आप हों या मैं, प्रायः हम सब को लगता है कि सामने वाला बहुत मजे में है और मैं हूँ कि परेशानी पीछा ही नहीं छोड़ती। पुरानी कहावत भी है "हर किसी को दूसरे की थाली में ज्यादा घी नजर आता है"।
क्यों लगता है ऐसा?
दफ्तर का बाबू सोचता है कि मैं तो मर-मर कर काम कर रहा हूँ पर इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि घर चलाना मुश्किल है। और साहब को देखो कुछ ज्यादा काम करना ना धरना पर मोटी तनख्वाह ऐंठ लेते हैं।
घरवाली सोचती है कि मैंने कितना मेहनत कर के खाना बनाया और पतिदेव हैं कि सराहना करना तो दूर उल्टे हमेशा नुक्स निकालते रहते हैं मेरे बनाए खाने में।
नौकरी करने वाला सोचता है कि व्यापारी सुखी है, रोज ही पैसे आते हैं उसके पास, यहाँ तो महीने में एक बार वेतन मिलता है जो चार दिन में ही खर्च हो जाता है, उसके बाद फिर वही उधारी। दूसरी तरफ व्यापारी सोचता है कि दिन भर हाय-हाय करो पर बिक्री बढ़ती ही नहीं, नौकरी करने वाला कितना खुश है कि काम कुछ करे कि मत करे, महीना खत्म हुआ और तनख्वाह हाथ में हाजिर!
हर किसी को लगता है कि मैं परेशान हूँ और "वो" मजे में है।
क्यों लगता है ऐसा?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उसके परिवार, समाज, कार्यालय आदि में अन्य लोगों से सम्बन्ध बनते तथा बिगड़ते ही रहते हैं। सम्बन्धों का मधुर या कटु होना मनुष्य के व्यवहार पर निर्भर होता है। व्यवहार एकतरफा नहीं बल्कि दोतरफा होता है। जब दो व्यक्ति के बीच सम्बन्ध बनता है तो उस सम्बन्ध पर दोनों ही व्यक्तियों का व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।
मनुष्यों के आपसी व्यवहार की चार स्थितियाँ होती है -
मैं मजे में तू मजे में (I’m OK, You’re OK)
मैं मजे में तू परेशान (I’m OK, You’re not OK)
मैं परेशान तू मजे में (I’m not OK, You’re OK)
मैं परेशान तू परेशान (I’m not OK, You’re not OK)
उपरोक्त परिस्थितियाँ किन्हीं भी दो लोगों के बीच हो सकती हैं, चाहे वे बाप-बेटे हों, भाई-भाई हों, पति-पत्नी हों, अधिकारी-कर्मचारी हों, दुकानदार-ग्राहक हों, यानी कि उनके बीच चाहे जैसा भी आपसी सम्बन्ध हों।
यदि दो व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध है और वे दोनों ही एक दूसरे से सन्तुष्ट हैं तो यह सबसे अच्छी बात है। यही ऊपर बताई गई स्थितियों में पहली स्थिति है। किन्तु यह एक आदर्श स्थिति है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन में शायद ही कभी आ पाती है। ज्यादातर होता यह है कि हम अपनी बला दूसरे सिर पर लाद कर खुश होते हैं और दूसरा परेशान रहता है या फिर इसके उल्टे दूसरा व्यक्ति अपने झंझटों को हम पर डाल कर हमें परेशान कर देता है और खुद निश्चिंत हो जाता है। याने कि उपरोक्त बताई गई स्थितियों में दूसरी और तीसरी स्थितियाँ ही हमारे जीवन में अक्सर आते रहती हैं। पर कभी कभी ऐसा भी होता है कि लाख कोशिश करने के बावजूद हम और सामने वाला दोनों ही संतुष्ट नहीं हो पाते याने कि दोनों के दोनों परेशान। यह चौथी स्थिति है जो कि सबसे खतरनाक है।
मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित इस विषय पर थॉमस एन्थॉनी हैरिस द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक I’m OK, You’re OK बहुत ही लोकप्रिय है। यह पुस्तक व्यवहार विश्लेषण (Transactional Analysis) पर आधारित है। श्री हैरिस की पुस्तक इस बात का विश्लेषण करती है कि उपरोक्त व्यवहारिक स्थितियाँ क्यों बनती हैं। उनका सिद्धांत बताता है कि मनुष्य निम्न तीन प्रकार से सोच-विचार किया करता है:
बचकाने ढंग से (Child): इस प्रकार के सोच-विचार पर मनुष्य की आन्तरिक भावनाएँ तथा कल्पनाएँ हावी रहती है (dominated by feelings)। आकाश में उड़ने की सोचना इसका एक उदाहरण है।
पालक के ढंग से (Parent): यह वो सोच-विचार होता है जिसे कि मनुष्य ने बचपने में अपने पालकों से, रीति-रिवाजों से, धर्म-सम्बन्धी प्रवचनों आदि से, सीखा होता है (unfiltered; taken as truths)। ‘बड़ों का आदर करना चाहिए’, ‘झूठ बोलना पाप है’, ‘दायें बायें देखकर सड़क पार करना’ आदि वाक्य बच्चों को कहना इस प्रकार के सोच के उदाहरण है।
वयस्क ढंग से (Adult): बुद्धिमत्तापूर्ण तथा तर्कसंगत सोच वयस्क ढंग का सोच होता है (reasoning, logical)। सोच-विचार करने का यही सबसे सही तरीका है।
हमारे सोच-विचार करने के ढंग के कारण ही हमारे व्यवहार बनते है। जब दो व्यक्ति वयस्क ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो ही दोनों की संतुष्टि प्रदान करने वाला व्यवहार होता है जो कि “मैं मजे में तू मजे में (I’m OK, You’re OK)” वाली स्थिति होती है। जब दो व्यक्तियों में से एक वयस्क ढंग से सोच-विचार करके तथा दूसरा बचकाने अथवा पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो “मैं मजे में तू परेशान (I’m OK, You’re not OK)” या “मैं परेशान तू मजे में (I’m not OK, You’re OK)” वाली स्थिति बनती है। किन्तु जब दो व्यक्ति बचकाने या पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो “मैं परेशान तू परेशान (I’m not OK, You’re not OK)” वाली स्थिति बनती है।
किन्तु स्मरण रहे कि यद्यपि वयस्क ढंग से सोच-विचार करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है किन्तु बचकाने ढंग से और पालक ढंग से सोच-विचार करने का भी अपना महत्व है। न्यूटन ने यदि बचकाने ढंग से न सोचा होता तो हमें गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त कभी भी न मिला होता। पालक ढंग से सोचना यदि समाप्त हो जाए तो समाज में भयंकर मनमानी होने लगे।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर व्यवहार करने से ही सभी की संतुष्टि हो सकती है।
Saturday, January 8, 2011
Wednesday, January 5, 2011
ठण्ड से ठिठुराता हुआ शिशिर
प्रकृति ने भाँति-भाँति के पुष्पों से अपना श्रृंगार कर लिया है। भारतवर्ष के प्रहरी हिमालय के क्षेत्रों में गिरे हुए हिमकणों ने हिमशिला का रूप धारण कर लिया है। वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा से तीव्र गति से प्रवाहित होती हुई शीतल समीर की लहरों ने आर्यावर्त को अपने आगोश में समेट लिया है जिसके परिणामस्वरूप लोग ठण्ड से ठिठुरने लगे हैं। यद्यपि प्रचण्ड शीत ने भगवान भास्कर की किरणों की प्रखरता को विनष्टप्राय कर दिया है फिर भी सूर्य-किरणों का स्पर्श प्रिय लगने लगा है। अग्नि की ऊष्मा आकर्षित करने लगी है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है और गोरस की नदियाँ बहने लगी हैं।
उपरोक्त बातें इस बात का द्योतक हैं कि हेमन्त ऋतु के प्रस्थान के साथ ही शिशिर ऋतु का आगमन हो चुका है।
शिशिर ऋतु में फूलों के पौधे फूलों से लद जाते हैं। बाजार में नर्सरी से बिकने वाले पुष्पयुक्त पौधों की भरमार दिखाई देने लगती है। सब्जियों के पौधे तथा लताएँ अपने उत्पादन की चरम स्थिति में पहुँच जाती है। बाजार सब्जियों से पट-सा जाता है। भोजन अत्यन्त सुस्वादु लगने लगता है और रसना उसका रस लेते हुए अघाती तक नहीं है। जठराग्नि इतनी तेज हो जाती है कि कुछ भी और कितना भी खाओ, सब पच जाता है।
शिशिर ऋतु की अपनी अलग ही प्राकृतिक विलक्षणता है जिसका वर्णन 'सेनापति' अलौकिक रूप से इस प्रकार करते हैं
सिसिर में ससि को सरूप वाले सविताऊ,
घाम हू में चाँदनी की दुति दमकति है।
सेनापति होत सीतलता है सहज गुनी,
रजनी की झाँईं वासर में झलकति है॥
चाहत चकोर सूर ओर दृग छोर करि,
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।
चंद के भरम होत मोद है कुमुदिनी को,
ससि संक पंकजनी फूलि न सकति है॥
अर्थात - शिशिर ऋतु में सूर्य भी चन्द्रमा के स्वरूप वाला हो जाता है और धूप में चाँदनी का भास होने लगता है। 'सेनापति' कहते हैं कि इस ऋतु में शीतलता सौ गुनी बढ़ जाती है जिसके कारण दिन में भी रात्रि का आभास सा होने लगता है। सूर्य को चन्द्रमा समझकर चकवा पक्षी उसी की ओर देखने में मग्न हो जाता है और चकवी की छाती धड़कने लगती है। कुमुदनी भी सूर्य को चन्द्र समझकर मुदित हो खिल उठती है और कमल सूर्य के चन्द्र होने की शंका के कारण खिल नहीं पाता।
उपरोक्त बातें इस बात का द्योतक हैं कि हेमन्त ऋतु के प्रस्थान के साथ ही शिशिर ऋतु का आगमन हो चुका है।
शिशिर ऋतु में फूलों के पौधे फूलों से लद जाते हैं। बाजार में नर्सरी से बिकने वाले पुष्पयुक्त पौधों की भरमार दिखाई देने लगती है। सब्जियों के पौधे तथा लताएँ अपने उत्पादन की चरम स्थिति में पहुँच जाती है। बाजार सब्जियों से पट-सा जाता है। भोजन अत्यन्त सुस्वादु लगने लगता है और रसना उसका रस लेते हुए अघाती तक नहीं है। जठराग्नि इतनी तेज हो जाती है कि कुछ भी और कितना भी खाओ, सब पच जाता है।
शिशिर ऋतु की अपनी अलग ही प्राकृतिक विलक्षणता है जिसका वर्णन 'सेनापति' अलौकिक रूप से इस प्रकार करते हैं
सिसिर में ससि को सरूप वाले सविताऊ,
घाम हू में चाँदनी की दुति दमकति है।
सेनापति होत सीतलता है सहज गुनी,
रजनी की झाँईं वासर में झलकति है॥
चाहत चकोर सूर ओर दृग छोर करि,
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।
चंद के भरम होत मोद है कुमुदिनी को,
ससि संक पंकजनी फूलि न सकति है॥
अर्थात - शिशिर ऋतु में सूर्य भी चन्द्रमा के स्वरूप वाला हो जाता है और धूप में चाँदनी का भास होने लगता है। 'सेनापति' कहते हैं कि इस ऋतु में शीतलता सौ गुनी बढ़ जाती है जिसके कारण दिन में भी रात्रि का आभास सा होने लगता है। सूर्य को चन्द्रमा समझकर चकवा पक्षी उसी की ओर देखने में मग्न हो जाता है और चकवी की छाती धड़कने लगती है। कुमुदनी भी सूर्य को चन्द्र समझकर मुदित हो खिल उठती है और कमल सूर्य के चन्द्र होने की शंका के कारण खिल नहीं पाता।
Monday, January 3, 2011
महमूद का अभियान
लेखकः आचार्य चतुरसेन
महमूद ने गुजरात पर चढ़ाई तो अवश्य की और सोमनाथ को भंग भी किया, गुजरात और सोमनाथ को लूटा भी, फिर भी उसने अपनी सत्ता हिन्द में स्थापित करने की चेष्टा नहीं की। उसने बहुत-से प्रदेशों को सर किया, फिर भी उनमें सूबाओं द्वारा अपनी सत्ता जमाने का उद्योग नहीं किया। वह एक साहसी योद्धा अवश्य था, परन्तु उसे साम्राज्य का शौक नहीं लगा, उसे तो सम्पत्ति की ही भूख थी। और यही कारण था कि सोमनाथ के पराभव होने के बाद गुजरात पर ऐसी भयानक विपत्ति आकने पर भी समग्र गुजरात के जीवन का प्रवाह महमूद की पीठ फेरते ही पूर्ववत चलता रहा। यह एक बड़े ही आश्चर्य का विषय था। वास्तव में वह युग ही दूसरा था। महमूद जिस ऊजड़ प्रदेश में रहता था, वहाँ अनन्त भू-विस्तार उसके अधीन था। इसलिए उसे धरती की भूख नहीं थी। अमर कीर्ति की लालसा थी - धन का लोभ था।
कुछ इतिहासकार महमूद को धर्मान्ध कहते हैं। और उनका कहना यह है कि उसने सोमनाथ की मूर्ति भंग करने के लिए ही यह जिहाद का झण्डा उठाया था, परन्तु कुछ इतिहासकार उसे लुटेरा कहते हैं। सम्भवतः दोनों ही बातों में सत्य हो, और इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर महमूद ने ऐसे भारी-भारी अभियान किए हों। फिर भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि महमूद के दुस्साहस में उसकी प्रजा का पूरा-पूरा हाथ था। महमूद बादशा था, फिर भी प्रजा का सेवक था। यह जमाना वोटोक्रेसी अथवा मिलिटरी डिक्टेटरशिप का था। परन्तु राज्य का कारोबार डेमोक्रेसी पद्धति पर चलता था। आज डेमोक्रेसी का युग है, पर कार बार सब डिक्टेटरशिप की रीति पर चलते हैं। स्टालिन की सोवियत सरकार तो यह कहती रही कि स्वातन्त्र्य के लिए ही यह डिक्टेटरशिप है।
महमूद का यह युग गज़नी की ज़ाहोज़लाली, राजा और प्रजा के प्रेम, मुसलमानों की साहसप्रियता, भारतीय क्षत्रियों के अनैक्य तथा विजि प्रजा के साथ महमूद की उदारता और मूर्ति-पूजा का विकृत रूप प्रकट करता है।
ऐतिहासिक आधार पर नीचे लिखी बातें प्रमाणित हैं -
सोमनाथ के विनाश और जीर्णोद्धार का विवरण श्री अमृतलाल पाण्ड्या ने इस प्रकार दिया है -
इस प्रकार एक के बाद दूसरा आक्रमणकारी आता गया जाता गया, और सोमनाथदेव अपना चोला बदलता गया। वे सब आक्रमणकारी आज नहीं रहे, परन्तु देवाधिदेव सोमनाथ आज भी उसी स्थान पर सुप्रतिष्ठित हैं। सम्पूर्ण विश्व में आज के दिन सुपूजित इतना प्राचीन देवता कोई दूसरा नहीं है।
(सामग्री आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोमनाथ" से साभार)
महमूद ने गुजरात पर चढ़ाई तो अवश्य की और सोमनाथ को भंग भी किया, गुजरात और सोमनाथ को लूटा भी, फिर भी उसने अपनी सत्ता हिन्द में स्थापित करने की चेष्टा नहीं की। उसने बहुत-से प्रदेशों को सर किया, फिर भी उनमें सूबाओं द्वारा अपनी सत्ता जमाने का उद्योग नहीं किया। वह एक साहसी योद्धा अवश्य था, परन्तु उसे साम्राज्य का शौक नहीं लगा, उसे तो सम्पत्ति की ही भूख थी। और यही कारण था कि सोमनाथ के पराभव होने के बाद गुजरात पर ऐसी भयानक विपत्ति आकने पर भी समग्र गुजरात के जीवन का प्रवाह महमूद की पीठ फेरते ही पूर्ववत चलता रहा। यह एक बड़े ही आश्चर्य का विषय था। वास्तव में वह युग ही दूसरा था। महमूद जिस ऊजड़ प्रदेश में रहता था, वहाँ अनन्त भू-विस्तार उसके अधीन था। इसलिए उसे धरती की भूख नहीं थी। अमर कीर्ति की लालसा थी - धन का लोभ था।
कुछ इतिहासकार महमूद को धर्मान्ध कहते हैं। और उनका कहना यह है कि उसने सोमनाथ की मूर्ति भंग करने के लिए ही यह जिहाद का झण्डा उठाया था, परन्तु कुछ इतिहासकार उसे लुटेरा कहते हैं। सम्भवतः दोनों ही बातों में सत्य हो, और इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर महमूद ने ऐसे भारी-भारी अभियान किए हों। फिर भी इतना तो कहना ही पड़ेगा कि महमूद के दुस्साहस में उसकी प्रजा का पूरा-पूरा हाथ था। महमूद बादशा था, फिर भी प्रजा का सेवक था। यह जमाना वोटोक्रेसी अथवा मिलिटरी डिक्टेटरशिप का था। परन्तु राज्य का कारोबार डेमोक्रेसी पद्धति पर चलता था। आज डेमोक्रेसी का युग है, पर कार बार सब डिक्टेटरशिप की रीति पर चलते हैं। स्टालिन की सोवियत सरकार तो यह कहती रही कि स्वातन्त्र्य के लिए ही यह डिक्टेटरशिप है।
महमूद का यह युग गज़नी की ज़ाहोज़लाली, राजा और प्रजा के प्रेम, मुसलमानों की साहसप्रियता, भारतीय क्षत्रियों के अनैक्य तथा विजि प्रजा के साथ महमूद की उदारता और मूर्ति-पूजा का विकृत रूप प्रकट करता है।
ऐतिहासिक आधार पर नीचे लिखी बातें प्रमाणित हैं -
- ईस्वी सन् 1025 में महमूद ने आक्रमण किया।
- क्षत्रिय राजाओं के भय से उसे मरुस्थली की राह से आना पड़ा।
- रास्ते में गुर्जरेश्वर भीम के भय से उसे कच्छ के महारन से वापस जाना पड़ा।
- उसने सोमनाथ का मन्दिर तोड़ा।
- वह आया और चला गया। किन्तु गुजरात का राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवन अभंग ही रहा। इस आक्रमण को इतना तुच्छ समझा गया कि हेमचन्द्र, सोमेश्वर और मेरुतुंग-जैसे इतिहासकारों ने उसकी कहीं चर्चा तक नहीं की।
- गुजरात की सत्ता और समृद्धि में कुछ भी कमी न आई, क्योंकि उसके सात ही वर्ष बाद 1032 में मन्त्रीश्वर विमलदेवशाह ने आबू पर आदिनाथ का मन्दिर बनवाया, जिसमें अठारह करोड़ रुपए खर्च हुए।
सोमनाथ के विनाश और जीर्णोद्धार का विवरण श्री अमृतलाल पाण्ड्या ने इस प्रकार दिया है -
| विनाशः- | जीर्णोद्धारः- |
| महमूद गज़नवी ईस्वी सन् 1024 | भीमदेव प्रथम, ईस्वी सन् 1026 कुमारपाल, ईस्वी सन् 1196 |
| अलफ खान, ईस्वी सन् 1297 अहमदशाह, ईस्वी सन् 1314 शम्सखान, ईस्वी सन् 1318 | महीपाल, ईस्वी सन् 1325 |
| मुजफ्फरखान दूसरा, ईस्वी सन् 1394 तातारखान, ईस्वी सन् 1520 औरंगजेब मारफत, ईस्वी सन् 1706 | अहिल्याबाई होल्कर, ईस्वी सन् 1765 |
इस प्रकार एक के बाद दूसरा आक्रमणकारी आता गया जाता गया, और सोमनाथदेव अपना चोला बदलता गया। वे सब आक्रमणकारी आज नहीं रहे, परन्तु देवाधिदेव सोमनाथ आज भी उसी स्थान पर सुप्रतिष्ठित हैं। सम्पूर्ण विश्व में आज के दिन सुपूजित इतना प्राचीन देवता कोई दूसरा नहीं है।
(सामग्री आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोमनाथ" से साभार)
Thursday, December 30, 2010
अमर शहीद ऊधम सिंह
"मैं परवाह नहीं करता, मर जाना कोई बुरी बात नहीं है। क्या फायदा है यदि मौत का इंतजार करते हुए हम बूढ़े हो जाएँ? ऐसा करना कोई अच्छी बात नहीं है। यदि हम मरना चाहते हैं तो युवावस्था में मरें। यही अच्छा है और यही मैं कर रहा हूँ।
"मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।"
(‘I don’t care, I don’t mind dying. What Is the use of waiting till you get old? This Is no good. You want to die when you are young. That is good, that Is what I am doing’.
‘I am dying for my country’.)
उपरोक्त शब्द अमर शहीद ऊधम सिंह के अन्तिम शब्द थे।
देश को अंग्रेजों के अत्याचार तथा गुलामी से स्वतन्त्र कराने के लिए अनगिनत देशभक्त क्रान्तिकारियों ने हँसते-अपने प्राणों की आहुति दी है। उन्हीं शूरवीरों में अमर शहीद ऊधम सिंह का नाम आदर व श्रद्धा से लिया जाता है।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। उस दिन डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत लगभग 10,000 से भी अधिक लोग उस सभा में उपस्थित थे। ऊधम सिंह वहाँ पर प्यासे लोगों को पानी पिलाने के पुनीत कार्य में लीन थे।
अंग्रेज सरकार से भारतीयों का देशप्रेम देखा नहीं गया। अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी जनरल ओ’डायर के सैनिकों ने पूरे बाग को घेर लिया और निहत्थे आबालवृद्ध लोगों पर मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी करनी शुरू दी। हजारों भारतीय मारे गए। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे।
इस घटना ने वीर ऊधम सिंह को विचलित करके रख दिया। तत्काल ही उन्होंने ओ’डायर को सबक सिखाने के लिए शपथ ले लिया। ऊधम सिंह ने बहुत प्रयास किया किन्तु ओ’डायर के भारत में रहते तक उन्हे अपने शपथ को पूरा करने का मौका नहीं मिला। ओ’डायर वापस इंगलैंड चला गया। ओ’डायर के वापस चले जाने पर भी ऊधम सिंह अपना शपथ नहीं भूले। प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने 20 मार्च 1933 के दिन लाहौर में अपना पासपोर्ट बनवाया और इंगलैंड चले गए। अपना उद्देश्य पूर्ण करने के लिए उन्हें वहाँ लगभग सात साल और इंतजार करना पड़ा।
अन्ततः इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुईं। 13 मार्च 1940 को ओ’डायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया। ऊधम सिंह ओ’डायर का वध करने के लिए 45 स्मिथ एण्ड वेसन रिवाल्वर पहले ही खरीद चुके थे। एक मोटी किताब के पन्नों को बीच से काटकर तथा किताब के भीतर अपने रिवाल्वर को छिपाकर ऊधम सिंह भी उस सभा में पहुँच गए। मौका मिलते ही उन्होंने मंच पर उपस्थित ओ’डायर को लक्ष्य करके 6 राउंड गोलियाँ दाग दीं। ओ’डायर को दो गोलियाँ लगीं और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
प्रतिशोध के पूर्ण हो जाने पर ऊधम सिंह कायरतापूर्वक भागे नहीं बल्कि उन्होंने वीरतापूर्वक स्वयं गिरफ्तार करवा दिया। उन्होंने कहा "मेरी उससे शत्रुता थी इसीलिए मैंने उसे मारा। वह इसी लायक था। ऐसा मैंने किसी अन्य या किसी संस्था के कहने से नहीं किया है वरन् ऐसा करना मेरा अपना फैसला था।" (“I did it because I had a grudge against him, he deserved it. I don’t belong to any society or anything else.)
ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। 1901 में उनकी मां और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया और उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम दिए गए। 1917 में उनके बड़े भाई का भी स्वर्गवास हो गया। 1919 में वे अनाथालय छोड़ क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
मेट्रोपोलिटन पोलिस रिपोर्ट फाइल क्र. MEPO 3/1743, दिनांक 16 मार्च 1940 के में लिखा है "हमें उसके जीवन के विषय में सूचना मिली है कि वह एक बेहद सक्रिय, अनेक स्थानों की यात्रा किया हुआ, राजनीति से प्रेरित, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाला युवक था तथा उसके पास अपने जीवन का महान उद्देश्य था। वह साम्यवाद का समर्थक था और भारत में ब्रिटश शासन के प्रति उसके हृदय में प्रबल घृणा थी।" (we find information concerning his life, which reveals him to be a highly active, well-travelled, politically motivated, secular-minded young man with some great purpose in his life, a supporter of Bolshevism and driven by an ardent hatred of British rule in India.)
दुःख का विषय है कि हमें बताए जाने वाले इतिहास में देशभक्तो के विषय में नहीं के बराबर ही सामग्री पाई जाती है।
"मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।"
(‘I don’t care, I don’t mind dying. What Is the use of waiting till you get old? This Is no good. You want to die when you are young. That is good, that Is what I am doing’.
‘I am dying for my country’.)
उपरोक्त शब्द अमर शहीद ऊधम सिंह के अन्तिम शब्द थे।
देश को अंग्रेजों के अत्याचार तथा गुलामी से स्वतन्त्र कराने के लिए अनगिनत देशभक्त क्रान्तिकारियों ने हँसते-अपने प्राणों की आहुति दी है। उन्हीं शूरवीरों में अमर शहीद ऊधम सिंह का नाम आदर व श्रद्धा से लिया जाता है।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। उस दिन डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत लगभग 10,000 से भी अधिक लोग उस सभा में उपस्थित थे। ऊधम सिंह वहाँ पर प्यासे लोगों को पानी पिलाने के पुनीत कार्य में लीन थे।
अंग्रेज सरकार से भारतीयों का देशप्रेम देखा नहीं गया। अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी जनरल ओ’डायर के सैनिकों ने पूरे बाग को घेर लिया और निहत्थे आबालवृद्ध लोगों पर मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी करनी शुरू दी। हजारों भारतीय मारे गए। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे।
इस घटना ने वीर ऊधम सिंह को विचलित करके रख दिया। तत्काल ही उन्होंने ओ’डायर को सबक सिखाने के लिए शपथ ले लिया। ऊधम सिंह ने बहुत प्रयास किया किन्तु ओ’डायर के भारत में रहते तक उन्हे अपने शपथ को पूरा करने का मौका नहीं मिला। ओ’डायर वापस इंगलैंड चला गया। ओ’डायर के वापस चले जाने पर भी ऊधम सिंह अपना शपथ नहीं भूले। प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने 20 मार्च 1933 के दिन लाहौर में अपना पासपोर्ट बनवाया और इंगलैंड चले गए। अपना उद्देश्य पूर्ण करने के लिए उन्हें वहाँ लगभग सात साल और इंतजार करना पड़ा।
अन्ततः इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुईं। 13 मार्च 1940 को ओ’डायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया। ऊधम सिंह ओ’डायर का वध करने के लिए 45 स्मिथ एण्ड वेसन रिवाल्वर पहले ही खरीद चुके थे। एक मोटी किताब के पन्नों को बीच से काटकर तथा किताब के भीतर अपने रिवाल्वर को छिपाकर ऊधम सिंह भी उस सभा में पहुँच गए। मौका मिलते ही उन्होंने मंच पर उपस्थित ओ’डायर को लक्ष्य करके 6 राउंड गोलियाँ दाग दीं। ओ’डायर को दो गोलियाँ लगीं और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
प्रतिशोध के पूर्ण हो जाने पर ऊधम सिंह कायरतापूर्वक भागे नहीं बल्कि उन्होंने वीरतापूर्वक स्वयं गिरफ्तार करवा दिया। उन्होंने कहा "मेरी उससे शत्रुता थी इसीलिए मैंने उसे मारा। वह इसी लायक था। ऐसा मैंने किसी अन्य या किसी संस्था के कहने से नहीं किया है वरन् ऐसा करना मेरा अपना फैसला था।" (“I did it because I had a grudge against him, he deserved it. I don’t belong to any society or anything else.)
ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। 1901 में उनकी मां और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया और उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम दिए गए। 1917 में उनके बड़े भाई का भी स्वर्गवास हो गया। 1919 में वे अनाथालय छोड़ क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
मेट्रोपोलिटन पोलिस रिपोर्ट फाइल क्र. MEPO 3/1743, दिनांक 16 मार्च 1940 के में लिखा है "हमें उसके जीवन के विषय में सूचना मिली है कि वह एक बेहद सक्रिय, अनेक स्थानों की यात्रा किया हुआ, राजनीति से प्रेरित, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाला युवक था तथा उसके पास अपने जीवन का महान उद्देश्य था। वह साम्यवाद का समर्थक था और भारत में ब्रिटश शासन के प्रति उसके हृदय में प्रबल घृणा थी।" (we find information concerning his life, which reveals him to be a highly active, well-travelled, politically motivated, secular-minded young man with some great purpose in his life, a supporter of Bolshevism and driven by an ardent hatred of British rule in India.)
दुःख का विषय है कि हमें बताए जाने वाले इतिहास में देशभक्तो के विषय में नहीं के बराबर ही सामग्री पाई जाती है।
Wednesday, December 29, 2010
हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 6 (Hindi Proverbs)
प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।
इन तिलों में तेल नहीं
अर्थः किसी प्रकार का आसरा न होना।
इसके पेट में दाढ़ी है
अर्थः कम उम्र में बुद्धि का अधिक विकास होना।
इस हाथ दे उस हाथ ले
अर्थः किसी कार्य का फल तत्काल चाहना।
ईद का चॉद
अर्थः लम्बे अरसे के बाद दिखाई देने वाला
उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ना
अर्थः थोड़ा आसरा पाकर पूर्ण अधिकार पाने का प्रयास करना।
उल्टा चोर कोतवाल को डॉंटे
अर्थः दोषी होने पर भी दूसरों पर धौंस जमाना।
उगले तो अंधा, खाए तो कोढ़ी
अर्थः दुविधा में पड़ना।
उत्त़र जाए या दक्खिन, वही करम के लक्ख़न
अर्थः स्थान बदल जाने पर भी व्यक्ति के लक्षण नहीं बदलते।
उलटी गंगा पहाड़ चली
अर्थः असंभव कार्य।
उलटे बाँस बरेली को
अर्थः विपरीत कार्य करना।
ऊँची दुकान फीका पकवान
अर्थः तड़क-भड़क करके स्तरहीन चीजों को खपाना।
ऊँट किस करवट बैठता है
अर्थः सन्देह की स्थिति में होना।
ऊँट के मुँह में जीरा
अर्थः अत्यन्त अपर्याप्त।
ऊधो का लेना न माधो का देना
अर्थः किसी के तीन-पाँच में न रहना, स्वयं में लिप्त होना।
एक अंडा वह भी गंदा
अर्थः बेकार की वस्तु।
एक अनार सौ बीमार
अर्थः किसी वस्तु की मात्रा बहुत कम किन्तु उसकी माँग बहुत अधिक होना।
एक आवे के बर्तन
अर्थः सभी का एक जैसा होना।
एक और एक ग्यारह होते हैं
अर्थः एकता में बल है।
एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा
अर्थः बहुत अधिक खराब होना।
एक गंदी मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है
अर्थः अनेकों अच्छाई पर भी एक बुराई भारी पड़ती है।
इन तिलों में तेल नहीं
अर्थः किसी प्रकार का आसरा न होना।
इसके पेट में दाढ़ी है
अर्थः कम उम्र में बुद्धि का अधिक विकास होना।
इस हाथ दे उस हाथ ले
अर्थः किसी कार्य का फल तत्काल चाहना।
ईद का चॉद
अर्थः लम्बे अरसे के बाद दिखाई देने वाला
उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ना
अर्थः थोड़ा आसरा पाकर पूर्ण अधिकार पाने का प्रयास करना।
उल्टा चोर कोतवाल को डॉंटे
अर्थः दोषी होने पर भी दूसरों पर धौंस जमाना।
उगले तो अंधा, खाए तो कोढ़ी
अर्थः दुविधा में पड़ना।
उत्त़र जाए या दक्खिन, वही करम के लक्ख़न
अर्थः स्थान बदल जाने पर भी व्यक्ति के लक्षण नहीं बदलते।
उलटी गंगा पहाड़ चली
अर्थः असंभव कार्य।
उलटे बाँस बरेली को
अर्थः विपरीत कार्य करना।
ऊँची दुकान फीका पकवान
अर्थः तड़क-भड़क करके स्तरहीन चीजों को खपाना।
ऊँट किस करवट बैठता है
अर्थः सन्देह की स्थिति में होना।
ऊँट के मुँह में जीरा
अर्थः अत्यन्त अपर्याप्त।
ऊधो का लेना न माधो का देना
अर्थः किसी के तीन-पाँच में न रहना, स्वयं में लिप्त होना।
एक अंडा वह भी गंदा
अर्थः बेकार की वस्तु।
एक अनार सौ बीमार
अर्थः किसी वस्तु की मात्रा बहुत कम किन्तु उसकी माँग बहुत अधिक होना।
एक आवे के बर्तन
अर्थः सभी का एक जैसा होना।
एक और एक ग्यारह होते हैं
अर्थः एकता में बल है।
एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा
अर्थः बहुत अधिक खराब होना।
एक गंदी मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है
अर्थः अनेकों अच्छाई पर भी एक बुराई भारी पड़ती है।
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