Monday, May 9, 2011

हम भारतवासी इतने भी कृतघ्न नहीं हैं कि.....

अब साल में कम से कम एक दिन तो ऐसा आता है जिस दिन 'मदर' भी खुश रहती है और 'सन्स' एण्ड 'डाटर्स' भी। नहीं तो साल भर तो 'ममी' के खटर-पटर लगा ही रहता है। 'मदर' तो गिफ्ट मिलने से जितना खुश होती है उससे भी अधिक यह सोच कर खुश होती है कि चलो कम से कम एक दिन के लिए मुझे याद किया या याद करने का दिखावा तो किया जाता है।

पहले जब 'माताएँ' हुआ करती थीं तो मातृ ऋण भी हुआ करता था।  "मनुस्मृति" में तो कहा गया है "उपाध्याओं से दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य से सौ गुना श्रेष्ठ पिता और पिता से सहस्त्र गुना श्रेष्ठ माता का गौरव होता है। माता की कृतज्ञता से संतान सौ वर्षो में भी मुक्त नहीं हो सकती"। मातृ ऋण से उबरना किसी भी प्रकार से नहीं हो सकता था। 'मदर' या 'ममी' का किसी प्रकार का उधार हम पर नहीं होता फिर भी हम मदर्स डे के दिन उन्हें गिफ्ट देकर खुश कर लेते हैं। कितने खराब थे पुराने संस्कार जिसमें हम माता, पिता, गुरु आदि के ऋणी हुआ करते थे और कितने अच्छे हैं आधुनिक संस्कार जिनमें हम उनके ऋणी होने के बजाय गिफ्ट आदि देकर उन्हें ही अपना ऋणी बना लेते हैं। इसी कारण से तो आज पुराने संस्कार खत्म होते जा रहे हैं और नये संस्कार हमारे भीतर घर करते जा रहे हैं।

वैसे भी हम भारतवासी वात्सल्य, स्नेह, प्रेम की अमृत धाराएँ प्रदान करने वाली माता के मातृ-ऋण को भले ही भूल जायें, पर हम इतने कृतघ्न भी नहीं है कि साल में एक दिन मदर्स डे मनाकर अपनी माँ को खुश भी ना कर सकें।

3 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

सच बात है।

राज भाटिय़ा said...

क्या बात हे जी, बहुत खुब

ramswarup said...

सच मेँ आज की युवा पीढी इसी सोच मे आकँठ डूबी हैँ....

 
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