मैं फिल्म "तीन देवियाँ" की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तो उन तीन देवियों की बात कर रहा हूँ जो कि नेता, साहब, थानेदार, क्लर्क, छात्र, महिलाएँ, गृहस्थ, पत्नी, मुन्ना और कुत्ता के साथ पाई जाती हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि ये बुड्ढा आज जरूर सठिया गया है तभी कुछ भी ऊल-जलूल बके जा रहा है। हो सकता है कि मैं सठिया गया होऊँ पर साहब मैं ऊल-जलूल बक नहीं रहा हूँ। मैं तो बात कर रहा हूँ जनाब स्माइल 'जगदलपुरी' की रचना "तीन देवियाँ" की। लीजिये आप भी पढ़ियेः
तीन देवियाँ
स्माइल 'जगदलपुरी'
नेता
खादी नित पहना करें, सूरत है मनहूस।
तीन देवियाँ साथ हैं, चंदा, थैली, घूस॥
साहब
रिश्वत खाकर बढ़ गया, बड़े साब का पेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चाय, पान सिगरेट॥
थानेदार
छात्र पुलिस संघर्ष में, टूट गई है टाँग।
तीन देवियाँ साथ हैं, व्हिस्की, गाँजा, भाँग॥
क्लर्क
बहे पसीना देह से, तनिक न आवे चैन।
तीन देवियाँ साथ हैं, फाइल, चिट्ठी, पैन॥
छात्र
पीट दिया आचार्य को, करी खोपड़ी ठूँठ।
तीन देवियाँ साथ हैं, हाकी, पत्थर, बूट॥
महिलाएँ
फिल्म देखने को चली, महिलाओं की टीम।
तीन देवियाँ साथ हैं, रूज़, पाउडर, क्रीम॥
गृहस्थ
दर्जन भर बच्चे हुये, किस्मत का है खेल।
तीन देवियाँ साथ हैं, राशन, लकड़ी, तेल॥
पत्नी
घर आने में रात को, पति हो जायें लेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चिमटा, बेलन, प्लेट॥
मुन्ना
भाग गये स्कूल से, देख पिता जी दंग।
तीन देवियाँ साथ हैं, मंझा, डोर, पतंग॥
कुत्ता
मेम साब को देखकर, फौरन पूँछ हिलाय,
तीन देवियाँ साथ हैं, हलवा, रोटी, चाय॥
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Saturday, January 9, 2010
तीन देवियाँ
लेबल:
इस्माइल जगदलपुरी,
तीन देवियाँ,
थानेदार,
देवियाँ,
नेता,
पत्नी,
महिलाएँ
Friday, December 4, 2009
विचित्र जीव है ये पत्नी नाम की प्राणी
आपकी एक एक बात का लेखा जोखा रहता है इसके पास। बहुत विचित्र जीव है ये पत्नी नाम की प्राणी। पति अपने बारे में जितना नहीं जानता उससे अधिक पत्नी जानती है उसके विषय में। मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये!
शादी के पहले ऑफिस जाते समय हमारी माता जी हमारा टिफिन तैयार करती थीं। हमारी खुराक से अधिक खाना रहता था उसमें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रायः प्रत्येक ऑफिस में एक न एक सहकर्मी जरूर ऐसा होता है जो कभी भी अपना टिफिन नहीं लाता पर खायेगा जरूर दूसरों की टिफिन से। हमारे टिफिन का अतिरिक्त खाना हमारे एक ऐसे ही सहयोगी के काम आता था। शादी होने के बाद कुछ दिनों तक तो माता जी ही टिफिन तैयार करती रहीं फिर धीरे से इस कार्यभार को हमारी श्रीमती जी ने अपने हाथों में ले लिया। लंच समय में जब हमने टिफिन खोला तो देखा पाँच पराठों की जगह तीन ही पराठे और चाँवल भी रोज की अपेक्षा आधा। इधर हमारे टिफिनविहीन मित्र भी तत्काल आ धमके। हमारी खाना खाने की गति बहुत धीमी है। हम जब तक एक पराठा खतम करते, मित्र ने दो पराठे उदरस्थ कर लिया। चाँवल का भी अधिकतम हिस्सा उनके ही उदर में समा गया। हम तो रह गये भूखे।
ऑफिस से आने पर श्रीमती जी से जब कहा कि खाना कम क्यों रखा था तो जवाब मिला, " कम? कम कहाँ था? क्या मैं नहीं जानती कि आप कितना खाते हैं? मैंने तो अपने हिसाब से कुछ अधिक ही खाना रखा था। लगता है कि आपका खाना दूसरे लोग खा जाते हैं।"
हमने कहा, "हाँ भइ, अब कोई एकाध रोटी खा ले तो क्या फर्क पड़ता है? मना करते अच्छा भी तो नहीं लगता।"
वे बोलीं, "क्यों अच्छा नहीं लगता? क्या आपके मित्रों को तनखा नहीं मिलती? वो अपना खाना खुद क्यों नहीं लाते? अब से आपका इस प्रकार से रोज रोज दूसरों को खाना खिलाना बिल्कुल नहीं चलेगा।"
बताइए अब हम क्या कहते? इधर ऑफिस में हमारे मित्र को तो आदत लगी हुई थी रोज हमारे साथ खाने की, उन्हें क्या पता कि अब हमें भूखे मरना पड़ता है। अन्ततः दो-तीन दिन बाद कह ही दिया, "यार, तुम अपना खाना लाया करो नहीं तो नजदीक के भोजनालय में चला जाया करो।"
इस प्रकार से श्रीमती जी ने हमसे वह कहलवा लिया जो कि शादी के पहले हम कभी भी नहीं कह सकते थे।
तो मित्रों, पत्नी अपने पति की एक-एक बात, एक-एक आदत को अच्छी तरह से जानती है। आप कब झूठ बोल रहे हैं, कब पीकर आये हैं, किस दिन आपकी सेलरी मिलती है, कब ओव्हरटाइम का पेमेन्ट होता है, सब कुछ जानती है वह।
अक्सर पति त्रस्त रहते हैं पत्नी के उनके बारे में सभी कुछ जानने की वजह से। वे समझते हैं कि पति के लिये पत्नी "साँप के मुँह में छुछूंदर" है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते। पर पत्नियाँ जहाँ एक तरफ पतियों को अपनी मुट्ठी में रखने का भरपूर प्रयास करती हैं वहीं दूसरी तरफ पति पर आये किसी भी विपत्ति को दूर करने के लिये जी जान तक लगा देती हैं।
जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत सारे तकरार, नोक-झोंक चलते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि वे दोनों ही एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। पत्नी पति की प्रेरणा होती है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इसके और सबसे बड़ा उदाहरण तो तुलसीदास जी का है। यदि रत्नावली ने यह न कहा होता किः
"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"
तो आज हम रामचरितमानस से ही वंचित रहते।
श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सही ही लिखा हैः
यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!
(पूरी कविता यहाँ पढ़ें - पत्नी को परमेश्वर मानो!)
तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास, घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?
एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली वही होती है!
'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥
चलते-चलते
पति, "तुम मेरे रिश्तेदारों की बनिस्बत अपने रिश्तेदारों को ज्यादा प्यार करती हो।"
पत्नी, "गलत! मैं अपनी सास से अधिक तुम्हारी सास को प्यार करती हूँ।"
शादी के पहले ऑफिस जाते समय हमारी माता जी हमारा टिफिन तैयार करती थीं। हमारी खुराक से अधिक खाना रहता था उसमें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रायः प्रत्येक ऑफिस में एक न एक सहकर्मी जरूर ऐसा होता है जो कभी भी अपना टिफिन नहीं लाता पर खायेगा जरूर दूसरों की टिफिन से। हमारे टिफिन का अतिरिक्त खाना हमारे एक ऐसे ही सहयोगी के काम आता था। शादी होने के बाद कुछ दिनों तक तो माता जी ही टिफिन तैयार करती रहीं फिर धीरे से इस कार्यभार को हमारी श्रीमती जी ने अपने हाथों में ले लिया। लंच समय में जब हमने टिफिन खोला तो देखा पाँच पराठों की जगह तीन ही पराठे और चाँवल भी रोज की अपेक्षा आधा। इधर हमारे टिफिनविहीन मित्र भी तत्काल आ धमके। हमारी खाना खाने की गति बहुत धीमी है। हम जब तक एक पराठा खतम करते, मित्र ने दो पराठे उदरस्थ कर लिया। चाँवल का भी अधिकतम हिस्सा उनके ही उदर में समा गया। हम तो रह गये भूखे।
ऑफिस से आने पर श्रीमती जी से जब कहा कि खाना कम क्यों रखा था तो जवाब मिला, " कम? कम कहाँ था? क्या मैं नहीं जानती कि आप कितना खाते हैं? मैंने तो अपने हिसाब से कुछ अधिक ही खाना रखा था। लगता है कि आपका खाना दूसरे लोग खा जाते हैं।"
हमने कहा, "हाँ भइ, अब कोई एकाध रोटी खा ले तो क्या फर्क पड़ता है? मना करते अच्छा भी तो नहीं लगता।"
वे बोलीं, "क्यों अच्छा नहीं लगता? क्या आपके मित्रों को तनखा नहीं मिलती? वो अपना खाना खुद क्यों नहीं लाते? अब से आपका इस प्रकार से रोज रोज दूसरों को खाना खिलाना बिल्कुल नहीं चलेगा।"
बताइए अब हम क्या कहते? इधर ऑफिस में हमारे मित्र को तो आदत लगी हुई थी रोज हमारे साथ खाने की, उन्हें क्या पता कि अब हमें भूखे मरना पड़ता है। अन्ततः दो-तीन दिन बाद कह ही दिया, "यार, तुम अपना खाना लाया करो नहीं तो नजदीक के भोजनालय में चला जाया करो।"
इस प्रकार से श्रीमती जी ने हमसे वह कहलवा लिया जो कि शादी के पहले हम कभी भी नहीं कह सकते थे।
तो मित्रों, पत्नी अपने पति की एक-एक बात, एक-एक आदत को अच्छी तरह से जानती है। आप कब झूठ बोल रहे हैं, कब पीकर आये हैं, किस दिन आपकी सेलरी मिलती है, कब ओव्हरटाइम का पेमेन्ट होता है, सब कुछ जानती है वह।
अक्सर पति त्रस्त रहते हैं पत्नी के उनके बारे में सभी कुछ जानने की वजह से। वे समझते हैं कि पति के लिये पत्नी "साँप के मुँह में छुछूंदर" है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते। पर पत्नियाँ जहाँ एक तरफ पतियों को अपनी मुट्ठी में रखने का भरपूर प्रयास करती हैं वहीं दूसरी तरफ पति पर आये किसी भी विपत्ति को दूर करने के लिये जी जान तक लगा देती हैं।
जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत सारे तकरार, नोक-झोंक चलते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि वे दोनों ही एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। पत्नी पति की प्रेरणा होती है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इसके और सबसे बड़ा उदाहरण तो तुलसीदास जी का है। यदि रत्नावली ने यह न कहा होता किः
"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"
तो आज हम रामचरितमानस से ही वंचित रहते।
श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सही ही लिखा हैः
यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!
(पूरी कविता यहाँ पढ़ें - पत्नी को परमेश्वर मानो!)
तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास, घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?
एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली वही होती है!
'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥
चलते-चलते
पति, "तुम मेरे रिश्तेदारों की बनिस्बत अपने रिश्तेदारों को ज्यादा प्यार करती हो।"
पत्नी, "गलत! मैं अपनी सास से अधिक तुम्हारी सास को प्यार करती हूँ।"
Monday, November 30, 2009
इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है - श्रीमती अवधिया
श्रीमती अवधिया उवाच:
"हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित भाषा को आपकी बुद्धि ग्रहण नहीं कर पाती इसलिये मुझे आपके ब्लोग की भाषा में ही आपसे वार्तालाप करना पड़ रहा है। आपकी स्मरण शक्ति मंद होते जा रही है। आपको मेरा कुछ ध्यान ही नहीं रहता। आप दिन-रात अपने ब्लोगिंग में ही लिप्त रहने लगे हैं। आप मुझ पर कटाक्ष करने वाले पोस्ट लिख-लिख कर अपना टीआरपी बढ़ाने लगे हैं। अब मैं आपकी अर्धांगिनी न रह कर केवल आपके टीआरपी बढ़ाने का साधन मात्र बन कर रह गई हूँ
हे गर्दभबुद्धि नाथ! तनिक स्मरण कीजिये कि मैंने विवाहपूर्व अतिसुन्दर, प्रसन्नवदन इंजीनियर लड़के के प्रणय-निवेदन को अस्वीकार करके आपका वरण किया था क्योंकि आप मेरी प्रिय सखी के अग्रज थे और मुझे विदित था कि आपको मेरी ही भाँति चलचित्र दर्शन में अनन्य रुचि है। विवाहोपरान्त आपने मुझे अनेक चलचित्रों के दर्शन करवाये किन्तु शनैः-शनैः चलचित्र-दर्शन की संख्या कम होने लगी। आज आप चलचित्रों पर पोस्ट तो लिखते हैं किन्तु अपनी इस प्राणप्रिया को चलचित्र-दर्शन करवाने में किंचित मात्र भी रुचि नहीं दर्शाते।
हे महापातकी पतिदेव! हमारे विवाह के पश्चात् आप मेरे दर्शन किये बिना व्याकुल रहा करते थे किन्तु लगभग एक वर्ष की अवधि व्यतीत होने पर आपको परस्त्री दर्शन में ही अधिक सुख की प्राप्ति होने लगी। आप कामजनित अधर्म में लिप्त हो गये। फिर भी मैं सहन करती रही। हे निष्ठुर! आप मेरे समक्ष ही मेरी सखियों से मृदु वार्तालाप करने में व्यस्त रहने लगे, फिर भी मैंने धैर्य ही धारण किया।
हे मूर्खाधिराज स्वामी! अब यह ब्लोगिंग आपको मुझसे दिन-प्रति-दिन दूर ले जाती जा रही है। वर्षों से आपने मुझे किसी चलचित्र का दर्शन नहीं करवाया है। किसी जलपानगृह में गये कितना समय व्यतीत हो चुका है यह मुझे स्मरण नहीं। मैंने बहुत सहन किया किन्तु अब और धैर्य धारण कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूँ। मेरा क्रोध अपनी चरमस्थिति में पहुँचते जा रहा है। आप यह समझने की भूल कदापि न करें कि मैं कैकेयी की भाँति कुपित होकर कोप-भवन में चली जाउँगी। मुझे अच्छी प्रकार से विदित है कि मेरे कोप-भवन चले जाने पर आप कदापि मुझे मनाने के लिये नहीं आने वाले हैं। मेरे कोप-भवन चले जाने से तो आप और भी प्रसन्न होकर अपने पोस्ट लिखने में व्यस्त हो जायेंगे। मैं आपको यह विदित करा देना उचित समझती हूँ कि मैं रामायण काल की नारी न होकर आधुनिक काल अर्थात् इक्कीसवीं सदी की नारी हूँ। यदि पति का सम्मान करना जानती हूँ तो पति के अहं को चूर-चूर करना भी मुझे अच्छी प्रकार से आता है।
अतः हे अज्ञानी आर्यपुत्र! आज रविवार के दिन यदि आपने मुझे चलचित्र-दर्शन नहीं करवाया तो मैं रणचण्डी का रूप धारण कर लूँगी, मेरे क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो जायेगी। मेरे उस क्रोध की ज्वाला से आपके इस कम्प्यूटर का कैसा विनाश होगा इस बात का अनुमान लगाने योग्य बुद्धि, आपकी मति के कुंद हो जाने के बाद भी, अभी भी आपके पास शेष बचा हैं।"
पत्नी के वचन सुनकर एवं रौद्ररूप देख कर भयभीत अवधिया ने तत्काल कम्प्यूटर बंद कर दिया और अपनी अर्धांगिनी को चलचित्र दर्शन करवाने की तैयारी आरम्भ कर दी।
चलते-चलते
मनाली के एक होटल के कमरे में ठहरी दो सहेलियों ने घूम कर आने के बाद अपने वस्त्र बदले। वस्त्र बदलते वक्त भूल से खिड़की खुली रह गई थी अतः परिणामस्वरूप एक को ठंड ने जकड़ लिया और एक को एक करोड़पति युवक ने।
"हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित भाषा को आपकी बुद्धि ग्रहण नहीं कर पाती इसलिये मुझे आपके ब्लोग की भाषा में ही आपसे वार्तालाप करना पड़ रहा है। आपकी स्मरण शक्ति मंद होते जा रही है। आपको मेरा कुछ ध्यान ही नहीं रहता। आप दिन-रात अपने ब्लोगिंग में ही लिप्त रहने लगे हैं। आप मुझ पर कटाक्ष करने वाले पोस्ट लिख-लिख कर अपना टीआरपी बढ़ाने लगे हैं। अब मैं आपकी अर्धांगिनी न रह कर केवल आपके टीआरपी बढ़ाने का साधन मात्र बन कर रह गई हूँ
हे गर्दभबुद्धि नाथ! तनिक स्मरण कीजिये कि मैंने विवाहपूर्व अतिसुन्दर, प्रसन्नवदन इंजीनियर लड़के के प्रणय-निवेदन को अस्वीकार करके आपका वरण किया था क्योंकि आप मेरी प्रिय सखी के अग्रज थे और मुझे विदित था कि आपको मेरी ही भाँति चलचित्र दर्शन में अनन्य रुचि है। विवाहोपरान्त आपने मुझे अनेक चलचित्रों के दर्शन करवाये किन्तु शनैः-शनैः चलचित्र-दर्शन की संख्या कम होने लगी। आज आप चलचित्रों पर पोस्ट तो लिखते हैं किन्तु अपनी इस प्राणप्रिया को चलचित्र-दर्शन करवाने में किंचित मात्र भी रुचि नहीं दर्शाते।
हे महापातकी पतिदेव! हमारे विवाह के पश्चात् आप मेरे दर्शन किये बिना व्याकुल रहा करते थे किन्तु लगभग एक वर्ष की अवधि व्यतीत होने पर आपको परस्त्री दर्शन में ही अधिक सुख की प्राप्ति होने लगी। आप कामजनित अधर्म में लिप्त हो गये। फिर भी मैं सहन करती रही। हे निष्ठुर! आप मेरे समक्ष ही मेरी सखियों से मृदु वार्तालाप करने में व्यस्त रहने लगे, फिर भी मैंने धैर्य ही धारण किया।
हे मूर्खाधिराज स्वामी! अब यह ब्लोगिंग आपको मुझसे दिन-प्रति-दिन दूर ले जाती जा रही है। वर्षों से आपने मुझे किसी चलचित्र का दर्शन नहीं करवाया है। किसी जलपानगृह में गये कितना समय व्यतीत हो चुका है यह मुझे स्मरण नहीं। मैंने बहुत सहन किया किन्तु अब और धैर्य धारण कर पाने में स्वयं को असमर्थ पा रही हूँ। मेरा क्रोध अपनी चरमस्थिति में पहुँचते जा रहा है। आप यह समझने की भूल कदापि न करें कि मैं कैकेयी की भाँति कुपित होकर कोप-भवन में चली जाउँगी। मुझे अच्छी प्रकार से विदित है कि मेरे कोप-भवन चले जाने पर आप कदापि मुझे मनाने के लिये नहीं आने वाले हैं। मेरे कोप-भवन चले जाने से तो आप और भी प्रसन्न होकर अपने पोस्ट लिखने में व्यस्त हो जायेंगे। मैं आपको यह विदित करा देना उचित समझती हूँ कि मैं रामायण काल की नारी न होकर आधुनिक काल अर्थात् इक्कीसवीं सदी की नारी हूँ। यदि पति का सम्मान करना जानती हूँ तो पति के अहं को चूर-चूर करना भी मुझे अच्छी प्रकार से आता है।
अतः हे अज्ञानी आर्यपुत्र! आज रविवार के दिन यदि आपने मुझे चलचित्र-दर्शन नहीं करवाया तो मैं रणचण्डी का रूप धारण कर लूँगी, मेरे क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित हो जायेगी। मेरे उस क्रोध की ज्वाला से आपके इस कम्प्यूटर का कैसा विनाश होगा इस बात का अनुमान लगाने योग्य बुद्धि, आपकी मति के कुंद हो जाने के बाद भी, अभी भी आपके पास शेष बचा हैं।"
पत्नी के वचन सुनकर एवं रौद्ररूप देख कर भयभीत अवधिया ने तत्काल कम्प्यूटर बंद कर दिया और अपनी अर्धांगिनी को चलचित्र दर्शन करवाने की तैयारी आरम्भ कर दी।
चलते-चलते
मनाली के एक होटल के कमरे में ठहरी दो सहेलियों ने घूम कर आने के बाद अपने वस्त्र बदले। वस्त्र बदलते वक्त भूल से खिड़की खुली रह गई थी अतः परिणामस्वरूप एक को ठंड ने जकड़ लिया और एक को एक करोड़पति युवक ने।
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