Wednesday, November 4, 2009

सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिट्रेन अर्धसभ्य किसानों का उजाड़ देश था

"सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिट्रेन अर्धसभ्य किसानों का उजाड़ देश था"
ये मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ये उद्गार हैं प्रसिद्ध इतिहासज्ञ उपन्यासकार आचार्य चतुर सेन के। प्रस्तुत है उनकी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति "सोना और खून" का एक अंशः

सोना और खून
पाँचवा खण्ड
1

सत्रहवीं शताब्दी में पहली बार भारत का ब्रिटेन से सम्पर्क हुआ। यह सम्पर्क दो परस्पर-विरोधी संस्कृतियों का परस्पर टकराना–मात्र था। उन दिनों समूचा ब्रिट्रेन अर्धसभ्य किसानों का उजाड़ देश था। उनकी झोपड़ियों नरसलों और सरकंडों की बनी होती थीं, जिनके ऊपर मिट्टी या गारा लगाया हुआ होता था। घास-फूस जलाकर घर में आग तैयार की जाती थी जिससे सारी झोपड़ी में धुआँ भर जाता था। धुँए को निकालने के कोई राह ही न थी। उनकी खुराक जौ, मटर, उड़द, कन्द और दरख्तों की छाल तथा मांस थी। उनके कपड़ों में जुएं भरी होती थीं।

आबादी बहुत कम थी, जो महामारी और दरिद्रता के कारण आए दिन घटती जाती थी। शहरों की हालत गाँवों से कुछ अच्छी न थी। शहरवालों का बिछौना भुस से भरा एक थैला होता था। तकिये की जगह लकडी का एक गोल टुकड़ा। शहरी लोग जो खुशहाल होते थे, चमड़े का कोट पहनते थे। गरीब लोग हाथ-पैरों पर पुआल लटेपकर सरदी से जान बचाते थे। न कोई कारखाना था, न कारीगर। न सफाई का इन्तजाम, न रोगी होने पर चिकित्सा की व्यवस्था। सड़कों पर डाकू फिरते थे और नदियां तथा समुद्री मुहाने समुद्री डाकुओं से भरे रहते थे। उन दिनो दुराचार का तमाम यूरोप में बोलबाला और आतशक-सिफलिस की बीमारी आम थी। विवाहित या अविवाहित, गृहस्थ पादरी, यहाँ कि पोप दसवें लुई तक भी इस रोग से बचे न थे। पादरियों का इंग्लैंड की एक लाख स्त्रियों को भ्रष्ट किया था। कोई पादरी बड़े से बड़ा अपराध करने पर भी केवल थोड़े-से जुर्माने की सज़ा पाता था। मनुष्य-हत्या करने पर भी केवल छः शिलिंग आठ पैंस- लगभग पांच रुपये-जुर्माना देना पड़ता था। ढोंग-पाखण्ड, जादू-टोना उनका व्यवसाय था।

सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में लंदन नगर इतना गंदा था, और वहां के मकान इस कदर भद्दे थे कि उसे मुश्किल से शहर कहा जा सकता था। सड़कों की हालत ऐसी थी कि पहियेदार गाड़ियों का चलना खतरे से खाली न था लोग लद्दू टट्टुओं पर दाएं-बाएं पालनों में असबाब की भाँति लदकर यात्रा करते थे। उन दिनों तेज़ से तेज़ गाड़ी इंगलैंड में तीस से पचास मील का सफर एक दिन मे तय कर सकती थी। अधनंगी स्त्रियां जंगली और भद्दे गीत गाती फिरती थीं और पुरुष कटार घुमा-घुमाकर लड़ाई के नाच नाचा करते थे। लिखना-पढ़ना बहुत कम लोग जानते थे। यहाँ तक कि बहुत-से लार्ड अपने हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते थे। बहुदा पति कोड़ों से अपनी स्त्रियों को पीटा करते थे। अपराधी को टिकटिकी से बाँधकर पत्थर मार-मारकर मार डाला जाता था। औरतों की टाँगों को सरेबाजार शिकंजों में कसकर तोड़ दिया जाता था। शाम होने के बाद लंदन की गलियां सूनी, डरावनी और अंधेरी हो जाती थीं। उस समय कोई जीवट का आदमी ही घर से बाहर निकलने का साहस कर सकता था। उसे लुट जाने या गला काट जाने का भय था। फिर उसके ऊपर खिड़की खोल कोई भी गन्दा पानी तो फेंक ही सकता था। गलियों में लालटेन थीं ही नहीं। लोगों को भयभीत करने के लिए टेम्स के पुराने पुल पर अपराधियों के सिर काट कर लटका दिए जाते थे। धार्मिक स्वतन्त्रता न थी। बादशाह के सम्प्रदाय से भिन्न दूसरे किसी सम्प्रदाय के गिरजाघर में जाकर उपदेश सुनने की सजा मौत थी। ऐसे अपराधियों के घुटने को शिकजे में कसकर तोड़ दिया जाता था। स्त्रियों को लड़कियों को सहतीरों में बाँधकर समुद्र के किनारे पर छोड़ देते थे कि धीरे-धीरे बढ़ती हुई समुद्र की लहरें उन्हें निगल जाएं। बहुधा उनके गालों को लाल लोहे से दागदार अमेरिका निर्वासित कर दिया जाता था। उन दिनों इंग्लैंड की रानी भी गुलामों के व्यापर में लाभ का भाग लेती थी।

इंग्लैंड के किसान की व्यवस्था उस ऊदबिलाव के समान थी जो नदी किनारे मांद बनाकर रहता हो। कोई ऐसा धंधा-रोजगार न था कि जिससे वर्षा न होने की सूरत में किसान दुष्काल से बच सकें। उस समय समूचे इंगलिस्तान की आबादी पचास लाख से अधिक न थी। जंगली जानवर हर जगह फिरते थे। सड़कों की हालत बहुत खराब थी। बरसात में तो सब रास्ते ही बन्द हो जाते थे। देहात में प्रायः लोग रास्ता भूल जाते थे और रात-रात भर ठण्डी हवा में ठिठुरते फिरते थे। दुराचार का दौरदौरा था। राजनीतिक और धार्मिक अपराधों पर भयानक अमानुषिक सजाएं दी जाती थीं।

http://vedantijeevan।com/bs/home.php?bookid=668 से साभार

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

सीता की शंका - अरण्यकाण्ड (3)

सीता ने रामचन्द्र से कहा, "आर्यपुत्र! तीसरा कामजनित दोष है बिना वैरभाव के ही दूसरों के प्रति क्रूरतापूर्ण व्यवहार। यह तीसरा दोष अर्थात् क्रूरतापूर्ण व्यवहार ही आपके समक्ष उपस्थित है और आप इसे करने जा रहे हैं। आपने इन तपस्वियों के समक्ष राक्षसों को समूल नष्ट कर डालने की जो प्रतिज्ञा की है, उसी में मुझे दोष दृष्टिगत हो रहा है।"

8 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल said...

एकदम सही कहा आचार्य चतुर सेन ने, ये साले गोरी चमड़ी वाले भूखे नंगे नहीं होते तो पेट के खातिर लुटेरो की तरह मटरगश्ती करते हुए बंगाल क्यों आते ?

Dr. Smt. ajit gupta said...

बहुत ही अच्‍छी शुरुआत, बधाई। मेरी पोस्‍ट भी देखिए, अंग्रेजी खूनी पंजे।

अनुनाद सिंह said...

बहुत अभिनव जानकारी है। उनके लिये विशेष महत्व की है जो अब भी गुलाम मानसिकता लिये फिर रहे हैं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

भारत तो कई भागों में प्रागैतिहासिक काल में लौट रहा है! :)

जी.के. अवधिया said...

"भारत तो कई भागों में प्रागैतिहासिक काल में लौट रहा है!"

ऐसे कुछ प्रमाण, साक्ष्य या दस्तावेज उपलब्ध हैं क्या ज्ञानदत्त जी?

Mishra Pankaj said...

आपके लेख को पढ़ तो लिया लेकिन कमेन्ट नहीं कर पाउगा ..माफी

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

गोदियाल जी का कहना सही है कि यदि ये लोग ऎसी स्थिति में नहीं होते तो इन्हे मुस्लिम आक्रमणकारियों की तरह से दूसरे देशों मे जाने की कोई आवश्यकता ही न होती।

आपने जिस साईट का लिंक दिया है....वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि यहाँ किसी टर्किश आक्रमणकारी का कब्जा हो चुका है ।

राज भाटिय़ा said...

बिलकुल सही लिखा,आज से सॊ साल पहले किसी आम आदमी कॊ बाईविल पढने पर सजा होती थी..... यज इगलेंड के लोग तो पक्के उच्चके है जो अब अमेरिकन बने फ़िरते है यह पहले इग्लेंड से ही गये थे...ओर आज भी दुसरे देशो को लडवा कर अपनी ओकात बता देते है.
धन्यवाद इस अति सुंदर लेख के लिये

 
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