Tuesday, December 15, 2009

ये शराबी की मैयत है इसको जो पिये वही कांधा लगाये

आपको शराबी की मैयत में ले जाने के पहले बता देना चाहता हूँ किः

ये ब्लोगिंग नहीं आसां ...

हाँ भाई, ब्लोगिंग कोई आसान काम नहीं है, बहुत कुछ करना पड़ता है इसके लिये। कभी अंदर की शराब वही रख कर बोतल बदलनी पड़ती है तो कभी समोसा वही रख कर अन्दर का आलू बदलना पड़ता है। दूसरों के लिखे को तो छोड़ो, कई बार अपने ही पोस्ट में काटछाँट करना पड़ता है, हेडिंग बदलना पड़ता है ताकि नया लगने लगे। अब देखिये ना, गूगल बाबा ने "है बातों में दम" लेख प्रतियोगिता शुरू कर दिया। तो हम कैसे चुप बैठे रहते? बस, निश्चय कर लिया इसमें भाग लेने के लिये। अपने एक पोस्ट को इस प्रतियोगिता में डालने के लिये सोच लिया। पर प्रतियोगिता के नियम में साफ लिखा है लेख पूर्व प्रकाशित नहीं होना चाहिये और १०० से १००० शब्दों वाला होना चाहिये। अब एक तो हमारा पोस्ट पहले से प्रकाशित है और १००० शब्दों से अधिक वाला है। पर हमने भी सोच लिया कि डालेंगे तो इसी लेख को ही। बस सबसे पहले तो शीर्षक बदल कर नया शीर्षक दिया "ये शराबी की मैयत है इसको जो पिये वही कांधा लगाये"। फिर उस लेख को लेख की भाषा में परिवर्तन कर करते हुए १००० शब्दों से कम का बना दिया और डाल दिया प्रतियोगिता में शामिल होने के लिये। हमारी मेहनत रंग लाई और वह लेख स्वीकृत भी हो गया (यहाँ पर)। तो आप भी देखिये उस लेख के नये रूप कोः
सामने मेरी लाश पड़ी थी और मैं आश्चर्य से उसे देखे जा रहा था। रात में सोने के बाद मेरे प्राण निकल गये थे।

मेरे लड़के ने मेरे मृत शरीर को देखा और घर के लोगों को जगाना शुरू कर दिया।

सबको जगा कर उसने कहा, "पापा तो रेंग लिये।"

"क्या? रात को तो अच्छे भले थे।" मेरी बहू ने कहा।

"सही कह रहा हूँ। देख लो जाकर।"

इतना कह कर लड़का रिश्तेदारों को फोन से सूचना देने लग गया।

बहू ने कहा, "अगर पता होता कि मर जायेंगे तो क्यों इस नये बिस्तरे पर सोने देती इन्हें! अब तो इसे दान में देना पड़ेगा। अफसोस!"

मेरे भाई की पत्नी ने कहा, "कोई जरूरत नहीं है दान-वान में देने की। इसे जल्दी से भीतर रख दो और कोई फटा-पुराना बिस्तर लाकर यहाँ रख दो।"

एक रिश्तेदार ने कहा, "सुना है कि कुछ लिखते विखते भी थे।"

मेरे एक लेखक मित्र ने कहा, "लिखता क्या था, अपने आपको लेखक दिखाता था। उसके लिखे को कोई पूछता नहीं था इसलिये इंटरनेट में डाल दिया करता था।"

एक सज्जन बोले, "मरने के बाद तो उनकी बुराई मत करो।"

मित्र ने कहा, "कौन स्साला बुराई कर रहा है? किसीके मर जाने पर सच्चाई बदल जाती है क्या? इतनी अधिक उम्र हो जाने पर भी बड़प्पन नाम की चीज तो छू भी नहीं गई थी इसे। खैर आप कह रहे हैं तो अब आगे मैं और कुछ नहीं कहूँगा।"

मेरा लड़का बोला, "पापा साठ साल से भी अधिक जीवन बिताकर गए हैं। आजकल तो लोग पैंतालीस-सैंतालीस में ही सटक लेते हैं। हम लोगों को गम मना कर उनकी आत्मा को दुःखी नहीं करना है। लम्बी उमर सफलतापूर्वक जीने के बाद उनके स्वर्ग जाने की खुशी मनाना है।"

मेरे भतीजे ने कहा, "अब हमें चाचा जी का क्रिया-कर्म बड़े धूम-धाम से करना है। दीर्घजीवी लोगों की शव-यात्रा बैंड बाजे के साथ होती है। जल्दी से बैंड बाजे का प्रबंध किया जाये।"

"आजकल तो बैंड का चलन ही खत्म हो गया है।" एक रिश्तेदार बोला।

"तो फिर डीजे ही ले आते हैं।"

"डीजे का प्रयोग तो लोग नाच-कूद कर खुशी मनाने के लिये करते हैं।"

"बात तो खुशी की ही है, हम लोग भी शव-यात्रा में नाचते-कूदते ही चलेंगे।"

"नाचने के लिये तो पहले मदमत्त होना जरूरी है। बिना दारू पिये कोई मदमस्त तो हो ही नहीं सकता। अब मैयत में लोगों को दारू तो पिलाई नहीं जा सकती?"

"क्यों नहीं पिलाई जा सकती? मरने वाला भी तो दारू पीता था। लोगों को दारू पिलाने से तो उनकी आत्मा को और भी शान्ति मिलेगी।"

"ये दारू भी पीते थे क्या?" किसी ने पूछा।

"पीते थे और रोज पीते थे। पूरे ड्रम थे वो। दारू के असर करने पर उनके ज्ञान-चक्षु खुल जाते थे। धर्म-कर्म की बातें करते थे। रहीम और कबीर के दोहे कहा करते थे। हम लोग बोर होते थे। पीने के बाद भला ऐसी बातें करनी चाहिये? करना ही है तो किसी की ऐसी-तैसी करो, किसी की टांग पकड़ कर खींचो, किसी को परेशान करने वाली बातें करो।"

"तो तुम उठ कर चल क्यों नहीं देते थे?"

"उनके पैसे से दारू पीते थे तो उन्हें झेलना भी तो पड़ता था। फिर घर जाकर घरवाली की जली-कटी सुनने से तो इन्हें झेल लेना ही ज्यादा अच्छा था।"

बहू ने मेरे लड़के को एक तरफ ले जाकर जाकर कहा, "ये क्या दारू की बात हो रही है? और तुम भी इन सब की हाँ में हाँ मिलाये जा रहे हो। इसमें तो पन्द्रह-बीस हजार खर्च हो जायेंगे।"

"तो तुम्हें कौन कह रहा है खर्च करने के लिये?"

"पर जानूँ भी तो आखिर खर्च करेगा कौन?"

"मैं करूँगा, मैं।" लड़के ने छाती फुलाते हुए कहा।

"बेटे की मोटर-सायकल मरमम्त के लिये पाँच हजार तो हाथ से छूटते नहीं हैं और जो मर गया उसके लिये इतने रुपये निकाले जा रहे हैं। इसी को कहते हैं 'जीयत ब्रह्म को कोई ना पूछे और मुर्दा की मेहमानी'। खबरदार जो एक रुपया भी खर्च किया, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"अगर मेरे पास रुपये होते तो मैं भला अपने बेटे को क्यों नहीं देता? पर बाप का अन्तिम संस्कार तो करना ही पड़ेगा ना!"

"बेटे के लिये नहीं थे तो बाप के लिये अब कहाँ से आ गये रुपये?"

"बुढ़उ ने खुद दिये थे मुझे पचास हजार रुपये परसों, अपने बैंक खाते में जमा करने के लिये। कुछ कारण से उस दिन मैं बैंक नहीं जा पाया और दूसरे दिन बैंक की छुट्टी थी। अब उन रुपयों में से उन्हीं के लिये अगर पन्द्रह-बीस हजार खर्च कर भी दूँ तो भी तो तुम्हारे और तुम्हारी औलाद के लिये अच्छी-खासी रकम बचेगी। अब चुपचाप मुझे अपने बाप का क्रिया-कर्म करने दो।"

लड़के ने वापस मण्डली में आकर कहा, "भाइयों, आप लोगों ने जैसा सुझाया है सब कुछ वैसा ही होगा। डीजे भी आयेगा और दारू भी।"

इतने में ही एक आदमी ने आकर कहा, "हमें खबर लगी है कि जी.के. अवधिया जी की मृत्यु हो गई है, कहाँ है उनकी लाश?"

हकबका कर मेरे लड़के ने पूछा, "आपको क्या लेना-देना है उनसे?"

"मैं सरकारी अस्पताल से आया हूँ उनकी लाश ले जाने के लिये, पीछे पीछे मुर्दागाड़ी आ रही है। उन्होंने तो अपना शरीर दान कर रखा था।"

वे लोग मेरे शरीर को ले गये और मेरी शव-यात्रा के लिये आये हुये लोगों को बिना पिये और नाचे ही मायूसी के साथ वापस लौट जाना पड़ा।

उनके जाते ही यमदूत मेरे सामने आ खड़ा हुआ और बोला, "चलो, तुम्हें ले जाने के लिये आया हूँ। जो कुछ भी तुमने अपने जीवन में पाप किया है उस की सजा तो नर्क पहुँच कर तुम्हें मिलेगी ही पर हिन्दी में ऊल-जलूल लिखकर उसका स्टैण्डर्ड गिराने की सजा तो तुम्हें अभी ही यहीं पर मिलेगी।"

इतना कह कर उसने अपना मोटा-सा कोड़ा हवा में लहराया ही था कि मेरी चीख निकल गई और चीख के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई।

तो इसे कहते हैं "रिठेल"!

चलते-चलते

इलाके का मशहूर गुंडा हलवाई की दूकान में पहुँचा और नशे में लड़खड़ाती आवाज में बोला, "पाँच रुपये की रबड़ी देना।"

हलवाई ने कहा, "रबड़ी खत्म हो गई है।"

"तो ये क्या है?" नशे में लड़खड़ाती आवाज।

"ये मोतीचूर के लड्डू हैं।"

"क्या भाव?" फिर नशे में लड़खड़ाती आवाज।

"सौ रुपये किलो।"

"दस किलो तौलो।"

डरे हुए हलवाई ने तौल दिया।

"और ये क्या है?" फिर नशे में लड़खड़ाती आवाज।

"कलाकंद।"

"क्या भाव?"

"एक सौ साठ रुपये किलो।"

"सोलह किलो तौलो।"

हलवाई ने फिर तौल दिया।

"ये क्या है?" फिर नशे में लड़खड़ाती आवाज।

"काजू बरफी।"

"क्या भाव?"

"दो सौ चालीस रुपये किलो।"

"चौबीस किलो तौलो।"

हलवाई ने तौला।

"ये क्या है?" फिर नशे में लड़खड़ाती आवाज।

"दूध।"

"क्या भाव?"

"अट्ठाइस रुपये लिटर।"

"अट्ठाइस लिटर दो।"

परेशान हलवाई ने एक गंजी में दूध निकाल कर रख दिया।

"अब तौली हुई सभी मिठाइयों को इसमें डालो और घोटो।" दूध की गंजी की तरफ इशारा करते हुए गुंडे ने कहा।

जैसा कहा गया था वैसा करते हुए हलवाई भुनभुनाया, "पता नहीं कहाँ से आ गया, सारी मिठाइयों का सत्यानाश करके रबड़ी बनवा दिया।"

"रबड़ी बन गई! तो पाँच रुपये की देना" पाँच का नोट हलवाई को देते हुए गुंडे ने कहा।

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एडसेंस का चेक मिला तो खुश होकर हमने एक अच्छा स्नो खरीदा। घर आकर श्रीमती स्नो देते हुए कहा, "देखो तुम्हारे क्या लाया हूँ!"

"क्या लाये हो?"

हमने स्नो उसकी हथेली पर रख दिया। उसे देख कर श्रीमती जी ने कहा, "हाय राम! अब इस उमर में मैं स्नो पाउडर लगाउँगी?"

"जूता जब पुराना हो जाता है तभी तो पॉलिश की जरूरत पड़ती है।"
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