Sunday, January 1, 2012

फिर एक नया साल आएगा और फिर नई उम्मीदें जागेंगीं

आज से साल भर पहले आज के ही दिन अर्थात् 1 जनवरी 2011 को हमने उमंग और उल्लास के साथ नये साल का स्वागत् किया था। आज उस वाले नये साल का अवसान हो चुका है। आज हम फिर से एक नये साल अर्थात 2012 का उसी उमंग और उल्लास के साथ स्वागत् कर रहे हैं और आज से ठीक एक साल के बाद इस नये साल का भी अवसान हो चुका होगा। यही प्रकृति का नियम है, जिस किसी का भी उदय होता है उसका अवसान होना भी अवश्यम्भावी है।

यदि हम याद करें याद आयेगा कि पिछले साल अर्थात 2011 के स्वागत् करने के साथ ही हमने उससे बहुत सारी उम्मीदें भी बाँध ली थीं और यह सोच कर खुश थे कि वह नया साल हमारी उन उम्मीदों को पूरी कर देगा। समय बीतने के साथ ही वह साल हमारे लिये पुराना होने लगा और हम उन उम्मीदों को भी भूलते गए। और अन्ततः 2011 के चले जाने तक हम उन सारी उम्मीदों को भूल गए। अब 2012 के इस नये साल में फिर से उम्मीदों का वही सिलसिला शुरू हो गया,  2012 के समाप्त होते तक हम फिर इन उम्मीदों को भूल जाएँगे। फिर एक नया साल आएगा और फिर नई उम्मीदें जागेंगीं, उस नये साल के जाते तक हम फिर हम उन उम्मीदों को भूल जाएँगे। यह चक्र न जाने कितनी सदियों से चला आ रहा है और न जाने कब तक चलता रहेगा। पर यह भी सच है कि यदि नई उम्मीदें आदमी के भीतर ना जागें तो उसका जीना दूभर हो जाएगा। हर नया साल कुछ दे या न दे पर मनुष्य के जीवन को आसान बनाने के लिए उम्मीदें अवश्य देता है, यह बात अलग है कि वह उन उम्मीदों को पूरा करता है या नहीं।

चलते-चलते


नया साल तुम क्या लाये हो?

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

नया साल तुम क्या लाये हो?
विश्व-शान्ति है क्या तुममें?
या उर में विस्फोट छियाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

उल्लास नया है,
आभास नया है,
पर थोड़े दिन के ही खातिर,
फिर तो दिन और रात बनेंगे
बदमाशी में शातिर
वर्तमान में तुम भाये हो,
नया साल तुम क्या लाये हो?

असुर न देव बनेंगे,
जो जो हैं वे वही रहेंगे,
शोषण कभी न पोषण बनेगा
रक्त पियेगा बर्बर मानव
जो चलता था वही चलेगा।
फिर क्यों जग को भरमाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

पिछला वर्ष गया है,
आया समय नया है।
क्या भीषण आघातों से
मानवता का किला ढहेगा?
बोलो, तुम क्यों सकुचाये हो?
नया साल तुम क्या लाये हो?

(रचना तिथिः 01-01-1981)
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