Monday, December 24, 2012

जब मुझे बूढ़े से बच्चा बनना पड़ा

इस पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर शायद आप सोच रहे होंगे कि ये जी.के. अवधिया क्या बेपर की हाँक रहा है? भला आदमी बूढ़े से बच्चा कैसे बन सकता है?

 यह तो हम सभी जानते हैं कि जो समय बीत गया उसे फिर से वापस लाया नहीं जा सकता। समय बीतने के साथ ही उम्र भी बढ़ते जाती है, और बीते हुए उम्र को भी फिर से वापस नहीं लाया जा सकता। पर बीते चुके उम्र में कल्पना के सहारे जाया तो जा सकता है।

बात यह हुई कि मेरे मित्र गुप्ता जी ने मुझसे कहा कि उनके पुत्र, जो कि कक्षा पीपी२ में पढ़ता है, के स्कूल की पत्रिका छप रही है और वे अपने पुत्र के नाम से कु सामग्री उसमें छपने के लिए देना चाहते हैं, अतः मैं उन्हें या तो नेट से कुछ खोज कर दूँ या स्वयं कुछ लिख कर दूँ। मैंने सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ लिख लिया जाए। पर मेरी सोच तो बूढ़ी हो चुकी है क्योंकि मैं बूढ़ा आदमी हूँ। इसलिए मैंने अपनी कल्पना के सहारे, अपने बचपन में वापस जाकर, स्वयं को बच्चा बनाया और उन्हें यह लिखकर दियाः

क्रिसमस की छुट्टी

क्रिसमस की छुट्टी हैं आईं।
खुशियों की ये लहरें लाईं॥
चुन्नू मुन्नू मेरे घर आए।
सब मिलकर हम नाचे गाये॥

मम्मी पापा प्यार जताते।
अपने संग पिकनिक ले जाते॥
खुशियों के हम गीत हैं गाते।
मामा मेरे ढोल बजाते॥

चह चह चहके चिड़िया रानी।
दाना चुगाती इसे है नानी॥
बहना मेरी बड़ी सयानी।
होकर बड़ी ये बनेगी रानी॥

कल कल करती नदिया बहती।
झर झर बहता झरना॥
नदिया झरना कहते हमसे।
सीखो हमसे आगे बढ़ना॥

तो ऐसे बनना पड़ा मुझे बूढ़े से बच्चा।
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