Friday, September 7, 2007

कलंक का अंत - 2

रचयिता : स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

- 2 -

खोह के आन्तरिक भाग में गुफा-द्वार की ओर से छन-छन कर प्रकाश बिखर रहा था। ऊबड़-खाबड़ दीवार पर अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र टंगे थे। उन भीषण आयुधों को देखकर दर्शकों के स्मृति-पटल पर वाल्मीकि का पूर्व जीवन साकार हो उठता था। एक ओर अधखुली आलमारी में से लूट का वैभव झाँक रहा था। दूसरी ओर दूध-सी श्वेत शय्या पर पूर्व परिचिति बालक निद्रावस्था में भी मुस्कुराता-सा सो रहा था। पलंग के पास ही एक बहुमूल्य कुर्सी पर गम्भीर मुद्रा में दिलेर सिंह विचार-मग्न बैठा था।
इस गुफा में दिलेर सिंह ने अपना अड्डा बना रखा था। इस समय उसकी आँखों में विभिन्न भाव उठते-मिटते जा रहे थे। भावों के उतार-चढ़ाव में उसकी मुद्रा कभी गम्भीर, कभी क्रोध से विकराल और कभी घृणा से परिपूर्ण हो जाती थी: मस्तिष्क के अचेतन कक्ष से एक-एक कर उसकी स्मृतियाँ अर्द्धचेतन कक्ष के मार्ग में से होकर चेतन कक्ष में साकार होती जा रही थीं। डाकू बनने से पहले कितना सम्पन्न था दिलेर सिंह और उसका परिवार! पत्नी भी थी और फूल सा नन्हा सा बच्चा। किन्तु-

एक दिन की भयानक रात.........!

रात काली चादर में सिमट कर मौत के सन्नाटे में सो रही थी। तारे अपने झिलमिलाते प्रकाश से रात्रि के भीषण अन्धकार को चीर देने का निष्फल प्रयास कर रहे थे। समस्त संसार प्राण-हीन-सा हो रहा था। दिलेर सिंह पत्नी सहित अपने घर के एक कमरे में चिन्ता-ग्रस्त व्यग्र होकर जाग रहा था। उसके बच्चे की तबीयत अनमनी थी। नींद में भी उसकी अशांति करवटें ले रही थी। सहसा बच्चा हृदय विदारक ध्वनि से रो उठा - रो क्या उठा, कराह ही रहा था। दिलेर सिंह - आज का डाकू और तब का सौजन्य-सुसज्जित सम्भ्रान्त जमींदार - शिशु को उठा, गोद में ले कमरे में इधर-उधर टहलने लगा। उसकी पत्नी आँखों से चुपचाप आँसू बहाती हुई व्याकुल बैठी थी। बच्चे की बेचैन बीमारी उसे अधीर कर रही थी।

धम्म, धम्म, धम्म

तीन नकाबपोश डाकुओं ने खिड़की में से कूद कर कमरे में प्रवेश किया। उनकी पस्तौल की नोक दिलेर सिंह के वक्ष पर थी।

"जो कुछ है वह सब दे दो। सुना है कि तुम इलाके में सबसे बड़े अमीर हो-" डाकुओं में से एक ने कहा।

दिलेर सिंह दिलेर था। डाकुओं की चुनौती पर वह आग-बबूला हो गया। वह अकेले ही तीनों डाकुओं के लिये पर्याप्त था किन्तु परिस्थिति कुछ नाजुक थी। उसके हाथ में उसका फूल-सा नन्हा बीमार बच्चा था, पलंग पर भयभीत थरथराती हुई उसकी पत्नी घबराहट में खोई जा रही थी। वह स्वयं तीन-तीन डाकुओं से घिरा था। फिर भी उसका राजपूती खून उबल पड़ा। शेर की तरह गरज उठा वह, "दुष्टों, शेर की माँद में घुस कर उसे ललकार रहे हो। ठहरो, अभी तुम्हारी लाशें तड़पती नजर आयेंगी।" और उन डाकुओं को पता ही नहीं चल पाया कि कब उसने उछल कर पलंग के पास जा कर बच्चे को पत्नी को सौंपा कैसे दीवार पर टंगी बन्दूक को निकाल कर एक डाकू को धराशायी भी कर दिया। अपने एक साथी की मृत्यु के साथ ही शेष दोनो डाकू सतर्क हो गये। उनमें से एक ने दिलेर सिंह की पत्नी पर गोली चलाई। वह ढेर हो गई। बच्चा उसके हाथ से छूटकर पलंग के पास ही गिर पड़ा। जब तक दिलेर सिंह गोली चलाता तब तक दूसरे डाकू ने बच्चे को कुचल कर रौंद किया। दिलेर सिंह की आँखों के आगे अन्धेरा छा गया। उसके हाथ से पिस्तौल छूट गई और चीख मार कर बेहोश गिर पड़ा। डाकुओं ने अपना काम किया। तिजोरी तोड़ी, गहने और नगद रुपये निकाले और चम्पत हो गये।

जीवन की मुस्कुराती लहरों पर मौत की भयानक शांति छा गई। घर उजड़ गया। चांद सदा के लिये मेघ में छिप गया। आँधी का झोंका महल गिराकर शांत हो गया। सचेत होने पर दिलेर सिंह वह दिलेर सिंह नहीं रहा। उसने पत्नी और बच्चे की लाश तक की चिन्ता न की। उन्हें ज्यों का त्यों छोड़कर वह बीहड़ वन में एक ओर चला गया। उसके हृदय की कोमलता को नैराश्य-जनित कठोरता ने समूल उखाड़ फेंका था।

इसके कुछ दिन बाद ही आसपास के प्रदेश में आतंक छा गया। सम्पन्न दिलेर सिंह अब डाकू दिलेर सिंह था। उसे आततायी डाकू अपना काल समझते थे, धनवान कट्टर शत्रु मानते थे और गरीब जनता उसे भगवान से भी अधिक श्रद्धा का पात्र समझती थी। डाकुओं से वह अपना बदला लेता, पूँजीपतयों से वह घृणा करता और निर्धनों को अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते हुये उनकी सहायता करता था - मानो वह आततायी डाकुओं के साथ वह निर्मम पूँजीपतियों का सर्वनाश कर अपनी पत्नी और नन्हे बच्चे की आत्मा की शांति के लिये महायज्ञ कर रहा हो जिसमें देवताओं के स्थान पर जीते-जागते दरिद्र नारायण को यज्ञ भाग दिया जाता हो। उसकी ही विचार-धारा के थोड़े से और लोग उसके साथ आ मिले थे जिससे छोटी सी टोली बन गई थी। दिलेर सिंह - सरकारी बुद्धि के अनुसार डाकू दिलेर सिंह - को जिंदा या मुर्दा पकड़ने में सरकार ने कोई कसर बाकी न रखी। काँटे से काँटा निकालने की परिपाटी के अनुसार संग्राम सिंह, सब-इंसपेक्टर, को दिलेर सिंह के पीछे लगा दिया गया था। वह भी राजपूत और सरकार का वफादार नौकर था। संग्राम सिंह ने अनेक उपाय किये किन्तु दिलेर सिंह ने सभी को निष्फल कर दिया।

दिलेर सिंह के विचारों खोया हुआ ही था कि बच्चे की नींद टूटी। उसके रोने से दिलेर सिंह चौंक उठा। उसे ऐसा लगा मानो बरसों पहले का उसका वही अपना बच्चा रो रहा हो। अतीत जीवन के विचारों के संसार को छोड़ कर वह वर्तमान में आ पहुँचा। दौड़कर उसने बच्चे को हृदय से लगा लिया और स्वयं बालक बन कर उसे दुलारने लगा। गाड़ी में मिले उस बालक ने दिलेर सिंह की कोमल भावनाओं में फिर से जागृति भर दी थी।

कुछ ही काल बाद उस मातृहीन बालक के लिये दिलेर सिंह और दिलेर सिंह के लिये वह बालक सभी कुछ बन कर रह गये।

और एक रात बच्चे को लेकर दिलेर सिंह चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे-सुने अपना अड्डा छोड़कर कहीं चला गया। साथ में कीमती वस्तुयें और आवश्यकता से अधिक धन भी उसने साथ ले लिया था। उसकी टोली निराधार होकर टूट गई। साथी इधर-उधर होकर जीविका के अन्य साधनों में लग गये।
अब उस इलाके में न तो "गाड़ियाँ एकदम रोक दो" की कड़कती कर्कश आवाज ही सुनाई देती है और न किसी प्रकार का मार्ग भय ही है। लोग पैदल, छकड़ों और गाड़ियों में बेखटके आते-जाते हैं। सरकार की परेशानी मिट गई है। सब-इंस्पेक्टर संग्राम सिंह दिलेर सिंह के एकाएक गायब हो जाने से हाथ मल कर रह गया। लोगों में तरह-तरह की अफवाह फैल गई। कोई कहता दिलेर सिंह को शेर ने खा डाला, तो कोई कहता वह साधु हो गया।

(कल आखरी किश्त)
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