Sunday, January 24, 2010

आज महानायक हैं तो क्या हुआ ... महानायक बनने के लिये संघर्ष तो उन्हें भी करना पड़ा था


अमिताभ जी के कद और आवाज के आज लाखों प्रशंसक हैं किन्तु उसी कद और आवाज के कारण शुरू शुरू में उन्हें अस्वीकृत कर दिया जाता था। पहली बार ख्वाज़ा अहमद अब्बास जी ने उन्हें अपनी फिल्म सात हिंदुस्तानी (1969) में अवसर दिया भी तो वह फिल्म ही बुरी तरह पिट गई और अमिताभ बच्चन की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया।

'मधुशाला' के रचयिता प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन के ज्येष्ठ पुत्र अमिताभ बच्चन ने अपने आरंभिक दिनों में अभिनय जगत में स्थापित होने के लिये बहुत संघर्ष किया है। फिल्मों में आने से पहले वे स्टेज आर्टिस्ट तथा रेडियो एनाउंसर भी रह चुके हैं। फिल्मों में काम करने के लिये उन्होंने कई बार आवेदन दिया पर हर बार उन्हें उनके ऊँचे कद के कारण अस्वीकार कर दिया जाता था।

उनकी आवाज से प्रभावित होकर उन्हें फिल्म भुवन सोम (1969) में 'नरेटर' (पार्श्व उद्घोषक) का कार्य दिया गया, भुवन सोम में उनकी आवाज अवश्य थी पर उन्हें परदे पर कहीं दिखाया नहीं गया था। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद (1970) में अमिताभ बच्चन ने बहुत अच्छी भूमिका निभाई थी पर फिल्म की सफलता का सारा श्रेय राजेश खन्ना ले गये, ये तो सभी जानते हैं कि राजेश खन्ना उस समय के जाने माने तथा स्थापित नायक थे।

ऋषि दा ने अपनी फिल्म गुड्डी में भी अतिथि कलाकार बनाया पर इससे अमिताभ को कुछ विशेष फायदा नहीं मिला। फिर उन्हें रवि नगाइच के फिल्म प्यार की कहानी (1971) में मुख्य भूमिका मिली। नायिका तनूजा और सह कलाकार अनिल धवन के होने के बावजूद भी फिल्म चल नहीं पाई और अमिताभ के संघर्ष के दिन जारी ही रहे। उन दिनों अमिताभ बच्चन को जैसा भी रोल मिलता था स्वीकार कर लेते थे। इसीलिये फिल्म परवाना (1971) में उन्होंने एंटी हीरो का रोल किया। परवाना में नवीन निश्चल की मुख्य भूमिका थी और नवीन निश्चल भी उस समय के स्थापित नायक थे अतः अमिताभ की ओर लोगों का ध्यान कम ही गया। सन् 1971 में ही उन्होंने संजोग, रेशमा और शेरा तथा पिया का घर (अतिथि कलाकार) फिल्मों में काम किया पर कुछ विशेष सफलता नहीं मिली।

सन् 1972 में आज के महानायक की फिल्में थीं - बंशी बिरजू, बांबे टू गोवा, एक नजर, जबान, बावर्ची (पार्श्व उद्घोषक) और रास्ते का पत्थर। बी.आर. इशारा की फिल्म एक नजर में उनके साथ हीरोइन जया भादुड़ी थीं। फिल्म एक नजर के संगीत को बहुत सराहना मिली पर फिल्म फ्लॉप हो गई। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फिल्म एक नजर के गाने आज भी संगीतप्रेमियों के जुबान पर आते रहते हैं खासकर 'प्यार को चाहिये क्या एक नजर.......', 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा.......', 'पहले सौ बार इधर और उधर देखा है.......' आदि। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी एक दूसरे को चाहने लगे। ये जया भादुड़ी ही थीं जिन्होंने संघर्ष के दिनों में अमिताभ को संभाले रखा।

सन् 1973 में अमिताभ जी की फिल्में बंधे हाथ, गहरी चाल और सौदागर विशेष नहीं चलीं। पर प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर की अपूर्व सफलता और उनके एंग्री यंगमैन के रोल ने उन्हें विकास के रास्ते पर ला खड़ा किया।

9 comments:

डॉ टी एस दराल said...

महानायक के संघर्ष भरे दिनों का अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है आपने।
सच है की सफल होने के लिए प्रारंभ में संघर्ष तो करना ही पड़ता है।
लेकिन जो लोग इससे डर कर भाग जाते हैं, वो गुमनामी के अन्धकार में खो जाते हैं।

महफूज़ अली said...

अमिताभ जी की बायोग्राफी बहुत अच्छी लगी....

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर

मनोज कुमार said...

अद्भुत!!!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

फिल्मी महानायक का बहुत अच्छा जीवनचरित प्रस्तुत किया आपने....

BrijmohanShrivastava said...

बहुत अच्छा और सच्चा लिखा है आपने

श्याम कोरी 'उदय' said...

.... धान के देश में ..... धान कहीं दिख नहीं रही है चलो कम-से-कम "अमीर किसान" का सफ़रनामा ही सही .... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!

खुशदीप सहगल said...

अवधिया जी,
पहले तो हाथ जोड़ कर मुआफ़ी मांगता हूं...अति व्यस्तता और फिर मियांजी के पचड़े ने ज़्यादा ही उलझा दिया था..,
इसलिए आपकी कुछ पोस्ट पर नहीं आ सका...अमिताभ बच्चन ने असफलता का दौर महानायक बनने के बाद भी
देखा...लेकिन फिर जीवटता के साथ मुश्किलों पर विजय पाई...हार मान कर अनमोल जीवन गंवाने वाले महाराष्ट्र के
बच्चों को देख कर यही जी करता है कि हर स्कूल में अमिताभ और ऐसे ही कुछ और नायकों की कहानियां सुनाई जाई जानी चाहिएं, जिन्होंने जीवन में कई बार नाकामी का मुंह देखा, फिर भी हार नहीं मानी...और एक दिन दुनिया
को फतेह कर के दिखाया...

अवधिया जी आपकी पिछली पोस्ट बिनाका गीतमाला ने वाकई अमीन सयानी साहब के साथ यादों के झरोखों में पहुंचा दिया...

जय हिंद...

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर