Thursday, November 29, 2007

तुलसी का संदेश

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

तुलसी का सन्देश यही है
सियारम मय जग को जानो,
अपने भीतर सबको देखो
सबमें अपने को पहचानो।

स्वाति बूंद है राम रमापति
उसके हित चातक बन जावो,
आत्म-शक्ति जागेगी तुममें
राम-भक्त जो तुम हो जावो।

भौतिकता में रावण पलता
आध्यात्मिकता में श्री राम,
राम-राज का सुख चाहो तो
मत जगने दो मन में काम।

काम-अर्थ के चक्कर में तुम
धर्म-मोक्ष को भूल गये हो,
अति अनाचार के झूले में
रावण के संग झूल गये हो।

"मानस" पढ़ कर निज मानस में
तुलसी की ही स्मृति जगने दो,
आदर्श राम का जागृत कर
भारत को भारत रहने दो

(रचना तिथिः 04-08-1995)

Wednesday, November 28, 2007

ऋषि-मुनि सम्मेलन

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

ऋषियों ने, मुनियों ने सोचा,
क्यों न करें हम सम्मेलन,
ऋषियों-मुनियों का बहुमत है,
क्यों न करें फिर आन्दोलन।

मुनि-मण्डल के मंत्री नारद,
संयोजक थे सम्मेलन के ,
दुर्वासा लीडर बन बैठे,
महा उग्र आन्दोलन के।

अध्यक्ष व्यास ने शौनक को,
अपना एडीकांग बनाया,
सबने छाना सरस सोमरस,
शून्य काल में शोर मचाया।

पाराशर-सत्यवती-नन्दन,
व्यास दलित के रक्षक थे,
ब्राह्मण-धीवर की सन्तति वे
शेड्यूल कॉस्ट के अग्रज थे।

आरक्षण का प्रस्ताव रखा,
सूत महामुनि ने हँस कर,
स्वीकार किया ऋषि-मुनियों ने,
बहुमत के चक्कर में फँस कर।

अगला प्रस्ताव किया पारित,
साधु-सन्त को त्याग दिया,
साधू साधक हैं, सिद्ध नहीं,
सन्तों ने सबका अन्त किया।

इस पर सम्मेलन में शोर हुआ,
उग्र प्रचण्ड मचा हंगामा,
देख उसे ढीला हो जाता,
संसद का पाजामा।

(रचना तिथिः 24-08-1984)

Tuesday, November 27, 2007

पंजा

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

कवियों से अनुरोध यही है,
पंजावादी बन जाओ;
सुख-सम्पति-सत्ता चाहो तो,
पंजे के नीचे आओ।

पंजा व्यापक है इस युग में,
पंजे से उद्धार नहीं;
नर का हो या फिर नर-पशु का,
चाहे हो खूंख्वार सही।

पंचशील से पंजे तक का,
सब इतिहास निराला है;
पंजा खूनी रहा निरन्तर,
तन उजला मन काला है।

पंजा-पंजा हुआ देश में,
पंजे की महिमा भारी है;
पंजे पैने करें भेड़िया,
पंजे की लीला न्यारी है।

पंजा ख़ून किया करता है,
पंजे से ही देते घूस;
पंजा से पंजा मिल जाता,
फिर क्यों कोई हो मायूस।

पंजा कवच पहन नेतागण,
मनमानी कर लेते हैं;
लोगों को कुछ और नहीं तो,
वादा तो दे देते हैं।

(रचना तिथिः शनिवार 21-11-1980)

Thursday, November 22, 2007

हाय राम अब क्या होगा!

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

जनता बड़ी अनाड़ी,
पहन रखी है साड़ी,
हाय राम अब क्या होगा!

जनता शासक चुनती है,
चुन कर मूरख बनती है,
हाय राम अब क्या होगा!

जनता मंहगाई सहती है,
नव-वधू-सी चुप रहती है,
हाय राम अब क्या होगा!

जनता जनता को छलती है,
छोटी मछली को बड़ी निगलती है,
हाय राम अब क्या होगा!

नेता कुर्सी पकड़ते हैं,
अफसर खूब अकड़ते हैं,
हाय राम अब क्या होगा!

मूरख आगे बढ़ते हैं,
सज्जन पीछे हटते हैं,
हाय राम अब क्या होगा!

चमचे आँख दिखाते हैं,
अपनी धौंस जमाते हैं,
हाय राम अब क्या होगा!

सत्य छिपा जाता है,
झूठ उमड़ता आता है,
फिर भी हम कहते हैँ,
सत्यमेव जयते!

हाय राम अब क्या होगा!

Wednesday, November 21, 2007

अगर कहीं मैं तोता होता

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

अगर कहीं मैं तोता होता
बेशरमी पर कभी न रोता।
कविता कानन के पुष्पों को
कुतर चोंच को पैनी करता,
काव्य-पींजड़े से उड़ जाता
छन्द अलंकारों को चरता;
झटपट अटपट गटपट कविता रचता होता।
अगर कहीं मैं तोता होता।

आँखें फेर लिया करता मैं,
रामायण के वातायन से
टें टें टें टें रटन लगाता
काम न रखता कुछ गायन से,
सीताराम न रटता, राधेश्याम न कहता, नास्तिक होता।
अगर कहीं मैं तोता होता।

टुनक काटता मैं संस्कृति को
भाषा की खिचड़ी खाता,
दर्पण में प्रतिबिम्ब देख कर
गिटपिट गिटपिट शोर मचाता।
हिन्दी की चिन्दी कर देता अंग्रेजी में जगता सोता।

अगर कहीं मैं तोता होता।
चोंच चलाता सबके ऊपर
भर घमण्ड में पंख फुलाता,
आँखें फेर लिया करता मैं
निन्दा सुनता और सुनाता।
आडम्बर में डूबा रहता, बीज कलह कि निशिदिन बोता।
अगर कहीं मैं तोता होता।

Thursday, November 8, 2007

बापू के तीन बन्दर

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

बुरा मत सुनो,
बुरा मत देखो,
बुरा मत बोलो,
बापू के सिद्धान्तों के प्रतीक
तीनों बन्दर-
बदल गये हैं अन्दर ही अन्दर,
क्योंकि वे अब नेता बन गये हैं;
ऊपर से चमकदार, उजले, सुन्दर,
पर भीतर से पूरी तरह सड़ गये हैं।

तीनों बन्दर बापू के नाम पर
कालिख पोत रहे हैं,
और अपना ही घर भरने केलिये
सत्ता का शक्तिशाली हल जोत रहे हैं।

बुरा न देखने वाला बन्दर अब-
बुराई और सिर्फ बुराई के सिवाय
कुछ नहीं देखता है,
अव्वल दर्जे का नेता है वह-
जनता का वोट पाकर,
सत्ता के मद में आकर,
अपनी डफली बजाकर,
अपना ही राग रेंकता है।

बुरा न सुनने वाला बन्दर-
कानों से हाथ हटा कर,
चमचों की बातों में आकर,
अपनी प्रशंसा सुनने लगा है,
और अगर बहरा है तो भी-
श्रवण-यंत्र लगा कर,
बुराइयाँ सुन-समझ कर,
दल पर दल बदलने लगा है।

बुरा न बोलने वाला बन्दर-
गला फाड़ चिल्ला कर,
लोगों के समक्ष जा कर,
अपने ही दल का दम भरने लगा है,
भाषण और आश्वासन का
अनर्गल प्रलाप करने लगा है।

बापू के जीवन-काल में-
तीनों बन्दर मूर्ख थे-
पर बापू के मर जाने पर वे
सफेद टोपी पहन, नख-शिख सफेद हो कर
अपने आपको बुद्धिमानों में गिनने लगे हैं।
पर बन्दर के अन्दर-
बन्दर-बुद्धि के सिवाय और क्या रहेगा-
चाहे वह नेता, महानेता, अभिनेता-
या नारद के समान-
सुन्दर तन, कलूटा मन बन्दर-मुख हो जाये-
तो भी जानवर, जानवरों का ही नेता बनेगा।

लेकिन पते की बात तो यह है कि-
ये बन्दर समझदारों के बीच भी
मान न मान, मैं तेरा मेहमान के नियम से
नेता के रूप में नाचने वाले
बापू के तीनों बन्दर-
स्वयं को ब्रह्मा मान अकड़ दिखाते हैं,
बन्दर-बाँट और लूट-खसोट को-
कदम कदम पर दुहराते और तिहराते हैं।

बापू के तीनों बन्दर
अब नेता हैं, जनता के सेवक हैं-
पर अगर पोस्ट मार्टम करोगे उनका
तो पावोगे भूखे भेड़िये को
उसके दिल के अन्दर,
बापू के तीन बन्दर
बापू के तीन बन्दर

(रचना तिथिः शनिवार 02-10-1984)

Wednesday, November 7, 2007

वापस चल

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

विनाश से सृजन की ओर-
मुख मोड़ और चल,
धूर्त-पथ त्याग कर,
मानव मन बन निश्छल।

विनाशिनी संहारिणी शक्ति-
तेरी ही कृति का प्रतिफल,
मोड़ दे अपनी दिशा,
उत्फुल्ल कर शतदल कमल,
कृत्रिम से प्रकृति उत्तम
शान्त सुन्दर धवल,
तो फिर ओ अशान्त मन,
चल वापस, प्रकृति ओर वापस चल।

(रचना तिथिः शनिवार 24-12-1983)

Monday, November 5, 2007

किसको अच्छा लगता है?

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

बच्चों का गुमसुम हो जाना,
युवकों का माला टरकाना,
बूढ़ों का श्रृंगार सुनाना,
नारी का निर्लज हो जाना,
किसको अच्छा लगता है?

दूध-रहित बचपन पलता है,
दुर्बल यौवन सिर धुनता है,
वृद्ध वर्ग सपने बुनता है,
तृष्णा में खुद को ठगता है,
यह किसको अच्छा लगता है?

बचपन होता निश्छल जीवन,
प्रेमांकुर ही पाता यौवन,
अध्यात्म-ज्ञान ही वृद्धों का धन,
बने सफल सब का ही जीवन,
यह सबको अच्छा लगता है।

(रचना तिथिः 25-09-1983)

Sunday, November 4, 2007

कौन रोकता है?

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मानते हैं कि-
हम धर्म निरपेक्ष देश में रहते हैं
और हर तरह की ज्यादती-
हम लोग ही तो सहते हैं।

धर्म निरपेक्ष!
अर्थात् जिसे धर्म की अपेक्षा ही न हो
याने कि पूरा पूरा अधर्मी
जिन्हें रौंद डालें विधर्मी।

क्या संसद ने ऐसा कोई कानून बनाया है-
कि हम वेद, शास्त्र, उपनिषद्, रामायण-
पढ़ ही नहीं सकते-
फिर हम ऐसा क्यों नहीं करते
कौन हमें रोकता है?
कौन हमारी धार्मिकता को
गहन अन्धकार में झोंकता है?
कोई हृदय पर हाथ रख कर कहे-
कि हम अपने धर्म ग्रंथों को नियमित पढ़ते हैं!
बारम्बार उनका पुनश्चरण करते हैं।
यदि हाँ, तो भारत आज भी-
धर्म निरपेक्ष नहीं धर्म प्राण राष्ट्र है-
और यदि नहीं, तो
निश्चित है कि यह संस्कृति-संस्कार विहीन राष्ट्र है।
हम मर चुके हैं और हमारा जीना,
केवल भीषण त्रास और उपहास है।

कौन रोकता है हमें-
नित्य स्वाध्याय करने से-
और सद् ग्रंथों को छोड़ स्वयं के साथ
घोर अन्याय करने से।
पर हमारा मन ही मर गया है-
पश्चिमी चकाचौंध से भर गया है।
हम एक नई संस्कृति उभार रहे हैं-
ब्राह्म-मुहूर्त में कुत्ते के साथ भ्रमण कर-
श्वान संस्कृति में जीवन को ढाल रहे हैं।
और चार्वाक को भी धिक्कार रहे हैं!
हमारी आत्मा गहरी नींद ले रही है-
हमारी मूर्खता यही सन्देश दे रही है-
कि हमें कोई नहीं रोकता-
हम पतन की आग में भस्म हो रहे हैं,
हमारे सिवाय-
उस आग में हमें और कोई नहीं झोंकता।

हम सब कुछ हैं पर भारतीय नहीं-
हममें संस्कार ही नहीं इसलिये-
वह हमें नहीं टोकता-
पर हमें संभलना चाहिये-
अपने धर्म ग्रंथों को नियमित पढ़ना ही चाहिये,
क्योंकि ऐसा करने से हमें,
कोई नहीं रोकता।

(रचना तिथिः शनिवार 09-04-1981)

Saturday, November 3, 2007

मैं भी तुमसे दूर रहूँगी

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

दूर रहा करते हो मुझसे,
मैं भी तुमसे दूर रहूँगी;
होगा इससे कष्ट मुझे जो,
तो उसको चुपचाप सहूँगी।

स्पर्श तुम्हारा जब हो जाता है,
गहरी शान्ति मिला करती है;
लगता है नील-गगन में ज्यों,
समा गई हो यह धरती है।

किया समर्पण तन-मन तुमको,
पर सच को तुम क्या पहचानो;
डूबे रहते हो अपने में ही,
दिल को तुम कैसे पहचानो।

तुम मस्तक मैं बुद्धि तुम्हारी,
पर यह तुम कैसे जानोगे?
आयेगी मिलने की बारी,
तब ही मुझको पहचानोगे।

पर ठुकराओगे मुझको तो,
मन ही मन मैं घुटन सहूँगी;
दूरी जो रखते हो मुझसे तो,
मैं भी तुमसे दूर रहूँगी।

(रचना तिथिः गुरुवार 31-01-1981)

 
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