Thursday, June 30, 2011

रोपै बिरवा आक को आम कहाँ ते होइ

वृन्द के दोहे

करै बुराई सुख चहै कैसे पावै कोइ।
रोपै बिरवा आक को आम कहाँ ते होइ॥

भली करत लागति बिलम बिलम न बुरे विचार।
भवन बनावत दिन लगै ढाहत लगत न वार॥

जाही ते कछु पाइए करिए ताकी आस।
रीते सरवर पै गए कैसे बुझत पियास॥

अपनी पहुँच बिचार कै करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर॥

नीकी पै फीकी लगै बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में रस श्रृंगार न सुहात॥

विद्याधन उद्यम बिना कहौ जु पावै कौन?
बिना डुलाये ना मिले ज्यों पंखा की पौन॥

कैसे निबहै निबल जन कर सबलन सों गैर।
जैसे बस सागर विषै करत मगर सों बैर॥

फेर न ह्वै हैं कपट सों जो कीजै व्यौपार।
जैसे हांडी काठ की चढ़ै न दूजी बार॥

बुरे लगत सिख के बचन हियै विचारौ आप।
करुवी भेषज बिन पियै मिटै न तन की ताप॥

करिए सुख की होत दुःख यह कहो कौन सयान।
वा सोने को जारिए जासों टूटे कान॥

भले बुरे सब एक सौं जौं लौं बोलत नाहि।
जानि परतु है काक पिक ऋतु वसंत के माहि॥

नयना देत बताय सब हिय की हेत अहेत।
जैसे निर्मल आरसी भली बुरी कहि देत॥

रोष मिटै कैसे कहत रिस उपजावन बात।
ईंधन डारै आग मों कैसे आग बुझात॥

अति परिचै ते होत है अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चंदन देति जराय॥

कारज धीरे होत है काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फरै केतक सींचौ नीर॥

जिहि प्रसंग दूषण लगे तजिए ताको साथ।
मदिरा मानत है जगत दूध कलाली हाथ॥

उत्तम जन सो मिलत ही अवगुन सौ गुन होय।
घन संग खारौ उदधि मिलि बरसै मीठो तोय॥

कुल सपूत जान्यौ परै लखि सुभ लच्छन गात।
होनहार बिरवान के होत चीकने पात॥

क्यों कीजै ऐसो जतन जाते काज न होय।
परवत पर खोदी कुआँ कैसे निकसे तोय॥

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान॥

Tuesday, June 28, 2011

जनता की याददाश्त और हिन्दी ब्लोग पोस्ट - दोनों ही की उम्र मात्र 24 घंटे

परसों डीजल, गैस और मिट्टीतेल का दाम बढ़ने पर कितना हंगामा हुआ। विभिन्न चैनलों पर दिन भर इस विषय पर बहस चलते रहे। मँहगाई बढ़ने की चर्चा चलती रही। रूलिंग पार्टी दाम बढ़ाने के अपने इस कृत्य को जायज ठहराती रही और विपक्ष नाजायज। मँहगाई के इस मुद्दे पर जनता के भीतर आक्रोश भरते रहा।

पर दूसरे ही दिन मीडिया को नए समाचार मिल गए दिखाने के लिए इसलिए दाम बढ़ने और मँहगाई बढ़ने का मुद्दा चैनलों से नदारद तथा इसके साथ ही जनता का आक्रोश गायब। सब कुछ सामान्य हो गया क्योंकि जनता की याददाश्त बेहद ही कमजोर होती है, मात्र चौबीस घंटों में ही वह सब कुछ भूल जाती है, यहाँ तक कि अपने ऊपर हुए अन्याय और अत्याचार तक को भी। और जनता याद भी रखे तो कैसे? उसे तो अपने परिवार पालने के लिए कोल्हू के बैल के माफिक जुटे रहना पड़ता है अपने काम में। यदि कोई एक बार काम में लग जाए तो दुनिया-जहान सब कुछ भूल ही जाता है।

जनता की कमजोर याददाश्त होने के साथ ही एक अन्य और कमजोरी है - वह है आसानी के साथ उसका ध्यान बँटा लिया जाना। काले धन के मुद्दे से उसका ध्यान बँटाना है तो उसके ध्यान को अनशनकर्ता के द्वारा महिलाओं के वस्त्र पहनने या उसके भगोड़ा होने की ओर खींच दो। बस जनता काले धन के मुद्दे को भूल कर व्यक्तिविशेष के क्रियाकलाप को मुद्दा बना लेती है।

जनता की इन दोनों कमजोरियों का सबसे अधिक नुकसान जनता को ही मिलता है और सबसे अधिक फायदा मिलता है तथाकथित राजनीतिक दलों और मीडिया को।

ईश्वर करे कि जनता की स्मरणशक्ति हमेशा कमजोर ही रहे नहीं तो उसके भीतर का आक्रोश ही उसे मार डालेगा। भलाई इसी में है कि जनता हमेशा पिसती ही रहे और उसे अपनी मुट्ठी में रखने वाले तिकड़मी हमेशा ऐश करते रहें, सो भी जनता के ही कमाए पैसों से!

जय जनता जनार्दन!

वैसे जनता की याददाश्त की उमर की तरह से ही हिन्दी ब्लोग पोस्टों की उमर भी चौबीस घंटे ही होती है। चौबीस घंटे बीते नहीं कि पोस्ट का महत्व समाप्त।  कई बार तो ब्लोगर स्वयं भी भूल जाता है कि कुछ दिन पहले उसने क्या पोस्ट किया था।

फिर भी कहा जाता है (जनता की कमजोर याददाश्त के कारण) देश की भी तरक्की हो रही है और (हिन्दी ब्लोग पोस्टों के अल्पायु होने के कारण) हिन्दी की भी!

Monday, June 27, 2011

एक ही समय में मैं सुकृत्य भी करता हूँ साथ ही साथ कुकृत्य भी

मैं सुन्दरकाण्ड का पाठ शुरू करता हूँ पर पाठ शुरू करने के बाद पाठ करते करते ही मैं यह भी सोच रहा हूँ कि कॉलेज में जब मैं पढ़ता था तो वह मेरी सहपाठिनी....

क्या कर क्या रहा हूँ मैं?

सुन्दरकाण्ड का पाठ करके सकृत्य?

या विवाहित होते हुए भी किसी अन्य का, जिसका किसी अन्य के साथ विवाह हो चुका है, खयाल करके कुकृत्य?

वास्तव में हम हम ऐसे बहुत से काम काम करते हैं जिनके विषय में हमें पता ही नहीं होता कि हमने वे काम कैसे कर लिया। उदाहरण के लिए आप आफिस जाने के लिए अपने घर से बाइक स्टार्ट करते हैं। बाइक पर सवार होने के बाद चलना शुरू करते ही आपका मस्तिष्क आपके किसी घरेलू समस्या या आगे घूमने जाने की योजना या इसी प्रकार की किसी अन्य बात के विषय में सोचना शुरू कर देता है। घर से आफिस पहुँचने तक आपके सोचने का सिलसिला चलते ही रहता है। रास्ते में चौराहा आता है और आपकी बाइक मुड़ जाती है, सामने कोई आता है और आपका पैर ब्रेक लगा देता है, ट्रैफिक की लाल बत्ती सामने आने पर बाइक उसके हरे होते तक रुकी रहती है और बत्ती के हरा होते ही फिर चल पड़ती है, ये सारे काम होते रहते हैं पर आपका सोचने का सिलसिला अनवरत रूप से चलते रहता है, एक पल के लिए भी नहीं रुकता। जब आप आफिस पहुँचते हैं तो आपकी बाइक स्टैंड में जाकर रुक जाती है और तब आपके सोचने का सिलसिला टूटता है। अब आप यह सोचने लगते हैं कि अरे मैं तो आफिस पहुँच गया। आप यह तो समझ पाते हैं कि आप सोचने का काम कर रहे हैं किन्तु आप यह जरा भी नहीं समझ पाते कि आप आफिस कैसे पहुँच गए, कैसे बाइक कहीं मुड़ा, कहीं रुका, कहीं पर ब्रेक लगा और आफिस में आकर कैसे स्टैंड पर खड़ा हो गया।

अब आप बताइए कि रास्ते भर तो आप सोचने का ही काम करते रहे हैं तो फिर बाइक को चलाने का काम किसने किया?

वास्तव में सोचने का और बाइक चलाने का दोनों ही काम आपने ही किया है किन्तु आपको स्वयं नहीं पता होता कि आपने बाइक कैसे चला लिया। सही बात तो यह है कि हमारे मस्तिष्क को अलग भाग इन दोनों कामों को अलग-करता है, आपका चेतन (conscious) मस्तिष्क सोचने का कार्य करता है और अचेतन (semi conscious) मस्तिष्क बाइक चलाने का।

हमारा यह अचेतन (semi conscious) मस्तिष्क हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हर उस कार्य को पूरा करता है जिसे शुरू तो हमारा चेतन (conscious) मस्तिष्क करता है और शुरू करने के बाद दूसरी ओर भटक जाता है। ऊपर के उदाहरण में भी बाइक चलाने का काम शुरू करने के बाद हमारा चेतन (conscious) मस्तिष्क भटक गया और दूसरी बात सोचने का काम करने लगा किन्तु उसके द्वारा शुरू किए गए कार्य को अचेतन (semi conscious) मस्तिष्क ने पूरा कर दिया। अचेतन मस्तिष्क चेतन के भटक जाने पर उसके शुरू किए गए काम को पूरा तो करता ही है पर इसके अलावा और भी बहुत सारे कार्य करता है। अनायास ही अनमना हो जाना या खुशी महसूस होना आदि भी अचेतन की की क्रियाएँ हैं। चौबीस घंटों में एक क्षण भी यह अचेतन आराम नहीं करता।  नींद में सो जाने पर यह हमें सपने दिखाता है, जागृत अवस्था में जब कोई अन्य हमारे पास न हो तो यह हमें स्वयं से बातें भी करवाता है। इसीलिए तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा हैः

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।

अस्तु, यह अचेतन कई बार हमें अपने विचारों में इतना तल्लीन करा देता है कि हम किसी स्थान पर होते हुए भी वहाँ पर नहीं होते।

चेतन अत्यन्त चंचल होता है इसीलिए हमेशा भटकता रहता है। मैं न तो चेतन को रोक पाता हूँ और न ही अचेतन को। मेरा जरा भी तो नियन्त्रण नहीं है इन दोनों पर। चेतन और अचेतन मुझे जैसा चलाना चाहते हैं वैसा ही मैं चलता हूँ। मैं इन्हें अपने अनुसार नहीं चला पाता। शायद हिन्दू दर्शन में इन्हें भी इन्द्रिय की ही संज्ञा दी गई है तथा इन पर नियन्त्रण करने का उपदेश दिया गया है। ध्यान, योग आदि वे विधियाँ हैं जिनके द्वारा इन्हें नियन्त्रित किया जा सकता है।

Sunday, June 26, 2011

भगवान शिव के अन्य नाम

भगवान शिव के अन्य नाम हैं
  • शंकर
  • शम्भु
  • रुद्र
  • महादेव
  • उमापति
  • वामदेव
  • त्रिलोचन
  • त्रिपुरान्तक
  • त्रिपुरारि
  • गंगाधर
  • हर
  • स्मरहर
  • ईश
  • पशुपति
  • महेश्वर
  • चन्द्रशेखर
  • गिरीश (गिरिश)
  • मृत्युञ्जय
  • त्र्यम्बक
  • वृषध्वज
  • व्योमकेश
  • श्रीकण्ठ
  • शितिकण्ठ
  • नीललोहित
  • विरूपाक्ष
  • भूतेश
  • ईश्वर
  • ईशान
  • शर्व (सर्व)
  • शूली
  • पिनाकी
  • कृत्तिवासा
  • खण्डपरशु

Saturday, June 25, 2011

बाबा रामदेव को लोगों की नजरों से गिराने की साजिश के लिए अब दूसरे बाबाओं का सहारा लिया जा रहा है

यदि लकीर को छोटा दिखाना है तो उसके पास एक बड़ी लकीर खींच दो। बस बन गई वह लकीर छोटी!

दूसरे बाबाओं से पूछा जा रहा है कि -

क्या बाबा रामदेव का महिला की वेशभूषा धारण करना उचित था?
क्या बाबा रामदेव का इतनी जल्दी अनशन तोड़ देना उचित था?

सवाल यह है कि ऐसे सवाल पूछे ही क्यों जा रहे हैं?

सिर्फ बाबा रामदेव को लोगों की नजरों से गिराने के लिए!

अरे दूसरे बाबाओं से सवाल पूछना ही है तो यह क्यों नहीं पूछते -

क्या बाबा रामदेव का उद्देश्य गलत था?
क्या सरकार द्वारा बाबा रामदेव की सभा में पुलिस द्वारा महिलाओं, वृद्धों आदि पर अत्याचार करना उचित था?

क्यों नहीं पूछते ऐसे सवाल?

भले ही तिकड़मबाजों की चालबाजी में बाबा रामदेव फँस गए हों किन्तु यह तो मानना ही पड़ेगा कि बाबा रामदेव राष्ट्र के हित का कार्य कर रहे थे और तथाकथित राष्ट्र के हित चाहने वालों को उनका यह कार्य फूटी आँखों न सुहाया।

Thursday, June 23, 2011

सरकार ने देश के हर परिवार को प्रति माह प्रतिव्यक्ति रु.500.00 के हिसाब से सहायता राशि देने की घोषणा कर रखी है किन्तु उसे लेने के लिए कोई दावेदार नहीं मिल रहा है

सरकार ने देश के हर परिवार को प्रति माह प्रतिव्यक्ति रु.500.00 के हिसाब से सहायता राशि देने की घोषणा कर रखी है किन्तु उसे लेने के लिए कोई दावेदार नहीं मिल रहा है क्योंकि हर कोई अपनी आमदनी से इतना खुश और सन्तुष्ट है कि उसे इस अतिरिक्त राशि की परवाह ही नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति किसी दूकान से कुछ खरीदी करता है तो दूकानदार उसे ईमानदारी के साथ रसीद दे देता है क्योंकि सेल्स टैक्स की दर अलग-अलग सामानों के लिए मात्र 0.2% से 1% तक ही है इसलिए व्यापारी खुशी के साथ टैक्स पटा देने के लिए तैयार है। आयकर की दर भी बहुत कम हो गई है जिसके कारण देश का प्रत्येक व्यक्ति खुशी-खुशी आयकर पटाने के लिए तैयार है। टैक्स की चोरी बिल्कुल बंद हो गई है।

देश भर में मुफ्त प्राथमिक शिक्षा दी जा रही है, माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के लिए नाममात्र फीस चुकानी पड़ती है तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी बहुत अधिक रकम खर्च नहीं करना पड़ता। सारे शिक्षण संस्थान स्वायत्तशासी निगम के अन्तर्गत संचालित हो रहे हैं तथा देश में लोगों को लूट लेने वाली कोई भी निजी शिक्षा संस्थान नहीं है। गरीब से गरीब परिवार का बच्चा भी शिक्षा से वंचित नहीं है। शिक्षा नीति भी भारत के प्राचीन तथा अर्वाचीन संस्कृति तथा सद्विचार पर आधारित है इसलिए देश का प्रत्येक व्यक्ति देश प्रेम की भावना से सराबोर है।

प्रत्येक व्यक्ति के लिए अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा मुफ्त या नाममात्र के खर्च पर उपलब्ध है।

देश की सभी प्रमुख सड़कें फोरलेन हैं, गाँव-गाँव तक भी जाने पर एक भी कच्ची सड़क नजर नहीं आती। खेतों में फसल लहलहा रहे हैं, हर किसान साल में कम से कम तीन फसल पैदा कर रहा है।

यह सब इसलिए सम्भव हो पाया है क्योंकि विदेशों में जमा भारत के लगभग 280 लाख करोड़ रुपये वापस देश में आ चुके हैं, चोरों और बेईमानों को उनकी करनी की सजा मिल चुकी है तथा देश का संचालन पूरी तरह से ईमानदार लोगों के हाथ में हैं।

ऐसी ही खुशहाली की बहुत सारी बातें मेरे समक्ष दिखाई दे रहीं थीं कि एक आवाज आती है, "यदि किसी ने भी आगे अनशन की तो उसे कुचल दिया जाएगा"। इस आवाज से मेरी नींद खुल जाती है। घड़ी देखता हूँ तो सुबह के पाँच बजे हैं।

तो यह सपना था! सोचने लगता हूँ "अजब बेवकूफ हूँ मैं - कैसे कैसे सपने देख लेता हूँ"।

Monday, June 20, 2011

सीधे का मुँह तो कुत्ता भी चाट लेता है

जब तक देश की जनता भोली-भाली बनी रहेगी चोर, बेईमान, धूर्त, पाखण्डी लोग उसे लूटते ही रहेंगे। इस देश की जनता को सदा से ही जनता के सेवक के रूप में चोर, बेईमान, धूर्त, पाखण्डी लोग उसे लूटते ही रहे हैं।

भोला-भाला होने का एक अर्थ है सीधा होना और "सीधे का मुँह तो कुत्ता भी चाट लेता है"। और सीधी-सादी जनता को घेरने वाले कुत्ते साधारण कुत्ते नहीं बल्कि शिकारी कुत्ते हैं जो मुँह न चाटकर सीधे मांस नोंच लेते हैं।

वक्त आ गया है जनता अब जागरूक बने। उसे जागरूक बनना ही पड़ेगा।

Sunday, June 19, 2011

धक्का खाय पुजारी मजा करे गिरधारी!

देश की जनता में से करोड़ों लोग ऐसे होंगे जिन्होंने कभी एक साथ एक करोड़ रुपये देखे भी नहीं होंगे पर चंद बेईमान लुटेरे ऐसे भी हैं जिन्होंने हजारों और लाखों करोड़ रुपये विदेशी बैंकों में जमा कर रखे हैं।

कहाँ से आया इतना रुपया उनके पास?

ये रुपये उनके पास आए हैं सिर्फ और सिर्फ बेईमानी और लूट से। ये रुपये भारत की मेहनतकश जनता की मेहनत से बने हैं किन्तु जिन लोगों ने ये रुपये कमाए हैं वे ही अभाव में जिन्दगी बसर कर रहे हैं और उनकी कमाई को लूटकर ऐश कर रहे हैं चंद बेईमान और लुटेरे लोग। इसी को कहते हैं "धक्का खाय पुजारी मजा करे गिरधारी"!

सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि ईमानदारी के साथ अपना काम करने वाले के पास, जीवन भर मेहनत-मशक्कत करने के बावजूद भी, उतना ही रुपया आ पाता है जितने में उसके परिवार का निर्वाह हो सके, अपना खुद का एक मकान बनवाने के लिए उसे फायनेंस का सहारा लेना पड़ता है जबकि चोरी-बेईमानी करने वाले लुटेरे अतुल सम्पत्ति के मालिक हैं।

Friday, June 17, 2011

खरबपति मैं सदा रहूँ भले देश बिक जाय

रुपया...

जो सबको नाच नचाती है!

कोई बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता है। किसलिए?

ढेर सारा रुपया कमाने के लिए!

कोई पढ़-लिख कर ऊँचा से ऊँचा ओहदा पाना चाहता है। किसलिए?

ढेर सारा रुपया कमाने के लिए!

जिसे देखो ढेर सारा रुपया पाने के लिए पागल है।

इस रुपये को यदि कुत्ते के सामने रख दें तो वह उसे सूँघेगा तक नहीं पर इसी रुपये के लिए आदमी कुछ भी करने के लिए तैयार है - चोरी, बेईमानी, रिश्वतखोरी, एक दूसरे का गला काटना, खून कर कर देना.....

रुपया कमाने में कोई बुराई नहीं है बल्कि कहा जाए तो जीवन निर्वाह के लिए रुपया कमाना जरूरी भी है क्योंकि रुपये के बिना न तो आदमी पेट की आग बुझा सकता है और न तन ढकने के लिए कपड़ा ही प्राप्त कर सकता है। पर पेट की आग बुझाने, तन ढकने आदि के लिए एक सीमा के भीतर रुपये की जरूरत होती है न कि ढेर सारे रुपये की -

साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय॥

तो ढेर सारा रुपया पाने का यह हवस क्यों? यह पागलपन क्यों?

ऐसी बात नहीं है कि बहुत सारा धन कमाने की हवस कोई नई बात हो, ऐसी हवस का होना हमेशा से ही चला आ रहा है। रावण ने विपुल सम्पदा प्राप्त करने के लिए देवता, गन्धर्व आदि को बलपूर्वक प्रताड़ित किया था, यहाँ तक कि अपने भाई कुबेर की सारी सम्पत्ति, जिसमें पुष्पक विमान भी सम्मिलित था, छीन ली थी। ऐसे ही दुर्योधन ने पाण्डवों पर अत्याचार किया था।

किन्तु प्राचीनकाल में ऐसे हवस वाले व्यक्तियों की संख्या नगण्य थी क्योंकि ऐसे लोगों को कुबुद्धि और दुराचारी की संज्ञा प्राप्त थी। अधिकतर लोग उतने ही धन से सन्तुष्ट रहा करते थे जितने में उनका गुजर-बसर हो जाए।

किन्तु ज्यों-ज्यों कालचक्र घूमता गया त्यों-त्यों ऐसे हवस वाले लोगों की संख्या अधिक से अधिक होती गई। यद्यपि हमारे देश में इस प्रकार के हवस वाले लोगों की संख्या नहीं के बराबर थी फिर भी इस हवस का सबसे बड़ा शिकार हमारा देश बना क्योंकि दूसरे देशों के लुटेरों ने इस देश में आकर हमें लूटना शुरू कर दिया। इस देश के चार करोड़ लोगों का निर्मम वध करके चंगेज खान ने सिर्फ सोना बटोरा और उसे घोड़ों पर लाद कर अपने देश पहुँचा दिया। गज़नी का महमूद ने सोने तथा हीरे जवाहिरात के लिए इस देश को पदाक्रान्त किया। पुर्तगालियों नें जी भर कर इस देश से सोना लूट कर अपने देश पहुँचा दिया। किन्तु इतनी लूट के बावजूद भी भारत की धन-सम्पदा अकूत ही रही, किंचित मात्र भी कमी नहीं आई भारत के वैभव में। विश्व का सर्वाधिक धनाड्य देश था भारत जिसे संसार सोने की चिड़िया के नाम से जानता था।

भारत को कंगाल बनाया तो अंग्रेजों ने। भारत की समस्त सम्पदा को लूट कर अपने देश में पहुँचा दिया और वे मालामाल बन गए। यदि भारत का धन इंग्लैंड में न गया होता तो उनके एक भी कल-कारखाने न खुल पाते। उनके यहाँ विकास की गंगा कभी भी न बह पाती।

किन्तु भारत की कंगाली कभी भी अधिक समय तक नहीं रही। वह भारत भारत ही क्या जो दरिद्र और कंगाल हो! यही कारण है कि आज भी भारत माता के पास कुछ भी कमी नहीं है। अपनी दरिद्रता से पूरी तरह से उबर गया हमारा देश। भारत को आज विश्व के सबसे बड़े बाजार के रूप में देखा जा रहा है। एक बार फिर से विश्व के सर्वाधिक धनाड्य देश बनने की क्षमता है हमारे देश में। किन्तु अब हमारे देश को उसके कपूत ही लूट रहे हैं सैकड़ों लाखों रुपयों को इन कपूत लुटेरों ने विदेशों में भेज कर रख दिया है।

किसी को इतना अधिक रुपये की जरूरत क्यों हो जाती है कि उसे वह अपने देश में ही न रख सके, विदेशों में जमा करने की नौबत आ जाए?

विदेशों में जमा रुपए से आखिर किसका भला हो सकता है? देश और समाज का भला तो हो ही नहीं सकता, हाँ उन रुपयों से विदेशी बैंक और विदेशी सरकार का अवश्य ही भला होता है।

यदि विदेशों में जमा ये रुपये वापस देश में आ जाएँ तो क्या नहीं हो सकता? शिक्षा के इतने सारे केन्द्र स्थापित हो जाएँ कि कोई भी निरक्षर न रहे, कृषि के क्षेत्र में ऐसी उन्नति हो जाए कि कभी किसी किसान को आत्महत्या करने की नौबत ही न आए, चिकित्सा इतनी सुलभ हो जाए कि कभी कोई व्यक्ति अस्वस्थ रहे, बेरोजगारी का तो नामोनिशान मिट जाए।

किन्तु कैसे वापस आएँगे ये रुपये? कौन वापस लाने देगा इन्हें? रावण के दुराचारों का अन्त तो श्री राम ने कर दिया, कौरवों को उनके अत्याचारों का दण्ड दिलवाने के लिए श्री कृष्ण आ गए, पर आज के भ्रष्टाचारियों के मुखौटे हटा कर उनके घिनौने रूप को कौन सामने लाएगा? यदि कोई सामने आए भी तो क्या सरकार उसे सामने आने देगी? आज की सरकार तो चुनी गई है भारत की जनता के द्वारा किन्तु उसे उसी जनता के हित की परवाह नहीं है, परवाह है तो उन चन्द स्वार्थी लोगों के स्वार्थ की जिनका तो सिद्धान्त है -

साईं मैं खाता रहूँ अन्य भूख मर जाँय।
खरबपति मैं सदा रहूँ भले देश बिक जाय॥

Monday, June 13, 2011

क्या महत्वपूर्ण है - एक अरब बीस करोड़ लोगों का हित या एक करोड़ लोगों का स्वार्थ?

सन् 1942 में विख्यात निर्माता निर्देशक महबूब खान ने एक फिल्म बनाई थी "रोटी"। फिल्म का नायक लक्ष्मी दास (चन्द्रमोहन) लोगों को लूटकर सोने के रूप में बेहिसाब धन इकट्ठा कर लेता है। अपराधी के रूप में जब वह फँस जाता है तो वह भाग कर एक रेगिस्तान में चला जाता है जहाँ पर उसे पता चलता है कि उसके पास बेहिसाब सोना तो है किन्तु खाने के लिए एक रोटी तक नहीं है। उस फिल्म को अंग्रेज सरकार ने बैन कर दिया था क्योंकि उन्होंने स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था कि फिल्म का हीरो लुटेरे अंग्रेजों का प्रतीक है।

अंग्रेज सरकार के द्वारा फिल्म रोटी को बैन करना उसमें निहित सन्देश को कुचल देना ही था। यह तो सभी जानते हैं कि अंग्रेज लुटेरे थे और उन्होंने हमारे देश को बुरी तरह से लूटा। उन लुटेरों का फिल्म रोटी को बैन कर देना तो समझ में आता है किन्तु हमारी आज की सरकार विदेशों में जमा किए गए लूट के धन को वापस देश में लाने की हर मुहिम को कुचल देने के लिए क्यों कटिबद्ध है? क्या आज की सरकार देश की समृद्धि और विकास नहीं चाहती? यदि विदेशों में जमा काले धन की विशाल राशि वापस देश में आ जाए तो क्या उस धन से करोड़ों देशवासियों का कल्याण नहीं होगा?

भारत के एक अरब इक्कीस करोड़ लोगों में से आखिर कितने लोग ऐसे होंगे जिन्होंने विदेशों में अपनी काली कमाई जमा कर रखी है? ऐसे लोगों की संख्या अधिक से अधिक एक करोड़ ही होगी। तो क्यों आज की सरकार भारत के एक अरब बीस करोड़ जनता के हित को अनदेखा कर उन एक करोड़ लोगों के स्वार्थ की चिन्ता कर रही है?

Friday, June 3, 2011

खान अकादमी (Khan Academy) - ई-लर्निंग के लिए एक मुफ्त प्लेटफॉर्म

इंटरनेट की असंख्य सुविधाओं में से एक महत्वपूर्ण सुविधा है ई-लर्निंग। याने कि अब कुछ सीखने के लिए आपको पाठशाला की चारदीवारी से घिरी कक्षा में, जहाँ पर कोई शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर चाक से लिखकर सिखाया करता है, कैद होने की आवश्यकता नहीं रह गई है। अब आप अपने घर में ही अपने इंटरनेट से कनेक्टेड कम्प्यूटर के समक्ष बैठ कर कोई ई-लर्निंग साइट खोलकर कुछ भी सीख सकते हैं। खान अकादमी भी एक ई-लर्निंग साइट है जहाँ पर कि सीखने के लिए अनेक विषयों के मुफ्त व्हीडियो पाठ उपलब्ध हैं। ई लर्निंग के इस मुफ्त प्लेटफॉर्म में गणित जैसे शुष्क विषय को सीखने के लिए इतने रोचक प्रकार के व्हीडियो पाठ हैं कि कोई भी व्यक्ति बड़े ही आसानी के साथ गणित सीख सकता है।

खान अकादमी के लाइब्रेरी में साधारण अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित से लेकर गणित त्रिकोणमिति, केलकुलस आदि तक के रोचक पाठ उपलब्ध हैं। इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, गणित.... सभी विषय सम्मिलित हैं खान अकादमी में। वास्तव में यह अकादमी विश्व स्तर का ई-लर्निंग सेन्टर हैं जहाँ पर कोई भी व्यक्ति बिल्कुल मुफ्त में कुछ भी सीख सकता है।

खान अकादमी के स्थापना की कहानी बड़ी रोचक है। इसके संस्थापक समलमान खान नामक व्यक्ति हैं। हुआ यह कि एक बार सन् 2004 में सलमान खान की नाडिया नामक भतीजी को गणित विषय में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अतः उसने सलमान खान से गणित समझाने के लिए कहा। चूँकि सलमान खान और नाडिया अलग-अलग स्थानों में निवास करते थे, सलमान खान ने गणित समझाने के लिए याहू मेसेन्जर तथा नोटपैड का सहारा लिया। इसके बाद खान के अन्य रिश्तेदारों से भी कुछ विषयों को समझाने के लिए अनुरोध आने लग गए। खान को लगा कि उनके इस प्रकार से विषयों को समझाने का लाभ अन्य लोगों को भी मिल सकता है। अतः उन्होंने अलग-अलग विषयों के विभिन्न व्हीडियो पाठ बना कर यू ट्यूब में डालना आरम्भ कर दिया। कुछ ही समय में लोगों ने उनके पाठों को यू ट्यूब में ढूँढ निकाला और वे पाठ आश्वर्यजनक रूप से लोकप्रिय होने लगे। दिसम्बर 2009 तक तो यू ट्यूब में प्रतिदिन उनके लगभग35,000 व्हीडियो पाठ देखे जाने लगे।

आज खान अकादमी में विभिन्न विषयों के  2,300 से भी अधिक व्हीडियो पाठ उपलब्ध हैं।

 
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