Monday, March 15, 2010

आना लंगूर के हाथ में हूर का ... बाद में पछताना लंगूर का

आप जितने भी जोड़े देखते होंगे उनमें से पंचान्बे प्रतिशत बेमेल ही मिलेंगे। पता नहीं क्या जादू है कि हमेशा हूर लंगूर के हाथों ही आ फँसती है। हमारे हाथ में भी आखिरकार एक हूर लग ही गई थी आज से चौंतीस साल पहले।

जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम। अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे। न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं कि आगे नाथ न पीछे पगहाकिसी के तीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थे हम। आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते थे हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आप भला तो जग भला

पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमें अक्ल का अंधा पाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमें अंधों में काना राजा समझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।

बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। "अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ" वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है

इतना होने पर भी जब उसे लगा कि दिल्ली अभी दूर है तो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। आखिर एक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी "ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था कि अकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमें सावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख

अब अपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको। अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया कि लंगूर के हाथ में हूर फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं कई बार पछतावा भी होता है पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
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