Thursday, October 28, 2010

इक पल जैसे इक युग बीता....

पल तो पल होता है! कब आता है और कब निकल जाता है पता ही नहीं चल पाता! फिर भी अनेक बार ऐसा होता है कि वही पल युग बन जाता है, बिताए नहीं बीतता। क्या समय की गति भी अलग-अलग समय में अलग-अलग होती है?

क्यों कभी समय पंख लगा कर उड़े चला जाता है और कभी काटे भी नहीं कट पाता?

उत्सव की रात को सभी अपने एक साथ होते हैं और घर में सायंकाल किसी की मृत्यु हो गई हो और रातभर उसकी लाश पड़ी हो तो भी सभी अपने एक साथ होते हैं किन्तु पहली रात अर्थात् उत्सव वाली रात के बीतने का पता भी नहीं चल पाता और दूसरी रात काटे नहीं कटती।

क्यों होता है ऐसा?

क्यों खुशी के दिनों के बीतने का पता भी नहीं चल पाता और क्यों दुःख के दिन पहाड़-से लगने लगते हैं?

ऐसा प्रतीत होता है कि महान वैज्ञानिक आइंसटाइन का विशिष्ट सापेक्षता का सिद्धान्त (Special Theory of Relativity) समय पर भी लागू होता है। समय की गति हमारे मन की अवस्था के सापेक्ष होता है। हम सुखी होते हैं तो हमारे लिए समय की गति तेज होती है और जब हम दुखी होते हैं तो हमारे लिए हमारे लिए उसी समय की गति धीरे हो जाती है। इसीलिए रहीम कवि ने कहा हैः

रहिमन चुप ह्वै बैठिए देख दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहै देर॥


केवल धीर मनुष्य ही अपने मन की अवस्था पर नियन्त्रण रख सकता है और उसके लिए समय की गति सदैव एक समान होती है। इसीलिए हमारी संस्कृति हमें धीर बनने की शिक्षा देती है।
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