Sunday, January 8, 2012

वर्ष 1925 से अब तक सोने की कीमतें ऐसे बढ़ी हैं

स्वर्ण....कंचन....
कनक....

क्या ही विचित्र वस्तु है यह सोना! देखते ही इसे पाने की इच्छा होने लगती है और पाते ही इसका नशा चढ़ने लगता है। अन्य नशीली वस्तुओं का नशा तो उसे खाने या पीने के बाद चढ़ता है पर सोने का नशा उसे पाते ही चढ़ने लगता है; इसीलिए तो कहा है -





"कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय।
वे खाए बौरात हैं ये पाए बौराय॥"

यह सोना जितना लुभावना है, उतना ही क्रूर भी है। न जाने इसने कितनी हत्याएँ करवाई हैं, न जाने कितने युद्ध लड़े गए हैं इसके लिए। न जाने कितने भाइयों ने भाइयों की, पतियों ने पत्नियों की, मित्रों ने मित्रों की हत्या कर दी है इस सोने के लिए।

फिर भी यह सोना आदिकाल से अब तक मनुष्यों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बना चला आ रहा है। कैसी भी कीमत देकर लोग इस सोने को पाना चाहते हैं। इसी कारण से सामान्यतः सोने की कीमत साल दर साल बढ़ती ही चली जाती है। मेरी दादी माँ बताती थीं कि उन्होंने मेरे पिताजी की शिक्षा के लिए अठारह रुपये तोले की कीमत में सोना बेचा था। आज तो दस ग्राम सोने, जो कि तोले से भी कम मात्रा है, की कीमत रु.27000/- से भी ऊपर पहुँच गई है।

सोने तथा इसकी कीमत पर पोस्ट लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया मेरे हिन्दी वेबसाइट के स्नेही पाठक श्री रतन लाल श्रीवास्तव जी ने, जिन्होंने मुझे वर्ष 1925 से 2011 तक की सोने की कीमतों का चार्ट उपलब्ध करवाया। श्रीवास्तव जी इलाहाबाद के निवासी हैं किन्तु वर्तमान में चण्डीगढ़ में कार्यरत हैं। नीचे प्रस्तुत है श्रीवास्तव जी द्वारा भेजा गया सोने की कीमतों के आकड़े वाला चार्ट -

पोस्ट के आरम्भ में मैंने सोने के तीन और पर्यायवाची शब्द दिए हैं किन्तु संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार सोने के नाम हैं, जो इस प्रकार हैं -


  • सुवर्ण
  • कनक
  • हिरण्य
  • हेम
  • हाटक
  • तपनीय
  • शातकुम्भ या शातकौम्भ
  • गांगेय
  • भर्म
  • कर्बुर या कर्बूर
  • चामीकर
  • जातरूप
  • महारजत
  • काञ्चन
  • रुक्म
  • कार्तस्वर
  • जाम्बूनद
  • अष्टापद
चलते-चलते

"सुवरन को खोजत फिरै कवि व्यभिचारी चोर।"

उपरोक्त पंक्ति श्लेष अलंकार का एक सुन्दर उदाहरण है जिसमें "सुवरन" शब्द के तीन अर्थ हैं। आप समझ ही गए होंगे कि कवि सुन्दर शब्दों (सुवरन) को, व्यभिचारी सुन्दर स्त्री (सुवरन) को और चोर सोने (सुवरन) को खोजता फिरता है।
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