Friday, November 27, 2009

गाने के रेकॉर्डिंग के लिये माइक्रोफोन को गरम करना पड़ता था

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि फिल्मों में गानों के रेकॉर्डिंग के आरम्भिक दिनों में माइक्रोफोन इतने कमजोर हुआ करते थे कि अनेक बार रेकॉर्डिंग शुरू करने के पहले माइक्रोफोन को आँच दिखा कर गरम करना पड़ता था। गाना रेकॉर्ड करने के लिये माइक्रोफोन को बीच में रख कर गायक और साजिंदे उसके चारों ओर घेरा बनाते थे। जब माइक्रो फोन अधिक गरम हो जाता था तो घेरे को भी बड़ा करना पड़ता था ताकि रेकॉर्डिंग एक जैसा हो।

उन दिनों साज के नाम पर हारमोनियम, तबला, बाँसुरी जैसे केवल गिने-चुने वाद्ययंत्र ही उपलब्ध थे। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व अधिक था। आवाज का महत्व अधिक होने के कारण ही एक अंतराल तक के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे जैसे गायक फिल्म संगीत के क्षेत्र में छाये रहे। फिल्मों में काम करने के लिये गीत-संगीत का ज्ञान होना अनिवार्य होता था क्योंकि प्ले बैक का सिस्टम नहीं था। कलाकारों को अपना गाना स्वयं गाना पड़ता था।


फिर जमाना बदला, नये-नये तकनीक आने लगे, साजों में भी वृद्धि होने लगी। सन् 1944 में संगीतकार नौशाद ने पहली बार फिल्म 'रतन' में साज और आवाज का भरपूर प्रयोग किया और फिल्म संगीत को एक नई दिशा मिली। नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम ने फिल्म संगीत को मधुर और सर्वप्रिय बना दिया। धुनों में साज और आवाज के समुचित अनुपात उन्हें और भी अधिक मधुर बना देते थे और सार्थक शब्द संरचना सोने में सुहागा का काम करती थीं।

सन् 1950 से 1980 तक का समय फिल्म संगीत का स्वर्ण युग रहा। मेलॉडियस संगीत उस काल के फिल्मों की आत्मा बन गई। एक एक गीत को परदे पर देखने और सुनने के लिये लोग अनेक बार एक ही फिल्म को देखने जाते थे और अधिकतम फिल्में सिल्व्हर जुबली, गोल्डन जुबली तथा प्लेटिम जुबली मनाया करती थीं। सारे के सारे संगीतकार अपनी धुनों को सुमधुर सुरों से सजाने के लिये अथक परिश्रम किया करते थे। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण आदि भी गीतों को सार्थक बनाने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया करते थे। गायक गायिकाओं के कर्णप्रिय कंठस्वर उन दिनों के संगीत में चार चाँद लगा दिया करती थीं। कई बार तो फिल्में पिट जाती थीं पर उनका संगीत गूंजते रहता था। पारसमणि (गीत - उइ माँ, उइ माँ ये क्या हो गया........, सलामत रहो........), लुटेरा (गीत - किसी को पता ना चले बात का........), बादशाह (गीत - अभी कमसिन हो, नादां हो जानेजाना........) जैसी स्टंट फिल्मों के भी गीत आज तक लोकप्रिय हैं।

सभी संगीतकार अपनी मौलिकता बनाये रखना चाहते थे और सभी की अपनी अपनी स्टाइल थी। बर्मन दा अपनी धुनों में लोक संगीत का बहुत अच्छा समावेश कर लेते थे। आपको शायद पता हो कि सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के राजपरिवार से सम्बंधित थे। बर्मन दा को वर्ल्ड म्युजिक कान्टेस्ट (world music contest) का जूरी होने का गौरव भी प्राप्त था। सलिल चौधरी भारतीय और पश्चिमी दोनों ही संगीत में पारंगत थे और दोनों का बहुत अच्छा समावेश किया करते थे। शंकर जयकिशन ज्यादातर एकॉर्डियन और बांसुरी के मेल से अपनी धुनों को सजाया करते थे। कल्याणजी आनंदजी क्लार्नेट का बहुत अच्छा इस्तेमाल करते थे। फिल्म नागिन में हेमंत कुमार के लिये बीन की धुन को कल्याणजी आनंदजी ने ही क्लार्नेट पर बजाया था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ढोलक और बांसरी के प्रयोग से अपनी धुनों को मधुर बनाते थे। ओ.पी. नैयर ने संगीत की कोई शिक्षा ही नहीं प्राप्त की थी फिर भी इतनी मधुर धुनें बनाते थे कि लोग सुन कर झूम उठते थे।

सन् 1980 के बाद से मेलॉडी के स्थान पर डिस्को, पॉप इत्यादि पश्चिमी धुनों का प्रचलन बढ़ता गया। निरर्थक गीत लिखे जाने लगे और धुनों में वाद्ययंत्रों की बहुलता बढने लगी। गीतों की उम्र कम होने लगीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अब तो शोर ही संगीत का पर्याय सा हो गया है।

चलते-चलते

"वो सुबह हमीं से आयेगी" या "वो सुबह कभी तो आयेगी"?

साहिर साहब ने एक गीत लिखा था "वो सुबह हमीं से आयेगी" किन्तु फिल्म "फिर सुबह होगी" में उन्होंने अपने उसी गीत को "वो सुबह कभी तो आयेगी" के रूप में बदल दिया था। प्रस्तुत हैं दोनों गीतः

साहिर लुधियानवी

वो सुबह हमीं से आयेगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

वहीं वे अपने उसी गीत को कैसे निराशावादी रूप दे देते हैः

वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे, अर्मानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी
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