एक बार इस हिन्दी ब्लोगिंग में क्या घुस गये कि लत लग गई इसकी और इसने हमें "धोबी का गधा घर का ना घाट का" बना कर रख दिया। अंग्रेजी ब्लोगिंग करते थे तो जहाँ एडसेंस से चेक मिलता था वहीं क्लिक बैंक के प्रोडक्ट बिकने पर कमीशन की रकम सीधे हमारे बैंक खाते में जमा हो जाया करती थी। अंग्रेजी ब्लोगिंग का मतलब ही है "आम के आम और गुठलियों के दाम"। तो हम बता रहे थे कि हमारे साथ तो वही मिसल हो गई कि "कौवा चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल"। बड़े लोगों ने ठीक ही कहा है कि "जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है"। हम भी अंग्रेजी ब्लोगगिंग के जंगल को छोड़ कर हिन्दी ब्लोगिंग के शहर में चले आये। "चौबे जी आये थे छब्बे बनने और दुबे बन कर रह गये"।
कमाई-धमाई तो खतम ही हो गई ऊपर से नेट का बिल अलग से पटाना पड़ रहा है।इसी को कहते हैं "धन जाये और धर्मो का नाश"। पर किसी को क्या दोष दें, हम खुद ही तो "आ बैल मुझे मार" जैसे यहाँ आये थे। लगता है कि यह हिन्दी ब्लोगिंग अब हमारे लिये "आई है जान के साथ, जायेगी जनाजे के साथ" बनकर रह गई है। लाख सोचते हैं कि आज नहीं तो कल इस हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई होनी शुरू हो जायेगी पर लगता है "इन तिलों में तेल ही नहीं है"। हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई तो करमहीन की खेती है, कहते हैं ना "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े"। कमाई तो पाठकों से ही होनी है पर यहाँ तो पाठक आने से रहे। यहाँ पर तो पाठक मिलना "टेढ़ी खीर" है। इतने दिनों से भिड़े हुए हैं यहाँ पर पर अब तक नतीजा सिर्फ "कोयल होय ना उजली सौ मन साबुन लाइ" है।
कमीशन मिलने की आस में अपने ब्लोग के साइडबार में कुछ भारतीय कम्पनियों के विज्ञापन लगा रखे हैं पर उन्हें कोई देखने वाला हो तब ना। ऐसा भी नहीं है कि इन विज्ञापनों से कमाई होती ही नही है, कभी कभी हो भी जाती है पर कमीशन के रूप में मिलने वाली रकम "ऊँट के मुँह में जीरा" ही होती है। आप तो जानते ही है कि "ओस चाटे प्यास नहीं बुझती"। चार छः महीने में यदि हमारे विज्ञापन के माध्यम से कोई फ्लाईट या होटल बुकिंग करा ले तो समझते हैं कि "अंधे के हाथ बटेर" लग गया।
अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो लोग आते ही हैं कमाई करने के उद्देश्य से पर हिन्दी ब्लोगिंग वाले तो संतुष्ट प्राणी हैं, उनमें से अधिकतर को तो ब्लोगिंग से धन कमाने की चाह ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग तो "अनजान सुजान, सदा कल्याण" वाली दुनिया है, यहाँ पर सभी मस्त लोग हैं। हर कोई अपने ब्लोग को "अपना मकान कोट समान" मान कर चलते हैं, "अपनी अपनी खाल में सब मस्त" हैं और "अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग" अलापते हुए अलमस्त रहते हैं।
तो हम भी हिन्दी ब्लोगिंग के रंग में पूरी तरह से रंग गये हैं। जब अंग्रेजी ब्लोग लिखते थे इंटरनेट मार्केटिंग के लिये प्लानिंग किया करते थे, अब हिन्दी ब्लोग लिखते हैं तो योजना बनाते हैं कि किसकी टाँगें खींची जाये, किसके धर्म की बखिया उधेड़ी जाये, पुरुष हैं इसलिये कैसे नारी को नीचा दिखाया जाये। किसी ने कहा है "काजर की कोठरी में कैसे हु जतन करो, काजर की रेख एक लागिहैं पै लागिहैं"। यहाँ एक रेख लगना तो क्या पूरी तरह से कजरारे बन गये हैं और "नवपंक लोचन पंक मुख कर पंक पद पंकारुणम" वाला हमारा एक नया ही रूप उभर कर सामने आ रहा है।
अब तो हम भी यहाँ आकर मस्त हो गये हैं। विषय आधारित ब्लोग न बना कर अपने "आधा तीतर आधा बटेर" ब्लोग से ही खुश रहते हैं। भले ही अब हमारा हाल "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" हो गया है पर किसी को बताते नहीं कि हम "धोबी के गधे, घर के ना घाट के" हो गये हैं। आखिर बताने से "अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये लाज" वाली मिसल ही तो चरितार्थ होगी। इसलिये "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" मंत्र को ध्यान में रखकर अपने ब्लोग में जो मन मे आता है वो लिख दिया करते हैं।
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Sunday, March 21, 2010
Monday, March 15, 2010
आना लंगूर के हाथ में हूर का ... बाद में पछताना लंगूर का
आप जितने भी जोड़े देखते होंगे उनमें से पंचान्बे प्रतिशत बेमेल ही मिलेंगे। पता नहीं क्या जादू है कि हमेशा हूर लंगूर के हाथों ही आ फँसती है। हमारे हाथ में भी आखिरकार एक हूर लग ही गई थी आज से चौंतीस साल पहले।
जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम। अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे। न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं कि आगे नाथ न पीछे पगहा। किसी के तीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थे हम। आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते थे। हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आप भला तो जग भला।
पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमें अक्ल का अंधा पाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमें अंधों में काना राजा समझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।
बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। "अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ" वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है।
इतना होने पर भी जब उसे लगा कि दिल्ली अभी दूर है तो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। आखिर एक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी "ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था कि अकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमें सावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख।
अब अपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको। अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया कि लंगूर के हाथ में हूर फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं। कई बार पछतावा भी होता है पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम। अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे। न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं कि आगे नाथ न पीछे पगहा। किसी के तीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थे हम। आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते थे। हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आप भला तो जग भला।
पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमें अक्ल का अंधा पाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमें अंधों में काना राजा समझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।
बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। "अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ" वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है।
इतना होने पर भी जब उसे लगा कि दिल्ली अभी दूर है तो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। आखिर एक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी "ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था कि अकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमें सावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख।
अब अपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको। अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया कि लंगूर के हाथ में हूर फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं। कई बार पछतावा भी होता है पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
Thursday, March 11, 2010
व्यथा बड़े गुरूजी की
चेलों ने परेशान कर रखा है बड़े गुरूजी को। सारे चेले उनके ऊपर "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बन कर पिल पड़े हैं। रोज ऐसा पोस्ट लिख देते हैं जिससे साबित हो जाये कि बड़े गुरूजी की सोच "अधजल गगरी छलकत जाय" है, बड़े गुरूजी "आँख के अन्धे और नाम के नैनसुख" हैं। बड़े गुरूजी के साथ साथ उनके ब्लोग को भी नहीं छोड़ते, उनके ब्लोग को चेलों ने "ऊँची दुकान फीका पकवान" बना कर रख दिया है। बेचारा बड़े गुरूजी का ब्लोग क्या जाने कि "गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है"। चेलों के पोस्ट ऐसे होते हैं जैसे कि "हींग लगे ना फिटकिरी और रंग आये चोखा!" चेलों के इन पोस्ट को टिप्पणियाँ भी खूब मिल जाती हैं और बड़े गुरूजी की धुलाई भी हो जाती है। इसी को कहते हैं "आम के आम और गुठलियों के दाम!"
बड़े गुरूजी यदि कुछ कहते हैं तो उसके कथन को "थोथा चना बाजे घना" बता देते हैं। ये "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" नहीं है तो क्या है भला? बड़े गुरूजी ने चेलों को शिक्षा देने की कोशिश क्या कर दी कि चेलों के लिये "बिल्ली के भागों छींका टूटा" हो गया। "रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी" और बड़े गुरूजी रूठेंगे तो अपना पोस्ट वापस लेंगे।
बड़े गुरूजी को तो यह भी पता नहीं है कि "अकल बड़ी या भैंस?"। सही बात तो यह है कि "अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे"। उनका हाल तो "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे" जैसा होकर रह गया है और पछता रहे हैं इन्हें चेला बनाकर। पर "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"
अब बड़े गुरूजी इस जुगाड़ में लगे हैं कि चेले मान जायें, पर उनकी कोशिश "का वर्षा जब कृषी सुखाने" बनकर रह जाती है। बड़े गुरूजी तो अब बस इतना ही चाह रहे हैं कि कैसे भी "अन्त भला सो भला" हो जाये।
बड़े गुरूजी यदि कुछ कहते हैं तो उसके कथन को "थोथा चना बाजे घना" बता देते हैं। ये "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" नहीं है तो क्या है भला? बड़े गुरूजी ने चेलों को शिक्षा देने की कोशिश क्या कर दी कि चेलों के लिये "बिल्ली के भागों छींका टूटा" हो गया। "रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी" और बड़े गुरूजी रूठेंगे तो अपना पोस्ट वापस लेंगे।
बड़े गुरूजी को तो यह भी पता नहीं है कि "अकल बड़ी या भैंस?"। सही बात तो यह है कि "अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे"। उनका हाल तो "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे" जैसा होकर रह गया है और पछता रहे हैं इन्हें चेला बनाकर। पर "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"
अब बड़े गुरूजी इस जुगाड़ में लगे हैं कि चेले मान जायें, पर उनकी कोशिश "का वर्षा जब कृषी सुखाने" बनकर रह जाती है। बड़े गुरूजी तो अब बस इतना ही चाह रहे हैं कि कैसे भी "अन्त भला सो भला" हो जाये।
Tuesday, March 9, 2010
ये बुड्ढा तो सठियाने की सीमा पार कर गया है
सठियाने की भी एक सीमा होती है पर ये बुड्ढा तो सठियाने की सीमा पार कर गया है। कब्र में पाँव लटकाये बैठा है पर ब्लोगिंग का शौक नहीं गया। है तो पिद्दी जैसा पर अपने आपको बहुत बड़ा ब्लोगर बताता है। अकल तो ऐसी है इसकी कि कहे खेत की और सुने खलिहान की पर कमली ओढ़कर खुद को फकीर समझता है। "कहीं की ईँट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनबा जोड़ा" जैसे पोस्ट लिखकर तुर्रम खाँ बन जाता है। पर क्या कभी कागज की नाव चली है? इसे पढ़कर तो लोग सिर्फ यही कहते हैं कि क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा।
किस्मत का धनी है इसलिये अब तक टिका हुआ है यहाँ। "कबीर दास की उलटी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी" जैसी उल्टी-उल्टी बातें करता है। किसी के बारे में कुछ भी लिख देता है, इसे पता नहीं है कि कमान से निकला तीर और मुँह से निकली बात वापस नहीं आती। जब गरीबी में आटा गीला होगा तब पता चलेगा बच्चू को! इस पर गुस्सा तो बहुत आता है पर क्या करें, ककड़ी के चोर को फॉंसी तो दी नहीं जाती। पर देख लेना एक दिन अपने किये की सजा जरूर पायेगा, कहते हैं ना कि कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर! भला गधा कभी घोड़ा बना है? देर सबेर अपने किये को जरूर भुगतेगा, भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है!
पर क्या करें भाई, जब तक टपकेगा नहीं तब तक तो इसे झेलना ही पड़ेगा।
किस्मत का धनी है इसलिये अब तक टिका हुआ है यहाँ। "कबीर दास की उलटी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी" जैसी उल्टी-उल्टी बातें करता है। किसी के बारे में कुछ भी लिख देता है, इसे पता नहीं है कि कमान से निकला तीर और मुँह से निकली बात वापस नहीं आती। जब गरीबी में आटा गीला होगा तब पता चलेगा बच्चू को! इस पर गुस्सा तो बहुत आता है पर क्या करें, ककड़ी के चोर को फॉंसी तो दी नहीं जाती। पर देख लेना एक दिन अपने किये की सजा जरूर पायेगा, कहते हैं ना कि कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर! भला गधा कभी घोड़ा बना है? देर सबेर अपने किये को जरूर भुगतेगा, भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है!
पर क्या करें भाई, जब तक टपकेगा नहीं तब तक तो इसे झेलना ही पड़ेगा।
Thursday, February 4, 2010
"कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" ... याने कि किसी को जबरन छेड़ना
मानव मस्तिष्क भी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी यह किसी को जबरन छेड़ कर मौज लेता है। इसे ही छत्तीसगढ़ी हाना (लोकोक्ति) में "कुकुर के मुँह में लउड़ी हुड़सना" कहा जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार यह एक मानसिक खेल है जो अक्सर महज मौज-मजा लेने के लिये किया जाता है और संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने कभी भी ऐसा न किया हो। एक सीमा तक ही यह खेल जारी रहे तो कुछ अधिक नुकसानदायक नहीं है यह किन्तु प्रायः यह खेल अपनी सीमा पार कर जाती है और साधारण चुहलबाजी एक विवाद का रूप धारण कर लेती है। बेहतरी इसी में है कि हम इस मानसिक खेल से बच कर ही रहें।
लोकोक्ति की बात चली है तो आपको हम यह बता दें कि जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
लोकोक्ति की बात चली है तो आपको हम यह बता दें कि जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:
- "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
- "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
- "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
- "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
- "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
- "अजान बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
- "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
- "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
- "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
- "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् प्रशंसा कम मिलती है और अपयश अधिक।
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