Friday, June 11, 2010

अंग्रेजी शासन के समय की एक झलक

हिन्दुत्व एवं ब्राह्मणत्व में अखण्ड विश्वास रखने वाला एमएससी पास चोटीधारी बंगाली युवक अपूर्व को एक कंपनी में अफसर पद पर नौकरी मिलती है और वह अपने ब्राह्मण रसोइये तिवारी के साथ, अपने ब्राह्मणत्व की अत्यन्त सावधानी स रक्षा करता हुआ रंगून पहुँच जाता है जहाँ पर कंपनी की ओर से ही उसके लिये एक मकान की भी व्यवस्था कर दी गई रहती है। समुद्र-यात्रा की थकान से चूर अपूर्व तिवारी को भोजन तैयार करने का आदेश करने के लिये अपनी माँ को अपनी कुशलता का तार देने तारघर पहुँच जाता है।

अपूर्व जब तारघर पहुँचा, तो तार-बाबू खाना खाने चले गये थे। एक घण्टा प्रतीक्षा करने के बाद जब आये, तो घड़ी देखकर बोले, "आज छुट्टी है; दो बजे ऑफिस बन्द हो गया।"

अपूर्व ऊबे हुए स्वर में बोला, "यह अपराध आपका है। मैं एक घण्टे से बैठा हूँ।"

बाबू बोला, "लेकिन मैं तो, केवल दस मिनट हुआ, यहाँ से गया हूँ।"

अपूर्व ने उसके साथ झगड़ा किया, झूठा कहा, रिपोर्ट करने की धमकी दी; लेकिन सब व्यर्थ समझकर अपूर्व चुप हो गया। वह भूख-प्यास तथा क्रोध से जलते हुए बड़े तारघर पहुँचा। यहाँ से, अपने निर्विघ्न पहुँचने का समाचार जब माँ को भेज सका, तब कहीं उसे सन्तोष हुआ।

उपरोक्त उद्धरण श्री 'शरतचंद्र चट्टोपाध्याय' के बंगला उपन्यास "पाथेर दावी" के हिन्दी अनुवाद "पथ के दावेदार" से लिया गया है। तो यह थी अंग्रेजी शासनकाल के समय की व्यवस्था जिसे कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारे देश के कर्णाधारों ने ज्यों का त्यों अपना लिया और यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि यही व्यवस्था आज तक चली आ रही है।

थोड़ी सी झलक और देखें:
अपूर्व जब वापस पहुँचा तो उसने देखा कि तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अनर्गल बकते-झकते जा रहे हैं।

साथ ही एक दूसरे व्यक्ति, तिमंजले से, हिन्दी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं; और एक घोड़े का चाबुक लेकर बीच-बीच में सट्ट-सट्ट शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी उसे नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है; और इस शिष्टाचार के आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है, उसे न कहना ही उचित है।

अपूर्व के पूछने पर तिवारी ने उसे कमरे के भीतर ले जाकर क्रोध, दुःख तथा क्षोभ से रोते-रोते बताया, "यह देखिये, उस हरामजादे साहब ने क्या किया है!"

वास्तव में काण्ड देखकर अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम ही हवा हो गई। खिचड़ी की हांडी से इस समय तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गन्ध निकल रही है; लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। कमरे में बिछा उसका साफ-सुथरा बिछौना, मैले-काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी; यहाँ तक कि पुस्तकें भी पानी में सन गई हैं!

अपूर्व ने पूछा, "यह सब क्या हुआ?"

तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया -

अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आये। आज ईसाइयों का कोई पर्व है। पहले गाना-बजाना और फिर उसके बाद नृत्य आरम्भ हुआ और शीघ्र ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असह्य हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत, साहत का इतना बड़ा आनन्द सम्भवतः, वहन न कर पायेगी। जइसी समय रसोई के पास ही ऊपर से पानी गिरने लगा। भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर आकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब - चाहे वह काला हो या गोरा - देशी आदमी की ऐसी अशिष्टता नहीं सह सकते। वे उत्तेजित हो उठे और देखते-देखते, उन्होंने घर में जाकर बालटी की बालटी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह अपूर्व ने स्वयं अपनी आँखों से देख लिया।

उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि उन दिनों क्या स्थिति थी।

शरत्‌चन्द्र जी की इस कृति पाथेर दावी, जिसकी कथा देशभक्त, स्वाधीनता के पुजारी क्रान्तिकारी वीरों के इर्द-गिर्द घूमती है, से अंग्रेजी शासन इतनी भयभीत हुई थी कि इसके प्रथम संस्करण के छपते ही इसे खतरे की चीज समझकर ब्रिटिश-सरकार ने इस पुस्तक को जब्त कर लिया था।
चलते-चलते

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