Wednesday, March 24, 2010

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना ... प्रभु की यह मुस्कान ही तो माया है

रामनवमी पर विशेष

राम ...

दो अक्षरों का एक ऐसा नाम जिस पर संसार का प्रत्येक हिन्दू की अथाह श्रद्धा है। राम हिन्दुओं के आराध्य देव हैं और राम का नाम उनके लिये भवसागर से मुक्ति देने वाला मन्त्र है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम के नाम को महामन्त्र बताते हुए कहा है "महामंत्र जोइ जपत महेसू"

राम साक्षात् ब्रह्म के अवतार हैं। ब्रह्म और माया एक दूसरे के पूरक हैं। विशुद्ध ज्ञान ही ब्रह्म है और सांसारिक मोह ही माया है। कृपालु भगवान जिस किसी के समक्ष प्रकट होते हैं तो वह विशुद्ध ज्ञान से परिपूरित हो जाता है और माया से मुक्त हो जाता है इसीलिये जब श्री राम माता कौसल्या के समक्ष प्रकट हुए तो उनके भीतर विशुद्ध ज्ञान उत्पन्न हो गया और वे कहने लगीं:

ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति प्रति बेद कहै।

अर्थात् हे नाथ! वेद कहते हैं कि आपके प्रत्येक रोम में माया के रचते हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह हैं।

प्रभु के दर्शन से उत्पन्न माता कौसल्या का यह विशुद्ध ज्ञान प्रभु की लीला में बाधक बन रहा था। इस ज्ञान के कारण ही माता कौसल्या प्रभु को अपना पुत्र मानने के लिये तैयार नहीं हो पा रही थीं अतः प्रभु के लिये उन्हें मोहबन्धन बाँधना आवश्यक हो गया और मुसका दियेः

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।

प्रभु की इस मुसकान में ही माया का वास है अतः माता कौसल्या मोह के बन्धन में बँध गईं और उनका ज्ञान लुप्त हो गया। और वे कहने लगीं:

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥

अर्थात् माता की मति डोल गई और बोलीं, "हे तात्! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय तथा अनुपम सुख प्रदान करने वाली बाललीला कीजिये।

आज राम जन्मोत्सव के विशिष्ट अवसर पर आप सभी को रामनवमी पर्व की शुभकामनाएँ!
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