टिपिर टिपिर.... टिपिर टिपिर.... टिपिर टिपिर....
दमकती हुई दामिनी! कड़कते हुए मेघ! झमाझम बरसती बरखा!
चहुँओर जल ही जल! पूरा रायपुर जलमय हो गया है! खारून नदी अपने उफान पर आ गई है, उसकी वेगवती धारा मानो सभी कुछ को बहा ले जाना चाहती है। जहाँ पर उच्छृंखल धारा चट्टान से टकराती है वहाँ पर की शुभ्रता मन को मोह लेती है।
गरजत बरसत सावन आयो रे ....
सावन!
ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसके मन में सावन की झमाझम बरसात किसी भी प्रकार का भाव उत्पन्न ना करे। सावन की रिमझिम बरखा हर किसी के मन में किसी ना किसी भाव को जगा देती है। जहाँ प्रेमी-युगल को उल्लासित करता है वहीं विरही-विरहन को घोर वेदना देता है यह सावन।
सावन के रिमझिम फुहार को देखकर कवि के हृदय में भाव स्वयमेव ही उठने लगते हैं! जहा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बरबस ही गुनगुना उठते हैं "वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर ..." वहीं रीतिकालीन कवि सेनापति की लेखनी कागद पर मसि से लिखने लग जाती हैः
दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥
11:56 AM
जी.के. अवधिया

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5 टिप्पणियाँ:
बरसात में आल्हा का आनंद तो हमने भी गांव में लिया है ।
बरसात में आल्हा का आनंद तो हमने भी गांव में लिया है ।
बड़ा ही सुघड़ वर्णन किया है सावन का।
बहुत सुंदर लगा सावन
बढिया पोस्ट!
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