Monday, February 14, 2011

प्राचीन भारत में गणित (Mathematics in ancient India)

प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक अनुष्ठानों को के आयोजन के लिए विशिष्ट तिथियाँ नियत किया था जिनकी गणना के लिए ज्योतिष अर्थात् खगोल शास्त्र (Astronomy) का सम्पूर्ण ज्ञान आवश्यक था और खगोलीय गणनाएँ गणित के ज्ञान के बिना असम्भव थीं। इसी प्रकार से विभिन्न यज्ञों के लिए वेदियों का त्रिभुज, चतुर्भुज, षट्भुज, अष्टभुज, वृताकार आदि विभिन्न आकार में बनाने का विधान था जिसके लिए अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि का ज्ञान होना अत्यावश्यक था। यही कारण है कि भारत में गणित का प्रचलन वैदिक काल से ही चला आ रहा है। वेदों के उपग्रन्थ शुल्बसूत्र में गणित के अनेक सूत्र पाए जाते हैं। प्राचीन भारत में अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि गणित के अनेक विभागों में बहुत अधिक विकास हुआ था। आज जिसे स्कूलों में "पाइथागोरस साध्य" (Pythagoras' Theorem) के नाम से पढ़ाया जाता है उसके विषय में पाइथागोरस से हजारों साल पूर्व हमारे देश के आचार्यों को जानकारी थी और उसके प्रयोग का विवरण बोधायन के शुल्बसूत्र में मिलता है।

सिंधु घाटी की सभ्यता (ई.पू. 2500 ई.पू. 1700 तक) के अवशेष भी भारत में गणित के ज्ञान होने को ही इंगित करते हैं। खुदाई में मिले मकानों का निर्माण पूर्णतः गणितीय विधियों के आधार पर ही हुआ था। हड़प्पा के निवासियों ने नापतौल (weights and measures) की एक विशिष्ट पद्धति का विकास कर लिया था और अंकों के दशमलव पद्धति से पूर्णतः परिचित थे। लंबाई को नापने के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार की इकाइयों की खोज कर ली थीं। उस जमाने का एक इंडस इंच आज के1.32 इंच (3.35 से.मी.) के बराबर हुआ करता था और उसका दसगुना अर्थात् 13.2 इंच के बराबर उनका एक फुट होता था। खुदाई में मिले एक कांसे की पट्टी (bronze rod) पर 0.367 इंच की दूरियों पर निशान बने मिले हैं जिससे यह जानकारी मिलती है कि 36.7 इंच की सौ इकाइयों वाली लंबाई नापने की उनके पास एक और पद्धति थी। उस स्केल पर बने निशानों की बराबर दूरी की विशुद्धता ने आज के विद्वानों को आश्चर्य में डाल रखा है।

प्राचीन वैदिक धर्म के क्षय होने के बाद से ईसा पश्चात् 500 तक का समय भारतीय गणित का अन्धकारमय समय माना जाता है। इस अन्धकारपूर्ण समय के व्यतीत हो जाने के आर्यभट्ट प्रथम ने भारत के प्राचीन गणित को पुनः एक नई दिशा देने का कार्य किया। आर्यभट्ट ने खगोल विद्या के एक नये युग का आरम्भ करते हुए सूर्य तथा चन्द्र ग्रहणों को समझने के लिए नए सिद्धान्त दिए तथा खगोलीय गणना को त्रिकोणमिति द्वारा करने कि विधि का विकास किया। आर्यभट्ट ने ही कुसुमपुर में गणित के केन्द्र की स्थापना की जहाँ पर गणित तथा खगोल शास्त्र के विभिन्न विषयों पर शोधकार्य हुआ करता था। उस काल में भारत में उज्जैन भी गणित का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। वाराहमिहिर जैसे गणित के प्रकाण्ड पण्डित उज्जैन केन्द्र से ही सम्बन्धित थे। ईसा पश्चात् सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त उज्जैन केन्द्र के एक और आधारस्तम्भ बने जिन्होनें अंकप्रणाली में बहुत से महत्वपूर्ण विकास के कार्य किया।

आर्यभट्ट प्रथम के समय से लगभग ईसा पश्चात् 150 तक के समय में  विभिन्न गणितज्ञों ने संख्या के सिद्धान्त (theory of numbers), अंकगणित कार्यप्रणाली  (arithmetical operations) ज्यामिति  (geometry), भिन्न कार्यप्रणाली (operations with fractions), सामान्य समीकरण (simple equations), क्यूबिक समीकरण (cubic equations), क्वार्टिक समीकरण (quartic equations), क्रमचय और संचय (permutations and combinations) जैसे गणित के विभिन्न विषयों में उल्लेखनीय कार्य किया। इसी दौरान भारतीय गणितज्ञों ने अनन्त के सिद्धान्त (theory of the infinite), जिसमें विभिन्न श्रेणी सापेक्षिक स्तर के अनन्त (different levels of infinity) शामिल थे, का आश्चर्यजनक रूप से विकास कर लिया, यहाँ तक कि 2 के आधार वाला लघुगुणक logarithms to base 2 तक को भी समझ लिया।

प्राचीन भारतीय ग्रंथों का शोधपूर्ण अध्ययन से प्राचीन भारतीय गणित तथा विज्ञान के विषय में और भी बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की भरपूर सम्भावनाएँ हैं किन्तु ये समस्त ग्रंथ संस्कृत भाषा में है और हमारे साथ विडम्बना यह है कि भारतीय होने के बावजूद भी हम संस्कृत नहीं जानते। हमारे प्राचीन विद्वानों द्वारा खोजे तथा अन्वेषित किए गए खोजों तथा आविष्कारों को उनसे कई हजारों साल बाद पुनः खोज और अन्वेषित करके पाश्चात्य विद्वानों ने उन खोजों और आविष्कारों का श्रेय प्राप्त कर लिया है और हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि, जिन्होंने विश्व को अनेक महत्व वैज्ञानिक देन दिया है, उन श्रेय से वंचित रह गए हैं। भारत ने विश्व को क्या-क्या महत्वपूर्ण देन दिए हैं इस बात की जानकारी भी हम भारतीयों को विदेशी विद्वानों से ही मिलती है क्योंकि हम स्वयं को किसी प्रकार का अनुसन्धान करने में असफल पाते हैं। मैक्समूलर और कनिंघम जैसे अने पाश्चात्य विद्वान अपने शोधकार्यों के लिए अत्यन्त रुचि और लगन के साथ संस्कृत सीख सकते हैं किन्तु हम भारतीय नहीं।

विश्व के प्रायः समस्त विद्वान इस बात से सहमत हैं कि बौधायन, मानव, आपस्तम्ब, कात्यायन, पाणिनि, आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर १, ब्रह्मगुप्त, पृथूदक, हलायुध, आर्यभट २ आदि भारत प्राचीन विद्वानों के महत्वपूर्ण देन को संसार कभी भी नहीं भुला सकता।
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