Monday, August 22, 2011

नवभ्रष्ट लोचन भ्रष्ट मुख कर भ्रष्ट पद भ्रष्टारुणम्

15 अगस्त 1947 के दिन, जब राष्ट्र ने गुलामी की जंजीरों को तोड़कर स्वतन्त्रता का हार पहना था, शायद ही देश के किसी व्यक्ति ने कल्पना की रही होगी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब भ्रष्टाचार का भस्मासुर इस देश को भस्म कर देने के लिए आमादा हो जाएगा। उस समय तो उनकी कल्पना में भविष्य का भारत एक खुशहाल भारत ही रहा होगा, न कि भ्रष्टाचार और मँहगाई से त्रस्त भारत। उस समय उन्होंने सोचा तक न रहा होगा कि जिस प्रकार से उनके जमाने में अंग्रेजों की गुलामी के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए लोगों के हुजूम उमड़ पड़ते थे वैसे ही एक दिन ऐसा भी आएगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए न केवल दिल्ली के रामलीला मैदान में 1.25 लाख लोग इकट्ठे हो जाएँगे बल्कि देश के हर हिस्से में लोगों का सैलाब उमड़ पड़ेगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्र की बागडोर यदि सच्चे, कर्मठ और ईमानदार जननायकों के हाथ में गई होती तो निश्चित रूप से इस देश में रामराज्य की कल्पना साकार हो गई होती किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया और इस देश को भ्रष्टाचार का एक ऐसा घाव लगा जो कि आज नासूर बन चुका है। आइये देखें कि 1947 के बाद कौन-कौन से प्रमुख घोटाले हुए जिसके कारण आज यह स्थिति बनी हैः

1948

जीप घोटाला

काश्मीर ऑपरेशन के लिए भारतीय सेना को जीपों की आवश्यकता होने पर व्ही.के. कृष्णा मेनन, जो कि उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर पद पर थे, ने समस्त नियमों को ताक पर रखकर एक विदेशी कंपनी को क्रय आदेश दिया था। कहा जाता है कि फर्म को 2,000 जीपों के लिए क्रय आदेश दिया गया था जिसके लिए अधिकतम राशि का अग्रिम भुगतान भी कर दिया गया किन्तु कम्पनी ने मात्र 155 जीपें ही प्रदाय की थी। विपक्ष के द्वारा प्रकरण के न्यायिक जाँच के अनुरोध को रद्द करके अनन्तसायनम अयंगर के नेतृत्व में एक जाँच कमेटी बिठा दी गई। बाद में  30 सितम्बर 1955 सरकार ने जाँच प्रकरण को समाप्त कर दिया। यूनियन मिनिस्टर जी.बी. पन्त ने घोषित किया, "सरकार इस मामले को समाप्त करने का निश्चय कर चुकी है। यदि विपक्षी सन्तुष्ट नहीं हैं तो इसे चुनाव का विवाद बना सकते हैं।" 3 फरवरी1956 के बाद शीघ्र ही कृष्णा मेनन को नेहरू केबिनेट में बगैर किसी पोर्टफोलियो का मन्त्री नियुक्त कर दिया गया।

1950

भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित सिविल सर्व्हेंट ए.डी. गोरवाला को शासन संचालन में सुधार के लिए अपनी सिफारिशें
 देने के लिए कहा गया। 1951 में उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में अन्य अनेक अवलोकनों के साथ निम्न दो अवलोकन भी थे -

"नेहरू के मन्त्रिमण्डल में कुछ मन्त्री भ्रष्ट थे और इस बात की जानकारी प्रायः सभी को थी।"

"एक अत्यन्त जिम्मेदार सिविल सर्व्हेंट के आफिसियल रिपोर्ट में उल्लेख है कि सरकार अपने मन्त्रियों को बचाने के लिए गलत रास्ते अपनाती है"
(Report on Public Administration, Planning Commission, Government of India 1951 से उद्धृत)

1958

एल.आई.सी. स्कैन्डल

इन्दिरा गांधी के पति फीरोज गांधी ने इस घोटाले को खोला था और वित्त मन्त्री टी.टी. कृष्ण्माचारी, वित्त सचिव एच.एम. पटेल, जीवन बीमा निगम के चेयरमैन एल.एस. वैद्यनाथन आदि के नाम इस घोटाले के साथ जोड़े थे।

उल्लेखनीय है कि मुद्गल प्रकरण (1951), मूंदड़ा डील्स (1963), मालवीय-सिराजुद्दीन घोटाला (1963) और प्रताप सिंह कैरोन प्रकरण (1963) के लिए कांग्रेस के मन्त्रियों तथा मुख्य मन्त्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे किन्तु किसी भी मन्त्री, मुख्य मन्त्री तथा प्रधान मन्त्री ने इस्तीफा नहीं दिया।

भारत सरकार ने भ्रष्टाचार मामलों की जाँच के लिए 1962 में शान्तनम कमेटी का गठन किया था जिसके द्वारा 1964 में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, "लोगों में व्यापक रूप से यह धारणा पाई जाती है कि मन्त्रियों में सत्यनिष्ठा की कमी कोई असामान्य बात नहीं है और पिछले सोलह सालों में कुछ मन्त्रियों ने गैरकानूनी तौर पर बहुत सारा धन कमाने, अपने पुत्रों तथा रिश्तेदारों को भाईभतीजावाद द्वारा अच्छा जॉब दिलवाने और सार्वजनिक जीवन की निर्मलता से पूर्णतः असम्बद्ध तरीकों से अन्य प्रकार के फायदे उठाने का कार्य किया है।" (There is widespread impression that failure of integrity is not uncommon among ministers and that some ministers, who have held office during the last sixteen years have enriched themselves illegitimately, obtained good jobs for their sons and relations through nepotism and have reaped other advantages inconsistent with any notion of purity in public life.)

1965

यह ज्ञात होने पर कि उड़ीसा के मुख्य मन्त्री बीजू पटनायक (नवीन पटनायक के पिता) ने कलिंग ट्यूब्स नामक अपनी स्वयं की कम्पनी को सरकारी ठेका देकर फायदा पहुँचाया है, उन्हें इस्तीफा देने पर विवश किया गया था।

1970

नागरवाला काण्ड

भारतीय स्टेट बैंक की संसद मार्ग शाखा के चीफ कैशियर व्ही.पी. मेहता ने केवल टेलीफोन द्वारा प्राप्तआदेश पर, बगैर किसी बैंकिंग इंस्ट्रुमेंट  (विथड्राल फॉर्म, चेक, ड्राफ्ट आदि) के, नागरवाला नामक व्यक्ति को रु.60 लाख का भुगतान कर दिया। बताया जाता है कि मेहता को यह विश्वास था कि फोन पर इन्दिरा गांधी ने आदेश दिया था। नागरवाला कांड की जाँच करने वाले अधिकारी की सड़क दुर्घटना में तथा नागरवाला की जेल में मृत्यु हो जाने के कारण यह प्रकरण हमेशा के लिए रहस्यमय बन कर रह गया।

1974

मारुति घोटाला

1974 में मारुति घोटाले के प्रकरण में इन्दिरा गांधी का नाम उभरा था। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने पैसेन्जर कार के निर्माण हेतु पक्षपातपूर्वक गलत तरीके से अपने पुत्र को लाइसेंस उपलब्ध करवाया था।

1976

तेल घोटाला

हांग कांग की कुओ ऑयल कम्पनी (Kuo Oil Co) के साथ वर्तमान कीमत पर ही भविष्य में भी तेल उपलब्ध कराने के लिए 200 मिलियन डालर का कान्ट्रैक्ट किया गया था जिसमें देश को रु.13 करोड़ का चूना लगा। ऐसा माना जाता है कि उन रुपयों को इन्दिरा गांधी और संजय गांधी के खातों में जमा किया गया था।

1980

THAL Vaishet project घोटाला

पेट्रोलियम सेक्रेटरी एच.एन. बहुगुणा, एन.एन. कापड़िया, पेट्रोलियम मन्त्री पी.सी. सेठी और के.पी. उन्नीकृष्णन पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने इटली के Snamprogetti की subsidiary कम्पनी को THAL Vaishet project का कान्ट्रैक्ट, नियमों को ताक में रखकर, दे दिया।

1981

महाराष्ट्र सीमेंट घोटाला

महाराष्ट्र के मुख्य मन्त्री ए.आर. अन्तुले ने सार्वजनिक खपत के सीमेंट को पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाकर गलत तरीके से प्रायवेट बिल्डर्स को दे दिया।

1986

जर्मन सबमैरिन घोटाला

कहा जाता है कि जर्मन फर्म HDW से दो सबमैरिन की खरीदी के इन्दिरा सरकार ने रिश्वत लेकर किया था।

1987

बोफोर्स घोटाला

रु.64 करोड़ लेकर 155mm howitzer सौदा स्वीडिश कम्पनी बोफोर्स को दिया गया। इस घोटाले से राजीव गांधी का नाम जुड़ा हुआ है।

1991

जैन हवाला प्रकरण

रु.64 करोड़ के जैन हवाला प्रकरण में लालकृष्ण अडवानी, विद्याचरण शुक्ल, सी.के. जैफर शरीफ, आरिफ मोहम्मद खान, मदन लाल खुराना, कल्पनाथ राय, एन.डी. तिवारी जैसे नामी नेताओं के साथ अन्य अनेक लोगों पर आरोप लगाए गए थे।

हर्षद मेहता काण्ड

कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर रु.10,000 करोड़ के घोटाले का मामला सामने आने पर उसके लिए हर्षद मेहता, भारतीय स्टेट बैंक सहित कुछ अन्य प्रमुख बैंको पर आरोप लगाए गए थे।

चारा घोटाला

बताया जाता है कि बिहार के मुख्य मन्त्री लालू प्रसाद यादव, अन्य राजनीतिज्ञ तथा नौकरशाही ने मिल कर रु.950 करोड़ का चूना लगाया था।

1996

गलत तरीके से ऋण वितरणः

कहा जाता है कि इण्डियन बैंक के पूर्व चेयरमेन तथा मैनेजिंग डायरेक्टर एम. गोपालकृष्णन ने अन्य लोगों से मिलकर गलत तरीके से रु.1,500 करोड़ का ऋण वितरित कर दिया था।

टेलीकॉम घोटाला

सुखराम पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कई टेलीकॉम कम्पनियों से पक्षपात करने के लिए रिश्वतें ली थीं। सुखराम के घर से 1 मिलियन डालर की रकम छोटे नोटों की शक्लों में पाई गई थीं।

1999

यू.टी.आई. का म्युचुअल फंड घोटाला

2002

केतन पारेख शेयर घोटाला, सत्यम घोटाला, आदर्श घोटाला, कॉमन वेल्थ घोटाला,2 G स्पैक्ट्रम घोटाला, हथियार, गोली, जैकेट खरीदी घोटाला

इसके बाद के घोटालों से तो आप सारे लोग परिचित ही हैं।

शासकों तथा अधिकारियों का कर्तव्य है देश में भ्रष्टाचार को रोकना, किन्तु उपरोक्त घोटालों को देखकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार को रोकने वाले लोग ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इन भ्रष्टाचारी शासकों तथा अधिकारियों का वर्णन करने के लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है कि

नवभ्रष्ट लोचन भ्रष्ट मुख कर भ्रष्ट पद भ्रष्टारुणम्

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भ्रष्टाचार विकरालतर से विकरालतम रूप धारण करता चला गया। सैकड़ों लाख करोड़ रुपये, जिन्हें जनता की हित तथा देश के विकास के लिए जनता ने सरकार को टैक्स के रूप में दिए थे, देश से निकल कर काले धन के रूप में विदेशों में चले गए। भ्रष्टाचारी अमीर होते चले गए और जनता मँहगाई की चक्की में पिसती चली गई।

आज जरूरत है भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिटा देने की। काले धन के रूप में विदेश में जमा रकम को वापस देश में लाने की और जिनके के कारण जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया विदेश चला गया उन लोगों को उनकी करतूतों की सजा देने की। और यह तो स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है कि इन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए देश की जनता अब कटिबद्ध हो चुकी है।
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