Sunday, July 18, 2010

मेरी घरवाली

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

वज्र से भी कठोर, फूल से भी कोमल,
क्या केवल भगवान ही है?
नहीं, इसी स्वभाव का एक सभ्य प्राणी-
मेरे घर में भी है;
जिसकी आवाज ऐसी है
जैसे चल रही हो बन्दूक दुनाली,
आप शौक से पूछिये - "कौन है वह?"
तो मेरा छोटा से उत्तर है-
मेरी घरवाली।

अतीत के आधे घण्टे में
सात फेरे हुये थे उससे-
पर वर्तमान में नित्य निरन्तर
एक दिन में एक की दर से
सप्ताह में सात फेरे होते ही रहते हैं-
हम दोनों एक दूसरे के इर्द-गिर्द घूमते,
लड़ते-झगड़ते, मुँह फुलाते,
फिर भी हँसते रहते हैं
वह हमारी सहती है,
हम उसकी सहते हैं;
मेरे पीछे वह ऐसे दौड़ती है
जैसे मोटर के पीछे ट्राली-
दौड़ दौड़ कर थक जाती है-
मेरी घरवाली।

नजर उसकी रहती है मेरी पाकेट पर
यह कोई नई बात नहीं है।
लेकिन कइयों की घरवालियाँ तो
छीन लेती हैं उनके मनीबेग उनसे
यह भण्डाफोड़ एकदम दुरुस्त और सही है;
पर हम सब सभ्य हैं,
उदार हैं, महान हैं, भव्य हैं,
न कभी हम उसे मारते और न देते गाली,
जो है अपने अपने घर में
अपनी अपनी घरवाली।

गीता रामायण पढ़ती है,
महाभारत भी कर लेती है,
जब जब गुस्सा आता है उसे मुझ पर,
तब तब बच्चों के कोमल गालों पर,
दो-चार तमाचे जड़ देती है;
कभी पड़ोसन से घुलमिल कर बातें करती है
जाने दोनों आपस में क्या साजिश रचती हैं
फिर दोनों में जब ठन जाती है,
तब पड़ोसन बन जाती है काली
और यह महाकाली - जो है
मेरी घरवाली।

पूजा-पाठ किया करती है,
कथा-पुराण सुना करती है,
पर सबमें मैं ही केन्द्रित रहता हूँ,
इसीलिये उसके नखरे सहता हूँ,
वह सीता है पर मैं राम नहीं,
यही सोच कर खुश रहता हूँ।
मेरे मुन्नों को वह सभ्य बनाती है,
उससे ही है मेरे घर की लाली,
खूब समझता हूँ उसको, जो है-
मेरी घरवाली।

(रचना तिथिः शनिवार 30-01-1981)
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