Thursday, January 31, 2008

साईं बाबा (19)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

त्यौहारों का समन्वय

राम नवमी उत्सव

राम नवमी का उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी। मस्जिद रंग-बिरंगी झण्डियों और तोरण से सजाई गई। राधा कृष्णा माई ने एक झूला दिया जो साईं बाबा के आसन के सामने रखा गया। कीर्तन करने के लिये कृष्ण राव भीष्म खड़े हुये और काका महाजनी ने हारमोनियम बजाया। उसी समय साईं बाबा ने एक आदमी भेज कर काका महाजनी को अपने पास बुलाया और पूछा, "क्या हो रहा है? झूला क्यों रखा गया है?" काका महाजनी ने बताया, "राम नवमी उत्सव प्रारम्भ हो गया है और झूला इसी लिये रखा गया है।" तब बाबा ने फूल की एक माला निकाली और उसे स्वयं पहन लिया। उन्होंने दूसरी माला निकाली और उसे उस दिन के कीर्तनकार भीष्म को पहनाने के लिये भेज दिया। और तब कीर्तन प्रारम्भ हुआ। इस तरह से साईं बाबा ने "देवो भूत्वा यजेत देवान" के सिद्धान्त के अनुसार सही ढंग से कीर्तन आरम्भ करने का मार्ग बताया।

कीर्तन समाप्त हुआ और "रामचन्द्र की जय" कह कर बैण्ड बाजा और संगीत के साथ चारों तरफ गुलाल उड़ाया गया। सभी परम प्रसन्न थे और तभी साईं बाबा की गर्जना सुनाई दी। उनकी आँख में गुलाल का छींटा घुस गया था जिससे वे कुपित हो गये थे। लोग डर कर भागने लगे। बाबा के नजदीकी भक्तों ने सोचा कि बाबा तो स्वयं राम थे और इसलिये राम जन्म होने के बाद रावण और उसके दल के अहंकार का वध करने के लिये बाबा का क्रोधित होना स्वाभाविक है। इसे भक्तों ने परोक्ष रूप से साईं बाबा का आशीर्वाद माना।

साईं बाबा को कुपित देख कर राधा कृष्णा माई डरी कि बाबा झूले को कहीं तोड़ न दें। उसने झूले को वापस लाने के लिये काका महाजनी को भेजा पर जब वह झूले की रस्सी को खोलने लगे तो साईं बाबा ने यह कह कर उसे मना कर दिया कि अभी उत्सव पूरा नहीं हुआ है। अब तक वे शान्त हो गये थे। लोगों ने हर्षित हो कर महापूजा और आरती की। दूसरे दिन भी कीर्तन हुआ। गोपाल काला और दही लूट होने के बाद साईं बाबा ने झूले को हटाने की अनुमति दी।

अगले वर्ष सन् 1913 से राम नवमी उत्सव में कार्यक्रम लगातार बढ़ने लगे। राधा कृष्णा माई ने चैत्र नवरात्रि के आरम्भ से नाम सप्ताह का आयोजन जोड़ा। सात दिनों तक द्वारका माई मस्जिद में रात-दिन अखण्ड रामधुन होने लगी। कभी कभी राधा कृष्णा माई भी सबेरे भजन और रामधुन में सम्मिलित होती थी। आधुनिक तुकाराम कहलाने वाले हरिदास बालबुवा माली ने सन् 1913 में कीर्तन किया, उसके बाद सन् 1914 में सतारा जिले के वृहद् सिद्ध कँवठे के बालबुवा सतारकर ने किया और अन्त में कीर्तनकार सम्बन्धी कठिनाई को दूर करने के लिये साईं बाबा ने दास गणू को स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया।

एकदम प्रेम और सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में राम नवमी और सन्दल के जुलूस निकलते थे। जुलूस के लिये लोगों के द्वारा एक सुन्दर घोड़ा, पालकी, रथ, चाँदी के बर्तन, बाल्टियाँ, दर्पण और चित्र उपहार के रूप में दिये गये थे। जुलूस के लिये हाथियों का भी प्रबन्ध किया जाता था। सब कुछ हो रहा था पर साईं बाबा सबसे विरक्त आत्मरत रहते थे।

मस्जिद की मरम्मत

साईं बाबा जिस द्वारका माई मस्जिद में बैठते और रहते थे वह केवल आठ फुट के भीतर थी और बैठने का स्थान गढ़े में था। उसी गढ़े में बाबा के सब भक्त बैठते थे। मस्जिद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थी और अब भक्त भी बड़ी संख्या में आने लगे थे। शिरडी के भक्तों को मस्जिद का जीर्णोद्धार करना आवश्यक जान पड़ रहा था पर स्थिति जैसी की वैसी चली आ रही थी।

जिस तरह से उर्स का मेला लगाने का विचार सबसे पहले गोपाल राव गुंड के मन में सबसे पहले आया उसी तरह से मस्जिद के जीर्णोद्धार की बात भी सबसे पहले उसी गोपाल राव गुंड के मन में आई। उसने पत्थर एकत्र किये और वे पत्थर उचित ढंग से तराशे गये किन्तु मस्जिद का जीर्णोद्धार उसके हाथ से नहीं होने का था। यह काम तो नाना साहब चान्दोरकर के लिये और फर्श का काम काका साहब दीक्षित के लिये सुरक्षित था।

अनुमति लेने के लिये जीर्णोद्धार की बात साईं बाबा के समक्ष रखी गई। पहले तो बाबा इसके लिये तैयार नहीं हुये पर भक्त म्हालासपति के हस्तक्षेप करने पर उन्होंने अनुमति दे दी। भक्तों ने मिल कर काम किया और जब फर्श एक रात में ही बना दिया गया तब साईं बाबा ने अपने बोरे का आसन फेंक दिया और उसकी जगह गद्दी रख दी - मानो आसन का भी जीर्णोद्धार हो गया।

(क्रमशः)

Wednesday, January 30, 2008

साईं बाबा (18)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

त्यौहारों का समन्वय

साईं नाथ का लक्ष्य

साईं बाबा का उद्देश्य हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव और समन्वय स्थापित करना जान पड़ता है। यही कारण रहा होगा कि वे रहते तो थे मस्जिद में पर उसका नाम उन्होंने 'द्वारका माई' रखा था। वे एक ओर तो संस्कृत के ज्ञाता थे और विशुद्ध रीति से वेद पाठ करते थे तो दूसरी ओर वे कुरान की आयतें भी कहते थे। वे पण्ढरपुर के विट्ठल भगवान के भक्त थे और राम, कृष्ण, श्री हरि के मानने वाले थे तो साथ ही उनके मुँह से हमेशा यही निकलता था कि "अल्लाह मालिक है।" साईं बाबा जाति-पाँति और धर्म के विवादों से ऊपर निर्लिप्त तथा समस्त प्राणियों का कल्याण करने वाले अवतार थै।

पूजा और त्यौहार

साईं बाबा अत्यन्त उदार थे। उन्होंने अपने भक्तों को अपने पूजा-अर्चना करने की पूरी स्वतंत्रता दे रखी थी। वे तो थे भक्त वत्सल। उनके निवास स्थान को मस्जिद या मन्दिर की अपेक्षा आश्रम कहना ही अधिक उचित होगा। शिरडी ही क्या, दूर दूर तक के लोग उनके जीवन काल में ही उनको भगवान मानते थे। भक्त जन जल के अर्ध्य से उनका पद प्रक्षालन करते थे।

मस्जिद या साईं बाबा के आश्रम में चौबीसों घण्टे धूनी जलती रहती थी। वहाँ शंख, झालर और घण्टे बजाये जाते थे। भजन होता था और नाम सप्ताह का आयोजन किया जाता था जिसमें अखण्ड राम धुन होती थी। भक्त लोग साईं बाबा को प्रातःकाल मंगल आरती, मध्याह्न की आरती और शाम को सन्ध्या आरती करते थे। साधक, साधु, सन्त और सन्यासी भी मोक्ष की अभिलाषा से उनके पास आते थे। श्रेष्ठ अग्निहोत्री ब्राह्मण भी साईं बाबा के चरणों में साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते थे।

साईं बाबा वर्ष में चार त्यौहार मनाते थे। वे हैं - राम नवमी, जन्माष्टमी, सन्दल और ईद। इनमें से राम नवमी और जन्माष्टमी हिन्दुओं के और सन्दल तथा ईद मुसलमानों के त्यौहार हैं। इस प्रकार उन्होनें अपने जीवन में त्यौहारों का समन्वय किया था। ईद में वे नमाज पढ़ते और रामनवमी के दिन वेदपाठ करते थे। राम नवमी में नाम सप्ताह का और जन्माष्टमी में गोपाल काला का आयोजन किया जाता था।

राम नवमी और उर्स

इन दोनों त्यौहारों में पहले उर्स का आयोजन किया गया और उसके बाद राम नवमी का। कोपरगाँव में गोपाल राव गुंड नाम का एक सर्किल इंस्पेक्टर साईं बाबा का भक्त था। उसका कोई पुत्र नहीं था। साईं बाबा के आशीर्वाद से उसका एक लड़का हुआ। इसी खुशी में गोपाल राव गुंड के मन में शिरडी में उर्स और उर्स का मेला लगाने का विचार आया। यह बात सन् 1897 की है।

गोपाल राव गुंड ने अपने विचार शिरडी में साईं बाबा के भक्तों के सामने उन लोगों की सहमति लेने के लिये रखा। सबने उसका समर्थन किया। बाबा से अनुमति और आशीर्वाद मांगा गया जो उन्होंने दे दिया। साईं बाबा ने उर्स के लिये रामनवमी का दिन निश्चय किया। ऐसा जान पड़ता है कि इसमें साईं बाबा का रहस्य था। वे तो त्रिकालदर्शी और सर्वज्ञ थे। उनका उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता थी और दूसरा यह कि उर्स का समावेश रामनवमी में होना था।

शिरडी गाँव था। वहाँ केवल दो कुँए थे जिनमें से एक सूख गया था। और दूसरे का पानी खारा था। उर्स और मेले में पीने के पानी की कठिनाई हो सकती थी जिसे पहले से ही दूर करना आवश्यक था। साईं बाबा ने खारे पानी वाले कुँए में कुछ फूल डाले और उसका पानी मीठा हो गया। तात्या पाटिल ने काफी दूर पर स्थित एक कुँए से भी पानी लाने की व्यवस्था की।

सन्दल का जुलूस

साईं बाबा का एक भक्त था अमीर शक्कर दलाल। उर्स के साथ सन्दल के जुलूस को जोड़ देने का विचार उसके मन में आया। सन्दल का जुलूस मुसलमान सन्तों के सम्मान में निकाला जाता है। इसमें चन्दन घिस कर थाली में रखते हैं। उस थाली को अगरबत्ती की सुगन्ध के साथ बैण्ड बाजा बजाते हुये जुलूस निकाल कर गाँव में घुमाते हैं। मस्जिद वापस आने पर उस घिसे हुये चन्दन को हाथ से नीम-वृक्ष के चबूतरे और द्वारका माई मस्जिद की दीवारों पर छिड़क देते हैं। साईं बाबा ने सन्दल का जुलूस निकालने की अनुमति भी दे दी।

तैयारी और जुलूस

शिरडी में उर्स और रामनवमी का जुलूस एक साथ निकालने की तैयारी और प्रबन्ध का काम शुरू हो गया। गोपाल राव गुंड का अहमद नगर में दामू अण्णा कसार नाम का एक मित्र था। उसने दो ब्याह किये थे पर उसका भी कोई पुत्र नहीं था। साईं बाबा के आशीर्वाद से उसके भी पुत्र हुये। गोपाल राव गुंड ने दामू अण्णा को एक सादा बड़ा झण्डा बनवा कर देने को कहा जो उसने दिया और नाना साहब निमोणकर से एक जरी किनारी वाला झण्डा लिया गया।

उर्स मेले का प्रबन्ध

मेले के दिन वातावरण एकदम साफ था। शिरडी के छोटे-बड़े, धनी-गरीब सभी लोग प्रबन्ध करने में लगे थे। बाहरी प्रबन्ध तात्या कोते पाटिल की जिम्मेदारी में था। भीतरी प्रबन्ध राधा कृष्णा माई नाम की बाबा की एक भक्त महिला कर रही थी। राधा कृष्णा माई का घर मेहमानों से भरा हुआ था। वह सबके लिये मिठाइयाँ और भोजन बना रही थी। एक और काम राधा कृष्णा माई ने स्वेच्छा से अपने हाथ में ले लिया था। वह काम था मस्जिद की साफ सफाउ और दीवालों की पुताई करना। साईं बाबा जिस दिन सोने के लिये चावड़ी चले जाते थे उस दिन रात को वह मस्जिद की सफाई करती थी। गरीबों को भोजन कराना भी कार्यक्रम के अन्तर्गत था। यह काम साईं बाबा को अत्यन्त ही प्रिय था। मेला निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

उर्स का रामनवमी में समावेश

उर्स और मेले का कार्यक्रम वर्ष प्रतिवर्ष चल रहा था। लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी। प्रारम्भ से ही पाँच हजार से ले कर सात हजार तक लोग एकत्र होते थे। यह संख्या कुछ ही वर्षों में बढ़ कर पचहत्तर हजार हो गई।

सन् 1912 में अमरावती के दादा साहब खापर्डे के साथ 'साईं सगुणोपासना' के रचयिता कृष्ण राव जागेश्वर भीष्म मेले में आये। वे दीक्षित बाड़ा में ठहरे। जब वे बरामदे में लेटे हुये थे और लक्ष्मण राव उर्फ काका महाजनी पूजा की सामग्री ले कर मस्जिद में जा रहे थे तब कृष्ण राव भीष्म के मन में एक विचार आया जिसे उन्होंने काका महाजनी को इन शब्दों में बताया कि, "इस तथ्य में कोई ईश्वरीय व्यवस्था अवश्य ही है कि उर्स का मेला रामनवमी के दिन लगता है। भगवान राम का जन्म दिन रामनवमी सभी हिन्दुओं को अत्यन्त ही प्रिय है। तब रामनवमी का त्यौहार क्यों न मनाया जाये।" काका महाजनी को भीष्म का यह विचार बहुत पसन्द आया और उन्होंने इसके लिये साईं बाबा से अनुमति लेने की इच्छा व्यक्त की।

रामनवमी का उत्सव मनाने के लिये कीर्तन करने वाला हरिदास प्राप्त करने की समस्या थी जिसका हल कृष्ण राव भीष्म ने स्वयं निकाल लिया। वे बोले, "राम जन्म पर मेरी रचना 'रामाख्यम' पूरी हो चुकी है। मैं स्वयं कीर्तन करूंगा।" काका महाजनी हारमोनियम बजाने के लिये राजी कर लिये गये। राधा कृष्णा माई से प्रसाद बनवाना तय किया गया। इसके बाद साईं बाबा से अनुमति लेने के लिये मस्जिद गये।

अन्तर्यामी साईं बाबा तो सब कुछ जानते थे। उन्होंने काका महाजनी से पूछा, "बाड़े में क्या बात चल रही थी?" काका महाजनी किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर चुप हो गये। तब बाबा ने भीष्म से पूछा, "तुम क्या चाहते हो?" भीष्म ने स्पष्ट रूप से कहा, "हम लोग राम नवमी उत्सव मनाना चाहते हैं। इसके लिये आपकी आज्ञा चाहिये।" साईं बाबा ने बड़ी प्रसन्नता से अनुमति दे दी। लोगों के हृदय में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

(क्रमशः)

Monday, January 28, 2008

साईं बाबा (17)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

मां-बेटे की भक्ति

तात्या की भक्ति

शिरडी में म्हालासपति और तात्या कोते पाटिल दो ऐसे अनन्य भक्त थे जो साईं बाबा के साथ ही रहते और उनके साथ ही रात को मस्जिद और चावड़ी में सोते थे। तात्या कोते पूरे चौदह साल तक बाबा के साथ सोया। तीनों अपने बिस्तर लगाने के बाद लेटते थे। उनमें से एक का सिर पूर्व की ओर, दसरे का पश्चिम की ओर और तीसरे का उत्तर की ओर रहता था। तीनों के पैर बीच में एक दूसरे का स्पर्श किये रहते थे। लेटने के बाद तीनों आधी रात तक बातचीत करते रहते थे। अगर तीनों में से कोई सोने लगता था तो शेष दो उसे उठा देते थे।

तात्या कोते पाटिल धार्मिक वृत्ति का था। उसके माध्यम से साईं बाबा ने शिरडी में गणपति, शंकर पार्वती, शनि और मारुति के मन्दिरों को सुव्यस्थित कराया था।

बायजा बाई का भाग्य

बायजा बाई हमेशा साईं बाबा का ध्यान रखती थी। वह हर दिन मस्जिद में जाती और बाबा को खिलाती थी। समय के साथ वह शिथिल होती जा रही थी और बीमार भी रहती थी। एक दिन बायजा मां साईं को भोजन करा रही थी। साईं बाबा उससे बोले, "मां, मेरा एक कहना मान लो। कल से तुम खाना ले कर मत आया करो। कमजोर हो गई हो।"

"तो बेटा तुम्हें खिलायेगा कौन?"

"मैं खुद ही तुम्हारे घर पहुँच जाया करूंगा।"

कहने को तो बाबा ने कह दिया लेकिन वे तो थे अनतर्यामी। उन्हें मालूम था कि बायजा मां का अन्त एकदम निकट ही है। दूसरे दिन ही एकदम सबेरे तात्या मस्जिद में रोता हुआ आया लेकिन यह देख कर उसका दिल धक्- सा रह गया कि बाबा समाधिस्थ थे। उनका चेहरे लाल-सुर्ख किन्तु चित्त शान्त था। बाबा ने धीरे धीरे आँखें खोलीं। उनके नेत्र लाल और चेहरा भयंकर था।

"बाबा तुम्हें क्या हो गया है?" रोना भूल कर तात्या ने पूछा। साईं बाबा का चेहरा शान्त हो गया। वे बोले, "तात्या, तुम मेरे भाई हो और हमेशा रहोगे। मैंने बायजा मां को वचन दिया है।"

परन्तु बाबा, मां तो तुम्हें याद करते करते मर गई।" कहते कहते तात्या सिसकने लगा।

"मुझे सब मालूम है भाई। धीरज रखो।" कह कर बाबा उठे और तात्या के साथ उसके घर चले। घर पहुँच कर "मां" कहते हुये बायजा मां के चरणों में श्रद्धा अर्पित की और उसके निकट बैठ कर समाधिस्थ हो गये। कुछ क्षणों में एकाएक बायजा बाई के शव में कम्पन हुआ। शरीर चैतन्य हुआ और जीवित हो कर उसने आँखें खोल दीं और साईं बाबा तथा तात्या को आँखें भर कर देखती हुई बोली, "बेटा साईं, बेटा तात्या, मेरे पास आवो।" दोनों उसके निकट आ गये वह कहने लगी, "बेटा साईं, मेरा अन्त समय आ गया है। तात्या का ध्यान रखना।"

"तू फिकर मत कर मां, मेरे जीते जी तात्या को कुछ नहीं होगा" कह कर साईं बाबा ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया और देखते देखते बायजा बाई फिर मृत्यु को प्राप्त हो गई।

(क्रमशः)

Sunday, January 27, 2008

साईं बाबा (16)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

मां-बेटे की भक्ति

विशेष लगन

बायजा बाई और उसके बेटे तात्या कोते पाटिल का उल्लेख पहले भी कई बार आ चुका है। दोनों मां-बेटे के मन में साईं बाबा के प्रथम दर्शन करने के साथ ही उनके प्रति अगाध श्रद्धा, अटूट प्रेम और अनन्य भक्ति हो गई थी। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शिरडी में साईं बाबा के जितने भक्त थे उन सबमें बायजा बाई और उसके बेटे तात्य कोते पाटिल का सर्व प्रथम स्थान था। परिणाम यह हुआ कि साईं बाबा की उन दोनों पर सबसे अधिक कृपा थी। अन्तर्यामी साईं बाबा तो स्वयं भगवान थे और भगवान कभी पक्षपात नहीं करते। उनकी कृपा तो सब पर समान रूप से बरसती है। वर्षा का जल तो समान रूप से बरसता है पर जिसका पात्र जितना बड़ा होता है उसे उतना ही अधिक जल मिलता है। इसमें वर्षा का कोई पक्षपात नहीं। इसी तरह जिसकी जितनी अधिक भक्ति होती है वह प्रभु का उतना ही अधिक कृपा-पात्र हो जाता है।

तात्या कोते हमेशा साईं बाबा के साथ रहता था और बायजा मां प्रतिदिन मस्जिद में जा कर साईं को भोजन कराती थी।

बायजा के परिवार की स्थिति

बायजा बाई और तात्या कोते पाटिल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उनके जीविकोपार्जन का कोई विशेष साधन नहीं था। तात्या कोते वन से लकड़ी बटोर कर ले आता और गट्ठा बना कर बेच देता था। बस यही उनकी थोड़ी सी आमदनी थी जिससे वे कठिनाई से जीवन-निर्वाह कर रहे थे। अब साईं बाबा की कृपा से उनकी दशा सुधरती जा रही थी।

उनके जीवन में एक आश्चर्य हो रहा था। जब से साईं बाबा शिरडी आये थे तब से तात्या कोते की लकड़ी का गट्ठा रास्ते में ही बिक जाता था, घर तक लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थे। कोई न कोई ग्राहक अवश्य ही मिल जाता और पूछता, "ओ लकड़ी वाले, लकड़ी कितने की है?" तात्या कहता, "भाई जो मर्जी हो दे दे, साईं तेरा भला करे।" वह ग्राहक एक रुपया दे कर खरीद लेता जब कि लकड़ी चार आने की ही होती थी।

एक दिन तात्या लकड़ी लाने के लिये जंगल में गया। वह लकड़ी इकट्ठी कर ही रहा था कि आकाश में काले काले बादल छा गये और गर्जना होने लगी। तात्या कोते चिन्तित हो गया कि अब क्या होगा! उसने थोड़ी ही लकड़ी इकट्ठी की थी जिसे गट्ठे में बांधा और गाँव की ओर चला। गाँव की सीमा पर पहुचते ही तात्या को आवाज सुनाई दी, "ए लकड़ी वाले।" वह रुक गया। खरीददार की आवाज थी। वह बोला, "लकड़ी चाहिये।" तात्या ने गट्ठर उसकी ओर बढ़ा दिया। उस ग्राहक ने बिना कुछ कहे उसके हाथ पर एक रुपया रख दिया। तात्य के मुँह से आश्चर्य के साथ निकाल गया, "एक रुपया!"

"कम है तो और लो भाई" कह कर ग्राहक ने एक रुपया और उसकी हथेली पर रख दिया। एकदम कम लकड़ी के लिये दो रुपये देने वाला उदार दाता कौन है - यह देखने के लिये तात्या ने आँखें ऊपर कीं तो वहाँ कोई नहीं था - न लकड़ी न ग्राहक। दो रुपये ले कर वह घर आ गया और मां बायजा बाई के हाथ में रुपये दे कर उसे जो कुछ हुआ था वह सब बता दिया।

मां-बेटे की आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। वह सब कुछ समझ गई और बोली, "बेटा यह सब साईं बाबा की करामात मालूम होती है। साईं तो भगवान के अवतार और अन्तर्यामी हैं।" तात्या बोला, "मुझे भी ऐसा ही लगता है मां। इस बारे में मैं साईं बाबा से जरूर पूछूँगा।" तात्या कोते पाटिल उत्सुकता लिये साईं बाबा के निवास स्थान द्वारका माई मस्जिद की ओर चला। वहाँ पहुँच कर उसने साईं बाबा को दण्डवत प्रणाम किया और इसके पहले कि वह कुछ कहता, अन्तर्यामी सर्वज्ञ साईं बाबा बोल उठे, "तात्या, तुझे तो तेरी मेहनत की कमाई मिलती है। फिर शंका क्यों? तेरे भाग्य में जो कुछ है वही तुझे मिलता है। तू तो मेरा भाई है। बायजा मां मेरे मां है।" कह कर साईं बाबा ने तात्या को अपने हृदय से लगा लिया।

(क्रमशः)

Saturday, January 26, 2008

साईं बाबा (15)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

योग और समाधि

तीन दिन की समाधि

सन् 1886 में साईं बाबा के ऊपर दमा का दौरा पड़ा। श्वाँस ने उन्हें कष्ट देने का प्रयास किया। तब उन्होंने उससे छुटकारा पाने के लिये समाधि लेने का निश्चय किया। म्हालासपति और तात्या कोते पाटिल को अपने पास बुला कर बोले, "मैं समाधि लेना चाहता हूँ। तुम तीन दिन तक मेरे शरीर की रक्षा करना। अगर वापस आ गया तो ठीक, नहीं तो मेरे शरीर को उस खुली जगह में गड़ा देना।" भक्तों को इससे बहुत दुःख हुआ लेकिन उनके कुछ कहने के पहले ही साईं बाबा ने समाधि लगा ली। उनकी श्वाँस रुक गई तथा दिल की धड़कन और नाड़ी बन्द हो गई। वे योग-निद्रा में सो गये।

साईं बाबा की समाधि की खबर बिजली की लहर की तरह फैल गई। लोग मस्जिद में आ कर इकट्ठा होने लगे। वातावरण गमगीन हो गया। बायजा बाई एक तरफ बैठ कर चुपचाप आँसू बहाने लगी। लोग न दुःखी हो सकते थे और न सुखी क्योंकि साईं बाबा समाधि में थे। साधारण लोगों की नजर में वे संसार छोड़ चुके थे। म्हालासपति एक पल भी बिना सोये बाबा का सिर अपनी गोद में लिये उनके शरीर की रक्षा करते हुये बैठे थे। समय बीतता जा रहा था। इसी तरह 36 घण्टे बीत चुके।

तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को इस घटना का पता लग गया। मस्जिद में अंग्रेज कलेक्टर, डॉक्टर, प्रोफेसर, दल-बल सहित पुलिस-इंस्पेक्टर आ गये। उन सबने साईं बाबा को मृत समझा लेकिन म्हालासपति ने उन्हें समझाया कि बाबा जीवित हैं और समाधि की अवस्था में हैं। डॉक्टर ने जाँच किया तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि 36 घण्टे पहले बन्द हुई श्वाँस वाले बाबा ऐसे लगे कि सिर्फ दो मिनट पहले ही श्वास और दिल की धड़कन बन्द हुई है। उन अंग्रेजों ने साईं बाबा की समाधि का लोगा मान लिया। अपने 'हैट' उतारे और साईं बाबा के चरणों से शीश झुका कर चले गये।

ठीक 72 घण्टे बीते और साईं बाबा के हृदय में धड़कन चालू होने लगी। जीवन के सभी लक्षण वापस आ गये - नाड़ी की गति सामान्य हो गई। बाबा समाधि छोड़ कर उठ बैठे। उनके होठों पर भुवन-मोहिनी मधुर मुस्कान थी। म्हालासपति ने उनकी चरण धूलि अपने माथे पर लगा ली। बायजा बाई ने चुपके से अपने आँसू पोंछ लिये लेकिन उसके बाद भी आँसू बहने लगे - पहले दुःख के आँसू थे और अब सुख के।

वातावरण में चारों तरफ उल्लास छा गया। लोग जयजयकार करने लगे। साईं बाबा बोले, "वापस कैसे नहीं आता। शरीर कैसे छोड़ देता। अभी तो आप लोगों का साथ देना है। बायजा माँ को देखना है। तात्या की सबसे अधिक चिन्ता है।" लोगों के हृदय में आनन्द की लहरें हिलोरें ले रही थीं। वे समवेत स्वर में बोल उठे - "साईं बाबा की जय।"

(क्रमशः)

Thursday, January 24, 2008

साईं बाबा (14)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

योग और समाधि

महान योगी

साईं बाबा बहुत बड़े योगी थेजब वे शैशवास्था में थे तभी से गुरु के सानिध्य में योगाभ्यास करने लगे थेउन्हे योग की सभी क्रियाएँ मालूम थीं और सिद्धियाँ प्राप्त थींधौति और नेति की क्रियाएँ तो तो उनके लिये अत्यन्त सामान्य थींतीन इंच चौड़े और साढ़े बाइस फुट लम्बे कपड़े की पट्टी को गीली करके निगल जाने और आधे घण्टे तक पेट के भीतर रख कर अँतड़ियों को साफ करने की यौगिक प्रक्रिया को धौति कहते हैंअँतड़ियाँ साफ हो जाने के बाद कपड़े की पट्टी बाहर निकाल ली जाती है पर साईं बाबा की धौति क्रिया निराली ही थीवे अपने अँतड़ियों को ही पेट से बाहर निकाल कर साफ कर लेते थे

बाबा की धौति क्रिया

हर तीसरे दिन साईं बाबा मस्जिद से काफी दूर एक वट वृक्ष के नीचे कुँए पर जाते थे और अपने मुँह धो कर स्नान करते थेएक अवसर पर देखा गया कि उन्होंने उल्टी की और अपने अँतड़ियों को मुँह से बाहर निकाल लियाउन्हें खण्ड योग तो मालूम ही था, इसलिये अपने अँतड़ियों को शरीर से अलग कर लेना उनके लिये सम्भव थाइसके बाद उन्होंने अपने अँतड़ियों को भीतर-बाहर से साफ किया और जामुन के एक पेड़ पर सूखने के लिये टांग दियासूख जाने पर फिर पेट के भीतर ज्यों की त्यों डाल दिया। 'साईं सत् चरित' के लेखक हेमाद पन्त ने लिखा है कि उन दिनों शिरडी के कुछ लोगों ने साईं बाबा की इस धौति क्रिया को देखा था और इसकी जाँच भी की थी

ध्यान की प्रक्रिया

साईं बाबा चौबीसों घण्टे प्रति पल परमात्मा के ध्यान में ही लीन रहते थेजब संसार सोता था तब वे जागृत अवस्था में रहते थेभगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि "या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी"। साईं बाबा इसके मूर्तिमान स्वरूप थेवे धूनी के बाजू से बैठे बैठे ही ध्यान लगा लेते थेवे कमलपत्र जलबिन्दु के समान संसार में रहते थे

साईं बाबा का खण्डयोग

साईं बाबा खण्ड योग में निपुण थेखण्ड योग, योग की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा योगी अपने अंगों को अलग अलग कर फिर उनको यथा स्थान जोड़ लेता हैसाईं बाबा योग की यह प्रक्रिया करते थेएक बार एक सज्जन साईं बाबा के दर्शन के लिये मस्जिद में आयाउसने वहाँ बाबा के अंगों को कट कर अलग अलग पड़े हुये देखावह बेहद डर गया और मस्जिद से बाहर गयाउसके मन में विचार आया कि किसी ने बाबा को काट काट कर उनके अंगों को इधर-उधर फेंक दिया हैउसने पुलिस को इसकी सूचना देने का विचार किया पर यह सोच कर रुक गया कि सबसे पहले देखने वाला समझ कर पुलिस उसी पर शक कर लेदूसरे दिन जब वह मस्जिद में गया तो साईं बाबा को कुशल पूर्वक मस्जिद में बैठे पायासाईं बाबा के खण्ड योग का यह अद्भुत उदाहरण है

(क्रमशः)

Wednesday, January 23, 2008

साईं बाबा (13)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के चमत्कार

शयन झूला

साईं बाबा के भक्त नाना साहब डेंगले एक बार चार हाथ लम्बा और एक हाथ चौड़ा लकड़ी का एक तख्ता यह सोच कर ले आये कि बाबा उस पर शयन करेंगे। तख्ते को फर्श पर रखने के बजाय साईं बाबा ने उसके चारों कोनों पर फटे-पुराने कमजोर चिथड़े बांध दिया और तख्ते को मस्जिद की छत की म्याल से झूले के समान लटका दिया और उस पर सोने और कभी बैठने लगे। जिन चिथड़ों से बांध कर वह तख्ता लटकाया गया था वे इतने कमजोर थे कि तख्ते का ही भार नहीं संभाल सकते थे - फिर उस पर बाबा का वजन अलग। उनके भक्त लोग घबरा गये कि कहीं ऐसा न हो कि बाबा नीचे गिर जायें।

और विशेष बात यह थी कि साईं बाबा उस तख्ते के चारों कोनों में चार दिये जला कर सोते थे। वे दिये कभी बुझते नहीं थे और न कभी नीचे ही गिरते थे। भक्तों को आश्चर्य हुआ कि बाबा उस तख्ते पर चढ़ते-उतरते कैसे होंगे! साईं बाबा की यह अद्भुत लीला देखने के लिये मस्जिद में लोगों की भीड़ लगने लगी। लोग बड़ी साधानी से ध्यान पूर्वक बाबा के चढ़ने-उतरने के काम को देखने की कोशिश करते थे पर किसी को पता ही नहीं लगा। जब भीड़ बढ़ने लगी तब साईं बाबा ने अपने उस शयन झूले को नीचे उतार दिया और तख्ते को तोड़ कर फेंक दिया।

साईं बाबा तो पूर्ण योगी थे। उन्हें सिद्धियाँ प्राप्त थीं। यही कारण था कि साईं बाबा ने शयन झूले का चमत्कार किया।

भगवान विट्ठल दर्शन

साईं बाबा पण्ढरपुर के विट्ठल या भगवान विठोवा को बहुत चाहते थे। वे अपने निवास स्थान में नाम सप्ताह का आयोजन कराते थे। नाम सप्ताह में भगवान का सात दिनों तक अखण्ड रूप से नाम लिया जाता है। लोग अलग अलग टोलियों में वाद्य यंत्र के साथ राम अर्थात् भगवान का भजन गाते हुये पूरे सात दिनों तक नाम स्मरण करते हैं। एक बार साईं बाबा ने दास गणू को नाम सप्ताह का उनके निवास स्थान द्वारका माई मस्जिद में आयोजन करने के लिये कहा। उनकी आज्ञा कौन टाल सकता था किन्तु दास गणू ने उनसे आग्रह किया कि नाम सप्ताह के अन्त में विट्ठल भगवान का दर्शन होना चाहिये। बाबा ने 'तथास्तु' कह दिया।

शिरडी में सब ओर बात फैल गई कि नाम सप्ताह के अन्त में विट्ठल भगवान प्रकट हो कर दर्शन देंगे। लोगों के हृदय में उत्साह, प्रेम और भक्ति उमड़ आई। नाम सप्ताह प्रारम्भ हुआ। भगवान के नाम का अखण्ड रूप से स्मरण और गायन होने लगा। सैकड़ों भक्त दिन-रात "विट्ठल विट्ठल" कहने लगे। साईं बाबा अपने पत्थरनुमा चौकी पर आसन लगाये शान्त बैठे रहते थे। उन्हें तो भगवान का नाम बहुत ही प्रिय था।

गुरुवार का दिन आया। यही नाम सप्ताह का अन्तिम दिन था। चारों तरफ धूप और अगरबत्ती की सुगन्ध फैल रही थी। विट्ठल भगवान का दर्शन करने के लिये भीड़ उमड़ पड़ी थी। अचानक लोगों ने देखा कि साईं बाबा अपने आसन पर नहीं हैं। उन्हें उठ कर जाते किसी ने नहीं देखा था। वे अपने आसन पर बैठे ही बैठे अदृश्य हो गये थे। दूसरे ही क्षण ही लोगों ने देखा कि चौकी पर भगवान विट्ठल बैठे हुये हैं। लोग हर्षविभोर हो गये और विट्ठल भगवान की जयजयकार करने लगे। कुछ ही देर में विट्ठल भगवान के स्थान पर स्वयं साईं बाबा ही बैठे मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। लोगों के कण्ठ से समवेत स्वर निकला -"साईं बाबा की जय!"

(क्रमशः)

Tuesday, January 22, 2008

साईं बाबा (12)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के चमत्कार

पानी से दिये जले

साईं बाबा को प्रकाश बहुत प्रिय था। वे मस्जिद और मन्दिर में हमेशा रात भर दिये जला कर रोशनी करते थे। इसके लिये वे शिरडी के बनिया दूकानदारों से तेल ले आते थे। यह क्रम कुछ दिनों तक चलता रहा। फिर आई दीवाली जो दिये जगमगा कर घरों में रोशनी करने का त्यौहार ही है। दीवाली के पहले तेल प्रदान करने वाले सभी बनियों ने एक जुट होकर बैठक की और निर्णय लिया कि साईं बाबा को दिये जलाने के लिये कोई भी दूकानदार तेल नहीं देगा। दीवाली की रात जब शिरडी का हर घर जगमगाता रहेगा तब साईं बाबा की द्वारिका माई मस्जिद में अंघेरा रहेगा।

साईं बाबा बनियों से तेल माँगने गये पर किसी बनिये ने उन्हें तेल नहीं दिया। इससे साईं बाबा जरा भी विचलित नहीं हुये और मस्जिद में लौट आये। शाम के समय उन्होंने सभी दियों में बत्तियाँ लगा दीं। उन्होंने अपने टिन के पात्र में पानी भरा और दियों में डालते गये। पानी डाल चुकने के बाद उन दियों के बत्तियों को जलाना शुरू किया। चमत्कार यह हुआ कि वे दिये पानी से ही जल उठे और जगमगाते रहे। मस्जिद में रोशनी ही रोशनी हो गई। उन दियों की विशेषता यह थी कि शिरडी के और दूसरे घरों के दयों की तुलना में उनमें अधिक रोशनी थी।

शिरडी में साईं बाबा के द्वारा पानी से तेज रोशनी वाले दिये जलाये जाने की बात फैल गई। लोग देखने आये और साईं बाबा की जय बोलते हुये उन्हें प्रणाम करने लगे। तेल न देने वाले बनिये छिप कर देख रहे थे किस साईं बाबा क्या कर रहे हैं। उनका चमत्कार देख कर वे सब लज्जित हो उनके पैरों पर गिर कर क्षमा मांगने लगे। साईं बाबा ने उन सबको क्षमा कर दिया।

दास गणू का त्रिवेणी स्नान

दास गणू साईं बाबा के अनन्य भक्त थे। वे कवि और कीर्तनकार थे। दास गणू महाराज ने कविता में साईं बाबा का गुणगान किया है। उनहोंने "भक्त लीलामृत" और "सन्त कथामृत" नाम की दो पुस्तकें लिखी हैं जिनमें उनहोंने साईं बाबा का जीवन वृत और उपदेशों का उल्लेख किया है। दास गणू ने अपने कीर्तन के माध्यम से साईं बाबा की ख्याति और लीलाओं का कोंकण, बम्बई तथा पूरे महाराष्ट्र में प्रचार किया। कहीं भी जब वे कीर्तन करते थे तब अपने सामने साईं बाबा का चित्र अवश्य ही रख लेते थे।

एक दिन दस गणू के मन में प्रयाग राज जा कर त्रिवेणी संगम में स्नान करने का विचार आया। वह साईं बाबा के पास आज्ञा लेने के लिये गये और बोले, "बाबा, मैं कुछ दिनों के लिये बाहर जाना चाहता हूँ।"

"प्रयाग राज जाना चाहते हो। वहाँ त्रिवेणी स्नान करोगे?" अन्तर्यामी साईं बाबा ने कहा और मुस्कुराने लगे। दास गणू आश्चर्य-चकित रह गये। उन्होंने जान लिया कि बाबा घट-घट वासी और सर्वज्ञ हैं। आनन्द-विभोर हो कर दास गणू ने अपना मस्तक साईं बाबा के चरणों में रख दिया। जैसे ही दास गणू ने साईं बाबा के चरणों पर सिर रखा वे अचम्भित हो गये। साईं बाबा के दोनों चरणों के अंगूठों से गंगा, यमुना और सरस्वती की जल धाराएँ बह रही थीं। दास गणू के सिर पर गंगा यमुना की धाराएँ बह रही थीं और उनके कपड़े भीग गये थे। एकाएक गंगा-यमुना का प्रवाह शान्त और विलुप्त हो गया। दास गणू के हृदय में आनन्द की धार उमड़ रही थी।

पानी से भीगे दास गणू ने कहा, "बाबा, मैं तो धन्य हो गया। आपने मुझे यहीं अपने चरणों में त्रिवेणी स्नान करा दिया। मैं गीले कपड़े बदल कर आता हूँ।" साईं बाबा के मुख पर मधुर मुस्कान थी। बोले, "कपड़े क्यों बदलने जा रहे हो?" दास गणू ने देखा कि उनके कपड़े गीले ही नहीं थे। उनके मुख से निकला - "साईं बाबा की जय।"

(क्रमशः)

Sunday, January 20, 2008

साईं बाबा (11)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के चमत्कार

नेत्र चिकित्सा

शिरडी में साईं बाबा प्रारम्भ में रोगियों का इलाज करते थे। वे इलाज और दवा के पैसे कभी नहीं लेते थे। परब्रह्म परमात्मा के अवतार साईं बाबा तो वैद्यों के भी वैद्य थे। उनके सामने व्याधियाँ कैसे टिक सकती थीं। उनका इलाज अचूक होता था। एक बार उनके एक भक्त की आँखें लाल हो गईं और उनमें दर्द के साथ सूजन आ गई। उन दिनों शिरडी में डॉक्टर नहीं था। दूसरे भक्त उसे साईं बाबा के पास ले आये। उन्होंने भिलावा पीस कर उसकी दो छोटी छोटी गोलियाँ बनाई, उन्हें उनके दोनों पलकों पर रखा और आँखों पर पट्टी बांध दी। भिलावा जहरीला होता है पर उसने उसकी आँखों को हानि पहुँचाने के बदले औषधि का काम किया। दूसरे दिन सबेरे पट्टी खोली गई और आँखें साफ जल से धोयी गईं। सूजन कम हो गया, दर्द जाता रहा और कुछ ही दिनों में उसकी आँखें एकदम रोग-रहित हो गईं।

साठे वैद्य

शिरडी में साठे वैद्य रहता था। यह साठे वैद्य और शिरडी में बाड़ा बनवाने वाले हरि विनायक साठे अलग अलग व्यक्ति थे। साठे वैद्य रोगियों का इलाज करता था। शिरडी में एक मात्र वही वैद्य होने के कारण लोगों को उनके पास विवश हो कर जाना पड़ता था। यह किसी को पता नहीं था कि साठे वैद्य वैद्यक की कोई परीक्षा पास था या फिर केवल नीम-हकीम खतरा-ए-जान था। इतना अवश्य था कि कभी कोई रोगी उसके इलाज से अच्छा हो जाता था तो कभी कोई मर भी जाता था। जब किसी रोगी का मर्ज काबू से बाहर हो जाता और उसके रिश्तेदार उसे कोपर गाँव या अहमद नगर ले जाने लगते तो साठे वैद्य चिढ़ जाता था। वह समझ नहीं सकता था कि जीवन कितना मूल्यवान होता है और जान है तो जहान है।

साईं बाबा के शिरडी में रह जाने और रोगियों का मुफ्त में हमेशा सफल इलाज करने के कारण साठे वैद्य साईं बाबा से शत्रुता भी रखता था। साठे वैद्य सोचता रहता कि किसी तरह से साईं बाबा शिरडी छोड़ कर चले जावें तो अच्छा हो। साईं बाबा तो अन्तर्यामी और सर्वज्ञ थे। उनसे साठे वैद्य की कुटिलता कैसे छिप सकती थी पर वे तो सबमें ईश्वर देखने वाले सन्त थे।

साठे वैद्य का हृदय परिवर्तन

साठे वैद्य का बचपन का एक साथी था जो हवलदार था। साठे ने अपने उस मित्र को अपने मन की बात बताई। वह बोला, "यह कौन सी बड़ी बात है। मैं कल ही उस फकीर को बदनाम करा दूंगा और गाँव वाले उसे निकाल बाहर करेंगे। दोनों ने मिल कर एक योजना बनाई। जीव परब्रह्म से टकराने का प्रयास करने लगा। योजना यह थी कि वे दोनों किसी मेनका (नर्तकी) को फकीर की तपस्या भंग करने के लिये मस्जिद के सामने गवायेंगे और नचायेंगे। जब वह फकीर नर्तकी से फँस जावेगा तब कोनों को रस्सी से बांध कर गाँव वालों के सामने पेश कर देंगे।

योजना के अनुसार दूसरे दिन एक नर्तकी को ले कर वे दोनों धूर्त मस्जिद के सामने पहुँचे। साठे वैद्य के हाथ में एक लम्बी रस्सी थी और हवलदार के गले में ढोलक। वहाँ पहुँच कर हवलदार ने ढोलक बजा कर गाना शुरू किया और नर्तकी ढोलक की थाप पर नाचती हुई बाबा को रिझाने और हाव-भाव दिखा कर उन्हें फाँसने का प्रयास करने लगी। साठे वैद्य हाथ में रस्सी लिये खड़ा था। बाबा भला कहीं फँसने वाले थे! वे उन लोगों की मूर्खता पर मन ही मन हँस रहे थे।

एकाएक साईं बाबा को उन पर क्रोध आ गया। उनकी आँखें लाल हो गईं। उन्होंने नर्तकी की ओर घूर कर देखा। उनकी नजर पड़ते ही वह काली और कुरूप हो गई। साईं बाबा की आँखें साठे वैद्य पर पड़ीं। रस्सी पर निगाह पड़ते ही वह रस्सी भयंकर काला नाग बन गई और फुंकार मार कर उस नाग ने साठे वैद्य को काट दिया। वह तिलमिला कर जमीन पर गिर पड़ा और साईं बाबा के चरणों की ओर घिसटने लगा। उसने साईं बाबा के पैर पकड़ लिये और काँपते काँपते प्रार्थना की, "बचाइये प्रभु, रक्षा कीजिये।" हवलदार थर थर काँप रहा था। नर्तकी गाने के बजाय रो रही थी। जीभ लपलपाते हुये नाग हवलदार के समीप फुँफकार रहा था। वह काँप रहा था और "बचाओ, साईं बाबा बचाओ" चिल्ला रहा था।

साईं बाबा तो परम कृपालु थे। उन्होंने साँप को देखा। वह गायब हो गया और रस्सी ही पड़ी थी। हवलदार, साईं बाब के पैरों पर गिर गया। साईं बाबा ने साठे वैद्य को अपने हाथों से उठाया और उसके शरीर पर हाथ फेरा। विष गायब और उसका शरीर स्वस्थ हो गया। नर्तकी को देखा तो वह अपने पूर्व रूप में आ गई। साठे वैद्य का हृदय परिवर्तन हो चुका था। अब तक शिरडी के लोग मस्जिद के बाहर जमा हो चुके थे। सईं बाबा का चमत्कार देख कर वे चिल्ला उठे - "साईं बाबा की जय।" वह हवलदार ढोलक बजा बजा कर साईं बाबा का गुणगान कते हुये नाच रहा था।

(क्रमशः)

Saturday, January 19, 2008

साईं बाबा (10)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

शिरडी तीर्थ स्थान

साईं बाबा का निवास सथान होने के कारण शिरडी की प्रसिद्धि देश भर में फैली है और शिरडी को लोग तीर्थ स्थान मानते हैं। शिरडी में यात्रियों, दर्शकों और भक्तों के ठहरने के लिये एक ही स्थान था जिसका नाम "साठे का बाड़ा" था। हरि विनायक साठे ने नीम पेड़ के आसपास की जमीन खरीद कर वहाँ लोगों के ठहरने के लिये एक बाड़ा बनवा दिया। नीम वृक्ष को चबूतरे से घेर दिया। सन् 1909 ई. में नाना साहब चान्दोरकर के कहने पर बम्बई के सालिसिटर हरि सीताराम उर्फ काका साहब दीक्षित साईं बाबा के दर्शन के लिये शिरडी आये। वे एक बार लन्दन में ट्रेन से गिर गये थे जिससे उनके एक पैर में लंगड़ापन आ गया था। जब वे साईं बाबा से मिले तब उन्होंने कहा कि "पाँव के लँगड़ेपन की कोई बात नहीं है, मेरे मन के लंगड़ेपन को दूर कर दीजिये।" साईं बाबा की कृपा से काका साहब दीक्षित के पैर और मन दोनों का लंगड़ापन ठीक हो गया। काका साहब दीक्षित इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने साईं बाबा के निकट शिरडी में ही रहने का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने रहने और दूसरे भक्तों के ठहरने के लिये एक बाड़ा शिरडी में बवनाया जो "दीक्षित बाड़ा" के नाम से जाना जाता है। नागपुर के धनी श्रीमान बापू साहब बूटी को साईं बाबा ने एक बार आँव की भयंकर बीमारी से और दूसरी बार हैजे से ठीक कर दिया। बापू साहब बूटी ने करोड़ों रुपये खर्च कर शिरडी में बाड़ा बनवा दिया। इस प्रकार शिरडी में तीन बाड़ा हो गये जहाँ आगन्तुक भक्त ठहरने लगे।

श्रीमान बूटी ने भव्य बाड़ा उसी स्थान पर बनवाया जहाँ पर साईं बाबा के परिश्रम से फूलों का बगीचा तैयार हो गया था। बापू साहब बूटी के उसी बाड़े में साईं बाबा का समाधि मन्दिर स्थित है जहाँ प्रतिदिन हजारों यात्री दर्शन करने के लिये आते हैं। साईं बाबा तो अन्तर्यामी थे। ऐसा लगता है कि उन्हें पहले से ही ज्ञात था कि उनका समाधि मन्दिर वहीं बनेगा। तभी तो पहले वहाँ उनके करकमलों से बगीचा लगा और बाद में वहीं उनकी समाधि बनी। अपनी मना समाधि के कुछ वर्ष पहले साईं बाबा ने कहा था, "मेरे संसार से चले जाने के बाद भी मैं अपने समाधि के माध्यम से बात करूँगा।" उनकी यह भविष्यवाणी सच हुई। वे आज भी अपने भक्तों को नये नये अनुभव कराते हैं।

(क्रमशः)

Friday, January 18, 2008

साईं बाबा (9)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के वेश-भूषा में परिवर्तन

शिरडी में मोहिद्दीन तम्बोली नाम का एक कुश्तीबाज पहलवान रहता था। किसी बात पर साईं बाबा और मोहिद्दीन के बीच असहमति हो गई। दोनों आपस में कुश्ती लड़े जिसमें साईं बाबा हार गये। उस दिन से उन्होंने अपने वेश-भूषा और जीवन में परिवर्तन कर लिया। उन्होंने धोती-अंगरखा पहनना और टोपी लगाना छोड़ दिया। धोती छोड़ कर लंगोट पहनने लगे। अंगरखा त्याग कर लम्बा कौपीन (कफनी) पहनना शुरू कर दिया। टोपी पहनना छोड़ कर सिर पर कपड़े का एक टुकड़ा बाँध लिया जैसा कि उनके चित्र में देखा जा सकता है। टाट के टुकड़े पर सोने लगे। वे कहते थे कि रंकपन राजापन से अच्छा होता है क्योंकि भगवान तो हमेशा रंक के साथ रहते हैं। वे दीनबन्धु हैं। साईं बाबा हमेशा कहते थे, "अल्ला मालिक है।"

साईं बाबा की ख्याति

साईं बाबा नीमगाँव के त्रिम्बक जी डैंगले को बहुत चाहते थे। बाबा साहब डेंगले का छोटा भाई था नाना साहब डेंगले। नाना साहब ने दो ब्याह किये थे पर सन्तान एक की भी नहीं थी। बाबा साहब साईं बाबा के भक्त थे और उनकी शक्ति को जानते थे। उन्होंने अपने छोटे भाई को साईं बाबा के दर्शन करने और उनसे आशीर्वाद लेने के लिये शिरडी भेजा। साईं बाबा की दया और आशीर्वाद से नाना साहब डेंगले को एक पुत्र प्राप्त हुआ। उसी समय से साईं बाबा की ख्याति लोगों के बीच बढ़ने लगी। उनका यश अहमद नगर पहुँचा जहाँ से बाबा के दर्शन, सेवा और सत्संग करने के लिये नाना साहब चान्दोरकर, केशव चिदम्बर और दूसरे अनेक भक्त शिरडी आने लगे। भाग्यशाली भक्तों ने पहचाना कि साईं बाबा परब्रह्म के अवतार हैं।

साईं बाबा के सामान और सत्संग

साईं बाबा धन-सम्पत्ति की चिन्ता कभी नहीं करते थे। उनके पास चिलम, तम्बाखू, टीन का भिक्षा पात्र, झोली, लम्बा कौपीन सिर पर बाँधने का सफेद वस्त्र का टुकड़ा और एक सटका (लकड़ी) था जिसे वे हमेशा साथ रखते थे। वे जूते या खड़ाऊ नहीं पहनते थे। टाट के एक टुकड़े की उनकी आसनी थी। वे धूनी के पास हमेशा लकड़ी के एक आड़े खम्भे (रैलिंग) पर अपने बायाँ हाँथ टिकाये दक्षिण की ओर मुँह करके बैठे रहते थे। वे अपने भक्तों से घिरे रहते थे। वे उपदेश देते, सैकड़ों कथा-कहानियाँ और दृष्टान्त बताते थे। वे सिद्ध, योगी और अवतार थे। साईं बाबा के दर्शन मात्र से ही मन को परम शान्ति मिलती थी और दर्शक मुग्ध होकर उनकी ओर आकर्षित हो जाता था। वे वेदान्त की शिक्षा देते थे। एक क्षण के लिये भी उनका मन ईश्वर के ध्यान से अलग नहीं होता था। शिरडी उनका केन्द्र था पर उनकी ख्याति पंजाब, कलकत्ता, उत्तर भारत, गुजरात, दक्षिण भारत आदि क्षेत्रों तक पहुँच चुकी थी जहाँ से लोग साईं बाबा के दर्शन करने के लिये आते। शिरडी ग्राम तीर्थ स्थान बन गया।

(क्रमशः)

Thursday, January 17, 2008

साईं बाबा (8)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

निवास स्थान

दूसरी बार साईं बाबा सन् 1858 ई. में शिरडी आये थे। शिरडी में एक टूटी-फूटी मस्जिद थी। साईं बाबा ने उसी मस्जिद को अपने निवास स्थान बनाया। कवितावली रामायण में सन्त तुलसीदास जी ने लिखा है कि, 'मांगि के खइबो, मजीद में सोइबो, लैबो को एक न दैबो को दोऊ।' तुलसीदास जी के इस कथन को साईं बाबा ने सत्य कर दिखाया। वे मस्जिद में रहने लगे। उन्होंने उस मस्जिद का नाम "द्वारिका माई मस्जिद" रख दिया। वहाँ पत्थर की एक चौकी थी जिस पर साईं बाबा बैठते थे। वे अक्सर मस्जिद की एक दीवाल के सहारे खड़े रह कर भगवान का चिन्तन करते थे। द्वारिका माई मस्जिद में साईं बाबा धूनी जलाते थे। उनकी धूनी अखण्ड थी अर्थात् रात-दिन जलती रहती और कभी बुझती नहीं थी। साईं बाबा धूनी के बाजू बैठे रहते थे।

अन्य सन्तों से सम्पर्क

साईं बाबा के आने से कई साल पहले से शिरडी में देवीदास नाम के एक सन्त चावड़ी में स्थित मारुति मन्दिर में रहते थे। साईं बाबा सन्त देवीदास का सत्संग करना पसन्द करते थे। वे उनसे मिलने और सत्संग करने के लिये मारुति मन्दिर जाते थे। और कभी-कभी वहीं रह भी जाते थे। बाद में जानकी दास नाम के एक दूसरे सन्त शिरडी आये। साईं बाबा जानकी दास के साथ बहुत समय तक बात किया करते थे। जानकी दास भी साईं बाबा के साथ सत्संग करने के लिये उनके निवास स्थान द्वारिका माई मस्जिद जाते थे।

एक बार 'पुन्ताम्बे' (स्थान का नाम) से गंगागिर नाम के एक वैश्य गृहस्थ सन्त शिरडी आये। साईं बाबा को देखते ही गंगागिर ने स्पष्ट रूप से कहा कि 'शिरडी गाँव धन्य है जिसे ऐसा बहुमूल्य रत्न मिला है।' दूसरी बार येवला मठ के प्रसिद्ध सन्त, अक्कलकोट महाराज के शिष्य आनन्द नाथ शिरडी आये। साईं बाबा को देखते ही वे बोले, "सचमुच में यह मूल्यवान हीरा है। शिरडी निवासी निकट भविष्य में इस बात का अनुभव करेंगे।" जब ये बातें हो रही थीं तब साईं बाबा छोटी अवस्था के थे। शिरडी के लोगों को उनकी महानता और दैवी अवतार की बात मालूम नहीं थी।

साईं बाबा की दिनचर्या

अपनी युवावस्था के दिनों में साईं बाबा अपने सिर पर बाल बढ़ा कर रखते थे। बाल कभी नहीं बनवाते थे। उनकी वेश-भूषा एक खिलाड़ी के समान रहती थी। वे अंगरखा और धोती पहनते तथा सिर पर टोपी लगाते थे। गाँव का वामन तात्या नाम का एक व्यक्ति साईं बाबा का भक्त हो गया था। बायजा बाई, कात्या कोते पाटिल और म्हालासपति तो पहले से ही उनके भक्त थे।

जब कभी साईं बाबा रहट गाँव जाते थे तब वे वहाँ से जाई, जूही और दूसरे फूलों के पौधे ले आते थे। उन्होंने एक जमीन चुन ली थी जहाँ उन पौधों को लगा देते थे। वे स्वयं पानी ला कर उन पौधों को सींचते थे। उनका भक्त वामन तात्य उनको प्रतिदिन मिट्टी के दो कच्चे घड़े देता था। साईं बाबा स्वयं कुएँ से पानी निकाल कर उन घड़ों को भरते, अपने कंधों पर रख कर लाते और उन पौधों को अपने हाथ से सींचते थे। शाम के समय उन दोनों घड़ों को नीम पेड़ की जड़ के पास रख देते थे। जैसे ही घड़े रखे जाते वैसे ही कच्चा होने के कारण वे फूट जाते थे। यह भी साईं बाबा का चमत्कार ही था कि दिन के समय उन कच्चे घड़ों को कुछ नहीं होता था। दूसरे दिन वामन तात्य उनको दो नये कच्चे घड़े दे देता था। यह क्रम तीन साल तक चलता रहा। साईं बाबा के इस परिश्रम से वहाँ पर फूलों का एक सुन्दर बगीचा लग गया। [उसी बगीचे वाले स्थान पर साईं बाबा का समाधि मन्दिर बना हुआ है।]

साईं बाबा उन दिनों लोगों से नहीं मिलते थे और न बात ही करते थे। लेकिन जब कभी उनसे कोई प्रश्न करता था तब वे उत्तर देते थे और प्रणाम करने वाले को हृदय से आशीर्वाद देते थे। दिन भर वे नीम वृक्ष के नीचे ध्यान लगाये बैठे रहते थे। कभी-कभी गाँव की सीमा पर बहने वाले नाले के किनारे वे किसी बबूल पेड़ की छाया में बैठते थे। दोपहर के बाद साईं बाबा इधर-उधर घूमते और कभी-कभी नीमगाँव चले जाते थे। वहाँ वे त्रिम्बक जी डेंगले के घर जाते थे जो उनका भक्त था।

(क्रमशः)

Wednesday, January 16, 2008

साईं बाबा (7)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा का शिरडी आगमन

द्वितीय आगमन

औरंगाबाद जिले में धूप नाम का एक गँव था। वहाँ चांद पाटिल नाम के एक मुसलमान सज्जन रहते थे। चांद पाटिल धनवान थे और धूप गाँव के एक आफिसर भी। एक बार जब वे धूप गाँव से औरंगाबाद जा रहे थे तब रास्त में उनकी घोड़ी खो गई। वह घोड़ी चांद पाटिल को बहुत प्रिय थी। दो महीने तक वे अपने उस घोड़ी को खोजते रहे पर वह कहीं नहीं मिली। घोड़ी के पीछे चांद पाटिल दीवाने-से हो गये। उस घोड़ी की जीन कन्धे पर डाले घोड़ी को खोजते हुये वे इधर-उधर भटकते थे। उन्होंने प्रण किया था कि घोड़ी मिलने पर ही घर लौटेंगे।

चांद पाटिल के घर उनके साले के लड़के रहते थे जिनकी शादी होने वाली थी और विवाह का पूरा प्रबन्ध चांद पाटिल को ही करना था। उसके घर के लोग परेशान थे। उन लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि दूसरी घोड़ी खरीद लो पर वे नहीं माने और घर छोड़ कर घूमते ही रहे।

एक दिन वे घोड़ी की जीन कन्धे पर रखे जंगल में से हो कर जा रहे थे। उन्होंने आम के एक पेड़ के नीचे बैठे हुये एक युवा फकीर को देखा। उसके सिर पर टोपी और तन पर लम्बी कफनी या कछनी थी। पास ही एक सटका (लकड़ी) रखा हुआ था। उस युवा फकीर ने पुकार कर चांद पाटिल को अपने पास बुलाया। वे फकीर के पास जा कर बाजू से बैठ गये। फकीर चिलम पीने की तैयारी में था। चिलम भरी जा चुकी थी पर आग नहीं थी। फकीर ने आसानी से अपने चिमटा जमीन में घुसा दिया और जब बाहर निकाला तब उसके साथ कोयले का जलता हुआ अंगारा बाहर निकल आया। फिर फकीर ने अपना सटका जमीन पर पटका तो वहाँ पानी की झिरी निकल आई जिसमें साफी गीली करके निचोड़ी गई। साफी से चिलम लपेटी गई और उसके ऊपर अंगारा रखा गया। फकीर ने चिलम पी और चांद पाटिल को भी दी। उन्होंने भी कश खींची। यह करामात देख कर चांद पाटिल अचरज में डूब गया और युवा फकीर को औलिया समझा।

चांद पाटिल के कुछ कहने के पहले ही फकीर ने कहा, "क्यों चांद तुम्हारी घोड़ी खो गई है न। आवाज तो लगाओ, यहीं कहीं नाले के आसपास होगी।" चांद पाटिल ने घोड़ी का नाम ले कर पुकारा। घोड़ी उछलती-कूदती हुई नाले की ओर से चांद पाटिल के पास आ गई। चांद पाटिल को बहुत हैरत हुई। उन्होंने फकीर के पैर पकड़ लिये। भर्रायी हुई आवाज में बोले, "आप तो महान और अन्तर्यामी हैं।" फकीर ने कहा, "चांद, तुम्हें तो शिरडी जाना है न। वहाँ तुम्हारे साले के बेटे की शादी है। घर में मेहमान आ चुके हैं" चांद बोला, "आप भी हमारे घर चलिये और बारात में शामिल होइये।"

"मैं शिरडी का ही रहने वाला हूँ। मुझे शिरडी वापस जाना है। तुम्हारे साथ ही चलूँगा। घोड़ी खो जाने और मिलने का तो बहाना था। मुझे तुमको अपने पास बुलाना जो था।" फकीर की बात सुन कर चांद पाटिल के मन में उनके प्रति भक्ति उमड़ आई। वे घर लौट कर ब्याह की तैयारी में जुट गये।

चांद पाटिल ने उस युवा फकीर को अपने घर आमंत्रित किया था। दूसरे दिन वे चांद के घर पहुँच गये और कुछ दिन उनके घर रहे। बारात जाने का दिन आ गया। बारातियों में वह युवा फकीर भी शामिल था। धूप गाँव से बात शिरडी के लिये चली। बाराती गाड़ियों मे बैठ कर चले। शिरडी पहुँचने पर बारात खण्डोवा मन्दिर के पास म्हालासपति के खेत में वटवृक्ष के नीचे रुकी। स्वागत करने वालों में म्हालासपति भी थे। जब युवा फकीर उतरने लगा तब म्हालासपति ने उन्हें तुरन्त पहचान लिया और उन्हें गाड़ी से उतारने में हाथ का सहारा दे कर हर्ष से उनका स्वागत करते हुये बोला, "या साईं।" साईं बाबा कुछ बोले नहीं, केवल मुस्कुरा दिये। यह घटना सन् 1858 ई. की है जब साईं बाबा शिरडी में ही रह कर और कहीं नहीं जाने के लिये शिरडी में दुबारा आये। म्हालासपति के द्वारा 'साईं' सम्बोधित करने पर बाराती, शिरडी वासी और समस्त संसार उन्हें 'साईं' ही कहने लगे और उस दिन से उनका नाम साईं बाबा पड़ गया।

म्हालासपति और चांद पाटिल ने साईं बाबा को रुकने और भोजन करने के लिये आग्रह किया पर वे रुके नहीं। वे तो अन्तर्यामी थे। उन्हें मालूम था कि बायजा बाई उनके वियोग में दुःखी है और नीम के पेड़ के नीचे उनके लिये भोजन लिये बैठी है। वे सीधे नीम पेड़ वाले चबूतरे के पास गये। वहाँ बायजा बाई बैठी थी। साईं बाबा ने उसे धीरे से पुकार कर कहा, "बायजा माँ, देखो मैं कौन हूँ।" बायजा बाई ने उन्हें देखा और खुशी के आँसू बहाती हुई बोली, "अरे, मेरा प्यारा बेटा साईं, हृदय का टुकड़ा। तू कहाँ चला गया था? आ गया है तो अब मत जाना।"

"नहीं जाउँगा माँ, तुझे और शिरडी को छोड़ कर अब कहीं नहीं जाउँगा। बड़ी भूख लगी है। कुछ खिला।" कह कर साईं बाबा बायजा माँ की गोद में बैठ गये।

"साईं तू तो फूल के समान हल्का हो गया है। तेरे वजन को क्या हो गया?"

"माँ, मैं हल्का-फुल्का हो गया हूँ तो क्या हुआ। अब तेरे हाथों से खाना खा कर मोटा-ताजा हो जाउँगा।" साईं बाबा बोले और बायजा माँ के हाथ से रोटी-सब्जी खाने लगे।

बायजा बाई को क्या पता था कि द्वापर में विदुर की पत्नी के हाथ से भाजी खाने वाले स्वयं त्रिलोकीनाथ उनके हाथ से भोजन कर रहे हैं।"

(क्रमशः)

Tuesday, January 15, 2008

साईं बाबा (6)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा का शिरडी आगमन

प्रथम आगमन

साईं बाबा सन् 1854 में शिरडी गाँव में प्रथम बार साठे बाड़ा के सामने नीम वृक्ष के चबूतरे पर पद्मासन में बैठे हुये प्रकट हुये। उस समय वे केवल सोलह वर्ष के थे, पर थे अपूर्व तेजस्वी। उनके मुख-मण्डल पर ब्रह्मज्ञान का प्रकाश झलक रहा था। शिरडी निवासी नाना चोपदार की वृद्धा माता ने उन्हें देख कर शिरडी वासियों के बीच उनका वर्णन किया कि सोलह वर्ष का एक तेजस्वी साधु नीम के पेड़ के नीचे आसन लगाये बैठा है। उसका रूप विलक्षण है। वह अत्यन्त ही अधिक सुन्दर, स्फूर्त और आकर्षक है। यह समाचार और विवरण सुन कर शिरडी के लोग उस नीम वृक्ष के पास साईं बाबा के दर्शन करने के लिये एकत्र हो गये।

इतनी छोटी अवस्था में उन्हें तपस्या करते देख लोगों को आश्चर्य हुआ। स्वाभाविक था कि उन लोगों ने उस तरुण सन्यासी से पूछा, "आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं?" प्रश्न सुन कर साईं बाबा केवल हँस दिये। सांसारिक प्रश्नों को उन्होंने आध्यात्मिक प्रश्नों में बदले और अत्यन्त ही मधुर वाणी में लोगों से पूछा, "क्या आप लोग जानते हैं कि आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं?" लोग उनका तात्पर्य नहीं समझ सके कि परब्रह्म के वे अवतार लोगों को आत्म दृष्टि से विचार करने के लिये कह रहे थे कि वस्तव में तुम आत्मा हो और ईश्वर के अंश रूपी जीव के रूप में परम पिता परमात्मा के पास से आये हो। उनका ही स्मरण करो।

इन्हीं तरुण सन्त का आगे चल कर साईं बाबा या साईं नाथ नाम हुआ। तरुण साईं बाबा के दर्शन के लिये जो लोग आये थे उनमें एक भक्त हृदया महिला भी थी जिसका नाम बायजा बाई था। बायजा बाई का तात्या कोते पाटिल नाम का बेटा था। पहले ही दर्शन में माँ-बेटे दोनों साईं बाबा के परम भक्त हो गये। जब अपने बेटे तात्या कोते पाटिल के साथ नीम वृक्ष के चबूतरे पर बैठे साईं बाबा को बायजा बाई ने देखा तब उसे लगा कि स्वयं मुरली मनोहर ही बैठे हैँ। बायजा बाई मुग्ध हो कर बेसुध-सी हो गिरने लगी तभी साईं बाबा ने उसे अपने हाथों में थाम लिया। बायजा बाई के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा - "बेटा।" साईं बाबा ने कहा, "माँ भूख लगी है। मेरे लिये टोकरी में रख कर रोटी-सब्जी तो लाई हो। खिलाओ न" - कह कर बाबा मुस्कुरा रहे थे। सचमुच बायजा बाई रोटी-सब्जी ले कर आई थी। उसने सोचा था कि सन्त के पास खाली हाथ नहीं जाउँगी।

"बेटा तुम तो अन्तर्यामी हो" - कहती हुई बायजा बाई श्रद्धा और प्रेम के साथ अपने हाथों से साईं बाबा को रोटी-सब्जी खिलाने लगी। उस दिन से बायजा बाई हर दिन बाबा के पास जाती और उन्हें भोजन कराती थी। माँ-बेटे के लिये साईं बाबा भगवान थे - साक्षात् कृष्ण कन्हैया।

साईं बाबा बायजा बाई को नीम-वृक्ष के नीचे मिल जाते थे पर अक्सर वे वहाँ न मिल कर वन में चले जाते थे पर बायजा बाई भी अपनी भक्ति में पक्की थी। वह कोसों दूर तक साईं बाबा को भटकती हुई खोजती थी। अन्त में जब वे किसी पर के नीचे ध्यान-मग्न मिल ही जाते थे तब वह टोकरी नीचे रख कर पहले उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम करती और फिर उनके सामने पत्तल बिछा कर उस पर रोटी-सब्जी रखती और अपने हाथों से साईं बाबा को खिलाती थी। ऐसा कई बार होने पर एक दिन साईं बाबा ने कहा, "माँ, मैं तुम्हारी बहुत परीक्ष ले चुका। तुम जीतीं और मैं हार गया। कल से मैं तुम्हें गाँव में ही मिल जाया करूँगा। वहीं भोजन कराना।" और आगे ऐसा ही हुआ।

साईं बाबा शिरडी में ही रहने लगे। वे किसी के दरवाजे पर नहीं जाते थे। हमेशा दिन के समय नीम पेड़ के नीचे ध्यान लगाये बैठे रहते थे। ऊपर से वे तरुण दिखते थे पर उनकी तपस्या से जान पड़ता था कि वे महान आत्मा हैं। शिरडी में फकीरों के रहने के लिये एक स्थान बना था। वे वहीं रहते थे। वे अंगरखा और धोती पहनते थे और सिर पर टोपी लगाते थे। वे शिरडी में लोकप्रिय हो गये थे। वे सबसे दिल खोल कर बातें करते थे। उन्हें पहलवानी और कुश्ती का शौक था। वे नर्तकियों का नाच और नाटक में नाट्य देखने के शोकीन थे। अक्सर गज़ल सुनते थे। इन सबके होते हुये भी उनका मन ईश्वर के ध्यान से तिल भर भी नहीं हटता था। वे कभी कभी पाँवों में घुँघरू बाँध कर खंजरी के ताल पर मनमोहक नृत्य भी करते थे।

शिरडी में किसी को भी साईं बाबा के बारे में कुछ भी पता नहीं था स्वाभाविक था कि साठे वैद्य जैसे कुछ लोग साईं बाबा के प्रति द्वेष भी रखते थे क्योंकि साईं बाबा रोगियों का अचूक और सफल उपचार कर उन्हें रोगमुक्त कर देते थे। साथ ही अनेक लोग उनके भक्त भी होते जा रहे थे। म्हालासपति नाम का व्यक्ति साईं बाबा का अनन्य भक्त बन गया था।

एक बार एक अद्भुत घटना घटी। किसी एक भक्त के शरीर में भगवान खण्डोबा प्रविष्ट हो गये। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि 'हे प्रभु, आप पता लगाईये कि यह तरुण फकीर कौन है। खण्डोबा प्रविष्ट उस व्यक्ति ने क स्थान बता कर वहाँ कुदाल से खोदने के लिये कहा। लोगों ने निर्दिष्ट स्थान को खोदना शुरू किया। कुछ गहराई तक खोदने के बाद वहाँ एक बड़ा पत्थर दिखाई दिया। लोगों ने पत्थर को हटाया तो वहाँ एक रास्ता दिखा। शिरडी निवासी उस रास्ते से भीतर घुसे और एक तलघर में पहुँच गये जो पूजा स्थान था। वह गोमुखी आकार की इमारत थी जिसमें कंगूरी मालायें थीं। उस स्थान के चारों कोनों पर चार दिये जल रहे थे तथा ठीक बीचोंबीच एक चौकी थी। भगवान खण्डोबा-प्रेरित व्यक्ति ने कहा, "यह वही स्थान है जहाँ इस तरुण बालक सन्त ने बारह वर्ष तक अपने गुरु के पास रह कर तपस्या की थी। यह बालक भगवान का अवतार है।" एकाएक लोगों ने पीछे मुड़ कर देखा तो तरुण साईं बाबा खड़े थे और मुस्कुरा रहे थे। लोग प्रेम, श्रद्धा और भक्ति से उनके चरणों पर गिर पड़े और उनसे क्षमा माँगने लगे। साईं बाबा तो दया के अवतार ही थे। उन्होंने लोगों से कहा, "यह मेरे गुरुदेव की पवित्र तपस्या-भूमि है। आप लोग इस स्थान की रक्षा करें।"

और एक दिन .....

जब बायजा बाई रोटी-सब्जी ले कर नीम तले आई तो साईं बाबा गायब थे। उसके पुत्र तात्या कोते ने उसे बताया कि थोड़ी देर पहले वे वहीं थे। साईं बाबा जैसे प्रकट हुये थे वैसे ही अन्तर्धान हो गये - शिरडी छोड़ कर चले गये। भारी हृदय से माँ-बेटे घर लौट आये। उसी रात माँ बेटे को एक समान ही स्वप्न दिखा जिसमें साईं बाबा ने उन दोनों को बताया कि वे जल्दी ही फिर शिरडी आवेंगे।

(क्रमशः)

Monday, January 14, 2008

साईं बाबा (5)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के गुरु (2)

गुरु के चरणों में बैठ कर साईँ बाबा ने योग की क्रियाएँ सीखीं तथा समस्त सिद्धियाँ प्राप्त कीं। वे संस्कृत का अगाध ज्ञान रखते थे और हिन्दू धर्म के मूल तत्व से परिचित थे। साथ ही वे इस्लाम धर्म के रहस्य को भी अच्छी तरह जानते थे। अपने गुरु को उन्होंने विद्या प्रदान करने की मान्यता प्रदान की। वास्तव में परब्रह्म होने के कारण वे पहले से ही सब कुछ जानते थे। उनकी स्थिति भगवान राम की-सी थी जिनके विषय में तुलसीदास जी ने कहा है, "गुरु गृह पढ़न गये रघुराई, अल्प काल विद्या सब पाई"।

साईं बाबा ने कहा था कि उनका धर्म कबीर है। ऐसा लगता है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समता स्थापित कने के लिये उनका अवतार हुआ था। कबीर ने अपने समय के आडम्बरों का खण्डन किया था किन्तु साईं बाबा का मार्ग खण्डन के स्थान पर मण्डन का था। वे एक ओर जहाँ देवी-देवताओं के साकार स्वरूप को मान्यता देते थे वहीं वे निराकार ब्रह्म को प्रमुख मान कर हमेशा 'अल्ला मालिक' कहते थे। कबीर और साईं बाबा के बीच की कड़ी 'चक्की' है। कबीरदास जी ने कहा था कि -

चलती चक्की देखि के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय॥

साईं बाबा ने स्वयं चक्की चला कर आटा निकाला और उसे शिरडी की सरहद में फेंक कर हैजे को रोका। साईं सत् चरित के रचयिता गोविन्द रघुनाथ राव दभोलकर उर्फ अन्ना साहब उर्फ हेमादपन्त बाबा के द्वारा चक्की चलाये जाने का आध्यात्मिक तथा दार्शनिक अर्थ लेते हुये कहते हैं कि शिरडी में साईं बाबा ने जो चक्की चलाई उसमें उन्होंने अपने भक्तों के पापों और उनके कष्टों को पीसा। उनकी चक्की के दो पाट 'कर्म' और 'भक्ति' थे - कर्म निचला पाट और भक्ति ऊपर का पाट था। ज्ञान उस चक्की की मूठ (हेंडिल) था। साईं बाबा का दृढ़ विश्वास था कि जब तक पाप और इच्छाओं को पहले पीस कर नष्ट नहीं कर दिया जाता तब तक ज्ञान, आत्म-ज्ञान और मुक्ति पाना असम्भव है। कबीरदास जी के गुरु ने भी कहा था कि ज्ञान की मूठ को दृढ़ता पूर्वक पकड़े रहो।

साईं बाबा का अपने गुरु के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति थी ऐसा जान पड़ता है कि बारह वर्ष तक तपस्या करने के बाद साईं बाबा अपने गुरु से दूर भ्रमण करते रहे पर उनका मन सदैव प्रति क्षण अपने गुरु के चरणकमलों में ही लगा रहता था। वे अपने गुरु के परम भक्त थे। इसीलिये वे अपने गुरु अथवा उनकी समाधि की खोज करते हुये वे शिरडी आये। शिरडी में ही उन्हें अपने गुरु का समाधि स्थल मिला। तब उन्होंने कहा कि 'यह मेरे गुरु की समाधि है। यही मेरा तप-स्थल और वतन है'। अपने गुरु भक्ति के कारण ही साईं बाबा अपने गुरु की समाधि का पास शिरडी में रह गये।

(क्रमशः)

Sunday, January 13, 2008

साईं बाबा (4)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के गुरु

गुरु की आवश्यकता

साईं बाबा स्वयं परब्रह्म के अवतार और सद्गुरु थे। फिर भी उनके गुरु थे। अवतारी राम के गुरु वशिष्ठ थे और श्री कृष्ण के गुरु सन्दीपनि थे। नर तन धारण करने पर ब्रह्म को भी आत्मज्ञान और आत्म दर्शन के लिये गुरु की आवश्यकता अनिवार्य रूप से पड़ती ही है। अतः शिरडी के साईं बाबा के भी गुरु थे जिनका नाम स्वयं बाबा ने 'वेंकुश' बताया था। साईं बाबा की आरती में भी उनके गुरु का उल्लेख करते हुये कहा गया है, "वेंकुश रमणा संकट हरणा शिरडी निवासा ओम् जय साईं नाथा"।

साईं बाबा गुरु के साथ में

ऐसा जान पड़ता है कि बहुत ही छोटी अवस्था से ले कर बारह वर्ष तक साईं बाबा अपने गुरु वेंकुश के पास ही रहे थे। इस बीच वे अपने गुरु के सानिध्य में रह कर तपस्या करते रहे थे। उनके गुरु की तपोभूमि शिरडी में ही भूमिगत थी और वह उनकी समाधि का स्थान भी बनी।

एक बार राधा बाई देशमुख नाम की एक वृद्ध महिला साईं बाबा की कीर्ति सुन कर उनके दर्शन करने के लिये बाबा के पास द्वारिका माई मस्जिद शिरडी आई। उसने साईं बाबा के दर्शन किये। दर्शन से वह इतनी प्रभावित और तृप्त हुई कि उसने दृढ़तम संकल्प कर लिया कि वह साईं बाबा को अपना गुरु बनावेगी और उनसे दीक्षा तथा मंत्र लेगी। यदि बाबा उसे दीक्षा नहीं देंगे तो वह अन्न-जल छोड़ देगी और आमरण अनशन कर अपने प्राण त्याग देगी। जहाँ वह ठहरी थी वहाँ उसने तीन दिनों तक न कुछ खाया और न पिया। जब यह बात साईं बाबा के कानों तक पहुँची तब उन्होंने राधा बाई देशमुख को अपने पास बुलवाया और समझाते हुये उन्होंने उसे अपने गुरु के विषय में बताया।

साईं बाबा राधा बाई देशमुख से बोले, "मेरे गुरु थे। मैंने उनकी बहुत लम्बे समय तक सेवा की पर उन्होंने मेरे कान में कभी कोई मंत्र नहीं फूँका। मेरी तीव्र इच्छा थी कि मैं अपने गुरु को कभी न छोड़ूँ किन्तु उनकी सेवा करता ही रहूँ और किसी भी कीमत पर उनसे मंत्र और उपदेश ले लूँ पर उनका अपना अलग ही रास्ता था। पहले उन्होंने मेरा सिर मुड़ा दिया और मुझसे दक्षिणा के रूप में दो पैसे माँगे, जो मैंने उन्हें तुरन्त दे दिये। अगर तुम कहो कि जब मेरे गुरु पूर्ण थे तो उन्होंने पैसे क्यों माँगे? अगर पैसे माँगे तो वे इच्छा रहित कैसे हुये? वास्तव में मेरे गुरु को पैसों की कोई आवश्यकता नहीं थी और न धन से कोई वास्ता ही था। उनके द्वारा दो पैसे माँगने का अर्थ कुछ दूसरा ही था। पहला पैसा था उनके (गुरु के) प्रति दृढ़ विश्वास और दूसरा पैसा था असीम धीरज। मैंने अपने गुरु को इन दोनों के लिये वचन दे दिये और मेरे गुरु प्रसन्न हो गये।

"मैं अपने गुरु के पास बारह वर्ष रहा। उन्होंने मेरा पालन पोधण किया। उनके पास भोजन और वस्त्र की कोई कमी नहीं थी। वे प्रेम से परिपूर्ण थे। यही नहीं किन्तु वे प्रेम के अवतार थे। वे मुझे सबसे अधिक चाहते थे। मेरे गुरु के समान क्वचित ही कोई दूसरा गुरु होगा। जब भी मैं उनकी ओर देखता था वे ध्यान मग्न ही जान पड़ते थे। उस समय हम दोनों परमानन्द से भर जाते थे। भूख-प्यास भूल कर मैं रात-दिन अपने गुरु को ही अपलक देखता रहता था। उनके बिना मैं बेचैनी का अनुभव करता था। मेरे लिये ध्यान करने के लिये अपने गुरु के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं था। वे मेरे एकमात्र आश्राय थे। मेरा मन हमेशा मेरे गुरु में ही रमा रहता था। यही 'एक पैसे' की दक्षिणा थी और धीरज रखना 'दूसरे पैसे' की। धीरज और गुरु के प्रति निष्ठा दोनों समज सन्तान हैं।

"मेरे गुरु ने मुझसे कभी कोई आशा नहीं की बल्कि सब समय मेरी रक्षा करते रहे। मैं उनके साथ रहता था और कभी कभी उनसे दूर भी चला जाता था। पर मैंने अपने प्रति उनके प्रेम में कभी कमी का अनुभव नहीं किया। इस मस्जिद में बैठ कर मैं सच कह रहा हूँ। मेरे गुरु ने जब मुझे कोई मंत्र या उपदेश नहीं दिया तब मैं तुम्हें कैसे दे सकता हूँ। मुझसे इसकी आशा मत करो। अपने गुरु में विश्वास रखो। मुझे अपने हृदय के नेत्र से देखो, तुम्हें परमार्थ अवश्य मिलेगा।" साईं बाबा की बातें सुन कर राधा बाई देशमुख को पूर्ण रूप से तृप्ति मिली और उसने अपना उपवास तोड़ दिया।

इस घटना से ऐसा जान पड़ता है कि राधा बाई देशमुख की आड़ से अपने गुरु के विषय में संसार को बताना साईं बाबा की एक लीला ही थी। इसके माध्यम से उन्होंने गुरु के प्रति प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा रखने का उपदेश दिया है। गुरु, मंत्र दे कर शिष्य को साधना में लगा देते हैं पर साईं बाबा तो सद्गुरु थे जिन्होंने अपने प्रति भक्ति रखने वाले लाखों भक्तों को मुक्त किया और आज भी करते हैं।

(क्रमशः)

Saturday, January 12, 2008

साईं बाबा (3)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

अद्भुत अवतार

इसमें कोई सन्देह नहीं कि शिरडी के साईं बाबा अवतार थे। प्रश्न यह है कि वे किसके अवतार थे? साईं बाबा के कुछ भक्त उन्हें भगवान दत्तात्रय का अवतार मानते हैँ। उनका विश्वास है कि भगवान दत्तात्रय ने चौदहवीं शताब्दी में श्रपाद श्री वल्लभ के रूप में और पन्द्रहवीं शताब्दी में श्री नरसिंह सरस्वती के रूप में अवतार लिये थे। भगवान दत्तात्रय के अन्य अवतार थे मानिक प्रभु और अक्कल कोटकर महाराज। साईं बाबा अक्कल कोटकर महाराज के अवतार माने जाते हैं। इस प्रकार साईं बाबा मूलतः दत्तात्रय भगवान के ही अवतार हुये। दत्तात्रय का आविर्भाव ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के वरदान स्वरूप हुआ था। ये त्रिदेव एक ही परब्रह्म के तीन रूप हैं। अतः श्री साईं बाबा परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे। उनमें परब्रह्म के सभी लक्षण थे। शिरडी के साईं बाबा को परब्रह्म का अवतार मानना ही उचित है। वे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान थे। वे अन्तर्यामी थे। प्रत्येक के हृदय में उनका निवास था, है और सदा रहेगा। उनका अन्तर्यामी होना इसीसे सिद्ध होता है कि जब कोई उनके दर्शन करने के लिये आता था तब वे बिना बताये ही उसका नाम, निवास स्थान और आने का उद्देश्य जान लेते थे। लोक कल्याण के लिये वे अनेक लीलाएँ करते थे। वे परब्रह्म परमात्मा के लीलावतार थे।

साईं बाबा की आरती में उनके किसी भक्त ने लिखा है -

"तुम दत्तात्रय तुम शिव बाबा, तुम मंगलमय श्याम विठोबा,
तुम योगेश्वर राम कन्हाई, तुम समर्थ सर्वेश्वर साईं।"

शिरडी के साईं बाबा परब्रह्म के अवतार थे उनमें सभी अवतारों का समावेश होना स्वाभाविक ही है। साईं बाबा के जीवन काल में ही उनके कुछ अनन्य भक्तों को उनके "ब्रह्मत्व" का बोध हो चुका था। इन्दौर हाई कोर्ट के जज माननीय श्री एम. बी. रेगे, बी.ए., एल.एल.बी. ने लिखा है, "शरीरधारी अवतारी साईं बाबा अपने भक्तों के लिये परमब्रह्म के अवतार थे जो अपने वचनों और कार्यों से साधकों का मार्ग प्रकाशित करते थे।" उत्तर भारत के तत्कालीन एक रियासत के हाई कोर्ट के एक जज ने कहा था, "मैं साईं बाबा को सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारकर्ता मानता हूँ।" अमरावती के प्रख्यात और विद्वान अधिवक्ता माननीय दादा साहब खापर्डे ने साईं बाबा के विषय में अपने विचार व्यक्त किये थे कि 'साईं बाबा अन्तर्यामी थे। वे हर एक के आन्तरिक विचारों को जानते थे, शरणागतों के अभावों को मिटाते और सबको सुख-शान्ति प्रदान करते थे। वे पृथ्वी पर साकार भगवान थे।' साईं बाबा के गुणगान करने वाले कीर्तनकार दास गणू का कहना है कि 'साईं बाबा सृष्टि के आदि कारण थे।'

स्वयं साईं बाबा ने अपने भक्तों के समक्ष कहा था कि 'तुम कहीं भी रहो, कुछ भी करो पर याद रखो कि तुम जो भी करते हो वह मुझे मालूम है। मैँ प्रत्येक के हृदय में हूँ और सबका आन्तरिक शासक हूँ। चराचर सृष्टि मुझसे ही आच्छादित है। मैं नियामक, नियंत्रक और दृश्य सृष्टि का सूत्रधार हूँ। मैं माता हूँ, समस्त प्राणियों का उद्गम हूँ। मैं सत्व, रज, तम तीनों गुणों का समत्व हूँ, इन्द्रयों तथा बुद्धि का संचालक हूँ और सृष्टि का रचयिता, पालक और संहारक हूँ। जो मुझमें अपना ध्यान केन्द्रित करेगा उसे कोई भी, कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचावेगा किन्तु जो मुझे भूलेगा, माया उसे आघात पहुँचावेगी। सभी जीव जन्तु तथा समस्त दृश्यमान सचराचर जगत मेरा ही शरीर और रूप है।' ठीक ऐसी ही घोषणा भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवतगीता के दसवें अध्याय में "विभूति योग" के अन्तर्गत की है।

परब्रह्म के अवतार साईं बाबा की यही स्तुति कर हम कृतार्थ हो जावें कि -

"ब्रह्मा दक्षः कुबेरो यम वरुनमरुद्रह्नि महेन्द्र रुद्राः
शैला जद्यः समुद्रा ग्रहगण मनुजा दैत्य गन्धर्व नागाः।
द्वीपा नक्षत्र तारा रवि वसु मुनयो व्योम भूरश्विनौ च
संलीना यस्य वपुषि स भगवान् पातु यो विश्वरूपः॥"

अर्थात् "जिनके शरीर में ब्रह्मा, दक्ष, कुबेर, यम, वरुण, वायु, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र, शिव, पर्वत, नदी, समुद्र, ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, नाग द्वीप, नक्षत्र, तारे, सूर्य, वसु, मुनि, आकाश, पृथ्वी और अश्वनीकुमार आदि सभी लीन हैं, वे विश्वरूप भगवान हमारा कल्याण करे।

(क्रमशः)

Friday, January 11, 2008

साईं बाबा (2)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा की जाति

साईं बाबा शरीर धारी होते हुये भी विशुद्ध आत्मा थे। आत्मा की कोई जाति नहीं होती। इसलिये वास्तव में आत्म-ज्योति स्वरूप साईं बाबा न हिन्दू थे, न मुसलमान। सन्त और सूफी जाति के झमेले से ऊपर और निर्लिप्त होते हैं। किन्तु सभी तो आत्म दृष्टि वाले नहीं होते और जब तक आत्मा शरीर में निवास करती हुई व्यक्त रूप में रहती है तब तक तो सांसारिक लोगों का मन उसकी जाति और धर्म पर ही अटका रहता है। साईं बाबा के जीवन काल में ही यह प्रश्न उठता था कि बाबा हिन्दू सन्त हैँ या मुसलमान फकीर? आज भी अज्ञानी लोग उन्हें कुछ का कुछ समझते हैं।

जाति और धर्म सम्बन्धी प्रश्न उठते ही रहते हैं। मक्का में गुरु नानक जब मस्जिद की ओर पैर करके सोये थे तब वहाँ के निवासियों ने कुपित होकर उनसे पूछा था कि वे कौन हैं? इस पर उन्होंने उत्तर दिया था -

"हिन्दू कहौं तो मारिये, मुसलमान हू नाहि।
पाँच तत्व का पूतला, नानक मेरा नाम॥"

जाति तो पाँच तत्व से निर्मित नश्वर देह की होती है न कि ज्ञान-स्वरूप आत्मा की। इसीलिये तो कबीरदास जी ने कहा है -

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान॥"

फिर भी साईं बाबा के सम्बन्ध में प्रमाणपूर्वक निश्चयात्मक रूप से सिद्ध करके बताया जा सकता है कि वे हिन्दू ही थे और वह भी ब्राह्मण।

शिरडी के साईं बाबा का कर्ण छेदन संस्कार हुआ था। उनके कान छिदे हुये थे। कर्ण छेदन हिन्दुओं के सोलह संस्कारों में से एक है। बाबा भगवान की मूर्ति और मूर्ति पूजा पर विश्वास करते थे। अपने आप में पण्ढरपुर के विट्ठल भगवान का दर्शन करा देना इसका प्रबल प्रमाण है। जिन भक्तों के राम, कृष्ण, शिव जो भी इष्ट थे, साईं बाबा उन्हें उसी रूप में दिखते थे। साईं बाबा 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी' के साकार स्वरूप थे। साईं बाबा हिन्दुओं के त्यौहार मनाते थे जिनमें कष्णाष्टमी और रामनवमी मुख्य थे। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता चाहते थे। इसलिये मुसलमानों के त्यौहार सन्दल और ईद भी मनाते थे। दीपावली के दिन उनका निवास स्थान दीपमालिका से जगमगा उठता था। बाबा का निवास स्थान मस्जिद में था। तुलसीदास जी के इस कथन का, कि 'मांगि के खैवो, मजीद में सोइवो', साईं बाबा मूर्तिमान स्वरूप थे। साईं बाबा को भगवान श्री कृष्ण के निवास स्थान द्वारिकापुरी से इतना प्रेम था कि उन्होंने अपने निवास स्थान का नाम "द्वारिका माई मस्जिद" ही रख लिया था। वे "द्वारिका माई" में रात-दिन लगातार धूनी जलाते थे। आज भी शिरडी में उनके समाधि स्थल पर धूनी जलती रहती है। धूनी तो हिन्दू सन्त ही जलाते हैं। यह काम 'अग्निहोत्र' कहलाता है जिसे अग्निहोत्री ब्राह्मण ही किया करते हैं।

बाबा के निवास स्थान में उनकी प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या समय आरती की जाती थी और शंख, झालर तथा घण्टे बजाये जाते थे। वहाँ लोग उनके दर्शन करते थे, नाम सप्ताह, कीर्तन और सत्संग किये जाते थे। उस मस्जिद अथवा साईं बाबा के मन्दिर के ऊपर हिन्दुओं के झण्डे लहराते थे। साईं बाबा के भक्त उन्हें साष्टांग दण्डवत करते थे और साईं बाबा सर्व रोग नाशक धूनी की पवित्र भस्मि लोगों को वितरित करते थे।

शिरडी के साईं बाबा पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे। उन्हें वेद, शास्त्र, उपनिषद, गीता, भागवत, विष्णु सहस्र नाम जैसे ग्रंथों पर पूर्ण आस्था थी। भक्तजन साईं बाबा को चन्दन लगाते थे। साईं बाबा योगी और वेदान्ती थे। वे स्वयं 'एक ईश्वर' के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आस्था रखते थे और 'सबका मालिक एक' उनका सिद्धान्त था। उन्हें 'नवधा भक्ति' पर पूर्ण विश्वास था। शिरडी के साईं बाबा के लिये खण्ड योग, धौति, नेति और समाधि अत्यन्त सामान्य कर्म थे।

शिरडी में म्हालासपति साईं बाबा के अनन्य भक्त थे। वे उनके साथ द्वारका माई मस्जिद और चावड़ी में सोते थे। उनके आग्रह पर साईं बाबा ने उनको बताया था कि वे ब्राह्मण थे और पथरी उनका गाँव था। एक बार जब पथरी से कुछ लोग आये थे तो बाबा ने उनसे वहाँ के कुछ व्यक्तियों के बारे में पूछा था। श्रीमती काशीबाई कानेटकर जब मस्जिद की सीढ़ियों पर पढ़ रही थीं तब उनकी शंका का निवारण करने के लिये बाबा तोले थे कि 'मैं ब्राह्मण हूँ, शुद्ध ब्राह्मण। यह ब्राह्मण (साईं बाबा) लाखों लोगों को धर्म के मार्ग पर चला सकता है और उनको मुक्त कर सकता है।"

(क्रमशः)

Thursday, January 10, 2008

सद्गुरु साईं बाबा

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

सद्गुरु और परब्रह्म

शिरडी के साईं बाबा सद्गुरु थे। साईं बाबा को साईं नाथ भी कहते हैँ। सबसे पहले सद्गुरु के लक्षणों और विशेषताओं को जानना आवश्यक है। सद्गुरु का प्रमुख लक्षण है कि वह शान्ति का अक्षय भण्डार होता है। उसके समीप जाते ही मन को असीम शान्ति मिलती है। सद्गुरु जीव को उसके स्वभाव अथवा आत्मा में स्थित कर देता है। वह अपने उपदेश से इहलोक और परलोक से विरक्ति उत्पन्न कर मन को आत्म दर्शन में लीन कर देता है। इसी आधार पर भगवान श्री कृष्ण संसार के सद्गुरु हैं। "कृष्णस्तु भगवान स्वयं" जान कर हम "कृष्णं वन्दे जगद्गुरुं" कहते और परम शान्ति का अनुभव करते हैं। इसी प्रकार शिरडी के साईं बाबा भी सद्गुरु हैं। वे सदैव आत्मरत रहते थे और बाहर से अपने भक्तों के कल्याण के लिये लीला करते थे।

साईं बाबा में अलौकिक आकर्षण था। जो भी उनके दर्शन करता था वह मुग्ध हो जाता था। अपनी महासमाधि के बाद आज भी वे अपने निर्गुण रूप में उन लोगों का कल्याण करते हैँ जो उनके चरणों में निष्कपट हो कर श्रद्धा और विश्वास पूरसवक झुक जाते हैं। साईं बाबा महान सन्त थे।

सन्त पंचायतन

सन्त वे जीवन्मुक्त आत्माएँ होते हैं जो युग-युग में पृथ्वी पर अवतार लेते हेँ। कई सन्त एक साथ संसार में आते और अधर्म का निवारण तथा धर्म का प्रचार करते हैं। कहा जाता है कि कुछ शतात्दी पूर्व, महाराष्ट्र में 'दास पंचायतन' था जिसमें (1) समर्थ स्वामी रामदास, (2) जयराम स्वामी, (3) रंगनाथ स्वामी, (4) केशव स्वामी और (5) आनन्दमूर्ति सम्मिलित थे। इसी प्रकार साईं बाबा के समय 'नाथ पंचायतन' था जिसमें (1) माधव नाथ, (2) श्री सद्गुरु साईं नाथ (साईं बाबा), (3) ढुंढिराज पलुसी, (4) शेगाँव के गजानन महाराज और (5) नासिक के गोपाल दास (नरसिहं महाराज) थे। ये सब एक साथ पर अपने ढंग से काम करते थे। नाथ पंचायतन में साईं बाबा का बड़ा सम्मान था। साईं बाबा को माधव नाथ 'कोहिनूर' और 'त्रिलोकीनाथ' कहा करते थे।

साईं बाबा के विषय में

कई भक्तों के बहुत अधिक आग्रह करने पर एक बार बाबा ने बताया था कि वे नौरंगाबाद से आये हैं। वे अपने मामा, जिनका नाम नासत्या (Nasatya) था, के घर रहते थे। लोग उन्हें साईं कहते थे। 'वेंकुश' उनके गुरु थे। उनका धर्म "कबीर" था और परवर दिगार (परमात्मा) उनकी जाति थी। वे अपने गुरु के समाधि स्थल की खोज में शिरडी आये थे।

(क्रमशः)

Sunday, January 6, 2008

संविधान की बन्दिनी

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता-
सहमी थी राक्षसियों से घिरी हुई,
आज हिन्दी बन्दिनी है संविधान में,
अन्य भाषाओं की हुंकार से डरी हुई।

हिन्दी जब संविधान की बन्दिनी नहीं थी-
तब अरबी-फारसी ने उसे खूब नोचा
फिर गौरांगिनी अंग्रेजी ने-
उसे जी भर कर दबोचा।
आज भी अंग्रेजी हिन्दी को निगल रही है
इसी बहाने भारतीयों की मूर्खता उगल रही है।

उन दिनों-
नागरी प्रचारिणी जैसी हिन्दी संस्थाओं ने
हिन्दी के उद्धार का बीड़ा उठाया था-
सतत् अथक परिश्रम के श्रम कण से
राष्ट्रभाषा हिन्दी को आगे बढ़ाया था।

पर आज, शासन की कैद में पा कर हिन्दी को
हिन्दी संस्थाएँ भी मौन हैं,
समझ में नहीं आता कि
राष्ट्रभाषा को उसका उचित स्थान
दिलाने वाला कौन है!

हम अन्य भाषा भाषियों पर दोष मढ़ते हैं
पर हम हिन्दी के हिमायती कान्वेण्ट प्रेमी
हिन्दी का गहन अध्ययन कब करते हैं!
'हिन्दी का व्याकरण नहीं है' सुनकर भी,
हिन्दी भाषियों की शर्म नहीं जागती-
और हमारे अंग्रेजी प्रेम की श्रद्दा नहीं भागती।

संविधान की बन्दिनी हिन्दी देवकी का
हिन्दी उद्धारक कृष्ण कब अवतरेगा,
और हिन्दी में गम्भीर विचारों से
राष्ट्र का कोना-कोना कब भरेगा?
हिन्दी विरोधियों का वर्तमान राष्ट्र विरोध,
किस शुभ घड़ी में मरेगा?

हमारे शासकीय कार्यालयों में ही,
जब हिन्दी का प्रयोग नहीं होता है,
तब हम यही जानते हैं कि राष्ट्र में,
हिन्दी प्रचार का राजकीय प्रयोग
खर्राटे ले कर कुम्भकर्णी नींद सोता है।

कौन जाने कब वह मुहूर्त आवेगा
जब कट्टरता से हिन्दी में शासन चलेगा,
या फिर हमारे हृदयों में
निकम्मे संविधान का सम्मान जलेगा।
निकम्मे संविधान का सम्मान जलेगा।

(रचना तिथिः शनिवार 16-09-1986)

Saturday, January 5, 2008

नया साल है

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

नया साल है-
लेकिन कौन खुशहाल है?
जो पहले चलता था
वही अब भी बहाल है।

नये वर्ष में-
क्या स्वभाव बदल जायेगा?
जो बदरंग रंग जमा था अब तक,
वही रंग फिर रंग लायेगा।
दुनिया पशुता का कमाल है
नया साल है।

वर्ष आते और जाते रहते हैं,
साथ में खुशियाँ और गम लाते रहते हैं,
सच तो यह है कि-
काल का चक्र एक-सा चलता है,
वर्ष नहीं बदलते पर
भावना का संसार बदलता है
और संसार एक जंजाल है,
नया साल है।

कल्याण का संकल्प दृढ़ है तो,
अवश्य ही नया साल है,
अन्यथा न नूतन है न पुरातन है वरन्
सृष्टि में निरन्तर महाकाल है,
नया साल है।

(रचना तिथिः 01-01-1982)

Friday, January 4, 2008

ये का होथै छत्तीसगढ़ में

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ी कविता)

कहाँ बिलागै गोबर खाद
अब आगै फास्फेट के जमाना,
खेती-बारी चौपट हो गै,
फुटहा करम के ताना-बाना।

गइया-बइला सबे नँदा गैं
कहाँ ले आही गोबर?
परबुधिया बन गैं छत्तिसगढ़िया
नेता हो गैं ढोबर।

फास्फेट डारेन तो भुइयाँ जर गै
अउ हो गै टकरहा
घेरी-बेरी फास्फेट मांग थै,
नइ रहि गै गोबरहा।

बिरथा जाथै नांगर-जाँगर,
मूड़ धर के रोथैं किसान,
उसर-पुसर के अकाल परथै
माई कोठी में नइ ऐ धान।

गाँव-गाँव में फूट मात गै,
पार्टी बन्दी के भइन सिकार,
मार-काट में जिव हर जाथै,
कोन्नो के नइ ऐ बेला-बिचार।

ऊपर ले सेठ महाजन मन
रकसा कस डेरुआथैं,
ढेकुना-किरनी जइसे वो मन
लहू-रकत ला चूसत जाथैं।

गिद्ध-मसानी आपस में लड़थैं
छत्तिसगढ़ के रहवइया मन,
अपने मन में अँइठत रहिथैं
छत्तिसगढ़िया कहवइया मन।

अपने भासा ला हीनत रहिथैं
पढ़े-लिखे कहवइया मन,
चमचा बन के पूछी हलाथै
आगू-आगू बढ़वइया मन।

वीर नरायन सिंग ला भूलिन
बिसराइन ठाकुर प्यारे लाल,
कतको नइ जानैं, कोन रहिन हैं
राजिम के शर्मा सुन्दर लाल।

(रचना तिथिः 07-02-1982)

Thursday, January 3, 2008

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ी कविता)

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
अड़बढ़िया खेती करथँयँ,
झटपटइया कूकुर मन के सेती
चुरमुरा के लांघन मरथँयँ।

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
हाँ तौ अब एक-जुट हो जावव;
लहू पिवइया कूकुर मन ला
छत्तीसगढ़ ले मार भगावव।

छत्तीसगढ़ी मां विद्या सीखव
जनम-भूमि ला मूड़ नवावव,
छत्तीसगढ़ महतारी ला भइया
हँस-हँस के बलिदान चढ़ावव।

वीर नारायन सिंह रहिन हँयँ,
मरहा-खुरहा के सुनवइया;
उनखर वीरता ला अपनावव,
तुम हौ बघवा अस गरजइया।

शर्मा सुन्दर लाल बनव तुम,
अत्याचारी ला थर्रा दव;
नवा जागरन के मंतर से,
दुश्मन ला बोइर-अस झर्रा दव।

सिंघ सरिख जिनगी भर गरजिन,
त्यागी ठाकुर प्यारेलाल;
पनप न पाइन ठाकुर साहब,
झेलिन पर के टेड़गा चाल।

खूबचन्द तो खूब रहिन हँयँ,
छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ के प्रान;
उर प्रेरक अँयँ ये नेता मन,
धरत रहव ये सब झन के ध्यान।

महानदी शिवरीनारायण,
राजिम सिरपुर भोरमदेव;
चाँपाझर खल्लारी बस्तर,
बमलाई के पूजा कर लेव।

छत्तीसगढ़ के सीमा ला जानव,
चार दिसा मां देवी चार;
हमर सक्ति के रच्छा करथँयँ,
माई के जस अपरम्पार।

रतनपूर मां महामाया हय अउ
डोंगरगढ़ मां बमलाई;
बस्तर मां दन्तेस्वरि देवी,
सम्बलपुर मां समलाई।

अइसन छत्तीसगढ़ के हम छत्तीसगढ़िया,
तेखरे सेती छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया

हिन्दी सार

छत्तीसगढ़िया सब से अच्छे होते हैं, खूब खेती करते हैं लेकिन झपटने वाले कुत्तों (नेताओं) के कारण भूखे ही मरते हैं।

तो अच्छे छत्तीसगढ़ियों एक जुट हो जाओ और खून पीने वाले कुत्तों को छत्तीसगढ़ से मार भगाओ।

छत्तीसगढ़ी में विद्या सीखो, जन्म-भूमि के प्रति सिर झुकाओ, हँस-हँस छत्तीसगढ़ माता को बलिदान चढ़ाओ।

निर्बल लोगों की बात सुनने वाले वीर नारायण सिंह थे, उनकी वीरता को अपना कर शेर जैसे दहाड़ो।

तुम सुन्दरलाल शर्मा बनो और अत्याचारियों को थर्रा दो; नव-जागरण के मन्त्र से दुश्मनों को बेर जैसे टपका दो।

त्यागी ठाकुर प्यारेलाल सिंह जिंदगी भर सिंह के समान गरजते रहे पर दूसरों की टेढ़ी चाल के कारण पनप न पाये।

छत्तीसगढ़ भ्रातृ संघ के प्राण खूबचन्द जी तो खूब थे। ये सब हमारे प्रेरक नेता रहे हैं, इन्हीं का ध्यान धरते रहो।

महानदी, शिवरीनारायण, राजिम, सिरपुर, भोरमदेव, चाँपाझर, खल्लारी, बस्तर जैसे पावन स्थलों और बमलाई माता की पूजा करो।

छत्तीसगढ़ की सीमा को जानो, यहाँ चारों दिशाओं में चार देवियाँ हैं जो हमारी शक्ति की रक्षा करते हैं, इन माताओं का यश अपरम्पार है।

रतनपुर में महामाया देवी हैं, डोंगरगढ़ में बमलाई देवी हैं, बस्तर में दन्तेश्वरी देवी हैं और सम्बलपुर में समलाई देवी हैं।

ऐसे महान छत्तीसगढ़ के हम छत्तीसगढ़िया हैं और इसीलिये हम सबसे अच्छे हैं।

(रचना तिथिः 29-11-1980)

Wednesday, January 2, 2008

नया साल तुम क्या लाये हो?

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

उल्लास नया है,
आभास नया है,
पर थोड़े दिन के ही खातिर,
फिर तो दिन और रात बनेंगे
बदमाशी में शातिर
वर्तमान में तुम भाये हो,
नया साल तुम क्या लाये हो?

असुर न देव बनेंगे,
जो जो हैं वे वही रहेंगे,
शोषण कभी न पोषण बनेगा
रक्त पियेगा बर्बर मानव
जो चलता था वही चलेगा।
फिर क्यों जग को भरमाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

पिछला वर्ष गया है,
आया समय नया है।
क्या भीषण आघातों से
मानवता का किला ढहेगा?
बोलो, तुम क्यों सकुचाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

(रचना तिथिः 01-01-1981)

 
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