Powered by Conduit

Wednesday, September 30, 2009

5 टिप्स टिप्पणी के

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि टिप्पणी है क्या चीज? किसी के विचार को जानने के बाद प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न अपने विचारों से अन्य लोगों को अवगत कराना ही टिप्पणी है।

किसी भी लेख को पढ़ने के तत्काल बाद ही हमारे मन में भी उस लेख के विषयवस्तु के सम्बन्धित कई प्रकार के विचार उठने लगते हैं और हम चाहने लगते हैं कि अपने मन में उठने वाले इन विचारों से पढ़े गए लेख के लेखक के साथ ही साथ अन्य लोगों को भी अवगत कराएँ। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। और हम अपने उन विचारों से टिप्पणी के द्वारा ही अन्य लोगों को अवगत कराते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं में टिप्पणी करने की सुविधा उपलब्ध नहीं होती क्योंकि पत्र-पत्रिकाएँ एकतरफा संवाद वाली माध्यम है किन्तु ब्लॉग में हम इस सुविधा का अवश्य इस्तेमाल कर सकते हैं। ब्लॉग की सबसे बड़ी विशेषता है इसका दोतरफा संवाद वाला माध्यम होना।

5 टिप्स टिप्पणी के

1. अपनी टिप्पणी में मुख्य लेख की विषयवस्तु से सम्बन्धित विचारों का ही उल्लेख करें, विषयान्तर न होने दें।

2. अपनी टिप्पणी में सदैव शालीनता का ध्यान रखें। अभद्र भाषा का प्रयोग कदापि न करें।

3. अपनी टिप्पणी में कभी भी व्यक्तिगत आक्षेप को स्थान न दे।

4. ऐसी टिप्पणी न करें जिससे कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचे।

5. हमेशा ध्यान रखें कि टिप्पणी आप किसी अन्य के ब्लॉग में कर रहे हैं अतः टिप्पणी के माध्यम से कभी भी गलत बातों का प्रचार न करें। वैसे टिप्पणी के माध्यम से प्रचार को प्रायः बुरा नहीं समझा जाता किन्तु यदि आपका प्रचार ब्लॉग के मालिक को यदि पसंद नहीं आता तो वह आपकी टिप्पणी को मिटा सकता है।

चलते-चलते

"बीएसपी (बी एस पाबला) एंड केडीएस (खुशदीप सहगल) फ्री स्माइल्स कंपनी" के फ्लॉप हो जाने पर खुशदीप सहगल जी ने अपनी स्लॉग ओवर की दुकान खोल ली। एक स्लॉग ओवर सुनाने की फीस मात्र रु.100.00 ! हँसाने की पूरी पूरी गारंटी!! हँसी न आने पर रु.100.00 के बदले में रु.10,000.00 वापस!!!

लोग रु.100.00 के बदले में रु.10,000.00 पाने की आस लिए आते थे पर खुशदीप जी ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थी, ऐसे ऐसे स्लॉग ओवर्स सुनाते कि सुनने वाला हँसने के लिए मजबूर हो जाता था। दुकान जोर-शोर से चल निकली।

एक दिन खुशदीप जी के पास एक खूँसट बुड्ढा (जी.के. अवधिया टाइप का) ग्राहक आया। खुशदीप जी ने अपनी फीस वसूल करने के बाद एक जोरदार स्लॉग ओवर बुड्ढे को सुनाया। पर ये क्या? आश्चर्य! बुड्ढा हँसा ही नहीं। मायूस होकर खुशदीप जी ने बुड्ढे को रु.10,000.00 दे दिए।

दूसरे रोज शाम को खुशदीप जी किसी काम से घर से बाहर निकले तो रास्ते में एक शवयात्रा दिखी। पता चला कि मरने वाला कल वाला बुड्ढा ही है।

खुशदीप जी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा, "अरे कल शाम को तो ये अच्छे भले थे। कैसे मर गए?"

जवाब मिला, "अजी साहब, कुछ मत पूछिए, कुछ देर पहले इन्हें बड़ा अजीब सा दौरा पड़ा। ताली पीट-पीट कर जोर जोर से कहते थे 'अब समझ में आया', 'अब समझ में आया' और हँसते जाते थे। बस हँसते हँसते ही इनके प्राण निकल गए।"

Tuesday, September 29, 2009

आखिर ये ब्लॉगवाणी पसंद है क्या बला जिसके कारण इतना बवाल मचा

आप सभी ने देखा होगा कि ब्लॉगवाणी में दिखने वाले सभी लेख के आगे एक बटन होता है जिसमें "पसंद" लिखा होता है और एक संख्या दिखती रहती है। यह बहुत ही काम का बटन है क्योंकि किसी भी लेख के आगे के बटन को क्लिक करके आप दर्शा सकते हैं कि वह लेख आपको पसंद आया है। ज्योंही आप बटन पर क्लिक करते हैं, बटन में दिखाई देने वाली संख्या एक अंक से बढ़ जाती है। इस बटन की सहायता से आप केवल अपनी पसंद दर्शाते हैं बल्कि उस लेख के लेखक को प्रोत्साहन भी देते हैं। भला ऐसा कौन लेखक होगा जो कि अपने लेख को अधिक से अधिक लोगों के द्वारा पसंद किए जाते देख कर खुश न होगा? उस लेखक को न केवल खुशी मिलती है बल्कि और भी अच्छे लेख लिखने की प्रेरणा भी मिलती है।

यह पसंद बटन एक और भी महत्वपूर्ण कार्य करता है वह है अधिक पसंद किए जाने वाले लेखों को ब्लॉगवाणी के दाँईं ओर के हाशिये में बने "आज अधिक पसंद प्राप्त" कॉलम में ले जाने का और वहाँ पर उसे पसंद की संख्या के अनुसार क्रम देने का। याने कि अधिकतम पसंद किए गए लेख को सबसे ऊपर और कम पसंद किए गए लेखों को क्रमवार उसके नीचे लाने का। जाहिर है कि जिस लेख को बहुत से लोगों ने पसंद किया हो उसे आप भी पढ़ना चाहेंगे। हो सकता है कि वह लेख ब्लॉगवाणी के पहले पेज से निकलकर दूसरे, तीसरे और भी आगे के पेज में पहुँच गया हो पर उसे पढ़ने के लिए आपको ब्लॉगवाणी के पेजेस को खंगालना नहीं पड़ता क्योंकि "आज अधिक पसंद प्राप्त" में ही उस लेख को क्लिक करने से वह लेख आपके समक्ष होता है। मैं तो ब्लॉगवाणी खोलते ही सबसे पहले "आज अधिक पसंद प्राप्त" को ही देखता हूँ और बहुत से लेखों को पढ़ जाता हूँ। मेरे जैसे ही और भी बहुत से लोग होंगे। खैर, मैं आपको यही बताना चाहता हूँ कि यह ब्लॉवाणी पसंद बटन बड़े काम की चीज है। मेरा तो विश्वास है कि भविष्य में यह हिन्दी के लेखों की लोकप्रियता का एक मानदंड बन जाएगा!

यह बटन ब्लॉगवाणी सॉफ्टवेयर का एक हिस्सा है और स्वतः ही (ऑटोमेटेड) कार्य करता है। तो इसी बटन की निष्पक्षता पर सन्देह उठने के कारण ही सारा बवाल मचा।

प्रसन्नता की बात यह है कि बवाल अब शान्त हो चुका है। ब्लॉगवाणी बन्द हुई और पुनः शुरू हो गई। हम कामना करें कि भविष्य में इस प्रकार का कोई बवाल फिर कभी न उठ पाए।

बहुत से लोग लेखों को पसंद तो करते हैं किन्तु इस बटन का प्रयोग नहीं करते। यदि आप किसी लेख को पसन्द करते हैं तो उसके लेखक को प्रोत्साहित करना भी आपका नैतिक कर्तव्य होता है। इसलिए मेरा आप सभी से अनुरोध है कि आप बटन का बेझिझक प्रयोग करें और अपने प्रिय लेखकों को प्रोत्साहित करें।

अन्त में सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि ब्लॉवाणी टीम ने अपने ब्लॉग में बताया है कि निकट भविष्य में ही वे हमें एक नई ब्लॉवाणी देने जा रहे जिसमें और भी बहुत सी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी और हिन्दी के पाठको की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जायेगा।

शाबास ब्लॉगवाणी पसंद ... तेरे पास होगा अब निराला ढंग

गम छोड़ के मनाओ रंगरेली ...

देर आयद दुरुस्त आयद।

खुशखबरी मिल चुकी है ... ब्लॉवाणी फिर शुरू हो चुका है ...

धन्यवाद ब्लॉगवाणी!!!

ब्लॉगवाणी ने अपने प्रशंसकों और समर्थकों के अनुरोध को स्वीकार कर उनकी मनोभावनाओं का सम्मान किया इसके लिए ब्लॉगवाणी को कोटिशः धन्यवाद!

अस्थाई ब्लॉगवाणी जारी रखते हुए एक नये और बेहतर ब्लॉवाणी की शुरुवात की घोषणा बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण तथा स्वागतेय कार्य है।

निकट भविष्य में होगी एक नई ब्लॉगवाणी पसंद ... जिसका होगा काम करने का निराला ढंग!

मैं ब्लॉवाणी टीम की सहनशीलता, विवेकशीलता और भलमनसाहत को नमन् करता हूँ।

Monday, September 28, 2009

वाह रे ब्लॉगवाणी पसंद ... तूने ही कर दिया ब्लॉगवाणी बंद

ऐसा लगता है कि शायद ब्लॉगवाणी टीम को दिनभर किसी के ब्लोग की पसंद की संख्या बढ़ाने और किसी के ब्लोग की पसंद की संख्या बढ़ने से रोकने के सिवाय और कुछ काम ही नहीं रहता था। ब्लॉगवाणी शायद ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर न होकर मेनुअल वर्क रहा होगा कि जिसे चाहे आगे बढ़ाना है बढ़ा लें और जिसे चाहे पीछे धकेलना है धकेल दें। या फिर यदि ब्लॉगवाणी शायद ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर रहा होगा तो हन्ड्रेड परसेंट परफैक्ट रहा होगा जिससे कि कभी किसी प्रकार की गलती होती ही नहीं रही होगी।

मैं प्रोग्रामर तो नहीं हूँ पर इतना अवश्य जानता हूँ कि किसी भी सॉफ्टवेयर में कभी भी खामी आ सकती है। कोडिंग में जरा सी त्रुटि हुई कि गड़बड़ी शुरू। कोडिंग की त्रुटि कई बार अपने आप भी आ जाती है, कोई जानबूझ कर गलती नहीं करता। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ क्योंकि मैंने भी कुछ स्क्रिप्ट्स का प्रयोग किया है और कॉन्फिगरेशन्स सही करने तथा गलतियाँ रोकने में मुझे दाँतों पसीना आ चुका है।

जब ब्लॉगवाणी किसी के ब्लॉग को दिखाने के लिए कोई शुल्क भी नहीं लेता था तो क्या अधिकार था किसी को उसकी आलोचना करने की? यदि ब्लॉगवाणी में इतनी ही खामियाँ नजर आती थीं तो हटा लेते वहाँ से अपने ब्लॉग को और कभी भी मत खोलते ब्लॉगवाणी को अपने कम्प्यूटर में।

किसी के ब्लॉग की पसंद की संख्या बढ़ने से रुक जाए तो ब्लॉवाणी क्यों जवाबदेह हो? और यदि जवाब न मिले तो ब्लॉगवाणी को जनतांत्रिक तरीके से काम करने के विरुद्ध समझा जाना कहाँ तक उचित है? एक अच्छे कार्य में गलतियों पर गलतियाँ निकाल कर उन्हें इस प्रकार से बताना कि अच्छे काम को करने वाले के मर्म को ही छेदने लगे कहाँ तक जायज है?

ब्लॉगवाणी टीम की सबसे बड़ी गलती यही थी कि वे एक अच्छा कार्य कर रहे थे। और बन्धुओं, अच्छा कार्य करने में नेकनामी नहीं हमेशा बदनामी ही मिला करती है।

असत्य पर सत्य की विजय?????



सत्‌युग!!!! .....


सत्य ही सत्य!!!!!



त्रेता!!!!?
.....

असत्य पर सत्य की विजय!!!!!

"शानदार विजय हुई।"



द्वापर!!!?? .....

असत्य पर सत्य की विजय!!!??

"विजय हुई किन्तु असत्य की सहायता से"

"कैसे?"

"युधिष्ठिर उवाच् - 'अश्वत्थामा हतो ...' "



कलियुग????? .....

असत्य पर सत्य की विजय?????

"हो ही नहीं सकती"

"अरे होती है भई!"

"कहाँ?"

"हमारी कल्पना में (विजयादशमी के दिन)

और

हमारे राष्ट्रीय नारे में

॥सत्यमेव जयते॥"

Sunday, September 27, 2009

अपने ब्लोग के अक्षरों को बड़ा कैसे करें

मैने देखा है कि बहुत से हिन्दी ब्लोग्स में अक्षर इतने छोटे होते हैं कि पढ़ने में तकलीफ होने लगती है। यह सत्य है कि इसमें हमारे ब्लोगर बन्धुओं की कहीं भी कोई गलती नहीं है क्योंकि उन्हें तो बना बनाया ब्लोग टेम्प्लेट ही मिलता है और उनमें फोंट की साइज नियत रहती है। हाँ यह जरूर है कि हमारे ब्लोगर साथियों को यह जानकारी यदि मिल जाए कि फोंट साइज कैसे बढ़ाया जाए तो वे अपने ब्लोग के अक्षरों का आकार अवश्य बड़ा कर सकते हैं। मैं इस पोस्ट को यही जानकारी देने के लिए लिख रहा हूँ।

यहाँ पर मैं ब्लोगर के ब्लोग टेम्प्लेट्स की ही बात करूँगा क्योंकि हमारे अधिकांश हिन्दी ब्लोग ब्लोगर में ही स्थित हैं।

ब्लोगर में फोंट साइज को निम्न तरीके से बढ़ाया जा सकता हैः

ब्लोगर खाते में लागिन करें।

डैशबोर्ड में जिस ब्लोग के अक्षरों को बढ़ाना है उसके लेआउट को क्लिक करें।

नये खुलने वाले विंडो में "एडिट एचटीएमएल" को क्लिक करें।

यहाँ दिखने वाले बॉक्स में है आपके ब्लोग के टेम्प्लेट का पूरा कोड! सबसे पहले इसकी एक कॉपी बना कर रख लें अर्थात् बैकअप ले लें ताकि यदि कोई गलती हो जाए तो फिर से पुराना कोड वापस डाल सकें।

अब उस कोड में वहाँ चले जाइए जहाँ

body {

लिखा हो।

इसके नीचे आपको कहीं पर font या font-size या text-font लिखा हुआ मिलेगा जिसके आगे फोंट का साइज या तो पिक्सल्स में (जैसे कि 9 या 10) या फिर यह प्रतिशत में (जैसे कि 90%) लिखा दिखेगा। यदि यह पिक्सल्स में है तो इसे 14 और यदि यह प्रतिशत में है तो इसे 100% करके सेव्ह टेम्प्लेट बटन को क्लिक कर दें।

बस हो गया आपका काम!

Saturday, September 26, 2009

यह तो तय है कि हिन्दी एग्रीगेटर्स का प्रचार होना चाहिए

हिन्दी को आगे लाने के लिए आप सभी कितने उत्साहित हैं यह तो इसी से पता चलता है कि आप लोगों ने मेरे कल के पोस्ट "जरूरत एक हिन्दी ब्लोगर बनाने की नहीं बल्कि एक हिन्दी पाठक बनाने की है" में इतनी अधिक रुचि दिखाई। आप सभी लोगों को मेरे पोस्ट में रुचि दिखाने और टिप्पणियों के द्वारा अपने विचार प्रदर्शित करने के लिए धन्यवाद!

आप सभी के उत्साह को देखते हुए मुझे विश्वास हो गया है कि यथाशीघ्र नेट में हिन्दी छा जायेगी।

संजीव तिवारी जी के कथन से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि "हिन्दी एग्रीगेटर्स का प्रचार किया जाए"। प्रचार करने के कुछ तरीके मुझे सूझे हैं जिनको बताना ही मेरे इस पोस्ट का उद्देश्य है।

याहू चैट, याहू समूह और ऑर्कुट वे स्थान हैं जहाँ हमारे हिन्दीभाषी मित्र बहुतायत से पाए जाते हैं। तो क्यों न हम इन्हीं स्थानों में ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत आदि अपने हिन्दी एग्रीगेटर्स का प्रचार करें।

याहू चैटः हम ब्लोगर्स में से अधिकतर साथी चैट तो करते ही होंगे। तो हमें याहू चैट के चैट रूम्स में एक के बाद एक जाना है और नीचे स्नैपशॉट में दर्शाए गए संदेश जैसा कोई आकर्षक संदेश बना कर चैट रूम के मुख्य विंडो में भेज देना है ताकि चैट रूम में उपस्थित सारे सदस्यों को वह संदेश मुख्य विंडो में नजर आने लगे।

याहू समूहः याहू समूहों की काफी लोकप्रियता है और हमारे बहुत से लोग अनेकों समूहों के सदस्य हैं। हम भी ऐसे समूहों के सदस्य बन कर वहाँ एग्रीगेटर्स के विषय में संदेश देना है और साथ ही समूह में अपने एग्रीगेटर्स के लिंक डाल देना है। लिंक डालने के लिए समूह के मीनू में लिंक्स को क्लिक कर देना है। उसके बाद वहा दिए गए निर्देशों के अनुसार लिंक्स डाल देना है। इस प्रकार से हमारे एग्रीगेटर्स के लिंक्स वहाँ हमेशा के लिए रह जायेंगे।

ऑर्कुटः ऑर्कुट के विषय में बहुत अधिक बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप सभी इसके बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। करना सिर्फ यह है कि वहाँ जितने भी अधिक मित्र बन सकें बनाना है और एग्रीगेटर्स के विषय में एक संदेश बना कर एक ही क्लिक से सभी मित्रों को एक बार में ही संदेश भेज देना है।

युवा वर्ग किसी युवा से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित होते हैं बनिस्बत के किसी प्रौढ़ या वृद्ध व्यक्ति के। अतः मेरी अपेक्षा आप लोग इस कार्य को अधिक प्रभावशाली ढंग से तथा सफलतापूर्वक कर सकेंगे।

जै हिन्दी!

हिन्दी ब्लोग जगत अमर हो!!

Friday, September 25, 2009

जरूरत एक हिन्दी ब्लोगर बनाने की नहीं बल्कि एक हिन्दी पाठक बनाने की है

भारत में इंटरनेट यूजर्स की वर्तमान संख्या 8,10,00,000 (आठ करोड़ दस लाख) है, यह मैं नहीं कहता बल्कि इंटरनेटवर्ल्डस्टैट्स कहता है। यकीन न हो तो इस लिंक को क्लिक कर के देख लें। तो इन आठ करोड़ दस लाख लोगों में से हिन्दी बोलने, समझने तथा पढ़ने वाले भी तो करोड़ों लोग होंगे ही। किन्तु खेद की बात तो यह है कि हिन्दी ब्लोग्स को पढ़ने के लिए इन लोगों में से कुछ सौ लोग भी शायद ही आते होंगे। ब्लोगवाणी में आज अधिक पढ़े गये की संख्या प्रायः 100 से 200 तक रहती है। यह संख्या शायद ही कभी 200 से ऊपर गई हो और कई बार तो यह 100 से भी कम ही रहती है। चिट्ठाजगत तथा अन्य एग्रीगेटर्स से भी शायद इतने ही पाठक आते हों। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दी ब्लोग्स की संख्या तो पाँच अंकों को पार कर गई है किन्तु पाठकों की संख्या ने शायद ही कभी तीन अंकों को पार किया हो।

हिन्दी ब्लोगिंग के शुरुवात के बाद से एक लंबा समय व्यतीत हो जाने के बाद भी हम ब्लोगर्स ही एक दूसरे को पढ़ते हैं। किसी कवि गोष्ठी, जहाँ सिर्फ कवि लोग एकत्रित होकर एक दूसरे को अपनी कविताएँ सुनाते हैं, के जैसे ही हमने ब्लोग गोष्ठी बना लिया है। हमें किसी विराट कवि सम्मेलन, जहाँ पर कि श्रोताओं की विशाल संख्या आती है, के जैसे ब्लोग सम्मेलन करना है जहाँ कि पाठकों की विशाल संख्या हो। और फिर हम ब्लोगर्स भी अन्य सभी ब्लोगर्स को न पढ़ कर सिर्फ उन थोड़े से ब्लोगर्स को पढ़ते हैं जिनका लेख हमें पसंद आता है। अब जब हम एक नया ब्लोगर बनाने की बात कहते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि हम अपने ब्लोग गोष्ठी के सदस्यों की संख्या में ही इजाफा कर रहे हैं जबकि हमें पाठकों की संख्या बढ़ाना है।

ब्लोगर बनने के लिए, थोड़ी ही सही, लेखन प्रतिभा की आवश्यकता होती है किन्तु पाठक बनने के लिए इस प्रतिभा का होना अनिवार्य नहीं है। तो क्यों न हम नये नये ब्लोगर्स बनाने के बदले नये नये पाठक बनाने का प्रयास करें? हिन्दी ब्लोगिंग को सफल और व्यावसायिक बनाने के लिए हमें पाठकों की संख्या बढ़ानी ही होगी।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर, करोड़ों की संख्या में हिन्दीभाषी लोगों ने नेट प्रयोगकर्ता होने बावजूद भी, हमारे ब्लोग्स के लिए पाठक क्यों नहीं मिलते? यदि हम इस प्रश्न का उत्तर खोज लें तो शायद नये पाठक बनाने में हमें आसानी हो। मेरी सूझ के अनुसार हिन्दी पाठकों की संख्या कम होने के निम्न कारण हो सकते हैं:

नेट में आने वाले अधिकतम लोगों को आज भी नहीं पता है कि हिन्दी ब्लोगिंग जैसी किसी चीज का अस्तित्व भी है। हमें लोगों को इस विषय में जानकारी देनी होगी। तो उन्हें कैसे जानकारी दी जाए? उन्हें जानकारी देने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि आखिर नेट में आने वाले ये हिन्दीभाषी लोग जाते कहाँ हैं? उनका ठिकाना मिलने पर ही तो उनसे सम्पर्क करके हम उन्हें हिन्दी ब्लोगिंग के बारे में बता सकेंगे। मैं समझता हूँ कि इन लोगों की एक बड़ी संख्या आर्कुट, याहू चैट और याहू समूहों में मिल जाएगी। हमारे बहुत से युवा ब्लोगर मित्र भी आर्कुट, याहू चैट और याहू समूहों में जाते होंगे। यदि वे उन्हें मित्र बना कर निजी संदेश, निजी मेल आदि के द्वारा हिन्दी ब्लोगिंग और हिन्दी ब्लोग एग्रीगेटर्स के विषय में जानकारी देना आरम्भ करें तो अवश्य ही हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी।

अच्छी गुणवत्ता वाली पाठ्य सामग्री की कमी भी पाठक न मिलने का एक कारण है। कुछ पाठक यदि हमारे ब्लोग्स में आ भी जाते हैं तो उन्हें या तो अपनी रुचि की पाठ्य सामग्री नहीं मिल पाती या फिर सामग्री की गुणवत्ता में कमी दिखाई पड़ता है। परिणामस्वरूप वे फिर से पलट कर नहीं आते। अब यदि हमारे ब्लोग में वह सामग्री हो जिससे कि पाठक टी.व्ही., प्रिंट मीडिया या नेट के न्यूज साइट्स के द्वारा पहले ही वाकिफ हो चुका हो तो वह हमारे ब्लोग में क्यों रुकेगा?

ऐसे ही और भी कई कारण आप लोगों को भी सूझ सकते हैं।

तो आइये हम सभी मिल कर अधिक से अधिक लोगों को हिन्दी ब्लोग्स के विषय में जानकरी देने और अपने ब्लोग्स के पाठकों की संख्या को बढ़ाने का संकल्प लें।

Thursday, September 24, 2009

क्या सोचकर टिप्पणी की थी ... सुरेश चिपलूनकर खुश होगा ... शबासी देगा ...

भइ सुरेश चिपलूनकर जी के लेख क्या "नेस्ले" कम्पनी, भारत के बच्चों को "गिनीपिग" समझती है? Nestle Foods GM Content and Consumer Protection ने तो कमाल ही कर दिया! कट्टर विरोधियों ने भी ऐसी टिप्पणियाँ कि जैसे कि शक्कर की चाशनी टपक रही हो!! सिर्फ टिप्पणियाँ ही नहीं कीं चटका भी लगाया!!!


स्वच्छ(?) हजरत तो जो हैं सो हैं, तीन हफ्ते में किसी को पागल कर देने वाले औंधे घड़े खुद तीन मिनट में पागल हो गए और कसीदे पढ़ने लगे।

अब आप बोलोगे कि अवधिया जी (सठियाये बुड्ढे) आप भी तो बस मौका खोजते रहते हो लट्ठ ले कर पीछे पड़ने की। आखिर क्या बुरा किया उन्होंने? तो जवाब में हम भी आपसे पूछ लेते हैं कि आपने पढ़ा है उन टिप्पणियों को? उन्हें पढ़ कर एक बच्चा भी समझ सकता है कि उनमें सुरेश जी की प्रशंसा से कहीं अधिक आत्म प्रशंसा है। उनमें दर्शाया गया है कि वे अगर चटका लगाकर सुरेश जी पर एहसान नहीं करते तो सुरेश जी के लेख को कोई पूछने वाला नहीं था। वो अगर सुरेश जी के लेख को हिन्दी के एग्रीगेटर्स में अगर आगे लाते तो पढ़ना तो दूर कोई देखता तक नहीं। ये बताया गया है कि सुरेश जी अकेले राष्ट्र के हित में सोचने वाले व्यक्ति नहीं हैं बल्कि टिप्पणी करने वाले उनसे भी अधिक राष्ट-हितू हैं।

हम तो सिर्फ यह कहते हैं कि किसी की प्रशंसा करनी है तो दिल से करो, सदाशयता के साथ करो। जिसकी प्रशंसा कर रहे हो उस पर एहसान जताने के लिए और उसकी प्रशंसा के बहाने आत्म प्रशंसा करने के लिए मत करो। या फिर प्रसंशा करो ही मत

Tuesday, September 22, 2009

पाकिस्तान बना - पर किसकी लाश पर?

महात्मा गांधी ने विभाजन के पूर्व हिन्दुओं से अनुरोध किया था कि वे अपना घर बार छोड़ कर कहीं न जाएँ क्योंकि देश का विभाजन नहीं होगा। भरी सभा में उनका कथन था - "यदि पाकिस्तान बनेगा तो मेरी लाश पर बनेगा"

(चित्र स्रोतः http://www.hindu.com/th125/gallery/thim001.htm)

किन्तु पाकिस्तान बना

विभाजन के पहले:


(
चित्र स्रोतः http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00maplinks/modern/maps1947/beforemax.gif)

विभाजन के बाद:

(चित्र स्रोतः http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00maplinks/modern/maps1947/aftermax.gif)

हाँ तो पाकिस्तान बना ...

पर
किसकी लाश पर? महात्मा गांधी की लाश पर? या 25 लाख हिन्दू सिखों की लाशों पर?

महात्मा जी का कथन कोरा झूठ साबित हुआ।

दंगों में मारे गये लोगों की लाशों का ढेर

(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/7.stm)

दंगों में मारे गये लोगों का सामूहिक अग्नि संस्कार

(चित्र स्रोतः http://news.bbc.co.uk/2/shared/spl/hi/pop_ups/06/south_asia_india0s_partition/html/9.stm)

असंख्य माताओं और बहनों का शीलहरण हुआ। अनगिनत लोगों को अपना घर बार, जमीन जायजाद, व्यवसाय व्यापार छोड़ कर दरिद्र बनना पड़ा और शरणार्थी जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होना पड़ा।

पाकिस्तान से भारत आने वाली रेलगाड़ी

(चित्र स्रोतः http://www.hindu.com/th125/gallery/thim004.htm)

दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाली रेलगाड़ी

(चित्र स्रोतः http://en.wikipedia.org/wiki/File:Train-to-pakistan-delhi1947.jpg)

शरणार्थी शिविर

(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)

एक और शरणार्थी शिविर

(चित्र स्रोत http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00routesdata/1900_1999/partition/camps/camps.html)

पंजाब उच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति श्री जी.डी. खोसला की पुस्तक ‘‘The stern Reckoning’’ पुस्तक में हिन्दुस्तान का विभाजन, विभाजन तक हुई घटनाएँ और विभाजन के भयानक परिणामों से सम्बन्धित अध्यायों के अनुसारः

गाड़ियाँ भर-भरकर निर्वासितों के दल हिन्दुस्तान आने लगे। उसका ब्यौरा भी हृदय विदीर्ण करने वाला है। वह भयाक्रान्त मानवता का बड़ा प्रवाह बह रहा था। डिब्बों में साँस लेने जितना भी स्थान न था। डिब्बों की छत पर बैठकर भी लोग आते थे। पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों का आग्रह था कि लोगों का स्थानान्तरण होना चाहिए, परन्तु वह इतने सीधे, बिना किसी छह के हो, यह उन्हें नहीं भाता था। इन हिन्दुओं के जाते समय भयानकता, क्रूरता, पशुता अमानुषता, अवहेलना आदि भावों का अनुभव मिलना ही चाहिए, ऐसी उनकी सोच थी। उसी के अनुसार उनका व्यवहार था।

(छेदक 12 ए 9)

किसी स्टेशन पर गाड़ी घण्टों ठहरती थी। उस विलम्ब का कोई कारण न था। पानी के नल तोड़ दिए गए थे। अन्य अप्राप्य किया जाता था। छोटे बच्चे भूख और प्यास से छटपटा कर मरते थे। यह तो सदा का अनुभव बना था। एक अधिकृत सूचना के अनुसार माता-पिताओं ने अपने बच्चों को पानी के स्थान पर अपना मूत्र दिया, किन्तु यह भी उनके पास होता तो ! निर्वासितों पर हमले हुआ करते थे। उनको ले जाने वाले ट्रक और लारियाँ रास्ते में रोकी जाती थीं। लड़कियाँ भगायी जाती थीं। जो युवावस्था में थीं, ऐसी लड़कियों पर बलात्कार हुआ करते थे। वे भगायी भी जाती थीं और दूसरे लोगों की हत्या की जाती थी। यदि कोई पुरुष बच जाए, उसे अपने प्राण बच गए, यह मानकर ही संतुष्ट रहना पड़ता था।

(छेदक 12 ए 10)

निर्वासितों का काफिला झुण्ड की भाँति चल रहा था। वृद्ध पुरुषों तथा स्त्रियों का चलते-चलते दम घुट जाता था। वे मार्ग के किनारे मरने के लिए ही छोड़े जाते थे। काफिला आगे बढ़ जाता था। उनकी देखभाल करने का किसी के पास समय न होता था। रास्तों शवों से भरे थे। शव गल जाते थे। उनसे दुर्गन्ध फैलती थी। कुत्ते और गिद्ध उन्हें अपना भोजन बनाते थे। ऐसे समूह मानो मनुष्य की पराभूत चित्त की, शोक विह्वल और अगनित मन की अन्त्ययात्रा ही थी।

(छेदक 12 ए 11)

अल्पसंख्यकों का बरबस निष्कासन करना, यही मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की रचना को प्रोत्साहित करने वालों का मन्तव्य था। अतएव उन लोगों से सद्व्यवहार, सहानुभूति अथवा सुविधाओं की अपेक्षा करना अर्थहीन था। उनके सैनिक और आरक्षीगण (पुलिस) उनके यात्रारक्षी दल प्रायः मुसलमान थे। उनसे निर्वासितों को रक्षण मिलना असंभव ही था। निर्वासितों को भी उन पर विश्वास न था। क्योंकि उन्हें रक्षण देने की अपेक्षा, अपने धर्मबन्धुओं द्वारा चलाए लूटपाट के अभियान में हाथ बंटाने का उन्हें अधिक मोह हुआ करता था।

(छेदक 12 ए 12)

पश्चिमी पंजाब से आई निर्वासितों की गाड़ियों पर कई हमले हुआ करते थे, किन्तु 14 अगस्त, 1947 के पश्चात् जो हमले हुए, वे अत्यधिक क्रूरतापूर्वक थे। सितम्बर में झेलम जिले के पिंडदादनखान गाँव से चल पड़ी गाड़ियों पर तीन स्थानों पर आक्रमण हुए। दो सौ स्त्रियों को या तो मारा गया या भगाया गया था। वहाँ से निकली गाड़ी पर वजीराबाद के पास हमला हुआ। वह गाड़ी सीधे रास्ते से लाहौर जाने के बजाय टेढ़े रास्ते सियालकोट की ओर घुमायी गयी। यह सितम्बर में हुआ। अक्टूबर में सियालकोट से आने वाली एक गाड़ी पर ऐसा ही अत्याचारी प्रयोग किया गया, किन्तु जनवरी, 1948 में बन्नू से निकली गाड़ी पर गुजरात स्थानक पर विशेष रूप से क्रूर हमला हुआ। हिन्दुओं का घोर संहार हुआ। उसी गाड़ी पर खुशाब स्थानक पर भी हमला हुआ। सरगोधा और लायलपुर के रास्ते वह गाड़ी सीधी लाहौर लाई जाने के बजाय खुशाब, मालकवाल, लालामोसा गुजरात और वजीराबाद जैसे दूर के मार्ग से लाहौर लाई गई। बिहार का सैनिकदल यात्रारक्षा के लिए नियुक्त किया गया था, उन पर भी शस्त्रधारी पठानों ने हमला किया था, गोलियाँ बरसायी थीं। यात्रारक्षी दल ने प्रत्युत्तर में गोली चलायी, किन्तु शीघ्र ही उनका गोला बारुद समाप्त हो गया। जैसे ही पठानों को यह भान हुआ, तीन सहस्त्र पठानों ने गाड़ी पर हमला कर दिया। पाँच सौ लोगों को कत्ल कर दिया। यात्री अधिकतर बन्नू की ओर के थे और उनमें से कुछ धनवान थे। उनको लूट लिया गया। यह सब जनवरी, 1948 में हुआ।

(छेदक 12 ए 13)

(कोटेड सामग्री http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4418 से साभार)

देश का विभाजन एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। विभाजन एक ऐसा घाव है जो हमेशा हमेशा के लिए नासूर बन कर रह गया है।

Monday, September 21, 2009

देवी नहीं आती दारू दुकान बंद कराने

हमारे रायपुर में:

देवी नहीं आती दारू दुकान बंद कराने नौ दिन तक, फिर भी लोग नवरात्रि में खुद से दारू पीना बन्द कर देते हैं!

गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्व में शासन दारू दुकान बन्द करा देती है फिर भी लोग उस दिन पीते हैं।

और आपके यहाँ?

क्या करें कि यूट्यूब वाली व्हीडियो बीच बीच में न रुके और सही सही चले

मैं यूट्यूब में एक व्हीडियो खोजने के लिए। पहले ये बता दूँ कि क्यों चला गया मैं यूट्यूब में। वो क्या है कि आदमी के दिमाग को भी विचित्र बनाया है बनाने वाले ने। न जाने क्यूँ सबेरे से रह रह कर दिमाग में गूँज रहा था "हम भी गोया किसी साज के तार हैं चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे"। याद करने पर याद आया कि अरे ये तो राही मासूम रज़ा साहब की गज़ल "अजनबी शहर के अजनबी रास्ते ..." है जिसे कभी मैं अपने सीडी प्लेयर पर सलाम आलवी की आवाज में सुना करता था। बस चला गया मैं यूट्यूब में इस गज़ल को खोजने के लिए, भाई आडियो में तो सुना था यदि व्हीडियो मिल जाए तो क्या बात है! थोड़ा सा सर्च करने पर मिल भी गया एक व्हीडियो उस गज़ल का।

अब मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि यदि इस व्हीडियो को मैं चलाना शुरू करूँगा तो जरूर यह बीच बीच में बार बार रुकेगा और मेरा दिमाग भन्ना जाएगा। अब यदि संगीत बीच बीच में टूटता जाए तो क्या दिमाग नहीं भन्नायेगा? आपने भी जरूर कई बार ऐसे अनुभव हुए होंगे। तो क्या करें कि व्हीडियो बीच बीच में रुके और सही सही चलता रहे। चलिए मैं बताता हूँ कि क्या करना है। बहुत आसान है ये। बस आपको व्हीडियो के सही सही चलने के लिए पाँच-दस मिनट इंतिजार करना है।

आपको सिर्फ इतना करना है कि उस व्हीडियो को चालू करने के बाद उसके आवाज को बंद कर देना है।

आवाज बंद कर देने के बाद आप उस व्हीडियो के विंडो को मिनिमाइज कर देना है और अपने किसी अन्य छोटे-मोटे जरूरी काम में जुट जाना है। दसेक मिनट बाद, जब आपका काम खतम हो जाए तो, फिर व्हीडियो वाले विंडो को मैक्जिमाइज करना है। आप देखेंगे कि वो व्हीडियो पूरा चल चुका है।

अब आप बंद किए गये आवाज को फिर से चालू दें और रिप्ले को क्लिक दें। व्हीडियो अब की बार बिना रुके सही सही चलेगा और आपको पूरा आनन्द देगा।

चलिए अब जिस गज़ल ने मुझे यूट्यूब में भेजा था, उसे आप लोगों को भी पढ़ा और उसका व्हीडियो दिखा दूँ

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पे मुस्कुराते रहे,
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे।

ज़हर मिलता रहा, ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे।

ज़ख्म जब भी कोई ज़हनो दिल पे लगा, जिंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे।

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया,
इतनी यादों के भटके हुए कारवां, दिल के जख्मों के दर खटखटाते रहे।


Sunday, September 20, 2009

हम अपने उद्देश्य में सफल हुए और कुप्रचार वाली टिप्पणियाँ मिटा दी गईं

पिछले कुछ दिनों से हम जो भी पोस्ट लिख रहे थे उसका उद्देश्य था हिन्दी ब्लोग्स से कुप्रचार और विज्ञापनयुक्त टिप्पणियों को समाप्त करना। हमारा उद्देश्य सिर्फ अपने विद्वान बन्धुओं को ही समझाना था न कि किसी मूर्ख को कुछ समझाना। हम जानते हैं कि न तो औंधे घड़े में पानी डाला जा सकता है और न ही किसी मूर्ख को, लाख सर पटक लेने के बाद भी, समझाया जा सकता है। इसीलिए तो तुलसीदास जी ने लिखा हैः

मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम।
फूलहिं फलहिं न बेत जदपि जलद बरसहिं सुधा॥

अस्तु, प्रसन्नता की बात है कि हम अपने उद्देश्य में सफल हुए। हमारे ब्लोगर बन्धुओं ने हमारी बात को समझा और अपने अपने ब्लोग्स से गंदगी को निकाल कर फेंक दिया। मैं अपने समस्त ब्लोगर बन्धुओं को इसके लिए साधुवाद देता हूँ।

Saturday, September 19, 2009

क्या आप इन सरल प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं?

1. कुछ महीनो में 30 दिन होते हैं, कुछ में 31 दिन। कितने महीनों में 28 दिन होते हैं?

2. डॉक्टर ने आपको तीन गोलियाँ दीं जिन्हें प्रत्येक आधे घंटे के अन्तराल में खाना है। सारी गोलियों को खाने में कितने घंटे लगेंगे?

3. मैंने अपने अलार्म घड़ी में सुबह नौ बजे उठने के लिए नौ बजे का अलार्म लगाया और रात्रि आठ बजे सो गया। अलार्म सुनकर उठने तक मैं कितने घंटे सो चुका होउँगा?

4. 30 में आधा का भाग देकर दस जोड़ने पर कौन सी संख्या मिलेगी?

5. एक किसान के पास बीस भेड़े थीं जिनमें से नौ को छोड़ कर शेष मर गईं। बताइये अब किसान के पास कितनी भेड़े हैं?

स्नैपशॉट एक टिप्पणी का जिसे हमने प्रकाशित नहीं होने दिया था

ज्योंही हमारी "वन्दे मातरम्" वाली पोस्ट प्रकाशित हुई थी त्योंही हिन्दी ब्लोग के व्योम को चीरते हुए इस टिप्पणी रूपी धूमकेतु ने प्रचण्ड वेग के साथ उसकी तरफ़ बढ़ना आरम्भ कर दिया था। किन्तु टिप्पणी मॉडरेशन रूपी दूरबीन से हमने उसे देख लिया था और ब्लोगर बाबा उर्फ गूगल महाराज प्रदत्त टिप्पणी निरस्त करने के अधिकार रूपी अस्त्र का प्रयोग करके उसे जीमेल रूपी महासागर में डुबो दिया था।

आज हम उसी टिप्पणी का स्नैपशॉट आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहे हैं। अब आप यह पूछेंगे कि जब आपने उस टिप्पणी को प्रकाशित करने से रोक ही दिया था तो अब क्यों उसका स्नैपशॉट दिखा रहे हैं। तो भाई इसके दो कारण हैं:

पहला

टिप्पणी को प्रकाशित होने से रोक देने के बाद हमें लगा कि इसे रोक कर हमने कुछ भी गलत नहीं किया है क्योंकि ब्लोगिंग हमें ऐसा करने का पूर्ण अधिकार देता है किन्तु यह भी ध्यान में आया कि आखिर विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी तो कोई चीज है। यह सोच कर हम कुछ ग्लानि अनुभव करने लगे।

दूसरा

हमें हमारे पाठकों को भी तो टिप्पणीकर्ता के अन्तःकरण, आचरण और नीयत के आकलन का अवसर देना चाहिए। आप देख भी लेंगे तो हमें भला क्या अन्तर पड़ना है क्योंकि हम तो मानते हैं

निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुहाय॥

और

जो बड़ेन को लघु कहै नहिं रहीम घटि जाहि।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहि॥

अन्त में

क्षमा बड़न को चाहिए ....

तो आखिर में हमने उस टिप्पणी का स्नैपशॉट आप लोगों को दिखाने का निश्चय कर लिया, पर हाँ उसमें हिन्दी ब्लोगिंग के वातावरण को अशुद्ध करने वाले जो विज्ञापन थे उसको जरूर काले रंग से पोत दिया है।

तो यह है उस टिप्पणी का स्नैपशॉटः


(चित्र को बड़ा कर के देखने के लिए उस पर क्लिक करें)

अब जब अन्तःकरण की बात चली है यह बताना कुछ अनुचित नहीं होगा कि सलीम मियाँ ने आजकल हमें "चश्माधारी जोकर" के बदले "अवधिया जी" संबोधित करना शुरू कर दिया है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि या तो उनका अन्तःकरण कुछ कुछ शुद्ध हुआ है या फिर वैसा कुछ दिखावा करने लगे हैं। खैर जो भी हो, हमें क्या।

आज नवरात्रि पर्व के आरम्भ होने के अवसर पर माता की वन्दना के रूप में अपने पूज्य पिता जी की यह रचना भी समर्पित कर रहा हूँ

जय दुर्गे मैया
(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

जय अम्बे मैया,
जय दुर्गे मैया,
जय काली,
जय खप्पर वाली।

वरदान यही दे दो माता,
शक्ति-भक्ति से भर जावें;
जीवन में कुछ कर पावें,
तुझको ही शीश झुकावें।

तू ही नाव खेवइया,
जय अम्बे मैया।

सिंह वाहिनी माता,
दुष्ट संहारिणि माता;
जो तेरे गुण गाता,
पल में भव तर जाता।

तू ही लाज रखैया,
जय अम्बे मैया।

महिषासुर मर्दिनि,
सुख-सम्पति वर्द्धिनि;
जगदम्बा तू न्यारी,
तेरी महिमा भारी।

तू ही कष्ट हरैया,
जय अम्बे मैया।

(रचना तिथिः 12-10-1980)

(उपरोक्त रचना इसी ब्लोग में पहले भी एक बार प्रकाशित कर चुका हूँ किन्तु प्रिय रचना होने के कारण मैंने इसे पुनःप्रकाशित किया।
)

Friday, September 18, 2009

आखिर धर्म क्या है?

धर्म का उद्देश्य होता है सबकी भलाई करना किन्तु विडम्बना यह है कि धर्म के नाम से आज तक लड़ाइयाँ ही अधिक हुई हैं। अपने धर्म को महान और दूसरे के धर्म को तुच्छ मानने का हमारा पूर्वाग्रह ही इन लड़ाइयों के कारण होते हैं।

इस विषय में मैंने आज तक जो कुछ भी अपने बड़े बुजुर्गों तथा विभिन्न प्रवचनकारियों से जो सुना, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में जो पढ़ा और परिणामस्वरूप जो मेरे विचार बने उससे मैं आपको इस पोस्ट के माध्यम से अवगत कराना चाहता हूँ। मैं यहाँ पर यह भी बता देना चाहता हूँ कि ये विशुद्ध रूप से मेरे अपने विचार हैं, इसे मानने न मानने की इच्छा आपकी है।

जहाँ तक मेरा विचार है धर्म परमात्मा तक पहुँचने का रास्ता है। एक ही मंजिल के लिए रास्ते अनेक हो सकते हैं। यदि परमात्मा को मंजिल मान लिया जाये तो उस तक पहुँचने के लिए रास्ते भी अनेक हो सकते हैं इसीलिए धर्म अलग अलग हैं। अलग अलग होते हुए भी सभी धर्मों का उद्देश्य एक ही है और वह है परमात्मा तक पहुँचाना। और जब सभी धर्मों का उद्देश्य एक है तो यही कहा जा सकता है कि सभी धर्म समान हैं, न कोई छोटा है न कोई बड़ा।

समय काल परिस्थिति के अनुसार अलग अलग धर्म बनते रहे हैं और नष्ट भी होते रहे हैं। कुछ धर्म आपस में विलीन भी हुए हैं। जैसे कि किसी काल में भारतवर्ष में मुख्यरूप से तीन धर्म हुआ करते थे वैष्णव, शैव और शाक्त। वैष्णव विष्णु के, शैव शिव के और शाक्त शक्ति के अनुयायी हुआ करते थे। इन धर्मों को मानने वाले भी अपने धर्म और अपने देवता को अन्य के धर्म और अन्य के देवता से महान माना करते थे और इसी कारण से वैष्णव, शैव और शाक्त में आपस में लड़ाई हुआ करती थी। इन लड़ाइयों को समाप्त करने के लिए ही हमारे ऋषि मुनियों, जो कि महान विचारक हुआ करते थे, इन तीनों धर्मों को विलीन कर के एक धर्म बना देने का संकल्प लिया। उन्होंने समझाया कि विष्णु, शिव, शक्ति आदि सभी देवी देवता महान हैं। उन विचारकों के प्रयास से ये तीनों धर्म आपस में विलीन हो गए और परिणामस्वरूप सनातन धर्म का उदय हुआ जिसके अनुयायी सभी देवी देवताओं को मानते थे। महर्षि वाल्मीकि से ले कर आदि शंकराचार्य तक समस्त विचारकों का सदैव प्रयास रहा कि धर्म के नाम से आपस में लड़ाइयाँ न हों।

एक लंबे समय तक आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण ने लोगों को एक सूत्र में बांध के रखा। कालान्तर में भारतवर्ष में विदेशियों का आधिपत्य हो जाने के कारण रामायण की भाषा संस्कृत का ह्रास होने लग गया और वाल्मीकि रामायण का प्रभाव क्षीण होने लग गया। शायद इसी बात को ध्यान में रख कर तथा लोगों को अपने धर्म के प्रति जागरूक रखने के लिए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की। रामचरितमानस की भाषा संस्कृत न होकर अवधी थी जिसे कि प्रायः सभी लोग समझते थे।

इस अन्तराल में सनातन शब्द हिन्दू शब्द में परिणित हो गया और सनातन धर्म हिन्दू धर्म के नाम से जाना जाने लगा। यह परिवर्त कब, क्यों और कैसे हुआ इसके विषय में विभिन्न विद्वानों का विभिन्न मत है। ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक काल में प्रचलित शब्द 'सप्तसिन्धु' से सप्त विलुप्त होकर 'सिन्धु' बना जो कि बाद में 'हिन्दू' हो गया।

समय समय में महावीर, बुद्ध, नानक जैसे अन्य विचारकों ने भी जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि धर्मों को प्रचलित किया। भारत में मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों आदि के स्थाई रूप में बस जाने पर इस्लाम, ईसाई, पारसी आदि धर्मों को भी भारत में प्रचलित धर्म मान लिया गया।

इस विषय में आप लोगों की जानकरी का स्वागत है।

Thursday, September 17, 2009

'हाँ मैं हिन्दू हूँ' कह देने से ही कोई हिन्दू नहीं हो जाता

"हाँ मैं फलाँ खान हिन्दू हूँ" कह देने से कोई मान लेगा क्या कि खाँ साहब हिन्दू हो गए हैं? अरे भाई! कितनी ही फिल्मों में अमरीश पुरी ने चीख-चीख कर कहा कि "मैं अच्छा आदमी हूँ", "मैं अच्छा आदमी हूँ" तो क्या लोगों ने मान लिया? उसको अच्छा आदमी तो किसी ने माना नहीं उल्टे उसकी धुलाई कर दी।

ब्लोगवाणी में अपने ही ब्लोग को क्लिकिया क्लिकिया कर 'आज अधिक पसंद प्राप्त' और 'आज अधिक पढ़े गये' वाली संख्याओं को बढ़ा देने से क्या ब्लोग पॉपुलर हो जाता है? नहीं होता भइया, इतना तो समझना चाहिए कि पीतल पर सोने का पानी चढ़ा देने से पीतल सोना नहीं हो जाता। वो कहते हैं ना "हर जो चीज चमकती है उसको सोना नहीं कहते"

मैं अपने पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि क्या किसी के दिखावे का हिन्दू बन जाने से उसकी कद्र बढ़ जायेगी?

हाँ यदि कोई सच्चा मुसलमान
बनके दिखायेगा तो जरूर उसकी कद्र होने लगेगी।

क्यों ठीक कह रहा हूँ ना बन्धुओं?

चलते-चलते

सूराखअली के मित्रों को किसी ने बता दिया कि सूराख का मतलब छेद होता है। बस फिर क्या था सारे मित्र उन्हें छेदी छेदी कहने लग गए। अब सूराखअली बेचारे बड़े परेशान। वे इतने परेशान हुए कि अपना नाम ही बदल डालने का निश्चय कर लिया। पहुँच गए पण्डित जी के पास नाम बदलवाने के लिए (मौलवी जी के पास इसलिए नहीं गए क्योंकि मौलवी साहब ने ही तो उनका नाम सूराखअली रखा था)। पण्डित जी ने ज्योतिष की गणना की और बोले भाई हमारी गणना के अनुसार तो तुम्हारा नाम गड्ढासिंह बनता है। बेचारे सूराखअली की परेशानी और बढ़ गई मौलवी जी ने छेद ही बनाया था अब ये पण्डित जी तो छेदा से गड्ढा बना दे रहे हैं। अब क्या करें? सोचा, चलो पादरी से नाम बदलवा लेते हैं और पहुँच गए चर्च के फादर के पास। पादरी ने भी अपना हिसाब किताब लगाया और कहा, "डियर सन, हम तुम्हारा नाम Mr. Hole रख देते हैं।"

Wednesday, September 16, 2009

वन्दे ईश्वररम् क्यों? वन्दे मातरम् क्यों नहीं?

टिप्पणियों का सहारा लेकर प्रचार किया जा रहा है वन्दे ईश्वरम् का। क्या करें जमाना प्रचार और विज्ञापन का है। अब चाहे टीव्ही हो या नेट, जबरन के प्रचार और विज्ञापन को हमें झेलना ही पड़ता है। पर मैं पूछता हूँ कि आखिर वन्दे ईश्वररम् क्यों? वन्दे मातरम् क्यों नहीं?

किसी की भी वन्दना करने के लिए, चाहे वह ईश्वर ही क्यों न हो, सबसे पहले वन्दना करने वाले का अस्तित्व का होना आवश्यक है। यदि अस्तित्व ही नहीं है तो वन्दना कौन करेगा? अब अस्तित्व तो हमें माता ही प्रदान करती है ना? यदि मान भी लिया जाए कि हमारा अस्तित्व ईश्वर के कारण है तो यह भी मानना पड़ेगा कि हमें अस्तित्व प्रदान करने के लिए ईश्वर प्रत्यक्ष तो आता नहीं, माता के रूप में ही वह आकर हमें अस्तित्व प्रदान करता है। तो फिर वन्दे ईश्वररम् क्यों? वन्दे मातरम् क्यों नहीं?

जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो स्वयमेव ही ईश्वर की वन्दना हो जाती है।

और जब हम वन्दे मातरम् कहते हैं तो अपने आप ही तीन-तीन माताओं की वन्दना हो जाती है। पहली माता 'हमें जन्म देने वाली माता'। यह जन्म देने वाली माता हमारे लिए पूजनीय है। यह माता हमें जीते जी तो अपने गोद में खिलाती है किन्तु मरणोपरान्त यह हमें अपने गोद में नहीं रख सकती। उस समय हमारी दूसरी माता, 'धरती माता', 'हमारी जननी जन्मभूमि माता', आती है हमें अपने गोद में लेने के लिए। वह भी हमारे लिए पूजनीय है और वन्दे मातरम् कहते ही उस माता की भी वन्दना हो जाती है। एक और माता है हमारी, वह है मातृभाषा माता। यदि यह माता न हो तो हम अपनी वन्दना को कभी भी अभिव्यक्त न कर सकें। न वन्दे ईश्वरम् कह सकें और न ही वन्दे मातरम्। तो वन्दे मातरम् कहने से मातृभाषा माता की भी अपने आप ही वन्दना हो जाती है। हमने ईश्वर को कभी देखा ही नहीं है तो क्यों कहें हम वन्दे ईश्वरम्? हम तो वन्दे मातरम् ही कहेंगे क्योंकि हमारे लिए तो माता ही ईश्वर है।

माता की वन्दना के साथ ही साथ हम एक और अत्यावश्यक वन्दना करेंगे, गुरु की वन्दना। यदि गुरु ने हमें ज्ञान नहीं दिया होता तो हम कैसे जान पाते कि ईश्वर है। इसीलिए कहा गया हैः

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय॥


हमारे लिए तो जैसे माता ईश्वर है वैसे ही गुरु भी ईश्वर है। हम तो यही मानते हैं किः

गुरूर्बह्मा गुरूर्विष्णु गुरूर्देवो महेश्वरः।

गुरूर्साक्षात परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः॥


जिसे भी ईश्वर वन्दना करना है वो करता रहे। हम तो माता और गुरु की ही वन्दना करेंगे क्योंकि हमने उन्हें देखा ही नहीं बल्कि उनका सानिध्य भी पाया है। और वास्तविकता तो यह है कि ईश्वर अपनी वन्दना से प्रसन्न नहीं होता बल्कि प्रसन्न होता है माता और गुरु की वन्दना से।

Tuesday, September 15, 2009

वो लेख लेख ही क्या जिसे कोई समझ ले

अब आप पूछेंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? भाई अभी अभी हमने एक लेख पढ़ा है ऐसा ही। शीर्षक में मुसलमानों से प्रश्न किया गया है कि एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति क्यों है? अब क्या कहें, इस शीर्षक ने हमारा ध्यान खींच लिया। सोचा चलो इस विषय में कुछ जानकारी बढ़ेगी। फिर जब बॉडी में पहुँचे तो पता चला कि मुसलमान इस प्रश्न का उत्तर दे ही नहीं पाते क्योंकि उन्हें खुद ही पता नहीं है। फिर विद्वान लेखक ने बताया कि कुरआन में निर्देश दिया है कि सिर्फ एक ही शादी करो। अब हमने खुद से प्रश्न किया कि इतना पढ़ कर हम क्या समझे? तीन शादी की अनुमति है या सिर्फ़ एक शादी की? बहुत सोचा पर कोई भी उत्तर नहीं सूझा, ठीक वैसे ही जैसे कि लेखक के अनुसार मुसलमान नहीं बता सकते कि तीन शादियों की अनुमति क्यों है।

अब आगे पढ़ा तो पता चला कि दशरथ और कृष्ण की कई बीबियाँ थीं। हम फिर एक बार चकराये कि आखिर ये मामला क्या है। बात तो मुसलमानों की शादी की हो रही थी अब मुसलमानों के बीच दशरथ और कृष्ण कहाँ से घुस आए? कुछ और आगे जाने पर पता चला कि लेख में ईसाई, पादरी, यहूदी, वेद, रामायण, गीता, तलगुद, बाइबिल आदि का भी पदार्पण हो गया है। (मन में एक शंका भी उठी कि कहीं इन सभी की कोई साजिश तो नही है तीन शादी की अनुमति के पीछे?) इन सभी के आगमन के पश्चात् भी अभी तक पता नहीं चल पाया कि आखिर तीन शादियों की इज़ाज़त क्यों है?

खैर साहब, अब हम और आगे बढ़े तो यह पता चला कि कुरआन के अनुसार "बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है।" अब फिर हम कनफ्यूजिया गए। लेख के शीर्षक से तो लगता है कि यह तो पता है कि तीन शादियों की अनुमति है पर क्यों है यह नहीं पता। पर यहाँ तक पढ़ने पर पता चला कि अनुमति तो है ही नहीं। अब बताइए कि हम क्या समझें?

अब कहाँ तक बताएँ साहब, लेख तो ज्ञान का विशुद्ध खजाना था क्योंकि उसमें अलग अलग देशों में स्त्री पुरुषों का अनुपात, किस देश में कितने विवाहित हैं और कितने अविवाहित और भी बहुत सारी ऐसी ही बातों की जानकारी दी गई थी। फिर अन्त में बताया गया था कि औरत के सम्मान और उसकी रक्षा के लिये अनुमति दी गई है। अब तो साहब दिमाग भन्ना गया। भला कैसे नहीं भन्नायेगा, कुछ ही देर पहले तो इसी लेख में पढ़ा था कि कुरआन सिर्फ एक ही शादी की अनुमति देता है और अब आखरी में फिर पढ़ रहे हैं कि इस्लाम एक से अधिक शादी की अनुमति देता है।

याने कि इस्लाम तो तीन शादी कि इजाजत देता है पर कुरआन सिर्फ़ एक ही शादी कि अनुमति देता है

भाई मैं तो कुछ समझ नहीं पाया, यदि आप लोगों में से किसी को समझ में आ पाये तो हमें भी समझाने की कृपा करना। पर यह अनुरोध आप लोगों से ही है उस लेखक से नहीं क्योंकि यदि कहीं वह समझाने जायेगा तब तो मैं पूरा पागल हो जाउँगा।

खैर इतना तो समझ में आ गया कि पढ़ कर समझ में आ जाए तो वो कोई लेख नहीं होता। लेख उसी को कहते हैं जिसका शीर्षक कुछ कहे, बॉडी कुछ और कहे, शीर्षक पढ़ कर विषय कुछ लगे, बॉडी बॉडी पढ़ कर कुछ और। याने कि सब कुछ एकदम गड्ड मड्ड और गोल गोल हो। भला वो लेख भी कोई लेख है जिसे पढ़ने वाला समझ ले? लिखना ही है तो ऐसा लिखो कि पढ़ने वाला सिर धुनने लगे।

चलते चलते

एक एजेंट (कोई प्रचारक मत समझ लेना भाई) एक सज्जन के पास फिर आ धमका। वो उस सज्जन के पास पहले इतने बार आ चुका था कि उन्हें उसकी सूरत देखते ही खुन्दक आ जाती थी। पिछली बार यह कह कर उसे भगाया था कि अब तू मेरे पास फिर कभी मत आना।

तो इस बार उस एजेंट के आते ही चीख पड़े, "तू फिर आ गया लसूढ़े।"

एजेंट भी तैश में आ गया और बोला, "शर्म आनी चाहिए आपको जो मुझे लसूढ़ा कह रहे हैं। आज तक कितने ही लोगों ने मुझे गरियाया है, धकियाया है, यहाँ तक कि धक्के दे कर बाहर भी फिंकवा दिया है पर किसी ने भी लसूढ़ा नहीं कहा। आपको मुझसे माफी मांगना चाहिए।"

-----------------------------------------------------
आज ही का एक और लेख - ब्लोगवाणी से अनुरोध

ब्लोगवाणी से अनुरोध

ब्लोगवाणी में एक बटन होता है पसंद वाला। याने कि यदि आपको किसी का लेख पसंद आया है तो आप इस बटन को क्लिक कर के बता सकते हैं कि आपने इस लेख को पसंद किया है। बड़े काम का है ये बटन! यह बटन बताता है कि किस लेख को कितने अधिक लोगों ने पसंद किया। अधिक पसंद पाकर ब्लोगर अधिक उत्साहित होता है और उसकी 'कुछ और अच्छा' लिखने की धुन बढ़ जाती है।

बहुत से लोग तो ब्लोगवाणी के हाशिये में अधिक पसंद किया गया देख कर ही लेख पढ़ जाते हैं। इसका मतलब है कि यह पसंद बटन अच्छे लेखों को आगे की ओर ठेलता है।

अब मैं आता हूँ असली बात पर। मैंने महसूस किया है कि इस अच्छे उद्देश्य वाले बटन का गलत प्रयोग भी किया जा सकता है और कहीं कहीं किया भी जा रहा है। भला कौन ब्लोगर नहीं चाहेगा कि उसे अधिक से अधिक पसंद मिले। उदाहरण के लिए मैं ही ब्लोगवाणी पर अपने लेख के आगे के पसंद बटन को कुछ कुछ अन्तराल में चटका देता हूँ। इस तरह से मेरे पोस्ट की पसंद संख्या बढ़ते जाती है और मेरा पोस्ट हाशिये में ऊपर बढ़ते जाता है।

तो मेरा ब्लोगवाणी वालों से एक अनुरोध है कि वे कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि किसी भी कम्प्यूटर से पसंद वाली बटन में प्रत्येक 24 घंटे में सिर्फ एक बार ही चटका लगाया जा सके। एक से अधिक बार चटका लगाये जाने पर पसंद की संख्या न बढ़ पाये।

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons