लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
त्यौहारों का समन्वय
राम नवमी उत्सव
राम नवमी का उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी। मस्जिद रंग-बिरंगी झण्डियों और तोरण से सजाई गई। राधा कृष्णा माई ने एक झूला दिया जो साईं बाबा के आसन के सामने रखा गया। कीर्तन करने के लिये कृष्ण राव भीष्म खड़े हुये और काका महाजनी ने हारमोनियम बजाया। उसी समय साईं बाबा ने एक आदमी भेज कर काका महाजनी को अपने पास बुलाया और पूछा, "क्या हो रहा है? झूला क्यों रखा गया है?" काका महाजनी ने बताया, "राम नवमी उत्सव प्रारम्भ हो गया है और झूला इसी लिये रखा गया है।" तब बाबा ने फूल की एक माला निकाली और उसे स्वयं पहन लिया। उन्होंने दूसरी माला निकाली और उसे उस दिन के कीर्तनकार भीष्म को पहनाने के लिये भेज दिया। और तब कीर्तन प्रारम्भ हुआ। इस तरह से साईं बाबा ने "देवो भूत्वा यजेत देवान" के सिद्धान्त के अनुसार सही ढंग से कीर्तन आरम्भ करने का मार्ग बताया।
कीर्तन समाप्त हुआ और "रामचन्द्र की जय" कह कर बैण्ड बाजा और संगीत के साथ चारों तरफ गुलाल उड़ाया गया। सभी परम प्रसन्न थे और तभी साईं बाबा की गर्जना सुनाई दी। उनकी आँख में गुलाल का छींटा घुस गया था जिससे वे कुपित हो गये थे। लोग डर कर भागने लगे। बाबा के नजदीकी भक्तों ने सोचा कि बाबा तो स्वयं राम थे और इसलिये राम जन्म होने के बाद रावण और उसके दल के अहंकार का वध करने के लिये बाबा का क्रोधित होना स्वाभाविक है। इसे भक्तों ने परोक्ष रूप से साईं बाबा का आशीर्वाद माना।
साईं बाबा को कुपित देख कर राधा कृष्णा माई डरी कि बाबा झूले को कहीं तोड़ न दें। उसने झूले को वापस लाने के लिये काका महाजनी को भेजा पर जब वह झूले की रस्सी को खोलने लगे तो साईं बाबा ने यह कह कर उसे मना कर दिया कि अभी उत्सव पूरा नहीं हुआ है। अब तक वे शान्त हो गये थे। लोगों ने हर्षित हो कर महापूजा और आरती की। दूसरे दिन भी कीर्तन हुआ। गोपाल काला और दही लूट होने के बाद साईं बाबा ने झूले को हटाने की अनुमति दी।
अगले वर्ष सन् 1913 से राम नवमी उत्सव में कार्यक्रम लगातार बढ़ने लगे। राधा कृष्णा माई ने चैत्र नवरात्रि के आरम्भ से नाम सप्ताह का आयोजन जोड़ा। सात दिनों तक द्वारका माई मस्जिद में रात-दिन अखण्ड रामधुन होने लगी। कभी कभी राधा कृष्णा माई भी सबेरे भजन और रामधुन में सम्मिलित होती थी। आधुनिक तुकाराम कहलाने वाले हरिदास बालबुवा माली ने सन् 1913 में कीर्तन किया, उसके बाद सन् 1914 में सतारा जिले के वृहद् सिद्ध कँवठे के बालबुवा सतारकर ने किया और अन्त में कीर्तनकार सम्बन्धी कठिनाई को दूर करने के लिये साईं बाबा ने दास गणू को स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया।
एकदम प्रेम और सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में राम नवमी और सन्दल के जुलूस निकलते थे। जुलूस के लिये लोगों के द्वारा एक सुन्दर घोड़ा, पालकी, रथ, चाँदी के बर्तन, बाल्टियाँ, दर्पण और चित्र उपहार के रूप में दिये गये थे। जुलूस के लिये हाथियों का भी प्रबन्ध किया जाता था। सब कुछ हो रहा था पर साईं बाबा सबसे विरक्त आत्मरत रहते थे।
मस्जिद की मरम्मत
साईं बाबा जिस द्वारका माई मस्जिद में बैठते और रहते थे वह केवल आठ फुट के भीतर थी और बैठने का स्थान गढ़े में था। उसी गढ़े में बाबा के सब भक्त बैठते थे। मस्जिद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थी और अब भक्त भी बड़ी संख्या में आने लगे थे। शिरडी के भक्तों को मस्जिद का जीर्णोद्धार करना आवश्यक जान पड़ रहा था पर स्थिति जैसी की वैसी चली आ रही थी।
जिस तरह से उर्स का मेला लगाने का विचार सबसे पहले गोपाल राव गुंड के मन में सबसे पहले आया उसी तरह से मस्जिद के जीर्णोद्धार की बात भी सबसे पहले उसी गोपाल राव गुंड के मन में आई। उसने पत्थर एकत्र किये और वे पत्थर उचित ढंग से तराशे गये किन्तु मस्जिद का जीर्णोद्धार उसके हाथ से नहीं होने का था। यह काम तो नाना साहब चान्दोरकर के लिये और फर्श का काम काका साहब दीक्षित के लिये सुरक्षित था।
अनुमति लेने के लिये जीर्णोद्धार की बात साईं बाबा के समक्ष रखी गई। पहले तो बाबा इसके लिये तैयार नहीं हुये पर भक्त म्हालासपति के हस्तक्षेप करने पर उन्होंने अनुमति दे दी। भक्तों ने मिल कर काम किया और जब फर्श एक रात में ही बना दिया गया तब साईं बाबा ने अपने बोरे का आसन फेंक दिया और उसकी जगह गद्दी रख दी - मानो आसन का भी जीर्णोद्धार हो गया।
(क्रमशः)
त्यौहारों का समन्वय
राम नवमी उत्सव
राम नवमी का उत्सव मनाने की तैयारी होने लगी। मस्जिद रंग-बिरंगी झण्डियों और तोरण से सजाई गई। राधा कृष्णा माई ने एक झूला दिया जो साईं बाबा के आसन के सामने रखा गया। कीर्तन करने के लिये कृष्ण राव भीष्म खड़े हुये और काका महाजनी ने हारमोनियम बजाया। उसी समय साईं बाबा ने एक आदमी भेज कर काका महाजनी को अपने पास बुलाया और पूछा, "क्या हो रहा है? झूला क्यों रखा गया है?" काका महाजनी ने बताया, "राम नवमी उत्सव प्रारम्भ हो गया है और झूला इसी लिये रखा गया है।" तब बाबा ने फूल की एक माला निकाली और उसे स्वयं पहन लिया। उन्होंने दूसरी माला निकाली और उसे उस दिन के कीर्तनकार भीष्म को पहनाने के लिये भेज दिया। और तब कीर्तन प्रारम्भ हुआ। इस तरह से साईं बाबा ने "देवो भूत्वा यजेत देवान" के सिद्धान्त के अनुसार सही ढंग से कीर्तन आरम्भ करने का मार्ग बताया।
कीर्तन समाप्त हुआ और "रामचन्द्र की जय" कह कर बैण्ड बाजा और संगीत के साथ चारों तरफ गुलाल उड़ाया गया। सभी परम प्रसन्न थे और तभी साईं बाबा की गर्जना सुनाई दी। उनकी आँख में गुलाल का छींटा घुस गया था जिससे वे कुपित हो गये थे। लोग डर कर भागने लगे। बाबा के नजदीकी भक्तों ने सोचा कि बाबा तो स्वयं राम थे और इसलिये राम जन्म होने के बाद रावण और उसके दल के अहंकार का वध करने के लिये बाबा का क्रोधित होना स्वाभाविक है। इसे भक्तों ने परोक्ष रूप से साईं बाबा का आशीर्वाद माना।
साईं बाबा को कुपित देख कर राधा कृष्णा माई डरी कि बाबा झूले को कहीं तोड़ न दें। उसने झूले को वापस लाने के लिये काका महाजनी को भेजा पर जब वह झूले की रस्सी को खोलने लगे तो साईं बाबा ने यह कह कर उसे मना कर दिया कि अभी उत्सव पूरा नहीं हुआ है। अब तक वे शान्त हो गये थे। लोगों ने हर्षित हो कर महापूजा और आरती की। दूसरे दिन भी कीर्तन हुआ। गोपाल काला और दही लूट होने के बाद साईं बाबा ने झूले को हटाने की अनुमति दी।
अगले वर्ष सन् 1913 से राम नवमी उत्सव में कार्यक्रम लगातार बढ़ने लगे। राधा कृष्णा माई ने चैत्र नवरात्रि के आरम्भ से नाम सप्ताह का आयोजन जोड़ा। सात दिनों तक द्वारका माई मस्जिद में रात-दिन अखण्ड रामधुन होने लगी। कभी कभी राधा कृष्णा माई भी सबेरे भजन और रामधुन में सम्मिलित होती थी। आधुनिक तुकाराम कहलाने वाले हरिदास बालबुवा माली ने सन् 1913 में कीर्तन किया, उसके बाद सन् 1914 में सतारा जिले के वृहद् सिद्ध कँवठे के बालबुवा सतारकर ने किया और अन्त में कीर्तनकार सम्बन्धी कठिनाई को दूर करने के लिये साईं बाबा ने दास गणू को स्थायी रूप से नियुक्त कर दिया।
एकदम प्रेम और सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में राम नवमी और सन्दल के जुलूस निकलते थे। जुलूस के लिये लोगों के द्वारा एक सुन्दर घोड़ा, पालकी, रथ, चाँदी के बर्तन, बाल्टियाँ, दर्पण और चित्र उपहार के रूप में दिये गये थे। जुलूस के लिये हाथियों का भी प्रबन्ध किया जाता था। सब कुछ हो रहा था पर साईं बाबा सबसे विरक्त आत्मरत रहते थे।
मस्जिद की मरम्मत
साईं बाबा जिस द्वारका माई मस्जिद में बैठते और रहते थे वह केवल आठ फुट के भीतर थी और बैठने का स्थान गढ़े में था। उसी गढ़े में बाबा के सब भक्त बैठते थे। मस्जिद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थी और अब भक्त भी बड़ी संख्या में आने लगे थे। शिरडी के भक्तों को मस्जिद का जीर्णोद्धार करना आवश्यक जान पड़ रहा था पर स्थिति जैसी की वैसी चली आ रही थी।
जिस तरह से उर्स का मेला लगाने का विचार सबसे पहले गोपाल राव गुंड के मन में सबसे पहले आया उसी तरह से मस्जिद के जीर्णोद्धार की बात भी सबसे पहले उसी गोपाल राव गुंड के मन में आई। उसने पत्थर एकत्र किये और वे पत्थर उचित ढंग से तराशे गये किन्तु मस्जिद का जीर्णोद्धार उसके हाथ से नहीं होने का था। यह काम तो नाना साहब चान्दोरकर के लिये और फर्श का काम काका साहब दीक्षित के लिये सुरक्षित था।
अनुमति लेने के लिये जीर्णोद्धार की बात साईं बाबा के समक्ष रखी गई। पहले तो बाबा इसके लिये तैयार नहीं हुये पर भक्त म्हालासपति के हस्तक्षेप करने पर उन्होंने अनुमति दे दी। भक्तों ने मिल कर काम किया और जब फर्श एक रात में ही बना दिया गया तब साईं बाबा ने अपने बोरे का आसन फेंक दिया और उसकी जगह गद्दी रख दी - मानो आसन का भी जीर्णोद्धार हो गया।
(क्रमशः)
9:16 AM
जी.के. अवधिया
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