Friday, June 6, 2008

अभी बहुत समय लगेगा हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में

"चिट्ठाकारी तो अभी शौकिया ही रहेगी"

उपरोक्त वाक्यांश श्री दिनेशराय द्विवेदी जी के पोस्ट 'चिट्ठाकारों के लिए सबसे जरुरी क्या है?' में श्री नीरज रोहिल्ला द्वारा की गई टिप्पणी का अंश है। यह वाक्यांश एक बहुत बड़े सत्य को उद्घाटित करता है। वास्तव में हिन्दी चिट्ठाकारी 'शौकिया' है और अभी बहुत दिनों तक 'शौकिया' ही रहेगी क्योंकि हिन्दी चिट्ठाकार केवल अपने लिये (या अपने जैसे चिट्ठाकारों के) लिये लिखता है न कि पाठकों के लिये। और इसीलिये हिन्दी चिट्ठों के पाठक भी आम लोग नहीं बल्कि सिर्फ हिन्दी चिट्ठाकार ही होते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि वकील का मुवक्किल वकील ही नहीं होता, डॉक्टर का मरीज डॉक्टर ही नहीं होता किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार का पाठक हिन्दी चिट्ठाकार ही होता है।

ऐसे बहुत कम वकील मिलेंगे जो केवल शौक के लिये वकालत करते हैं, ऐसे बहुत कम डॉक्टर मिलेंगे जो केवल शौक के लिये डॉक्टरी करते हैं पर ऐसे बहुत से चिट्ठाकार मिलेंगे जो केवल शौक के लिये चिट्ठाकारी करते हैं। 'वकालत' एक प्रोफेशन है, 'डॉक्टरी' एक प्रोफेशन है, 'अंग्रेजी और अन्य भाषा में चिट्ठाकारी' भी एक प्रोफेशन है क्योंकि इनसे अनेकों लोगों की आजीविका चलती है किन्तु हिन्दी चिट्ठाकार की आजीविका 'हिन्दी चिट्ठाकारी' से नहीं चलती इसलिये 'हिन्दी चिट्ठाकारी' प्रोफेशन नहीं है। हिन्दी चिट्ठाकार 'चिट्ठाकारी' को अपने आय का साधन नहीं समझता। भले ही वह यह समझता है कि चिट्ठाकारी से कुछ कमाई भी हो जाये तो अच्छा है किन्तु वह चिट्ठाकारी को केवल कमाई का साधन ही नहीं समझता, क्योंकि चिट्ठाकारी उसका शौक है प्रोफेशन नहीं। हिन्दी चिट्ठाकार की यह सोच आनन-फानन में तुरन्त बदल जाने वाली नहीं है इसलिये अभी हिन्दी चिट्ठाकार को प्रोफेशनल बनने में बहुत समय लगेगा।
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