Monday, May 16, 2011

भूली-बिसरी यादें

कालचक्र घूमने के साथ ही साथ किसी बात की स्मृति भी धूमिल पड़ते जाती है। जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ भी समय बीतने के साथ मस्तिष्क के गहरे गर्त में समा जाती है और हम उन्हें भूल जाया करते हैं। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बरसों से भूली हुई कोई बात अचानक अवचेतन मस्तिष्क के गर्त से उभरकर चेतन में वापस आ जाती है।

ईश्वर ने मनुष्य के मनुष्य के मस्तिष्क को विचित्र रूप से रचा है। हर पल, हर क्षण मस्तिष्क के भीतर विचार बुलबुले की भाँति उठते रहते हैं, ऐसा एक भी क्षण नहीं होता जबकि मस्तिष्क विचारशून्य हो। प्रायः चेतन और अचेतन मस्तिष्क से ही उठने वाले विचारों के ये बुलबुले हमारे भीतर कौंधते रहते है, विचारों के बुलबुले तो अवचेतन मस्तिष्क से भी उठते रहते हैं किन्तु अत्यन्त गहराई में होने के कारण वे ऊपर तक नहीं आ पाते। हाँ कभी कोई बुलबुला सतह तक आ जाए तो वही हमारी भूली-बिसरी याद बन कर रह जाता है।

इस पोस्ट के उपरोक्त पंक्तियों को लिखने के लिए इसलिए सूझा क्योंकि आज एक पुराना फिल्मी गीत, जिसे कभी मैं बहुत पसन्द करता था पर बाद में बिल्कुल ही भूल गया था, अचानक याद आ गया - वो गीत है फिल्म भूत बंगला का "ओ मेरे प्यार आजा..."। राहुल देव बर्मन की बनाई यह धुन मुझे बहुत ही पसन्द है, लीजिए आप भी सुनिए, उम्मीद है कि आपको भी पसन्द आएगा।

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