की विजय दिखाई गई हैं।
किन्तु वर्तमान कहानियों पर सर्वाधिक प्रभाव अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार 'एडगर एलिन पो' का है जिनके अनुसार एक सफल कहानी में एक केन्द्रीय कथ्य होता है जिसे प्रभावशाली और सघन बनाने के लिये कहानी के सभी तत्वों - कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल, उद्देश्य - का उपयोग किया जाता है। श्री पो के अनुसार कहानी की परिभाषा इस प्रकार हैः
"कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो।"
हिंदी कहानी को सर्वश्रेष्ठ रूप देने वाले 'प्रेमचन्द' ने भी श्री पो के विचारों को स्वीकारते हुये कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की हैः
"कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।"
कहानी के तत्व
रोचकता, प्रभाव तथा वक्ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाये रखने के लिये सभी प्रकार की कहानियों में कमोबेस निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं:
कथावस्तु: किसी कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिये कथावस्तु का होना अनिवार्य है क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं - आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह।
- 'आरम्भ' में कहानीकार कहानी के शीर्षक तथा प्रारमंभिक अनुच्छेदों के द्वारा पाठक को कथासूत्र से अवगत कराता है जिससे कि वह कहानी के प्रति आकर्षित होकर उसमें रमने लगे। सफल आरम्भ वह होता है जिसमें कि कहानी शुरू करते ही पाठका का मन कुतूहल और जिज्ञासा से भर जाये।
- कहानी के विकास की अवस्था को कहानी का 'आरोह' कहते हैं। आरोह में कहानीकार घटनाक्रम को सहज रूप में प्रस्तुत करता है और पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन करता है।
- जब कहानी पढ़ते-पढ़ते पाठक कौतूहल की पराकाष्ठा में पहुँच जाये तो उसे कहानी की 'चरम स्थिति' कहते हैं।
- पाठक को जब कहानी के उद्देश्य का प्रतिफल प्राप्त होता है उसे कहानी का 'अवरोह' अथवा 'अंत' कहते हैं। कहानी के अवरोह में संक्षिप्तता तथा मार्मिकता पर अधिक जोर दिया जाता है।
कथोपकथन अथवा संवाद: कहानी के पात्रों के द्वारा किये गये उनके विचारों की अभिव्यक्ति को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद के द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है।
देशकाल अथवा वातावरण: कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिये देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी कहानी में शाहजहाँ और मुमताज महल को आधुनिक कार में घूमते हुये बताया जाता है तो उसे हास्यास्पद ही माना जायेगा।
भाषा-शैली: कहानीकार के द्वारा कहानी के प्रस्तुतीकरण के ढंग को उसकी भाषा शैली कहा जाता है। प्रायः अलग-अलग कहानीकारों की भाषा-शैली भी अलग-अलग होती है।
उद्देश्य: कहानी केवल मनोरंजन के लिये ही नहीं होती, उसे एक निश्चित उद्देश्य लेकर लिखा जाता है।
Saturday, November 27, 2010
फोकट में पाइस अउ मरत ले खाइस
छत्तीसगढ़ी में एक लोकोक्ति है "फोकट में पाइस अउ मरत ले खाइस" जिसका अर्थ है मुफ्त में खाने को मिला तो इतना खाया कि प्राण ही निकल गए। इस लोकोक्ति से यही सन्देश मिलता है कि अधिक लालच प्राणघाती होता है। इसीलिए तो कबीरदास जी ने भी कहा हैः
माखी गुड़ में गड़ि रहै पंख रह्यौ लिपटाय।
हाथ मलै और सिर धुनै लालच बुरी बलाय॥
लालच अर्थात् लोभ व्यक्ति को हमेशा नुकसान ही पहुँचाता है। छत्तीसगढ़ी के एक अन्य लोकोक्ति में कहा गया है - "लोभिया ला लबरा ठगे" जिसका अर्थ है "लोभी व्यक्ति को झूठा आदमी ठग लेता है"।
वास्तविकता तो यह है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति लोभी या लालची होता है, लालच या लोभ प्राणीमात्र की स्वाभाविक मानसिकता है। चारे की लालच में मछली बंशी में फँस कर जान गवाँ देती है, पक्षी जाल में फँस जाते हैं, वन्य पशु भी मनुष्य की गिरफ्त में आ जाते हैं। मछली, पक्षी, वन्य पशुओं आदि के लालच का फायदा मनुष्य उठाता है चारे की लालच देकर।
मनुष्य न केवल अन्य प्राणियों के बल्कि मनुष्यों के भी लालच की मानसिकता का फायदा उठाता है चारे के रूप में "फोकट" या "मुफ्त" शब्द का इस्तेमाल करके। वास्तव में "फ्री", "मुफ्त", "फोकट" जैसे शब्द अचूक हथियार हैं लोगों के भीतर की लालच को उभारने के लिए। ये शब्द लोगों को बरबस ही आकर्षित कर लेते हैं। मुफ्त में मिलने वाली चीज को छोड़ देना कोई भी पसंद नहीं करता। वो कहते हैं ना “माले मुफ्त दिले बेरहम”। किन्तु इस मुफ्त पाने के चक्कर में हम लोगों को कितना लूटा जाता है यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा।
बाजार में आप "दो साबुन खरीदने पर एक साबुन बिल्कुल मुफ्त!" जैसी स्कीम रोज ही देखते होंगे। और इस स्कीम को जान कर हम खुश हो जाते हैं यह सोचकर कि एक साबुन हमें मुफ्त मिल रहा है, परिणामस्वरूप हम एक के बजाय तीन साबुन खरीद लेते हैं। तीन साबुन की फिलहाल हमें कतइ जरूरत नहीं है फिर भी हम तीन साबुन खरीद लेते हैं। क्यों? सिर्फ लालच में आकर। किन्तु हमें यह पता होना चाहिए कि जिसने हमें दो साबुन की कीमत में तीन साबुन दिए हैं उसने घाटा खाने के लिए दुकान नहीं खोला है, उसने हमसे कुछ न कुछ कमाया ही है। उसने अपनी कमाई के लिए हमारी लालच की मानसिकता का लाभ उठाते हुए हमें बेवकूफ बनाया है।
कैसे बेवकूफ बनाया है उसने?
मान लीजिये एक साबुन की कीमत पन्द्रह रुपये हैं तो दो साबुन के दाम अर्थात् तीस रुपये में आपको तीन साबुन मिलते हैं। जरा सोचिये, साबुन बनाने वाली कम्पनी बेवकूफ तो है नहीं जो कि बिना किसी लाभ के साबुन बेचेगी। तीस रुपये में तीन साबुन बेचने पर भी उसे लाभ ही हो रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक साबुन का मूल्य मात्र दस रुपये हैं। तो इस हिसाब से कम्पनी को साबुन का दाम पन्द्रह रुपये से कम करके दस रुपये कर देना चाहिये। पर कम्पनी दाम कम न कर के आपको एक मुफ्त साबुन का लालच देती है और आप लालच में आकर एक साबुन के बदले तीन साबुन खरीद लेते हैं जबकि दो अतिरिक्त खरीदे गये साबुनों की आपको फिलहाल बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। यदि कम्पनी ने दाम कम कर दिया होता तो आप दस रुपये में एक ही साबुन खरीदते और बाकी बीस रुपये का कहीं और सदुपयोग करते। इस तरह से दाम न घटाने का कम्पनी को एक और फायदा होता है वह यह कि यदि आप केवल एक साबुन खरीदेंगे तो आपको पन्द्रह रुपये देने पड़ेंगे। इस प्रकार से सिर्फ एक साबुन खरीदने पर मुनाफाखोर कम्पनी आपके पाँच रुपये जबरन लूट लेगी। बताइये यह व्यापार है या लूट?
भाई मेरे, यदि साबुन बिल्कुल मुफ्त है तो मुफ्त में दो ना, चाहे कोई दो साबुन खरीदे या ना खरीदे। ये दो साबुन खरीदने की शर्त क्यों रखते हो?
विडम्बना तो यह है कि अपनी गाढ़ी कमाई की रकम को लुटाने के लिये हम सभी मजबूर हैं क्योंकि सरकार ऐसे मामलों अनदेखा करती रहती है। इन कम्पनियों से सभी राजनीतिक दलों को मोटी रकम जो मिलती है चन्दे के रूप में।
सच बात तो यह है कि फ्री या मुफ्त में कोई किसी को कुछ भी नहीं देता। किसी जमाने में पानी मुफ्त मिला करता था पर आज तो उसके भी दाम देने पड़ते हैं।
यदि कोई कुछ भी चीज मुफ्त में देता है तो अवश्य ही उसका स्वार्थ रहता है उसमें।
माखी गुड़ में गड़ि रहै पंख रह्यौ लिपटाय।
हाथ मलै और सिर धुनै लालच बुरी बलाय॥
लालच अर्थात् लोभ व्यक्ति को हमेशा नुकसान ही पहुँचाता है। छत्तीसगढ़ी के एक अन्य लोकोक्ति में कहा गया है - "लोभिया ला लबरा ठगे" जिसका अर्थ है "लोभी व्यक्ति को झूठा आदमी ठग लेता है"।
वास्तविकता तो यह है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति लोभी या लालची होता है, लालच या लोभ प्राणीमात्र की स्वाभाविक मानसिकता है। चारे की लालच में मछली बंशी में फँस कर जान गवाँ देती है, पक्षी जाल में फँस जाते हैं, वन्य पशु भी मनुष्य की गिरफ्त में आ जाते हैं। मछली, पक्षी, वन्य पशुओं आदि के लालच का फायदा मनुष्य उठाता है चारे की लालच देकर।
मनुष्य न केवल अन्य प्राणियों के बल्कि मनुष्यों के भी लालच की मानसिकता का फायदा उठाता है चारे के रूप में "फोकट" या "मुफ्त" शब्द का इस्तेमाल करके। वास्तव में "फ्री", "मुफ्त", "फोकट" जैसे शब्द अचूक हथियार हैं लोगों के भीतर की लालच को उभारने के लिए। ये शब्द लोगों को बरबस ही आकर्षित कर लेते हैं। मुफ्त में मिलने वाली चीज को छोड़ देना कोई भी पसंद नहीं करता। वो कहते हैं ना “माले मुफ्त दिले बेरहम”। किन्तु इस मुफ्त पाने के चक्कर में हम लोगों को कितना लूटा जाता है यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा।
बाजार में आप "दो साबुन खरीदने पर एक साबुन बिल्कुल मुफ्त!" जैसी स्कीम रोज ही देखते होंगे। और इस स्कीम को जान कर हम खुश हो जाते हैं यह सोचकर कि एक साबुन हमें मुफ्त मिल रहा है, परिणामस्वरूप हम एक के बजाय तीन साबुन खरीद लेते हैं। तीन साबुन की फिलहाल हमें कतइ जरूरत नहीं है फिर भी हम तीन साबुन खरीद लेते हैं। क्यों? सिर्फ लालच में आकर। किन्तु हमें यह पता होना चाहिए कि जिसने हमें दो साबुन की कीमत में तीन साबुन दिए हैं उसने घाटा खाने के लिए दुकान नहीं खोला है, उसने हमसे कुछ न कुछ कमाया ही है। उसने अपनी कमाई के लिए हमारी लालच की मानसिकता का लाभ उठाते हुए हमें बेवकूफ बनाया है।
कैसे बेवकूफ बनाया है उसने?
मान लीजिये एक साबुन की कीमत पन्द्रह रुपये हैं तो दो साबुन के दाम अर्थात् तीस रुपये में आपको तीन साबुन मिलते हैं। जरा सोचिये, साबुन बनाने वाली कम्पनी बेवकूफ तो है नहीं जो कि बिना किसी लाभ के साबुन बेचेगी। तीस रुपये में तीन साबुन बेचने पर भी उसे लाभ ही हो रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक साबुन का मूल्य मात्र दस रुपये हैं। तो इस हिसाब से कम्पनी को साबुन का दाम पन्द्रह रुपये से कम करके दस रुपये कर देना चाहिये। पर कम्पनी दाम कम न कर के आपको एक मुफ्त साबुन का लालच देती है और आप लालच में आकर एक साबुन के बदले तीन साबुन खरीद लेते हैं जबकि दो अतिरिक्त खरीदे गये साबुनों की आपको फिलहाल बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। यदि कम्पनी ने दाम कम कर दिया होता तो आप दस रुपये में एक ही साबुन खरीदते और बाकी बीस रुपये का कहीं और सदुपयोग करते। इस तरह से दाम न घटाने का कम्पनी को एक और फायदा होता है वह यह कि यदि आप केवल एक साबुन खरीदेंगे तो आपको पन्द्रह रुपये देने पड़ेंगे। इस प्रकार से सिर्फ एक साबुन खरीदने पर मुनाफाखोर कम्पनी आपके पाँच रुपये जबरन लूट लेगी। बताइये यह व्यापार है या लूट?
भाई मेरे, यदि साबुन बिल्कुल मुफ्त है तो मुफ्त में दो ना, चाहे कोई दो साबुन खरीदे या ना खरीदे। ये दो साबुन खरीदने की शर्त क्यों रखते हो?
विडम्बना तो यह है कि अपनी गाढ़ी कमाई की रकम को लुटाने के लिये हम सभी मजबूर हैं क्योंकि सरकार ऐसे मामलों अनदेखा करती रहती है। इन कम्पनियों से सभी राजनीतिक दलों को मोटी रकम जो मिलती है चन्दे के रूप में।
सच बात तो यह है कि फ्री या मुफ्त में कोई किसी को कुछ भी नहीं देता। किसी जमाने में पानी मुफ्त मिला करता था पर आज तो उसके भी दाम देने पड़ते हैं।
यदि कोई कुछ भी चीज मुफ्त में देता है तो अवश्य ही उसका स्वार्थ रहता है उसमें।
Friday, November 26, 2010
गद्य की विधाएँ - निबन्ध
"निबन्ध" शब्द का मूल है "बन्ध", निबन्ध का अर्थ होता है बाँधना। किसी विषयवस्तु से सम्बन्धित ज्ञान को क्रमबद्ध रूप से बाँधते हुए लेखन को निबन्ध कहा जाता है। बाबू गुलाबराय ने निबन्ध को इस प्रकार से परिभाषित किया है -
एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय या वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता तथा सम्बद्धता के साथ किया जाना ही निबन्ध कहलाता है।
निबन्ध के निम्न मुख्य भेद होते हैं -
वर्णनात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, दृश्य आदि का निरीक्षण के आधार पर रोचक तथा आकर्षक वर्णन किया जाए तो उसे वर्णनात्मक निबन्ध कहा जाता है।
विवरणात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में ऐतिहासि तथा सामाजिक घटनाओं, स्थानों, दृश्यों आदि का रोचक तथा आकर्षक विवरण दिया जाए तो उसे विवरणात्मक निबन्ध कहा जाता है।
भावात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में हृदय में उत्पन्न होने वाले भावों तथा रागों को दर्शाया जाए तो उसे भावात्मक निबन्ध कहा जाता है। ऐसे निबन्धों की भाषा सरल, मधुर, ललित तथा संगीतमय होती है और ये निबन्ध कवित्वपूर्ण तथा प्रवाहमय प्रतीत होते हैं।
एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय या वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता तथा सम्बद्धता के साथ किया जाना ही निबन्ध कहलाता है।
निबन्ध के निम्न मुख्य भेद होते हैं -
- विचारात्मक
- वर्णनात्मक
- विवराणात्मक
- भावात्मक
वर्णनात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, दृश्य आदि का निरीक्षण के आधार पर रोचक तथा आकर्षक वर्णन किया जाए तो उसे वर्णनात्मक निबन्ध कहा जाता है।
विवरणात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में ऐतिहासि तथा सामाजिक घटनाओं, स्थानों, दृश्यों आदि का रोचक तथा आकर्षक विवरण दिया जाए तो उसे विवरणात्मक निबन्ध कहा जाता है।
भावात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में हृदय में उत्पन्न होने वाले भावों तथा रागों को दर्शाया जाए तो उसे भावात्मक निबन्ध कहा जाता है। ऐसे निबन्धों की भाषा सरल, मधुर, ललित तथा संगीतमय होती है और ये निबन्ध कवित्वपूर्ण तथा प्रवाहमय प्रतीत होते हैं।
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