Saturday, August 20, 2011

आज लोग भ्रष्टाचार से उतने ही त्रस्त है जितने कभी अंग्रेजों की गुलामी तथा लूट से थे

आज भारत की जनता देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से उतनी ही त्रस्त है जितनी अंग्रेजों के जमाने में उनकी गुलामी तथा लूट से थी। उन दिनों देश का प्रत्येक व्यकि चाहता था कि गुलामी और लूट से हमें मुक्ति मिले और आज देश का प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है। देश के हर व्यक्ति को लग रहा है कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देकर, भारत की जनता की मेहनत से की गई गाढ़ी कमाई को लूटकर अपने विदेशी बैंकों के खातों को सदैव अक्षुण्ण धन से भरपूर रखने वाले, भस्मासुरों का दल हमें भी भस्म करके रख देगा। यही कारण है कि देश के कोटि-कोटि लोग, जो भ्रष्टाचार के शिकंजे में फँसा हुए हैं, भ्रष्टाचार से मुक्ति की कामना कर रहे हैं।

किन्तु हर व्यक्ति के एक जैसा चाहने से तो मुक्ति नहीं मिल सकती, मुक्ति मिलती है एक सी कामना करने वालों के एक जुट होकर संघर्ष करने से! इतिहास गवाह है कि जब अंग्रेजों की गुलामी तथा लूट से मुक्ति की कामना करने वाले सभी लोग एकजुट हो गए तो अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाना ही पड़ा था। लोगों की उस एकजुटता ने अंग्रेंजो जैसे मक्कार किन्तु सशक्त शासकों के पैरों तले की जमीन को खिसका कर रख दिया था। आज इतिहास फिर से एक बार स्वयं को दुहरा रहा है। भ्रष्टाचार से मुक्ति की कामना करने वाले सारे लोग एकजुट हो गए हैं। और, उनकी इस एकजुटता से, भ्रष्टाचार खत्म करने का झूठा वादा करने वाली किन्तु वास्तव में भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाली सरकार सकते में आ गई है। सत्ता के नशे में चूर, हिरण्यकश्यपु, रावण तथा कंस के समान अहंकारी, राजनेताओं के दर्प से दमकते हुए चेहरे बुझे हुए नजर आ रहे हैं, उनकी जुबान से बोली तक नहीं निकल पा रही है।

भ्रष्टाचारी राजनेताओं को यह भय सताने लग गया है कि यदि जनता इसी प्रकार से एकजुट रही तो उन्हें भविष्य में फिर कभी सत्ता-सुख भोगने का अवसर ही नहीं मिल पाएगा। जनता की यह एकजुटता उन्हें बहुत ही खतरनाक नजर आ रही है। जनता पर अपनी मनमानी चलाने के लिए जनता में फूट का होना अति आवश्यक है। यही कारण था कि अंग्रेजों ने भारत की जनता को हिन्दू, मुसलमान तथा विभिन्न जातियों एवं उपजातियों के रूप में तोड़कर न केवल अलग-अलग कर रखा था बल्कि उन्हें आपस में लड़वाते भी रहते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात के तथाकथित राजनेताओं ने भी वही किया जो अंग्रेज किया करते थे। उन्होंने भारत की जनता को दलित, सामान्य, जाति, जन-जाति, पिछड़ा वर्ग जैसे विभिन्न वर्गों में बाँट कर तथा व्होट की राजनीति चलाकर सिर्फ, और सिर्फ, अपने स्वार्थों की सिद्धि ही किया है। स्वतन्त्रता-पूर्व अंग्रेज हमें लूटते रहे और स्वतन्त्रता-पश्चात देश के तथाकथित राष्ट्रनिर्माता हमें लूटते रहे। अपनी लूट की इस प्रक्रिया को सतत् रूप से चलाने के लिए सदैव उन्होंने केवल इसी बात पर ध्यान दिया कि कहीं देश की जनता जागरूक न हो जाए, कहीं वे एकजुट न हो जाएँ। अपनी लूट को जारी रखने के लिए वे साम-दाम-दण्ड-भेद यहाँ तक कि अनैतिकता तथा क्रूरता तक का प्रयोग करते रहे। अपने देश के प्राचीन सिद्धान्तों, नीतियों, शास्त्रों, शिक्षा आदि को हेय बनाने वाले, भारतीयों के दिलो-दिमाग में अंग्रेजियत तथा पश्चिमी संस्कार भर देने वाले, अंग्रेजों के बनाये विधानों, नीतियों तथा शिक्षा पद्धति को, जो सिर्फ, और सिर्फ, भ्रष्टाचार, बेईमानी, प्रपंच आदि को ही बढ़ावा देते है, जारी रखा गया ताकि उनकी लूट-खसोट जारी रहे, अमीर भारत में केवल भ्रष्टाचारी ही अमीर बने रहें और शेष जनता गरीब हो जाए। चुनाव प्रक्रिया को ऐसा बना दिया गया कि, उम्मीदवारों की भीड़ में, सौ में से केवल तीस से चालीस लोगों का व्होट पाने वाला व्यक्ति चुनकर आ जाए, वह व्यक्ति चुनकर आ जाए जिसे कि सौ में से साठ से सत्तर लोगों ने नकार दिया है। ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि यदि हमें स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो किसी और को भी न मिले। केवल भ्रष्ट लोगों की टोली ही चुनकर आ पाएँ और देश की जनता को लूट-लूट कर आपस में बंदर-बाँट करते रहें। देश का सैकड़ों लाख करोड़ रुपया विदेशी बैंकों के खातों में समा जाए।

आज देश की समस्त जनता एकजुट दिखाई दे रही है पर प्रश्न यह उठता है कि यह एकजुटता कब तक बनी रहेगी? जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। पाँच साल के शासन काल में चार साल तक उसे कितना लूटा गया है यह वह भूल जाती है और याद रह जाता है तो शासन काल के अन्तिम समय में किए गए विकास के कुछ कार्य। वह भी इसलिए याद रह जाता है क्योंकि प्रचार माध्यमों तथा विज्ञापनों के द्वारा उसे जबरदस्ती याद रखवाया जाता है ताकि अगले चुनाव में जनता फिर से उन्हीं भ्रष्टाचार के भस्मासुरों के दल को सत्ता के सिंहासन में वापस ले आए। आज जरूरत है जनता को अपनी स्मरण शक्ति बढ़ाने की ताकि लोगों की एकजुटता हमेशा-हमेशा के लिए कायम रहे।
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