Friday, May 30, 2008

मैं परेशान तू मजे में


जीवन में अनेकों बार ऐसी स्थिति आती है कि हम सोचने लगते है मैं तो परेशान हूँ और दूसरे लोग मजे में हैं और यह सोच हमें हीन भावना से ग्रस्त करते जाता है। मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित इस विषय पर थॉमस एन्थॉनी हैरिस द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक I'm OK, You're OK बहुत ही लोकप्रिय है। यह पुस्तक व्यवहार विश्लेषण (Transactional Analysis) पर आधारित है।

श्री हैरिस की पुस्तक I'm OK, You're OK के अनुसार मनुष्यों के आपसी व्यवहार की चार स्थितियाँ होती है -

मैं मजे में तू मजे में (I'm OK, You're OK)
मैं मजे में तू परेशान (I'm OK, You're not OK)
मैं परेशान तू मजे में (I'm not OK, You're OK)
मैं परेशान तू परेशान (I'm not OK, You're not OK)

उपरोक्त परिस्थितियाँ किन्हीं भी दो लोगों के बीच हो सकती हैं चाहे वे पति-पत्नी हों, भाई-भाई हों, बाप-बेटे हों, अफसर-कर्मचारी हों, यानी कि उनके बीच चाहे जैसा भी आपसी सम्बन्ध हों। देखा जाये तो पहली स्थिति आदर्श स्थिति है और चौथी सबसे खराब। मनुष्य के जीवन में आदर्श स्थिति कभी कभार ही आ पाती है और सबसे खराब स्थिति भी कभी-कभी आती है किन्तु दूसरी तथा तीसरी स्थिति संपूर्ण जीवन में बनी रहती है।

श्री हैरिस की पुस्तक इसी बात का विश्लेषण करती है कि उपरोक्त व्यवहारिक स्थितियाँ क्यों बनती हैं। उनका सिद्धांत बताता है कि मनुष्य निम्न तीन प्रकार से सोच-विचार किया करता है:

बचकाने ढंग से (Child): इस प्रकार के सोच-विचार पर मनुष्य की आन्तरिक भावनाएँ तथा कल्पनाएँ हावी रहती है (dominated by feelings)। आकाश में उड़ने की सोचना इसका एक उदाहरण है।

पालक के ढंग से (Parent): यह वो सोच-विचार होता है जिसे कि मनुष्य ने बचपने में अपने पालकों से सीखा होता है (unfiltered; taken as truths)। 'सम्भल के स्कूल जाना', 'दायें बायें देखकर सड़क पार करना' आदि वाक्य बच्चों को कहना इस प्रकार के सोच के उदाहरण है।

वयस्क ढंग से (Adult): बुद्धिमत्तापूर्ण तथा तर्कसंगत सोच वयस्क ढंग का सोच होता है (reasoning, logical)। सोच-विचार करने का यही सबसे सही तरीका है।

हमारे सोच-विचार करने के ढंग के कारण ही हमारे व्यवहार बनते है। जब दो व्यक्ति वयस्क ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो ही दोनों की संतुष्टि प्रदान करने वाला व्यवहार होता है जो कि "मैं मजे में तू मजे में (I'm OK, You're OK)" वाली स्थिति होती है। जब दो व्यक्तियों में से एक वयस्क ढंग से सोच-विचार करके तथा दूसरा बचकाने अथवा पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं मजे में तू परेशान (I'm OK, You're not OK)" या "मैं परेशान तू मजे में (I'm not OK, You're OK)" वाली स्थिति बनती है। किन्तु जब दो व्यक्ति बचकाने या पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं परेशान तू परेशान (I'm not OK, You're not OK)" वाली स्थिति बनती है।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर व्यवहार करने से ही सभी की संतुष्टि हो सकती है।

Thursday, May 29, 2008

आवारगी ...

आवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार तो घर जाना चाहिये

मुझसे बिछड़ कर इन दिनों किस रंग में हैं वो
ये देखने रक़ीब के घर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

उस बुत से इश्क कीजिये लेकिन कुछ इस तरह
पूछे कोई तो साफ मुकर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

अफ़सोस अपने घर का पता हम से खो गया
अब सोचना ये है कि किधर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

बैठे हैं हर फसील में कुछ लोग ताक में
अच्छा है थोड़ी देर से घर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

रब बेमिसाल वज़्म का मौसम भी गया
अब तो मेरा नसीब संवर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

नादान जवानी का ज़माना गुजर गया
अब आ गया बुढ़ापा सुधर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

बैठे रहोगे दश्त में कब तक हसन रज़ा
जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिये
लेकिन कभी कभार ...

उपरोक्त गज़ल मेरी पसंद के गज़लों में से एक है, उम्मीद है आपको भी पसंद आयेगी। सुनना चाहें तो यहाँ सुन सकते हैं:


Tuesday, May 27, 2008

hindi blog आश्चर्यजनक तथ्य

मन में एक उत्सुकता जागी कि hindi blog कीवर्ड को सर्च इंजिन में कितने लोग खोजते हैं। पता करने के लिये मैंने वर्डट्रैकर में hindi blog टाइप कर के हिट किया। आश्चर्य! पता चला कि इस कीवर्ड को कोई नहीं खोजता।


इस तथ्य को जान कर बड़ी ग्लानि हुई। अपने आप पर तरस आने लगा। खुद से कहा 'वा बेटे, अपने हिन्दी ब्लोग में नया पोस्ट कर के कितना खुश हो जाता है, अब पता चला तेरे हिन्दी ब्लोग की औकात!'

इसके बाद तख्ती में 'हिन्दी ब्लोग' टाइप तथा कॉपी करके वर्डट्रैकर में पेस्ट किया, हिट करने पर पता चला कि वर्डट्रैकर यूनीकोड को सपोर्ट ही नहीं करता।

फिर सोचा चलो यह भी देख लें कि hindi कीवर्ड को भी कोई खोजता है या नहीं। फिर से वर्डट्रैकर में hindi टाइप किया और हिट किया। इस बार परिणाम आया और कुछ संतोष हुआ।

पर परिणाम से पता चला कि लोग hindi songs, hindi movies, hindi mp3, hindi remix, hindi sex आदि ही खोजते हैं, उन्हें hindi content, hindi literature, hindi poem, hindi story, hindi novel, आदि खोजने में किसी प्रकार की रुचि ही नहीं है।

(आप चाहें तो यहाँ क्लिक करके वर्डट्रैकर में जाकर उपरोक्त प्रयोग कर सकते हैं।)

तो साहब! तथ्य उत्साहप्रद नहीं हैं और स्थिति निराशाजनक हैं पर ऐसा भी नहीं है कि स्थिति सुधर न सकती हो। हम सभी मिल कर अथक प्रयास करें, लोगों को नेट में हिन्दी पठन-पाठन के लिये प्रेरित करें तो स्थिति अवश्य ही सुधरेगी।

Wednesday, May 21, 2008

अब फिर दिखेंगे हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापन

गूगल ने हाल ही में गूगल सामग्री नेटवर्क (Google content network) को, योग्य तीसरे पक्ष के विक्रेताओं से प्राप्त विज्ञापनों को स्वीकार करने तथा उनका प्रदर्शन करने के लिये, सक्रिय कर दिया है। यह सूचना अभी कुछ समय पहले ही मुझे गूगल से प्राप्त ई-मेल से मिली है।

अभी तक केवल अंग्रेजी के विज्ञापनों को ही पात्रता प्राप्त होने के कारण हिन्दी पेजेस में गूगल के विज्ञापनों का प्रदर्शन नहीं हो रहा था किन्तु अब उपरोक्त परिवर्तन हो जाने से कम से कम छवि विज्ञापनों (image ads) का दिखाई देना शुरू हो जायेगा।

इससे अपने हिन्दी ब्लोग्स/वेबसाइट्स में गूगल विज्ञापन प्रदर्शित करने वालों की निराशा थोड़ी बहुत तो दूर होगी।

मर रे मानव मर!

मर रे मानव मर
भूस्खलन से मर
भूकंप से मर
मुठभेड़ कर और मर
बम विस्फोट से मर
जहरीली शराब पी कर मर
नकली दवा से मर
श्रद्धालु बन, दर्शन हेतु जीप से जा और दुर्घटना से मर
मरने से जरा भी न डर
मरना तेरी नियति है इसलिये तू मर

वेबदुनिया समाचार

Tuesday, May 20, 2008

मीडिया प्लेयर में आटो प्ले लिस्ट बना कर पसंदीदा संगीत सुनें।

हजारों-लाखों संगीत फाइल्स में से अपने विशिष्ट पसंद के संगीत को सुनने के लिये आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Playlists) बहुत ही उत्तम सुविधा है। मान लीजिये आपके कम्प्यूटर में पुरानी फिल्म संगीत के डेढ़-दो हजार गाने हैं और आज आपकी इच्छा केवल किशोर दा के गाये गानों को ही या आर.डी. बर्मन के संगीत वाले केवल आशा भोंसले के गाये गानों को ही सुनने की हो रही है तो सोचिये कि उन गानों को छाँटने में आपका कितना समय बर्बाद हो जायेगा। किन्तु आटो प्लेलिस्ट्स की सहायता से आप बात की बात में ही उन विशिष्ट गानों की लिस्ट बना सकते हैं जिन्हें आप सुनना चाह रहे हैं।

आटो प्लेलिस्ट्स (Auto Play lists) बनाने के लिये संगीत फाइल्स की टैगिंग होना आवश्यक है। केवल टैगिंग ही वह सुविधा प्रदान करता है जिससे आपके पसंद के गानों को पहचान कर आपका कम्प्यूटर उनकी लिस्ट तैयार कर सके। टैगिंग की विधि नीचे दी जा रही है।

संगीत फाइल्स को टैग कर के मनपसंद नाम दें!

संगीत फाइल्स को टैग (Tag) कर के नया नाम तथा वांछित जानकारी देने के लिये अनेकों टैग एडीटर्स (Tag Editors) उपलब्ध हैं। यदि आप Windows XP का प्रयोग करते हैं तो आपको किसी अलग टैग एडीटर की आवश्यकता नहीं है क्यों कि XP में उपलब्ध विन्डोज मीडिया प्लेयर (वर्सन 9 या उससे ऊपर) में ही संगीत फाइल्स को टैग करने की सुविधा उपलब्ध है। टैगिंग करने के लिये निम्न विधि अपनायें।

* विन्डोड़ मीडिया प्लेयर वर्सन 9 (Windows Media Player version 9) के प्ले लिस्ट या लाइब्रेरी में किसी संगीत फाइल को दाँया क्लिक (right click) करें।

* नये खुलने वाले मीनू में एडव्हान्स्ड टैग एडीटर (Advanced Tag Editor) को क्लिक करें।

* एडव्हांस्ड टैग एडीटर डॉयलाग बॉक्स में ट्रैक की जानकारियाँ प्रविष्ट करें जैसे कि ऊपर के चित्र में किया गया है। अब आर्टिस्ट इन्फो (Artist Info) टैब को क्लिक करें।


* आर्टिस्ट इन्फो में भी वांछित प्रविष्टियाँ करने के बाद चाहें तो अन्य टैब्स को क्लिक कर के जानकारियाँ प्रविष्ट करें और कार्य सम्पन्न हो जाने पर OK को क्लिक कर दें।

इसी प्रकार से सभी संगीत फाइल्स की टैगिंग कर लें।

आटो प्ले लिस्ट बनाना

* विन्डोज मीडिया प्लेयर में लाइब्रेरी खोलें।
* बायीं (left) ओर के विन्डो में आटो प्ले लिस्ट पर दायाँ (right) क्लिक करें।
* नये खुलने वाले विन्डो में न्यू (New) को क्लिक कर दें।

* आटो प्लेलिस्ट (Auto Plalist) डॉयलाग बॉक्स में क्लिक टू एड क्राइटेरिया (Click to add criteria) को क्लिक करें।


* वांछित क्राइटेरिया जैसे कि एलबम आर्टिस्ट (Album Artist) को क्लिक करें।
* Is, Is not..., contains में से किसी एक का चुनाव करके क्लिक तो सेट (Click to set) में उचित प्रविष्टि करें। चाहें तो एण्ड आल्सो इन्क्लुड (And also include) में भी अन्य शर्ते दे सकते हैं। कार्य सम्पन्न होने पर OK को क्लिक कर दें। उदाहरण के लिये यदि आपने 'Is' का चुनाव करके 'किशोर कुमार' प्रविष्ट किया है तो सिर्फ किशोर कुमार के गाये गानों वाली आटो प्लेलिस्ट बन जायेगी।

Monday, May 19, 2008

हमारे देश के अग्रणी संस्थान की हिन्दी?

यदि आप इसे पूरा पूरा पढ़ सकते हैं तो आपसे निवेदन है कि कृपया मुझे भी बताने का कष्ट करें कि क्या लिखा है

भारतीय स्टेट बैंक की हिन्दी वेबसाइट

(windows xp - firefox)
(windows xp - internet explorer)

P.S.: मुझे ज्ञात हुआ है कि कहीं कहीं यह सही हिन्दी दिखाई दे रही है, किन्तु मेरे कम्प्यूटर पर ऐसी ही दिखाई देती है जैसे कि स्क्रीनशॉट्स में दर्शाया गया है। अब प्रश्न यह है कि कितने लोगों को यह सही दिख रहा है और कितने को नहीं? क्या अग्रणी संस्थान के हिन्दी वेबसाइट को कही पर ठीक-ठीक और कहीं पर अस्पष्ट दिखना चाहिये? क्या unicode font के विषय में अब तक अग्रणी संस्थान को जानकारी नहीं है?

जुतियाना

यह तो हम सभी जानते हैं कि राजनीति, खास करके आज के जमाने की राजनीति, और जुतियाने में चोली दामन का सम्बन्ध है। जिस नेता के पास जुतियाने वाले चम्मचों की टीम नहीं होती, वास्तव में वह असली नेता ही नहीं होता। जुतियाना नेताओं के चम्मचों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। शक्ति प्रदर्शन करके अपना बड़प्पन स्वीकार करवाने का एक मात्र माध्यम जुतियाना ही है।


जब भी इंसान को गुस्सा आता है, किसी न किसी को जुतियाने का मन हो ही जाता है। अक्सर तो होता यह है कि गुस्सा किसी और पर आता है और जुतियाया कोई और जाता है। अब आप अपने से जादा ताकतवर को नहीं जुतिया सकते ना, पर गुस्सा शांत करने के लिये जुतियाना जरूरी भी है। इसीलिये जब आफिस में बॉस और घर में बीबी पर गुस्सा आता है तो चपरासी और नौकर ही जुतियाये जाते हैं।

'श्रीलाल शुक्ल' जी ने "राग दरबारी" में जुतियाने का जो तरीका बताया है वही तरीका हमें जुतियाने का सबसे अच्छा लगा। वास्तव में उससे अच्छा तरीका और हो ही नहीं सकता। उनके तरीके के अनुसार यदि किसी को जुतियाना हो तो उसे गिन कर 100 जूते लगाने चाहिये, न एक कम और न एक ज्यादा। और गिनती के 93-94 तक पहुँचने पर भूल जाना चाहिये कि अब तक कितने जूते लग चुके हैं। अब भूल गये तो फिर से जुतियाना तो शुरू करना ही पड़ेगा।


हम सोच रहे थे कि जुतियाना शब्द तो जूते से बना है। तो जब इस संसार में जूता नहीं हुआ करता था तो लोग भला कैसे अपना गुस्सा उतारते रहे होंगे? शायद जूते की जगह खड़ाऊ लगा कर। तो 'जुतियाने' को अवश्य ही 'खड़ुवाना' कहा जाता रहा होगा। और शायद उस जमाने में नेता के चम्मच के बजाय राजाओं के मुसाहिब और खुशामदी लोग 'खड़ुआते' रहे होंगे।


जुतियाने का सबसे बढ़िया प्रयोग तो फिल्म 'शोले' में किया गया था संजीव कुमार के द्वारा अमजद खान को बड़े बड़े कील वाले जूते खिलवा कर। सच्ची बात तो यह है कि जो जितना अधिक जुतियाने का प्रयोग करेगा वह उतना ही आगे बढ़ेगा। हम तो आज तक आगे नहीं बढ़ पाये क्योंकि हमें जुतियाना ही नहीं आता।

Sunday, May 18, 2008

न बोलते हुये भी बहुत कुछ बोलते हैं हम

बोलना क्या है? भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति। किन्तु भावों तथा विचारों को अभिव्यक्त करने के लिये मुँह से बोलना ही केवल एक माध्यम नहीं है। आपका पूरा शरीर आपके भावों और विचारों को अभिव्यक्त करता है। यदि आपने कभी रेलगाड़ी के जनरल बोगी में यात्रा की है तो याद करें कि क्या हुआ था। सीट पर बैठा व्यक्ति और फैल कर बैठ गया था। उसने बिना कुछ बोले आपको बता दिया कि वहाँ पर आपके बैठने की कोई गुंजाइश नहीं है, वह आपको जरा सी भी जगह नहीं देने वाला। आप पुस्तक पढ़ने में तल्लीन हैं और बच्चा वहाँ पर शोर मचा रहा है। आप सिर्फ क्रुद्ध भाव से बच्चे को घूरते हैं और बच्चा वहाँ से खिसक लेता है। आपने बच्चे को बिना कुछ कहे ही बता दिया कि वह आपको 'डिस्टर्ब' कर रहा है और बच्चे ने समझ भी लिया।

जब हम अकेले होते हैं, किसी प्रकार का 'काम्युनिकेशन' नहीं होता किन्तु एक से दो या अधिक व्यक्ति होते ही 'काम्युनिकेशन' स्वतः शुरू हो जाता है। हम हर पल एक दूसरे से काम्युनिकेट करते रहते हैं। आपके समक्ष चाहे कोई परिचित हो या अजनबी, आप उसके साथ काम्युनिकेट करेंगे ही और वह भी आप के साथ काम्युनिकेट करेगा। काम्युनिकेट करना हमारे व्यवहार का एक अभिन्न अंग है।

आपसी सम्बन्धों में मधुरता या कटुता इसी काम्युनिकेशन के ही परिणाम है। सही और उचित काम्युनिकेशन से सम्बन्धों में मधुरता बढ़ती है और गलत काम्युनिकेशन से कटुता। काम्युनिकेशन का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र-मित्र आदि में प्रेम या मनमुटाव का कारण भी यही काम्युनिकेशन है। हमारा काम्युनिकेशन हमारे व्यवहार को प्रदर्शित करता है।

काम्युनिकेशन को सीधा (direct) और स्पष्ट (clear) होना चाहिये अपरोक्ष तथा अस्पष्ट काम्युनिकेशन से हमेशा गलत संदेश जाने की आशंका बनी रहती है। यदि आप किसी को पाँच मिनट इंतजार करने के लिये कहकर आधे घंटे बाद वापस आते है तो यह आपका गलत काम्युनिकेशन होगा। गलत काम्युनिकेशन से संबंधों के बिगड़ने के पूरे अवसर बन जाते है।

एक सीधा व सरल व्यवहार वाला व्यक्ति बनने के लिये हमें हमेशा अपने काम्युनिकेशन का ख्याल रखना चाहिये।

Saturday, May 17, 2008

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापनों को क्या हुआ?

पिछले एक-दो दिनों से मैं देख रहा हूँ कि हिन्दी ब्लोग्स में गूगल के सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही प्रकाशित हो रहे हैं। तो क्या अब गूगल ने हिन्दी ब्लोग्स में सिर्फ अपने सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही दिखाने की ठान ली है? एक तो हिन्दी ब्लोग्स के एडसेंस विज्ञापनों पर क्लिक करने वालों की संख्या ही नगण्य है। ले दे कर यदि कभी-कभार कुछ सेंट की कमाई हो भी जाती थी तो सार्वजनिक सेवा विज्ञापनों से वह भी बंद हो जायेगा।

या फिर गूगल चुपचाप अपने तकनीक में कोई बड़ा परिवर्तन कर रहा है ताकि हिन्दी ब्लोग्स में हिन्दी शब्दों अंग्रेजी अनुवाद वाले शब्दों के अनुरूप विज्ञापन प्रकाशित हो सकें। चूँकि गूगल का स्वभाव हमेशा लोगों को विस्मित कर (surprise) देने का रहा है, यही लग रहा है कि अवश्य ही गूगल अपने तकनीक में कोई बड़ा परिवर्तन कर रहा है।

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय है अपने ब्लोग में एफिलियेट विज्ञापन प्रदर्शित करना। लोग आपके एफिलियेट विज्ञापन को क्लिक कर के विज्ञापनदाता से यदि उनके उत्पाद या सेवाएँ खरीदते हैं तो कमीशन के रूप में आपकी भी कमाई होती है। वैसे तो अमेजान, क्लिक बैंक, पेडॉटकाम को सबसे अच्छा एफिलियेट प्रोग्राम्स माना जाता है क्योंकि इनमें कमाई अधिक होती है। किन्तु ये सभी प्रोग्राम्स हिन्दी ब्लोग्स के लिये उपयुक्त नहीं है क्योंकि इन प्रोग्राम्स में भारतीय उत्पादों और सेवाओं का स्थान नहीं के बराबर है। हाँ, शादी.कॉम, मैत्री.कॉम जैसे मैट्रिमोनियल एफिलियेट्स प्रोग्राम्स से कुछ कमाई होने की उम्मीद की जा सकती है।

मैनें dgmpro.com के एफिलियेट प्रोग्राम्स को हिन्दी ब्लोग्स/वेबसाइट्स के लिये अधिक उपयुक्त पाया है क्योंकि वहाँ पर भारत देश के लिये एक अलग ही विभाग है जिसके अंतर्गत एयर बुकिंग, होटल बुकिंग, इन्डियन शॉपिंग आदि एफिलियेट्स प्रोग्राम्स हैं जो भारतीय पाठकों को अधिक आकर्षित करते है। यात्रा, मेकमाइट्रिप, एयरटेल, रेडिफ, सिफी आदि एफिलेट कार्यक्रम, जो भारतीयों में अधिक लोकप्रिय है, dgmpro के अंतर्गत आते है।

पिछले कुछ समय से मैं अपने हिन्दी ट्युटोरियल वेबसाइट में उपरोक्त इन एफिलियेट विज्ञापनों को प्रदर्शित कर रहा हूं और उनसे अधिक नहीं पर कुछ तो कमाई हो रही है।

आप भी यदि चाहे तो अपने ब्लोग्स में उपरोक्त एफिलियेट विज्ञापनों को प्रदर्शित करके कुछ लाभ उठा सकते है।

Friday, May 16, 2008

एक अचम्भा हमने देखा

किसी एक की चार-पाँच मिलकर खूब कुटाई करें, दे घूँसे पे घूँसा, दे लात पे लात कि सामने वाला अधमरा हो कर गिर जाये, तुर्रा यह कि बावजूद अधमरा होकर गिरे रहने के भी यदा कदा धुनाई जारी ही रहे कि इतने में हीं अधमरे आदमी के बदन में अचानक बला की ताकत आ जाये और चारों-पाँचो की ऐसी धुलाई करना शुरू कर दे कि वे लोग तौबा-तौबा करने लगें अचम्भा नहीं है और तो क्या है? भैया, आपके लिये भले न हो, हमारे लिये तो अचम्भा ही है। कहाँ से आ जाती है अधमरे के बदन में इतनी ताकत? क्या कोई देवता चढ़ जाता है? या फिर उस पर शैतान सवार हो जाता है? जी हाँ मैं WWE की बात कर रहा हूँ जिसके कि हमारे खली साहब भी आजकल बहुत बड़े हीरो हो रहे हैं।

अब वो क्या है भइ कि हम ठहरे पुराने आदमी। हमें तो ये लड़ाई ही समझ में नहीं आती। इस लड़ाई में तो लगता है कि अधमरा हो जाना एक फार्मूला है, वैसे ही जैसे कि हमारी पुरानी फिल्मों में दारासिंह किंग-कांग से पहले खूब मार खाये और बाद में खाये हुये मार को 10% मासिक की दर से ब्याज के साथ वापस करे। या फिर हीरो विलेन को मारने का तब तक खयाल ही न करे जब तक कि उसके नाक से खून न निकले और वह उस खून को अपने हाथ पोछ कर देख न ले। तो अधमरा हो जाने के बाद बदन में शैतान समाना हमारे ही बॉलीवुड फार्मूले की नकल है। हम भारतीयों की चीजों को एक दूसरा रूप दे देना तो सदियों से चलता चला आ रहा है। अब देखिये न, शताब्दियों पहले लोग हमारे अंकों को यहाँ से ले गये और बाद में उसे अंग्रेजी अंकों का रूप देकर हम लोगों को ही परोस दिया।

हाँ तो मैं लड़ाई की बात कर रहा था। अजीब लड़ाई है यह। कोई नियम नहीं, कोई कानून नहीं। हमारे यहाँ तो तलवार वाला तलवार वाले से और गदा वाला गदे वाले से ही लड़ा करता था। निहत्थे पर हाथ नहीं उठाया जाता था। किसी के मूर्छित हो जाने पर फिर वार नहीं किया जाता था। पर इस लड़ाई में तो सब जायज है। जैसी मर्जी आये मारो, बस कूटते रहो, धुनते रहो। देखने वालों को मजा आता है। वास्तव में मानव सदा से ही हिंसा प्रेमी रहा है, उसे हिंसा में सदा आनन्द आता रहा है, हिंसा करके या हिंसा देख कर मजा लेना उसका मूल स्वभाव है। खैर यह कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है इंसान के हिंसक स्वभाव का फायदा उठा कर कमाई करना।

हमें तो लगता है कि WWE के ये सारे लड़ाकू जयद्रथ के वंशज हैं। महाभारत की लड़ाई में एक योद्धा से अनेक योद्धा मिल कर युद्ध करने का नियम नहीं होने के बाद भी जयद्रथ ने और योद्धाओं को फुसला कर अपने साथ मिला लिया था और अभिमन्यु पर एक साथ सात-सात योद्धाओं ने युद्ध किया था। पर समझ में नहीं आया कि जयद्रथ के वंशज अमेरिका में जा कर कब बस गये।

कुछ भी हो, ये दानवों जैसे दिखने वाले लड़ाकुओं की लड़ाई खूब लोकप्रिय हो रहा है अपने देश में, खास कर युवा और किशोर वर्ग में। हमने बच्चों से कहा बेटा जरा डिस्कव्हरी चैनल लगाना तो वे कहते हैं नहीं जी हम तो WWE देखेंगे, अभी तो 'खली' आने वाला है। अब आज के जमाने में बच्चों के आगे बड़ों की चलती ही कहाँ है? सो हम चुपचाप वहाँ से खिसक लिये अपने कम्प्यूटर के कीबोर्ड में खिटिर पिटिर करने लगे। नतीजे के रूप में जो आया उसे अब आप पढ़ रहे हैं और पढ़ कर पछता रहे हैं कि आखिर इस लेख का तात्पर्य क्या है? अब हम क्या और क्यों लिख रहे हैं हमें ही नहीं पता तो आपको क्या बतायें! हाँ आप लोग तो विद्वजन हैं, इसलिये कुछ न कुछ तात्पर्य निकाल ही लेंगे। यदि कोई तात्पर्य निकल जाये तो हमें भी बताना न भूलियेगा।

Wednesday, May 14, 2008

आज ही देखें 1 अगस्त 2008 का खग्रास चन्द्रग्रहण अपने PC पर!

अब आप ब्रह्माण्ड की किसी भी घटना को कभी भी अपने PC पर देख सकते हैं। और यह सब सम्भव हुआ है माइक्रोसॉफ्ट के नवीनतम सॉफ्टवेयर 'विश्वव्यापी दूरबीन' (Worldwide Telescope) की वजह से, जिसे आम लोगों के लिये अब जारी कर दिया गया है। 'विश्वव्यापी दूरबीन' (Worldwide Telescope) डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें!

'विश्वव्यापी दूरबीन' (Worldwide Telescope) की सहायता से अब आप किसी भी ग्रह, नक्षत्र, खगोलीय पिण्ड को अपने PC पर किसी भी कोण से देख सकते हैं।


(शनि का चित्र)

अन्तरिक्ष में पृथ्वी ऐसी दिखाई देती है:


केवल इतना ही नहीं बल्कि 1 अगस्त 2008 का खग्रास चन्द्रग्रहण को ग्रहण के आरम्भ से अन्त तक आप अभी ही अपने PC पर देख सकते हैं। उस चन्द्रग्रहण के एक दृश्य का स्क्रीनशॉट देखें:


'विश्वव्यापी दूरबीन' (Worldwide Telescope) डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें!

भूल सुधार

श्री सुशील कुमार जी को धन्यवाद जिन्होंने मेरी भूल की जानकारी दी। वास्तव में मैं यह बताना भूल गया था कि सॉफ्टवेयर बिल्कुल मुफ्त है।

Tuesday, May 13, 2008

बेताल की ब्लोग कथा

हमेशा की तरह बेताल ने कहानी शुरू की, "सुन विक्रम! कालान्तर में जम्बूद्वीप का नाम भारतवर्ष हो गया। 400 वर्षों तक विदेशियों की गुलामी करने के बाद अंततः भारत स्वतंत्र हुआ और विकास के रास्ते पर चल पड़ा। वहाँ कम्प्यूटर, इंटरनेट आदि के साथ ब्लोग भी पहुँच गया। सन् 2003 में अल्प सुविधा होने के बावजूद भी हिन्दी के कुछ दिग्गजों ने अथक परिश्रम करके हिन्दी के ब्लोग बना लिये। पहले तो उनके ब्लोग को कोई नही जानता था किन्तु धीरे-धीरे लोगों को हिन्दी ब्लोग की जानकारी होती गई और हिन्दी ब्लोगिंग का विकास होना शुरू हो गया। परंतु विकास की गति कछुए की चाल जैसी ही थी। सन् 2003 से 2008 तक हिन्दी ब्लोगिंग रेंगना सीखने वाले बच्चे की तरह डगमगाता गिरता उठता आगे बढता रहा। सन् 2007 के अंत में हिन्दी ब्लोगिंग की गति अत्यंत तीव्र हो गई क्योंकि इन्टरनेट जगत की ख्यातिनाम कंपनियाँ, जिन्हें हिन्दी से कभी कोई सरोकार नहीं रहा था, अचानक हिन्दी पर मेहरबान हो गई और उन्होंने करोड़ो अरबो खर्च करके हिन्दी के सॉफ्टवेयर बनवाये। इन सॉफ्टवेयर्स का फायदा हिन्दी ब्लोगर्स को भी मुफ्त में मिलने लगा और द्रुत गति से हिन्दी ब्लोग्स की संख्या में वृद्धि होने लगी। हिन्दी ब्लोग्स का भविष्य शानदार नजर आने लगा।"

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा, "बता विक्रम जिन कंपनियों को हिन्दी से कभी कोई सरोकार नहीं था वे अचानक हिन्दी पर इतनी मेहरबान क्यों हो गईं?"

विक्रम ने उत्तर दिया, "जब तक भारत में इंटरनेट का उपयुक्त विकास नहीं हुआ था तब तक इन कंपनियों को भारत के 54 करोड़ हिन्दी बोलने वालों से किसी भी प्रकार के व्यापार की उम्मीद नहीं थी किन्तु भारत में ब्राडबैंड, डीसीएल आदि के आने पर इन कंपनियों को भारत में व्यापार करने का और मोटा लाभ कमाने का पूरा-पूरा अवसर दिखाई देने लगा। ग्राहक को प्रभावित करने के लिये उनकी भाषा का ही प्रयोग करना अधिक लाभदायी समझकर इन कंपनियों ने हिन्दी के सॉफ्टवेयर्स बनवायें। उन्हें हिन्दी या हिन्दी ब्लोगर्स से न तो पहले कभी सरोकार था और न बाद में ही हुआ। वे तो व्यापारी है और अपने व्यापार को बढाने के लिये ही उन्होंने हिन्दी को आगे बढाया। खैर उनका उद्देश्य चाहे जो भी हो हिन्दी और हिन्दी ब्लोग्स का भला तो हो ही गया, यदि वे हिन्दी को आगे न बढ़ाते तो हिन्दी को आगे बढ़ने में दसों साल लग जाते क्योंकि इस देश की सरकार तो हिन्दी को कछुआ चाल से ही आगे बढ़ाती।"

विक्रम के उत्तर देते ही बेताल वापस पेड़ पर जाकर लटक गया।

Sunday, May 11, 2008

हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की संख्या कैसे बढ़ायें

ऐसा नहीं है कि हिन्दी के पाठक नहीं हैं। अवश्य हैं और पर्याप्त से अधिक संख्या में हैं। किन्तु उन्हें हिन्दी ब्लोग्स के विषय में जानकारी नहीं है। अतः सबसे पहले हमें हिन्दी पाठकों को हिन्दी ब्लोग्स के विषय में अवगत कराना होगा।

अब तक तो आप सभी लोगों को विदित हो ही गया होगा कि 'उड़न तश्तरी' जी ने एक अभियान छेड़ा है। मैं तो कहूँगा कि यह अभियान नहीं बल्कि एक महायज्ञ है। इस महायज्ञ को पूर्णाहुति तक लाने लिये आइये हम सभी श्री समीर लाल जी के साथ एक जुट हो कर युद्धस्तर का प्रयास करें।

इस बात में तो किसी प्रकार के सन्देह की गुंजाइश ही नहीं है कि हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की संख्या बहुत ही कम या नहीं के बराबर ही है। हम ही लिखते हैं और हम ही एक दूसरे के ब्लोग्स को पढ़ते तथा उन पर टिप्पणी भी करते हैं। किन्तु अब हमें अपने सिवा अन्य पाठकों की संख्या बढ़ानी ही होगी।

समीर लाल जी की टिप्पणी से प्रेरित हो कर मैंने अपने एक परिचित को तो 'ब्लागिया' बना ही दिया। 'नौसिखिया' नाम रखा है उन्होंने अपने ब्लोग का। वे धमतरी के रहने वाले हैं और रायपुर में कार्यरत हैं। जानना चाहेंगे कि अपने ब्लोग में पहला पोस्ट करने के तत्काल बाद उन्होंने क्या किया? उन्होंने तुरन्त फोन उठाया और धमतरी के अपने 8-10 मित्रों से अपने ब्लोग को देखने और पढ़ने का आग्रह किया। उनके मित्र जब उनके ब्लोग को देखेंगे तो अवश्य ही उन्हें अन्य हिन्दी ब्लोग्स के विषय में जानने की उत्सुकता तो होगी ही और धीरे-धीरे वे हम सब लोगों के ब्लोग्स जान ही लेंगे। इस प्रकार से कम से कम एक हिन्दी ब्लोगर और 8-10 हिन्दी पाठकों की संख्या तो बढ़ ही गई। ऐसे पाठकों की जो कि'अन्य पाठक' की श्रेणी में आयेंगे अर्थात् स्वयं ब्लोगर नहीं हैं।

तो मेरा अनुरोध है कि आप भी श्री समीर लाल जी का कहना मान कर कम से कम अपने एक परिचित को अवश्य ही हिन्दी ब्लोगर बनायें। वास्तव में यह हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा होगी।

Friday, May 9, 2008

टिप्पणी तो करा दीजिये

मुझको ब्लोगर बना दीजिये
मेरी रचना पढ़ा दीजिये

अच्छा लिखूँ मैं या ना लिखूँ
टिप्पणी तो करा दीजिये

लोकली मैं छपूँ ना छपूँ
नेट पर तो छपा दीजिये

पोस्ट चोरी का है ये मेरा
मत किसी को बता दीजिये

मूल गज़ल

लज़्ज़त-ए-गम बढ़ा दीजिये
आप यूँ मुस्कुरा दीजिये

कीमत-ए-दिल बता दीजिये
खाक लेकर उड़ा दीजिये

चांद कब तक गहन में रहे
आप ज़ुल्फें हटा दीजिये

मेरा दामन अभी साफ है
कोई तोहमद लगा दीजिये

आप अंधेरे में कब तक रहें
फिर कोई घर जला दीजिये

एक समुन्दर ने आवाज दी
मुझको पानी पिला दीजिये

मूल गजल सुनें:

Wednesday, May 7, 2008

बूढ़ा बरगद


सबकी सेवा करते करते
चलो आज मैं वृद्ध हुआ
तिरस्कार भी पाकर अब तक,
नहीं कभी भी क्षुब्ध हुआ

फोटो worth1000।com के सौजन्य से!


हम भी ब्लोगर बनेंगे

सुबह सवेरे वे आ धमके। कहने लगे, "हम भी ब्लोगर बनना चाहते हैं"। हमने कहा, "तो बन जाइये दिक्कत क्या है?"

वे बोले, "अजी दिक्कत ही दिक्कत है। हम तो ये भी नही जानते कि ये ब्लोगर कैसे बनते है?" हम बोले, "यार पहले ये बताओ कि तुम्हें ब्लोगर बनने की सूझी कैसे?" उन्होनें कहा, "कुछ दिन पहले एनडीटीवी में देखा था कि अमिताभ बच्चन ब्लोगर बन गये है। अब भई हमारे फेवरिट स्टार ब्लोगर बन गये है तो हम भी क्यों न बनें।" हमने आश्चर्य से पूछा, "तो आप सिर्फ इसलिये ब्लोगर बनना चाहते हैं कि अमिताभ बच्चन ब्लोगर बन गये हैं?" वे बोले, "हाँ भइ हाँ, हम हर वो काम किया करते हैं जो अमिताभ साहब करते हैं। अब आप देर मत करें और फटाफट हमे ब्लोगर बना दें।"

"चलो, ब्लोगर तो मैं आपको बना दूँगा, पर उसमे लिखोगे क्या?"

"तो क्या ब्लोगर बनने के लिये कुछ लिखना भी पड़ता है?" उन्होंने आश्चर्य से पूछा।

हमने बताया, "लिखना भी नहीं, लिखना ही पड़ता है।"

"तो आप अपने ब्लोग में क्या लिखते हैं?"

"अरे भइ, जो कुछ सूझता है लिख देता हूँ।"

वे बोले, "यार तब तो लिखना बहुत सरल काम है।"

हमने कहा, "हाँ भइ, लिखना तो बहुत सरल काम है पर जो ये सूझना है न, वही बहुत मुश्किल होता है।"

वे बोले, "तो आप हमारे लिये कुछ लिख भी दीजिये न।"

हमने कहा, "नही भइ, ये नहीं हो सकता। हम तो अपने लिये ही बड़ी मुश्किल से लिख पाते है।"

बोले, "यार, ब्लोगर तो बनना ही है। अब आप ही कुछ जुगाड़ करो। कोई न कोई रास्ता तो जरूर होगा ब्लोगर बनने का।"

हम गम्भीर हो गये। एक युक्ति सूझ ही गई। उनसे पूछा, "भई अपने ब्लोग का नाम क्या रखोगे?" थोड़ी देर तक वे सोचते रहे फिर बोले, "यार हम तो नौसिखिये है हमारे ब्लोग का नाम नौसिखिया ही रख दो"

हमने ब्लोगर.कॉम में उनका एक ब्लोग बनाया, कृति निर्देशिका से अपना ही एक लेख लिया और उनके ब्लोग में प्रकाशित कर दिया। अपने ब्लोग को देखकर झूम उठे। हमने पूछा, "पढोगे नहीं?" वे बोले, "अजी, अब पढना‍-वढना क्या है?"

अचानक उनकी नजर 'टिप्पणी लिखें' पर पड़ गई। बोले, "आपने तो टिप्पणी तो लिखा ही नहीं।"
हमने बताया कि टिप्पणी पाठक लोग लिखते है। तो वे बोले, "तो आप हमारे पाठक बन जाइयें और एक टिप्पणी लिख दीजिये।" हमने कहा, "भई हम तो टिप्पणी नहीं लिख सकते क्योंकि आपके ब्लोग में हमने अपना ही लेख डाला है। अब अपने ही लेख की टिप्पणी कैसे करें।"

वे बोले, "कोई और मित्र हो तो उससे टिप्पणी करवा दो।"

हमने कहा, "यार आप तो प्रतीक्षा करों। किसी न किसी दिन कोई पाठक आपके ब्लोग को पढकर अवश्य ही टिप्पणी करेगा।"

"ठीक है मै टिप्पणी का इंतजार करूंगा।" कहकर वे चले गये।

आज भी उन्हे टिप्पणी का इंतजार है और हम जानते है कि उनके ब्लोग में कभी भी कोई टिप्पणी नहीं होने वाली है क्योंकि न तो उनके ब्लोग को कोई जानता है और न ही वो लेख दमदार है।

Monday, May 5, 2008

आइये! चन्द्रमा तक घूम आयें।

चौंकिये मत। नासा (NASA) अपने अगले चन्द्र मिशन (lunar mission) के एक हिस्से के तहत चन्द्रमा की यात्रा करने की इच्छा रखने वालों के लिये चन्द्रमा के द्वार खोलने जा रहा है। और इसके लिये सालों चलने वाले परीक्षण (test), किसी प्रशिक्षण (training) या स्मोकिंग एस्ट्रोटर्फ की कोई आवश्यकता भी नहीं है। किन्तु दुर्भाग्य से चन्द्रमा तक आप नहीं सिर्फ आपका नाम ही जायेगा। वैसे आपका नहीं जाना ही अच्छा है क्योंकि नक्षत्रों में लैंडिंग तथा आउटपोस्ट साइट्स (landing and outpost sites) का चयन करने वाला चन्द्र टोही यान (Lunar Reconnaissance Orbiter) लौट कर वापस नहीं आने वाला है।

तो यदि आप अपने नाम को चन्द्रमा तक भेजना चाहते हैं तो नासा के मिसन साइट (mission site) में जाकर अपना नाम दर्ज करा दें। आपका नाम उस चिप में जोड़ लिया जायेगा जो कि ब्रह्माण्ड के वृहतम 'चीज़' (biggest cheese in the Universe) अनन्त काल तक चक्कर लगाता रहेगा।

और हाँ, इसके लिये आपको नासा से एक प्रमाणपत्र भी प्राप्त होगा।

चन्द्रमा में अपना नाम भेजने के लिये यहाँ क्लिक करें

Thursday, May 1, 2008

आर्टिकल डायरेक्टरी के फायदे

आर्टिकल डायरेक्टरी (article directory) जिसे हिन्दी में कृति निर्देशिका कहते हैं क्या होता है?

आर्टिकल डायरेक्टरी (article directory) जिसे हिन्दी में कृति निर्देशिका कहते हैं एक प्रकार की निर्देशिका होती है जिसमें कोई भी रचनाकार अपनी किसी भी रचना को अपने नाम तथा अपने ब्लोग/वेबसाइट के लिंक के साथ मुफ्त में प्रकाशित कर सकता है तथा उसमें प्रकाशित रचनाओं का उपयोग कोई भी व्यक्ति मुफ्त में अपने ब्लोग/वेबसाइट आदि में प्रकाशन के लिये कर सकता है किन्तु बिना किसी प्रकार की हेर-फेर किये और रचनाकार के नाम तथा ब्लोग/वेबसाइट के लिंक के साथ।

क्यों आवश्यकता हुई कृति निर्देशिकाओं की?

सभी चाहते हैं कि उसके ब्लोग/वेबसाइट को सर्च इंजिन में प्राथमिकता मिले। सर्च इंजिन उन ब्लोग/वेबसाइट को प्राथमिकता देते हैं जिनको प्रायः रोज ही अपडेट किया जाता है अर्थात् जिनमें प्रतिदिन नई लेखन-सामग्री (new content) डाली जाती है। अब प्रतिदिन एक नई रचना रच लेना हर किसी के बस की बात नहीं होती। किन्तु सर्च इंजिन को इससे कोई सरोकार नहीं है कि आप रोज नया लेख लिख सकते हैं या नहीं, उसे तो आपके ब्लोग/वेबसाइट को प्राथमिकता देने के लिये रोज नई सामग्री चाहिये ही। इसीलिये कृति निर्देशिकाओं की आवश्कता हुई कि लोग एक दूसरे की रचनाओं का उपयोग कर सकें।

कृति निर्देशिकाओं के क्या फायदे हैं?

सभी ब्लोगर्स/वेबमास्टर्स को नई सामग्री प्राप्त हो जाती है।

जो स्वयं अपना लेख नहीं लिख सकते, और पेशेवर लेखकों की सेवाएँ खरीदने में भी असमर्थ होते हैं, उन्हें भी अपने ब्लोग/वेबसाइट के लिये मुफ्त रचनाएँ मिल जाती हैं।

जो रचनाकार अपनी रचनाएँ कृति निर्देशिकाओं को प्रदान करते हैं उन्हें लोकप्रियता तो मिलती ही है, सैकड़ों तथा हजारों की तदात में बैकलिंक्स भी मिल जाते हैं। (किसी ब्लोग/वेबसाइट का किसी दूसरे ब्लोग/वेबसाइट में लिंक होने को बैकलिंक कहा जाता है)। सर्च इंजिन के लिये बैकलिंक्स का महत्व डेली अपडेशन से कहीं अधिक होता है। यदि आपके ब्लोग/वेबसाइट के पास 100 वेबलिंक्स हैं और मेरे ब्लोग/वेबसाइट का केवल 1 तो इस स्थिति में सर्च इंजिन आपके ब्लोग/वेबसाइट को मेरे ब्लोग/वेबसाइट से पहले दिखायेंगे, भले ही आपका ब्लोग/वेबसाइट मेरे ब्लोग/वेबसाइट की अपेक्ष बिल्कुल ही नया क्यों न हो। अधिक पेज रैंक वाले ब्लोग/वेबसाइट में बैकलिंक्स होने का और भी बहुत महत्व होता है।

मान लीजिये आपने हिंदी वेबसाइट कृति निर्देशिका (वर्तमान पेज रैंक 3) में अपनी एक रचना प्रकाशित की। तो आपके ब्लोग/वेबसाइट को पेज रैंक 3 वाली वेबसाइट में 1 बैकलिंक तो मिल ही जायेगा अब यदि आपकी रचना को 100 लोगों ने पसंद किया और उसका प्रकाशन अपने ब्लोग/वेबसाइट में कर दिया तो आपको 100 बैकलिंक्स और भी मिल गये। इस प्रकार से अधिक से अधिक बैकलिंक्स मिलने से आपके ब्लोग/वेबसाइट का पेज रैंक बढ़ता जायेगा और सर्च इंजिन के पहले पेजों में ही उसे स्थान मिलने लगेगा।

इसके अतिरिक्त मान लीजिये कोई व्यक्ति, जो कि आपके ब्लोग/वेबसाइट के विषय में नहीं जानता, आपकी रचना को किसी अन्य ब्लोग/वेबसाइट में पढ़ता है तो रचना पसंद आने पर वह आपकी अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिये अवश्य ही आपके ब्लोग/वेबसाइट में आयेगा और इस प्रकार से आपके पाठकों की संख्या में भी वृद्धि होगी।

तो क्या मुझे कृति निर्देशिका के लिये कोई नई रचना गढ़नी होगी?

जी नहीं। आप अपने किसी भी पुरानी (और लोकप्रिय भी) रचना को, जो कि भले ही पहले से ही आपके ब्लोग/वेबसाइट में प्रकाशित हो चुकी हो, किसी एक कृति निर्देशिका या एक से अधिक कृति निर्देशिकाओं में प्रकाशित कर सकते हैं और बैकलिंक्स बढ़ा सकते हैं। आप चाहें तो नई रचना भी रच सकते हैं। यह पूरी तरह से आपकी मर्जी पर निर्भर है कि आप कृति निर्देशिका को अपनी कौन सी रचना प्रदान करें।

अधिक से अधिक बैकलिंक्स के क्या फायदे हैं?

  • आपके ब्लोग/वेबसाइट को सर्च इंजिन के पहले पेजों में स्थान मिलता है।
  • आपके ब्लोग/वेबसाइट का पेज रैंक बढ़ते जाता है।
  • पेज रैंक बढ़ने से एडसेंस के मंहगे विज्ञापन आपके ब्लोग/वेबसाइट में स्वतः ही प्रकाशित होने लगते हैं और आपके एडसेंस रिव्हेन्यू में बढ़ोत्तरी होती जाती है।

 
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