Saturday, May 28, 2011

रोचक छत्तीसगढ़ी हाने अर्थात् छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ

जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
  • "तेली के तेल होथे, त पहाड़ ल नइ पोतें" अर्थात् यदि तेली का तेल मुफ्त में मिल जाए तो पहाड़ को नहीं पोता जाता याने कि दूसरे के धन का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • "पटके म मेछा उखानना" अर्थात् किसी ने किसी को पटक दिया तो किसी दूसरे ने पटकाए हुए आदमी की मूछें उखाड़ ली याने कि दूसरे का कार्य का श्रेय स्वयं ले लेना।
  • "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • "कठवा के बइला" अर्थात् मूर्ख होना।
  • "रद्दा में हागै अउ आँखी गुरेड़ै" अर्थात् रास्ते में हगना और मना करने वाले को आँखें दिखाना याने कि "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटै"।
  • "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
  • "अड़हा बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
  • "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
  • "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् भले काम की प्रशंसा न करना और छोटी सी गलती को भी उछाल देना।
  • "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • "जादा मीठा में कीरा परथे" अर्थात् बहुत अधिक नजदीकी वैमनस्य का कारण बन जाती है।
  • "देह म नइ ए लत्ता, जाए बर कलकत्ता" अर्थात् डींग हाँकना याने कि "घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने"।
  • "मूड़ ले बड़े आँखी" अर्थात् मुख्य कार्य से सहायक कार्य का बड़ा हो जाना।
  • "खातू परै त खेती, नइ त नदिया के रेती" अर्थात् खाद न पड़ने पर खेत भी नदी रेत के समान होता है।
  • "खेती अपन सेती" अर्थात् दूसरे के भरोसे खेती नहीं हो सकती।
  • "हुरिया देना" अर्थात् ललकारना।
  • "आगी मूतना" अर्थात् दबंगता या अन्याय करना।
  • "छानी में होरा भूँजना" अर्थात् अत्याचार करना।
  • "एती ओती करना" अर्थात् बगलें झाँकना।
  • "चुचुवा के रहना" अर्थात् निराश होना।
  • "लोटा थारी बेचना" अर्थात् गरीबी में बर्तन-भांडे बिक जाना।
  • "ठेठरी होना" अर्थात् सूखकर काँटा होना।
  • "खटिया म पचना" अर्थात असाध्य रोगी होना।
  • "खटिया उसलना" अर्थात् मृत्यु हो जाना।
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