Thursday, March 11, 2010

व्यथा बड़े गुरूजी की

चेलों ने परेशान कर रखा है बड़े गुरूजी को। सारे चेले उनके ऊपर "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बन कर पिल पड़े हैं। रोज ऐसा पोस्ट लिख देते हैं जिससे साबित हो जाये कि बड़े गुरूजी की सोच "अधजल गगरी छलकत जाय" है, बड़े गुरूजी "आँख के अन्धे और नाम के नैनसुख" हैं। बड़े गुरूजी के साथ साथ उनके ब्लोग को भी नहीं छोड़ते, उनके ब्लोग को चेलों ने "ऊँची दुकान फीका पकवान" बना कर रख दिया है। बेचारा बड़े गुरूजी का ब्लोग क्या जाने कि "गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है"। चेलों के पोस्ट ऐसे होते हैं जैसे कि "हींग लगे ना फिटकिरी और रंग आये चोखा!" चेलों के इन पोस्ट को टिप्पणियाँ भी खूब मिल जाती हैं और बड़े गुरूजी की धुलाई भी हो जाती है। इसी को कहते हैं "आम के आम और गुठलियों के दाम!"

बड़े गुरूजी यदि कुछ कहते हैं तो उसके कथन को "थोथा चना बाजे घना" बता देते हैं। ये "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" नहीं है तो क्या है भला? बड़े गुरूजी ने चेलों को शिक्षा देने की कोशिश क्या कर दी कि चेलों के लिये "बिल्ली के भागों छींका टूटा" हो गया। "रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी" और बड़े गुरूजी रूठेंगे तो अपना पोस्ट वापस लेंगे।

बड़े गुरूजी को तो यह भी पता नहीं है कि "अकल बड़ी या भैंस?"। सही बात तो यह है कि "अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे"। उनका हाल तो "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे" जैसा होकर रह गया है और पछता रहे हैं इन्हें चेला बनाकर। पर "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"

अब बड़े गुरूजी इस जुगाड़ में लगे हैं कि चेले मान जायें, पर उनकी कोशिश "का वर्षा जब कृषी सुखाने" बनकर रह जाती है। बड़े गुरूजी तो अब बस इतना ही चाह रहे हैं कि कैसे भी "अन्त भला सो भला" हो जाये।
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