Wednesday, January 13, 2010

यदि कोई कहता है कि मुझे गुस्सा नहीं आता तो वह बिल्कुल गलत कहता है

गुस्सा सभी को आता है। बहुत से लोग तो गुस्से से आग-बबूला हो जाते हैं। यदि कोई कहता है कि मुझे गुस्सा नहीं आता तो वह बिल्कुल गलत कहता है। गुस्से का आना उतना ही स्वाभाविक है जितना किसी पर प्यार आना। संसार में कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं होगा जिसे गुस्सा न आता हो, मनुष्य तो क्या संसार में जितने प्राणी हैं उन सभी को क्रोध आता है।

हर्ष, दुःख, भय आदि के जैसे ही क्रोध भी प्राणीमात्र की एक मूलभावना है और प्राणियों के जीवित रहने के लिये ये मूल भावनाएँ अत्यन्त आवश्यक हैं। इन मूलभावनाओं के बगैर जिंदा रहा ही नहीं जा सकता। क्या आप बिना क्रोध किये किसी हमलावर से अपना बचाव कर सकते हैं? क्या कोई देशभक्त सैनिक क्रोध किये बिना शत्रु सैनिक का वध कर सकता है? सत्य तो यह है कि बुराइयों का नाश क्रोध किये बगैर हो ही नहीं सकता। क्रोध हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गीता में श्री कृष्ण ने भी अर्जुन को शत्रु का वध करने का उपदेश दिया है। अब किसी का वध भला बिना क्रोध किये कैसे किया जा सकता है? स्पष्ट है कि श्री कृष्ण ने परोक्ष रूप से अर्जुन को क्रोध करने का ही उपदेश दिया है क्योंकि क्रोध जीवन के लिये आवश्यक है। हाँ अकारण या स्वार्थवश क्रोध करना अवश्य बहुत बड़ी बुराई है।

कई बार तो दया, करुणा जैसी भावनाएँ भी क्रोध का रूप धारण कर लेती हैं। क्रौञ्च पक्षी की मृत्यु के कारण वास्तव में महर्षि वाल्मीकि के हृदय में करुणा ही उत्पन्न हुई थी जो कि बहेलिये को शाप देने के रूप में क्रोध में परिवर्तित हो गई। किसी निर्बल या मासूम बच्चे पर किसी दुष्ट के अत्याचार के परिणामस्वरूप हमारे हृदय में दया की ही उत्पत्ति होती है किन्तु वह दया ही दुष्ट को सजा देने के लिये क्रोध का रूप धारण कर लेती है उदाहरण के लिये देखें यह पोस्ट

मेरे कहने का आप यह आशय मत निकाल लीजियेगा कि मैं क्रोध को अच्छा बता रहा हूँ। मैं तो आपको यह बताना चाहता हूँ कि यद्यपि क्रोध में बहुत सारी बुराइयाँ हैं किन्तु क्रोध की अपनी अच्छाइयाँ भी हैं और जीवन निर्वाह के लिये क्रोध आवश्यक है। याने कि गुस्सा आना भी उतना ही जरूरी है जितना कि गुस्से पर काबू पाना!

जब भी किसी को किसी पर किसी को क्रोध आता है तो क्रोध करने वाले का सबसे बड़ा उद्देश्य बन जाता है उस व्यक्ति को व्यथा पहुँचाना जिस पर क्रोध किया गया है। मारना-पीटना, शारीरिक या मानसिक चोट लगाना, अपमानित करना आदि व्यथा पहुँचाने के तरीके हैं। क्रोध में आकर आदमी सामने वाले को गाली-गलौज से लेकर उसकी हत्या तक भी कर सकता है। कभी-कभी तो सामने वाले को व्यथित करने के तरीके भी विचित्र होते हैं। आपने देखा होगा कि कई बार कोई आदमी क्रोध में आकर स्वयं को पीटने लगता है, खाना खाना छोड़ देता है। किन्तु स्वयं को पीटना या भोजन त्याग देना आदमी तभी करता है जब उसे किसी अपने प्रियजन पर क्रोध आता है। स्वयं को पीट कर भी वह सामने वाले को व्यथित करता है क्योंकि वह जानता है कि स्वयं को पीड़ा पहुँचाने पर वह प्रियजन अवश्य ही व्यथित होगा। किसी दूसरे आदमी पर क्रोध आने पर कभी भी कोई स्वयं को पीड़ा नहीं पहुँचाता।

जहाँ किसी की हत्या कर देना क्रोध का उग्र रूप है वहीं किसी को मात्र चिढ़ा देना क्रोध का एक छोटा रूप है। किसी को चिढ़ाने में आदमी का उद्देश्य मात्र स्वयं तथा अन्य लोगों का मनोरंजन करना होता है याने कि मात्र मनोरंजन के भी मनुष्य क्रोध करता है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने बैर को क्रोध का अचार या मुरब्बा बताया है। जिस प्रकार से किसी फल का अचार या मुरब्बा बनाकर उसे दीर्घकाल के लिये सुरक्षित रखा जाता है उसी प्रकार से क्रोध को बैर बना कर दीर्घकालीन बना दिया जाता है अन्यथा क्रोध अल्पकालीन और अनेक बार क्षणिक ही होता है। शुक्ल जी ने क्रोध का एक बहुत ही अनूठा उदाहरण दिया है जिसके अनुसार एक ब्राह्मण बहुत ही भूखा था। उसने खाना बनाने के लिये चूल्हा जलाया। लकड़ियाँ गीली थी इसलिये जलने के स्थान पर मात्र धुआँ ही कर रही थी। ब्राह्मण देवता जब चूल्हा फूँकते-फूँकते थक गये तो अन्त में क्रोध में आकर बाल्टी भर पानी चूल्हे में डाल दिया और भूखे रह गये। इस प्रकार से क्रोध में आदमी प्रायः स्वयं को भी कष्ट पहुँचाता है।

क्रोध या गुस्सा या रोष पर नियन्त्रण करना "क्रोध प्रबन्धन" (anger management) के अन्तर्गत् आता है जो कि मनोवैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली का एक तकनीक है। इस प्रणाली का प्रयोग करके क्रोध पर नियन्त्रण रखा जा सकता है या फिर गुस्से को कम किया जा सकता है। क्रोध को नियन्त्रित करना बहुत अच्छी बात है किन्तु ऐसा करने के पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि हम किस प्रकार के क्रोध का नियन्त्रण कर रहे हैं। अच्छे प्रकार के क्रोध का या बुरे प्रकार के क्रोध का? पूरे क्रोध को नियन्त्रित करने के बजाय सिर्फ अतिरिक्त क्रोध को ही नियन्त्रित किया जाना चाहिये। हमेशा हानिकर क्रोध को ही नियन्त्रित किया जाना चाहिये। यदि आप अपने किसी प्रियजन की भलाई के उद्देश्य से उस पर गुस्सा करते हैं तो वह आपका बिल्कुल जायज गुस्सा है। इस प्रकार के गुस्से को नियन्त्रि कर के आप अपने प्रियजन का अहित ही करेंगे।

दूसरी ओर कुंठा, धमकी, उल्लंघन, या नुकसान की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न क्रोध का हमेशा नियन्त्रण किया जाना चाहिये क्योंकि इस प्रकार का क्रोध हमें कई प्रकार की समस्याओं की ओर धकेल सकता है तथा हमारे भीतर अनेक मानसिक रोगों को जन्म दे सकता है।

कहा जाता है कि निम्न उपाय करने से अतिरिक्त क्रोध पर नियन्त्रण पाया जा सकता हैः

जोरदार गुस्सा आने पर गहरी गहरी साँसे लेना शुरू कर दें।

क्रोध एक मानसिक स्थिति होती है अतः गुस्सा आने पर अपने विचारों को किन्हीं अन्य विषयों की ओर मोड़ने का प्रयत्न करें।

गुस्सा आने पर 1 से 100 सौ तक गिनती गिनें, ऐसा करने से गुस्सा अपने आप ही शान्त होने लगेगा।

चलते-चलते

जीवन का उद्देश्य आनन्द प्राप्त करना है। - दलाई लामा

(The purpose of our lives is to be happy. - Dalai Lama)

22 comments:

ललित शर्मा said...

क्रोध हमेशा विध्वंसात्मक ही होता है रचनात्मक नही।
क्रोध से किसी का भला नही हुआ है।

जिस क्रोध से संसार का भला होता है, उसे शास्त्रों मे क्रोध नही "मन्यु" कहा गया है।

श्री कृष्ण का "मन्यु" जागृत होने के पश्चात ही दुष्टों का संहार हुआ।

जय हो। संकरायत के बधाई
खाओ तिली लाड़ु अऊ मिठाई

महफूज़ अली said...

गुस्सा आना अच्छी बात है..... इससे लाभ भी है .... पर इसको सही तरीके से इस्तेमाल किया जाये तभी लाभ है.... नहीं तो खुद का ही नुक्सान होता है.... मैं गुस्से तो पोज़िटिव होना ही कहता हूँ.... पर गुस्सा ज़रुरत पर ही अच्छा लगता है.....

बहुत अच्छी लगी आपकी पोस्ट.....

महफूज़ अली said...

मैंने अब गुस्सा करना छोड़ दिया है.... हाँ! यह है कि अपने बारे में पहले ही बता देता हूँ.... कि बस .... मुझे गुस्सा मत दिलाना....

संजय बेंगाणी said...

गुस्से मत होना मगर जब गुस्सा आता है, आपके बताए एक भी उपाय याद नहीं आते. :)


जायज गुस्सा अच्छा है, बात-बेबात खराब है.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

गुस्सा आने पर सब गिनती विनती भूल जाती है ...:)कोशिश करनी चाहिए की गुस्सा कम आये ...मुझे सही गुस्सा जब नहीं आता तो नहीं आता .......पर जब आता है तो ..:) अच्छी पोस्ट ...शुक्रिया

पी.सी.गोदियाल said...

कल परसों ही तो आपने बताया था कि जहां पुन्य वहाँ पाप , अब भला जहां प्यार होगा वहाँ गुस्सा भी नितांत आवश्यक है ! हां, कट्रोल करने के तरीके को अपने पास सेव कर लेता हूँ !

निर्मला कपिला said...

जिस प्रकार से किसी फल का अचार या मुरब्बा बनाकर उसे दीर्घकाल के लिये सुरक्षित रखा जाता है उसी प्रकार से क्रोध को बैर बना कर दीर्घकालीन बना दिया जाता है अन्यथा क्रोध अल्पकालीन और अनेक बार क्षणिक ही होता है।
सही बात है वैसे अब मैने भी गुस्सा करना कम कर दिया है
धन्यवाद और लोहडी पर्व की शुभकामनायें

अविनाश वाचस्पति said...

गुस्‍सा यानी क्रोध
कर लिया है शोध
शोध चीखता आज
गुस्‍सा करिये, गुस्‍सा करिये
इससे लाभ होता है
वो बात दीगर है कि
हमें लाभ की चाहत नहीं है
http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2008/krodh.htm
इस लिंक पर सभी लाभ सामने आयेंगे, आप गुस्‍सा किये बिना रह नहीं पायेंगे।

खुशदीप सहगल said...

सोच रहा हूं कल महफूज़ ने आपकी पोस्ट... पुण्य के लिए कभी कभी पाप भी करना पड़ता है पढ़ कर ...रोक सको तो रोक लो...लिख मारी थी... क्रोध में भी अच्छाईयां होती हैं...इसे वो एंग्री यंगैमन कैसे लेगा...लेकिन आज वो खुद ही आपकी पोस्ट पर सेंसिबल एप्रोच दिखा गया है...अब थोड़ा बहुत एग्रेशन तो उसे माफ़ है...

लोहड़ी और मकर संक्रांति की बहुत-बहुत बधाई...

जय हिंद...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

गुस्सा करना गंदी बात, लेकिन जब आ जाए, तो अच्छी बात।
--------
अपना ब्लॉग सबसे बढ़िया, बाकी चूल्हे-भाड़ में।
ब्लॉगिंग की ताकत को Science Reporter ने भी स्वीकारा।

रंजन said...

एक दो तीन...... पचास.....

मनोज कुमार said...

मुझे तो आता है।
अच्छा आलेख। देखूंगा नुस्खे आजमा कर।

अन्तर सोहिल said...

अच्छे प्रकार के क्रोध को लाने के भी उपाय बतायें।
जायज गुस्सा आता ही नही क्या करें?

प्रणाम

खुला सांड said...

अच्छा उपाय बताया है क्रोध शांत करने का !!! पर साहाब हमें तो क्रोध अता है तो फिर कुछ ना कुछ कर देते है उसके बाद ही १ऊ तक गिना जाएगा!! !

उम्दा सोच said...

गुस्सा आना मानवीय क्रिया है पर ये सम्हालना ज़रूरी है की ये भावनात्मक आवेश अमानवीय न करवाए !

राज भाटिय़ा said...

मुझे तो आता हौ गुस्सा, लेकिन थोडी देर बाद उतर जाता है, अगर सामने वाला बेकसूर हो, ओर अगर सामने वाला गुरु(यानि चोर भी हो ओर आं्खे भी दिखाये) हो तो गुस्सा तो रहता है लेकिन फ़िर दिमाग से ही काम लेता हुं गुस्से से नही

Mithilesh dubey said...

बहुत बढिया लगा पढकर ।

डॉ टी एस दराल said...

आप बिलकुल सही कह रहे हैं।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

दो हजार साल से भी पहले अफ़लातून कह गया था कि गुस्सा हमेशा हिमाकत से शुरू होता है और शर्मिन्दगी पर खत्म होता है। यानि, क्रोध की उत्पत्ति सदैव मूर्खता से होती है और समाप्ति लज्जित होकर।

यह उक्ति पढ़ने के बाद मैंने गुस्सा करना छोड़ दिया। अब कहता हूँ कि दूसरों के दुर्व्यवहार या कदाचरण पर मुझे गुस्सा नहीं आता बल्कि दुख होता है। मैं क्रोधित नहीं दुखी हो लेता हूँ। :)

Anil Pusadkar said...

सही है अवधिया जी।भई अपने को तो आता है गुस्सा और जमकर आता है,और अपनी तो पहचान भी है अपना गुस्सा।ये बात ज़रूर है कि इससे नुकसान बहुत हुआ है पर अब ये अच्छा लगने लगा है और फ़िर कोई चारा भी नही है,गुस्सा तो आयेगा ही उससे बचा तो जा ही नही सकता।संक्रांति की बधाई अवधिया जी।आज आपका फ़ोन बंद था।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वैसे तो हमें भी गुस्सा कभी साल छ महीने में एक आध बार ही आता होगा...लेकिन जब भी आ जाए तो हम तो ठंडा पानी पीकर कुछ देर के लिए जाप करने बैठ जाते हैं...सारा गुस्सा बस दो मिनट में खत्म।

'अदा' said...

गुस्सा तो मुझे भी आता है भईया लेकिन बिना बात के नहीं....
ख़ुशी हुई देख कर की महफूज़ मियाँ....गुस्से पर काबू कर रहे हैं...सच में.