Tuesday, May 13, 2008

बेताल की ब्लोग कथा

हमेशा की तरह बेताल ने कहानी शुरू की, "सुन विक्रम! कालान्तर में जम्बूद्वीप का नाम भारतवर्ष हो गया। 400 वर्षों तक विदेशियों की गुलामी करने के बाद अंततः भारत स्वतंत्र हुआ और विकास के रास्ते पर चल पड़ा। वहाँ कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि के साथ ब्लोग भी पहुँच गया। सन् 2003 में अल्प सुविधा होने के बावजूद भी हिन्दी के कुछ दिग्गजों ने अथक परिश्रम करके हिन्दी के ब्लोग बना लिये। पहले तो उनके ब्लोग को कोई नही जानता था किन्तु धीरे-धीरे लोगों को हिन्दी ब्लोग की जानकारी होती गई और हिन्दी ब्लोगिंग का विकास होना शुरू हो गया। परंतु विकास की गति कछुए की चाल जैसी ही थी। सन् 2003 से 2008 तक हिन्दी ब्लोगिंग रेंगना सीखने वाले बच्चे की तरह डगमगाता गिरता उठता आगे बढता रहा। सन् 2007 के अंत में हिन्दी ब्लोगिंग की गति अत्यंत तीव्र हो गई क्योंकि इन्टरनेट जगत की ख्यातिनाम कंपनियाँ, जिन्हें हिन्दी से कभी कोई सरोकार नहीं रहा था, अचानक हिन्दी पर मेहरबान हो गई और उन्होंने करोड़ो अरबो खर्च करके हिन्दी के सॉफ्टवेयर बनवाये। इन सॉफ्टवेयर्स का फायदा हिन्दी ब्लोगर्स को भी मुफ्त में मिलने लगा और द्रुत गति से हिन्दी ब्लोग्स की संख्या में वृद्धि होने लगी। हिन्दी ब्लोग्स का भविष्य शानदार नजर आने लगा।"

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा, "बता विक्रम जिन कंपनियों को हिन्दी से कभी कोई सरोकार नहीं था वे अचानक हिन्दी पर इतनी मेहरबान क्यों हो गईं?"

विक्रम ने उत्तर दिया, "जब तक भारत में इंटरनेट का उपयुक्त विकास नहीं हुआ था तब तक इन कंपनियों को भारत के 54 करोड़ हिन्दी बोलने वालों से किसी भी प्रकार के व्यापार की उम्मीद नहीं थी किन्तु भारत में ब्राडबैंड, डीसीएल आदि के आने पर इन कंपनियों को भारत में व्यापार करने का और मोटा लाभ कमाने का पूरा-पूरा अवसर दिखाई देने लगा। ग्राहक को प्रभावित करने के लिये उनकी भाषा का ही प्रयोग करना अधिक लाभदायी समझकर इन कंपनियों ने हिन्दी के सॉफ्टवेयर्स बनवायें। उन्हें हिन्दी या हिन्दी ब्लोगर्स से न तो पहले कभी सरोकार था और न बाद में ही हुआ। वे तो व्यापारी है और अपने व्यापार को बढाने के लिये ही उन्होंने हिन्दी को आगे बढाया। खैर उनका उद्देश्य चाहे जो भी हो हिन्दी और हिन्दी ब्लोग्स का भला तो हो ही गया, यदि वे हिन्दी को आगे न बढ़ाते तो हिन्दी को आगे बढ़ने में दसों साल लग जाते क्योंकि इस देश की सरकार तो हिन्दी को कछुआ चाल से ही आगे बढ़ाती।"

विक्रम के उत्तर देते ही बेताल वापस पेड़ पर जाकर लटक गया।

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

कितनी देर लटकेगा बेताल-प्रश्न उठते जा रहे हैं, फिर आयेगा अगला प्रश पूछने. ऐसे में ही हम स्थापित हो जायेंगे बेताल कथाओं की तरह. बहुत उम्दा लिखा है.

MD. SHAMIM said...

itni badi baat aapne kahani ke madhyam se saralta ke sath kah dala. gre8

 
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