Monday, April 18, 2011

जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिए

जिन्दगी!

कहा जाता है कि जिन्दगी ऊपर वाले की दी हुई सबसे बड़ी नेमत है! ईश्वर का दिया हुआ सबसे बड़ा दान है!

पर अनेक बार मन में सवाल कौंधता है कि आखिर क्या है यह जिन्दगी? क्या उद्देश्य है इस जीवन का? कैसे समझा जाए इसे? राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त भी ने भी तो कहा है -

यह जन्म हुआ किस अर्थ कहो?
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो!

कभी कभी लगता है कि जिन्दगी को समझना बहुत मुश्किल है। बड़े-बड़े मनीषियों, दर्शनशास्त्रियों, विद्वानों, लेखकों, कवियों, दिग्गजों नें इस जिन्दगी की व्याख्या की है और हर एक की व्याख्या अलग-अलग है। जितनी नजरिया, जिन्दगी के उतने ही रूप! ये जिन्दगी जिन्दगी ही है या ईश्वर, परमात्मा, प्रभु, हरि का रूप? -

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहिं सुनहिं बहु बिधि सब सन्ता॥

राजा हरिश्चन्द्र के लिए सत्य ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने अपना सर्वस्व सत्य के लिए त्याग दिया। ययाति के लिए यौन-सुख ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने अपने कनिष्ठ पुत्र पुरु की युवावस्था को माँगकर अपने लिए प्रयोग किया। राम के लिए पितृभक्ति ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने राज-पाट त्यागकर चौदह वर्ष वन में व्यतीत किए। रावण के लिए अभिमान ही जिन्दगी है तभी तो प्रकाण्ड पण्डित और वेदवेत्ता होते हुए भी उन्होंने सीता का अपहरण किया। कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि कर्म ही जिन्दगी है। एकलव्य के लिए गुरुभक्ति जिन्दगी है। कर्ण के लिए दान ही जिन्दगी है, दान के समक्ष उनके लिए उनके अमोघ कवच और कुण्डल का भी कुछ भी महत्व नहीं है। मोक्षाभिलाषी योगियों के लिए मोक्ष ही जिन्दगी है।

हूणों, तुर्कों, मुगलों, अंग्रेजों के लिए लूटमार ही जिन्दगी थी जिन्होंने भारतभूमि को पददलित किया। मंगलसिंह, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र बोस जैसे क्रान्तिकारियों के लिए देश की स्वतन्त्रता के क्रान्ति करना ही जिन्दगी थी।

आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सत्ता, धन और सुख प्राप्ति ही जिन्दगी है इसीलिए तो नेता भ्रष्टतम कार्य करने से नहीं चूकते, अधिकारियों ने घूँस लेना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रखा है, व्यापारी खुलेआम कालाबाजारी करते हैं, शिक्षा-चिकित्सा जैसे सेवा कार्य व्यापार बन कर रह गए हैं।

अब कैसे कहा जाय कि जिन्दगी क्या है?

अजीब बात तो यह है कि हम जिन्दगी भले ही जाने-समझें नहीं किन्तु जिन्दगी है कि हमें अच्छी प्रकार से नचाती है, कभी सुख का बोध कराती है तो कभी दुःख का, कभी आशा के दीप जला देती है तो कभी निराशा के अन्धकार में धकेल देती है। हमें कठपुतली बनाकर डोर अपनी उँगलियों में बाँध लेती है और खूब नचाती है हमें, हम उसकी उँगलियों के इशारे पर नाचते हैं किन्तु समझते यही हैं कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं वह स्वयं ही कर रहे हैं, हमें जरा भी भास नहीं होता कि हम किसी दूसरे के इशारे पर नाच रहे हैं।

विचित्र है यह जिन्दगी, हमेशा भरमाती रहती है हमें। हम बरसों के लिए सामान जुटा कर रख लेते हैं और यह पल भर में हमें चलता कर देती है, तभी तो किसी शायर ने कहा है -

ख़बर पल की नहीं,सामां उम्र भर का।

शायरों और गीतकारों ने भी जिन्दगी को अपने-अपने तौर पर शेरों और गीतों में ढाला है। जफ़र जिन्दगी को मात्र चार दिन का मान कर कहते हैं -

उम्रे दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए दो इन्तजार में।

गुलजार जी को लगता है कि जिन्दगी सभी जगह है पर उनके घर में नहीं है, तभी तो कहते हैं -

जिन्दगी, मेरे घर आना जिन्दगी...

योगेश को जिन्दगी कभी हँसाने वाली तो कभी रुलाने वाली पहेली लगती है और वे कहते हैं -

जिन्दगी, कैसी है पहेली हाए
कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाए...

जिन्दगी को अलग-अलग फिल्मी गीतकार अलग अलग रूप में देखते हैं, कोई कहता है -

जिन्दगी क्या है, गम का दरिया है
ना जीना यहाँ बस में, न मरना यहाँ बस में, अजब दुनया है

तो कोई कहता है -

जिन्दगी का सफर, है ये कैसा सफर
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं

किसी को लगता है हार कर मुस्कुराना ही जिन्दगी है -

कोई जीत कर खुश हुआ तो क्या हुआ,
सब कुछ हार कर मुस्कुराना जिन्दगी हैं!

कोई जिन्दगी से बहुत खुश है तो कोई जिन्दगी से बहुत निराश।

कोमा में रहने वाले व्यक्ति की जिन्दगी जिन्दगी न होते हुए भी जिन्दगी ही है। असाध्य रोग के कारण असहनीय पीड़ा सहन करने वाला व्यक्ति मृत्यु की कामना करता है पर जिन्दगी को जीने के लिए विवश है। अनेक बार जिन्दगी मौत से भी बदतर होती है पर किसी को भी स्वयं अथवा किसी अन्य को मार डालने का अधिकार नहीं  है, भले ही दया करके मार डालने (murcy killing) का ही मामला क्यों न हो। यदि किसी हम जीवन नहीं दे सकते तो उसे मौत देने का अधिकार हमें हमें कैसे मिल सकता है। अच्छी हो या बुरी, जिन्दगी को जीना एक विवशता है।

पर क्यो विवश रहे कोई? जीने की इच्छा न होते हुए भी क्यों जिए कोई?

बैठे रहोगे दश्त में कब तक हसन रजा
जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिए!
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