Monday, March 12, 2012

अपने इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर क्या अजीब-सा नहीं लगता?

हमारे इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि अहिंसा, महात्मा गांधी, कांग्रेस आदि के कारण अंग्रेजों ने भारत को छोड़ा और हमारा देश स्वतन्त्र हुआ। यह सब पढ़कर बड़ा अजीब-सा लगता है मुझे। सोचने लगता हूँ कि क्या अहिंसा और सत्याग्रह के कारण डाकू, स्वार्थी, क्रूर, कुटिल, अत्याचारी, हत्यारे, निर्दय, अवसरवादी, अतिमहत्वाकांक्षी अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन हो गया? मुझे विश्वास नहीं हो पाता, और शायद न कभी होगा, कि ऐसा हुआ था। यही कारण है कि इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर मुझे अजीब-सा लगने लगता है। क्या आपको नहीं लगता ऐसा? क्या आप विश्वास करते हैं कि केवल एक व्यक्ति की अगुवाई में एक पार्टी अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से एक परतन्त्र देश को स्वतन्त्र करा सकता है?

जिस काल में अंग्रेजों ने भारत (1947) छोड़ा लगभग उसी काल में उन्हें अपने न्यू जीलैंड  (1947), बर्मा (1948), सीलोन (1948) Palestine (1948) आदि उपनिवेशों को भी छोड़ना पड़ा था। यह तो हो ही नहीं सकता कि अहिंसा और सत्याग्रह का प्रभाव अंग्रेजों पर इतना अधिक पड़ा हो को भारत के अलावा उन्होंने अपने उपरोक्त उपनिवेशों को भी छोड़ दिया हो। स्पष्ट है कि अंग्रेजों के समक्ष अपने उपनिवेशों को छोड़ने की विवशता थी। वास्तविकता यही है कि द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला करके रख दिया था और उसके कारण अंग्रेज अपने उपनिवेशों में अपना नियन्त्रण रख पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। इस विवशता के चलते उन्हें निश्चय करना पड़ा कि धक्के देकर निकाले जाने की अपेक्षा सत्ता छोड़कर इज्जत के साथ निकल लेना ही अधिक अच्छा है।

भारत में तो उनकी स्थिति और भी खराब हो गई थी। सेना उनके पास थी नहीं, वे तो स्थानीय सैनिकों को वेतन देकर उन्हीं के बल पर राज्य कर रहे थे। किन्तु समय बीतने के साथ स्थानीय सैनिकों में जागरूकता आ गई थी जिसके कारण अंग्रेजों के लिए भारत में सैनिकों का मिल पाना बहुत मुश्किल कार्य हो गया था। यदि अग्रेज भारत को न छोड़ने का निश्चय करते तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज उन्हें रौंद कर रख देती। वैसे भी अंग्रेज कुटिल अवश्य थे किन्तु बुद्धिमान भी थे, वे जानते थे कि किसी भी देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता, एक न एक दिन उन्हें आजाद करना ही पड़ेगा। भारत को आसानी के साथ छोड़ देने के निश्चय के पीछे उनकी यह बुद्धिमत्ता भी एक कारण थी।

किन्तु इतिहास की पुस्तकों में अंग्रेजों के भारत छोड़ने का पूरा-पूरा श्रेय व्यक्तिविशेष, दलविशेष, अहिंसा और सत्याग्रह को दे दिया गया। क्या यह अजीब नहीं लगता आपको?

6 टिप्पणियाँ:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मार्केट स्ट्रेटेजी थी ये सब-एक बंदे को प्रोजेक्ट करना.

जाटदेवता संदीप पवाँर said...

सच कितना भी छुपा लो वो छुपा नहीं रह सकता है।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुतों का योगदान था और अंग्रेजों की अपनी समस्या भी..

नारायण भूषणिया said...

आपका यह पोस्ट बहुत सही है.कांग्रेस ने झूठ को ही इतिहास बनाकर परोस दिया है इस देश में. सच लिखने के लिए बधाई .नारायण भूषणिया

शिवम् मिश्रा said...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बंद करो बक बक - ब्लॉग बुलेटिन

नवज्योत कुमार said...

जी हा आपने बिल्कुल सही लिखा है.
अंग्रेजो ने भारत को इसलिए आजाद किया क्योंकि वह एक तो युद्ध के कारण खोखला हो चुकी थी, दूसरा ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन हुआ था.
भारत में अब ज्यादा कुछ बचा नहीं था सभी कुछ तो वह लुट चुके थे. ऊपर से बगावत हो रही थी तो उन्होंने देश को लाचार अवस्था में आजाद कर दिया.

 
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