Wednesday, September 22, 2010

तू मानव है, तू चाहे तो ...

तू मानव है, तू चाहे तो
पत्थर को भी पानी कर दे
जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

मरुस्थली में फूल खिला दे
मिट्टी से सोना उपजा दे
तेरे हाथों में वो बल है
चट्टानों को मोम बना दे
अतुल शक्ति का स्वामी है तू
विष को भी तू अमृत कर दे!

जन-जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

शांतिदूत तू समस्त विश्व का
दुःख-दारिद्य का महाकाल है
अवनि और अंबर हैं तेरे
तू ज्ञान का महाजाल है
एक बार फिर आत्मज्ञान से
विश्वपटल आलोकित कर दे!

जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

उठ जाये तो देवतुल्य तू
गिर जाये तो पशु से बदतर
गिरने में अपयश है तेरा
उठ जाना ही है श्रेयस्कर
एक बार फिर इतना उठ तू
देवगणों को विस्मित कर दे!

जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

9 comments:

Unknown said...

प्रेरक कविता ............उत्तम कविता !

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

uttam kavita.........aabhar

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर सार्थक प्रेरणा देता गीत । बधाई।

प्रवीण पाण्डेय said...

अपार सम्भावनायें केवल मानव में ही हैं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छी कविता है... सुन्दर भावों के साथ..

उम्मतें said...

इंसानी सामर्थ्य पे भरोसा जताती कविता ! अच्छी कविता !

राज भाटिय़ा said...

अति सुंदर रचना जी, धन्यवाद

शरद कोकास said...

बहुत अच्छी कामना है यह फलीभूत हो ।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!