Sunday, March 21, 2010

हम ... याने कि धोबी का गधा घर का ना घाट का

एक बार इस हिन्दी ब्लोगिंग में क्या घुस गये कि लत लग गई इसकी और इसने हमें "धोबी का गधा घर का ना घाट का" बना कर रख दिया। अंग्रेजी ब्लोगिंग करते थे तो जहाँ एडसेंस से चेक मिलता था वहीं क्लिक बैंक के प्रोडक्ट बिकने पर कमीशन की रकम सीधे हमारे बैंक खाते में जमा हो जाया करती थी। अंग्रेजी ब्लोगिंग का मतलब ही है "आम के आम और गुठलियों के दाम"। तो हम बता रहे थे कि हमारे साथ तो वही मिसल हो गई कि "कौवा चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल"। बड़े लोगों ने ठीक ही कहा है कि "जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है"। हम भी अंग्रेजी ब्लोगगिंग के जंगल को छोड़ कर हिन्दी ब्लोगिंग के शहर में चले आये। "चौबे जी आये थे छब्बे बनने और दुबे बन कर रह गये"

कमाई-धमाई तो खतम ही हो गई ऊपर से नेट का बिल अलग से पटाना पड़ रहा है।इसी को कहते हैं "धन जाये और धर्मो का नाश"। पर किसी को क्या दोष दें, हम खुद ही तो "आ बैल मुझे मार" जैसे यहाँ आये थे। लगता है कि यह हिन्दी ब्लोगिंग अब हमारे लिये "आई है जान के साथ, जायेगी जनाजे के साथ" बनकर रह गई है। लाख सोचते हैं कि आज नहीं तो कल इस हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई होनी शुरू हो जायेगी पर लगता है "इन तिलों में तेल ही नहीं है"। हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई तो करमहीन की खेती है, कहते हैं ना "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े"। कमाई तो पाठकों से ही होनी है पर यहाँ तो पाठक आने से रहे। यहाँ पर तो पाठक मिलना "टेढ़ी खीर" है। इतने दिनों से भिड़े हुए हैं यहाँ पर पर अब तक नतीजा सिर्फ "कोयल होय ना उजली सौ मन साबुन लाइ" है।

कमीशन मिलने की आस में अपने ब्लोग के साइडबार में कुछ भारतीय कम्पनियों के विज्ञापन लगा रखे हैं पर उन्हें कोई देखने वाला हो तब ना। ऐसा भी नहीं है कि इन विज्ञापनों से कमाई होती ही नही है, कभी कभी हो भी जाती है पर कमीशन के रूप में मिलने वाली रकम "ऊँट के मुँह में जीरा" ही होती है। आप तो जानते ही है कि "ओस चाटे प्यास नहीं बुझती"। चार छः महीने में यदि हमारे विज्ञापन के माध्यम से कोई फ्लाईट या होटल बुकिंग करा ले तो समझते हैं कि "अंधे के हाथ बटेर" लग गया।

अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो लोग आते ही हैं कमाई करने के उद्देश्य से पर हिन्दी ब्लोगिंग वाले तो संतुष्ट प्राणी हैं, उनमें से अधिकतर को तो ब्लोगिंग से धन कमाने की चाह ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग तो "अनजान सुजान, सदा कल्याण" वाली दुनिया है, यहाँ पर सभी मस्त लोग हैं। हर कोई अपने ब्लोग को "अपना मकान कोट समान" मान कर चलते हैं, "अपनी अपनी खाल में सब मस्त" हैं और "अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग" अलापते हुए अलमस्त रहते हैं।

तो हम भी हिन्दी ब्लोगिंग के रंग में पूरी तरह से रंग गये हैं। जब अंग्रेजी ब्लोग लिखते थे इंटरनेट मार्केटिंग के लिये प्लानिंग किया करते थे, अब हिन्दी ब्लोग लिखते हैं तो योजना बनाते हैं कि किसकी टाँगें खींची जाये, किसके धर्म की बखिया उधेड़ी जाये, पुरुष हैं इसलिये कैसे नारी को नीचा दिखाया जाये किसी ने कहा है "काजर की कोठरी में कैसे हु जतन करो, काजर की रेख एक लागिहैं पै लागिहैं"। यहाँ एक रेख लगना तो क्या पूरी तरह से कजरारे बन गये हैं और "नवपंक लोचन पंक मुख कर पंक पद पंकारुणम" वाला हमारा एक नया ही रूप उभर कर सामने आ रहा है।

अब तो हम भी यहाँ आकर मस्त हो गये हैं। विषय आधारित ब्लोग न बना कर अपने "आधा तीतर आधा बटेर" ब्लोग से ही खुश रहते हैं। भले ही अब हमारा हाल "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" हो गया है पर किसी को बताते नहीं कि हम "धोबी के गधे, घर के ना घाट के" हो गये हैं। आखिर बताने से "अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये लाज" वाली मिसल ही तो चरितार्थ होगी। इसलिये "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" मंत्र को ध्यान में रखकर अपने ब्लोग में जो मन मे आता है वो लिख दिया करते हैं।

17 टिप्पणियाँ:

Dr. Smt. ajit gupta said...

अंग्रेजी और हिन्‍दी में यही अन्‍तर है कि वहाँ व्‍यापार है और यहाँ परिवार। परिवार में कहीं व्‍यापार किया जाता है क्‍या? इसलिए परिवार में रहिए, लड़िए, झगड़िए और मन का अवसाद मिटाते रहिए।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

:)

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक लिखा है.:)

रामराम.

AlbelaKhatri.com said...

भाईजी !

मुहावरों की एजंसी खोल ली है क्या ?

रोचक और मजेदार पोस्ट

अजय कुमार झा said...

गिन लिए सर..... आज टोटल छ्ब्बीस निपटा दिए गए ...
अजय कुमार झा

Ratan Singh Shekhawat said...

वाह ! क्या बढ़िया मुहावरे व लोकोक्तियाँ का इस्तेमाल किया है आपने पोस्ट में |

कमाई न सही वाह वाही तो कभी कभी मिल जाती है हिंदी ब्लोगिंग में :)

Bhavesh (भावेश ) said...

अवधिया जी अंग्रेजी और हिंदी ब्लोग्गिं के पाठकों की संख्या में काफी अंतर है. यहाँ तो न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी. लेख अच्छा लगा

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मजा आ गया मुहावरों और कहावतों का।

खुशदीप सहगल said...

अवधिया जी,

निराशा वहीं होती है जहां से अपने लिए मिलने की कुछ उम्मीद होती है...चाहे वो सगे रिश्ते हो या फिर वर्चुअल दुनिया...मेरी मानिए तो ये गाना सुनिए...

गम पे धूल डालो, कहकहा लगा लो,
कांटों की नगरिया ज़िंदगानी है,
तुम जो मुस्कुरा दो राजधानी है,
यारो नीलाम करो सुस्ती,
हमसे उधार ले लो मस्ती,
मस्ती का नाम तंदरूस्ती...

जय हिंद...

मनोज कुमार said...

मुहावरों और कहावतों से सनी इस प्रस्तुति का जोड़ नहीं।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आज की तारीख मे तो हिन्दी ब्लागिंग से बढिया कमाई की आस करना मायने..."दमडी की बुलबुल टका हलाल"।

Suman said...

nice

ललित शर्मा said...

आप कहावते मार-मार कर ही मुँह सुजा देते हैं।
आपने सिद्ध कर दिया कि
कहावतें भी घातक हथियार हैं।:)
बहुत अच्छी पोस्ट आभार

Tarkeshwar Giri said...

Jab kuch bolenge, accha hi bolenge.

डॉ. मनोज मिश्र said...

"आधा तीतर आधा बटेर" "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" "धोबी के गधे, घर के ना घाट के" "अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये लाज" "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" ..
कितनी रंग-बिरंगी पोस्ट बन गयी है,आभार.

Anil Pusadkar said...

वाह अवधिया जी वाह अंग्रेज़ी ब्लागिंग तो है आम के आम गुठलियों के दाम और हिंदी के बारे मे क्या तारीफ़ करूं आप ने तो सब बता ही दिया है।

राजीव तनेजा said...

भय्यी वाह!...मुहावरों और लोकोक्तियों से सुसज्जित आपकी इस पोस्ट के क्या कहने?...
फुल्ल बटा फुल्ल आनंद आ गया जी पढकर

 
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