Monday, December 14, 2009

आय एम ओके यू आर ओके ... याने मैं भी खुश तू भी खुश

व्यवहार विज्ञान से सम्बन्धित एक ऐसा लेख जो आपके जीवन को खुशियों से भर सकता है ....
हिन्दी ब्लोग जगत में कुछ समय पहले एक ऐसी स्थिति आ गई थी कि कुछ ब्लोगर्स अन्य ब्लोगर्स से नाखुश थे और अन्य ब्लोगर्स उन कुछ ब्लोगर्स से। मतलब यह कि आय एम नॉट ओके यू आर नॉट ओके याने कि मैं भी नाखुश आप भी नाखुश। कितना अच्छा लगता है जब सभी लोग खुश रहें, आय एम ओके यू आर ओके ... याने मैं भी खुश आप भी खुश।

जीवन है तो रिश्ते हैं और रिश्ते हैं तो खुशी और नाखुशी भी हैं। जब दो लोग होते हैं तो दोनों के बीच कोई ना कोई सम्बन्ध भी होता है। यह सम्बन्ध कुछ भी हो सकता है, बाप-बेटे का, पति-पत्नी का, प्रेमी-प्रेमिका का, भाई-भाई का, भाई-बहन का, मित्र-मित्र का, अफसर-कर्मचारी का, मालिक-नौकर का, दुकानदार-ग्राहक का याने कि कुछ भी सम्बन्ध! और इन सम्बन्धों के कारण हमारे जीवन में निम्न चार प्रकार की स्थितियों में से कोई न कोई एक बनती हैः

मैं खुश तू खुश (I'm OK, You're OK)
मैं
खुश तू नाखुश (I'm OK, You're not OK)
मैं
नाखुश तू खुश (I'm not OK, You're OK)
मैं
नाखुश तू नाखुश (I'm not OK, You're not OK)

तो यदि आपका किसी से कुछ सम्बन्ध है तो आप दोनों के बीच उपरोक्त चार स्थितियों में से एक न एक स्थिति अवश्य ही होगी। और हर किसी के जीवन में एक नहीं अनेक सम्बन्ध होते ही हैं।

उपरोक्त स्थितियों में पहली स्थिति सबसे अच्छी स्थिति है और चौथी सबसे खराब।

पहली स्थिति इतनी अधिक अच्छी स्थिति है कि इसे आदर्श की संज्ञा दी जा सकती है। जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन में आदर्श स्थिति कभी कभार ही आ पाती है उसी प्रकार से सबसे खराब स्थिति भी कभी-कभी ही आती है। किन्तु दूसरी तथा तीसरी स्थिति जीवनपर्यन्त बनी रहती है।

क्यों बनती हैं ये स्थितियाँ?

ये स्थितियाँ बनती हैं हमारे अपने व्यवहार के कारण से। हमारे व्यवहार में जहाँ लचीलापन होता है वहीं कठोरता भी होती है। किस समय हमें किस प्रकार का व्यवहार करना है यदि हम जान लें तो हम इन स्थितियों पर नियन्त्रण भी कर सकते हैं।

हमारा व्यवहार बनता है हमारी सोच से। हम किस प्रकार से सोचकर कैसा व्यवहार करते हैं यह बताती है श्री थॉमस एन्थॉनी हैरिस (Thomas A हर्रिस) द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक I'm OK, You're OK जो कि बहुत ही लोकप्रिय है। यह पुस्तक व्यवहार विश्लेषण (Transactional Analysis) पर आधारित है। श्री हैरिस की पुस्तक इसी बात की व्याख्या करती है कि उपरोक्त व्यवहारिक स्थितियाँ क्यों बनती हैं। उनका सिद्धांत बताता है कि मनुष्य निम्न तीन प्रकार से सोच-विचार किया करता है:

बचकाने ढंग से (Child): इस प्रकार के सोच-विचार पर मनुष्य की आन्तरिक भावनाएँ तथा कल्पनाएँ हावी रहती है (dominated by feelings)। आकाश में उड़ने की सोचना इसका एक उदाहरण है।

पालक के ढंग से (Parent): यह वो सोच-विचार होता है जिसे कि मनुष्य ने बचपने में अपने पालकों से सीखा होता है (unfiltered; taken as truths)। 'सम्भल के स्कूल जाना', 'दायें बायें देखकर सड़क पार करना' आदि वाक्य बच्चों को कहना इस प्रकार के सोच के उदाहरण है।

वयस्क ढंग से (Adult): बुद्धिमत्तापूर्ण तथा तर्कसंगत सोच वयस्क ढंग का सोच होता है (reasoning, logical)। सोच-विचार करने का यही सबसे सही तरीका है।

हमारे सोच-विचार करने के ढंग के कारण ही हमारे व्यवहार बनते है। जब दो व्यक्ति वयस्क ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो ही दोनों की संतुष्टि प्रदान करने वाला व्यवहार होता है जो कि "मैं खुश तू भी खुश (I'm OK, You're OK)" वाली स्थिति होती है। जब दो व्यक्तियों में से एक वयस्क ढंग से सोच-विचार करके तथा दूसरा बचकाने अथवा पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं खुश तू नाखुश (I'm OK, You're not OK)" या "मैं नाखुश तू खुश (I'm not OK, You're OK)" वाली स्थिति बनती है। किन्तु जब दो व्यक्ति बचकाने या पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो "मैं नाखुश तू नाखुश (I'm not OK, You're not OK)" वाली स्थिति बनती है।

तो मित्रों! यदि अच्छी प्रकार से सोच-विचार करके दूसरों के साथ व्यवहार करें तो हमारे जीवन की खुशियों में अवश्य ही इजाफा हो सकता है।

वैसे यदि व्यवहार के मामले को छोड़ दें तो बचकानी और पालक सोच का अपना महत्व है और इनके बिना काम चलना मुश्किल हो। विज्ञान के अधिकतर आविष्कारों और खोजों का श्रेय बचकानी सोच को ही जाता है।
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