Thursday, July 29, 2010

वे गरीब आदमी हैं, मगर इज्जतदार तो हैं

असल मुगल खून! मोती के समान रंग! उम्र अस्सी के पार, लम्बे पट्ठे, बगुला के पर जैसे सफेद! बड़ी-बड़ी आँखें - प्यार ‌और शान को निमन्त्रण देती हुईं! कद लम्बा, दाढ़ी खसखसी, मखमली ऊदी कामदार टोपी .....

यह थे मिया खुरशैद मुहम्मदखां, रईस बड़ा गाँव।

सुना जाता था कि मियाँ का घराना दिल्ली के शाही खानदान से भी कुछ सम्बन्ध रखता था। बादशाह उनका आदर करते और कभी-कभी उन्हें लालकिले में बुलाते थे। मियाँ की उम्र बादशाह सलामत की उम्र से भी अधिक थी। इसी से बादशाह कभी-कभी दर्बारे-तख्लिया और कभी-कभी शाही दस्तरखान पर भी मियाँ को बुलाकर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाते थे। इसी से रईस-रियाया सभी पर उनका दबदबा था।

सर्दी के दिन, सुबह का वक्त। अभी पूरी धूप नहीं खिली थी, कोहरा छाया था, मियाँ खेतों से वापस लौट रहे थे। कल्लू भंगी अपनी झोपड़ी के आगे आग ताप रहा था और हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। मियाँ ने घोड़ी रोक दी। बोले, "कल्यान मियाँ, सर्दी बहुत है।"

कल्लू, घबरा कर, हुक्का छोड़ उठ खड़ा हुआ। उसने जमीन तक झुक कर मियाँ को सलाम किया। और हाथ बाँधकर कहा, "हाँ सरकार!"

"अमां, तुम्हारे पास तो कुछ ओढ़ने को भी नहीं है। लो, यह लो।"

उन्होंने अपनी कमर से लपेटा हुआ शाल उतारकर भंगी के ऊपर डाल दिया। भंगी ने घबराकर कहा, "सरकार, यह क्या कर रहे हैं, इतनी कीमती शाल यह गुलाम क्या करेगा? न होगा तो मैं गढ़ी में हाजिर हो जाऊँगा। कोई फटा-पुराना कपड़ा बख्श दीजियेगा।"

लेकिन मियाँ ने भंगी की बात सुनी नहीं। उन्होंने कहा, "अमां, कल्यान, तुम्हारी लड़की की शादी कब हो रही?"

इसी चौथे चाँद की है सरकार!"

"देखना, बारात की तवाज़ा ज़रा ठीक-ठाक करना, ऐसा न हो भई, गाँव की तौहीन हो। तुम जरा लापरवाह आदमी हो। समझे?"

"समझ गया सरकार!"

"जिस चीज की जरूरत हो छुट्टन मियाँ से कहना।"

"जो हुक्म सरकार!"

मियाँ ने घोड़ी बढ़ाई। और कल्लू भंगी को सिर से लपेटते हुए दूर तक मियाँ की रकाब के साथ गया।

यह है प्रसिद्ध इतिहासज्ञ उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन जी की कृति "सोना और खून" से लिया गया सारांशित अंश। मुझे उनके उपन्यास अच्छे लगते हैं! आप लोगों को यदि अच्छा लगा हो तो आगे .....

मियाँ ने घोड़ी साईस के हवाले की और दीवानखाने में आ मसनद पर बैठ गये।

मियाँ के सनद पर बैठते ही मुहम्मद, उनके साहबजादे, ने आकर कहा, "अब्बा हुज़ूर, मियाँ अमज़द और वासुदेव पण्डित बड़ी देर से बैठे हैं।"

"किसलिए?"

"वही, कर्जा माँग रहे हैं। मियाँ अमज़द को जो कम्पनी बहादुर को मालगुजारी भरनी है, उसका वारंट लेकर कम्पनी का आदमी दरवाजे पर डटा बैठा है। अमज़द पिछवाड़े की दीवार फाँदकर आया है। कहता है, घर रोना-पीटना मचा है। कम्पनी के प्यादे बरकन्दाज़ एक ही बदजात होते हैं। बहू-बेटियों की बेहुर्मती करना तो उनके बायें हाथ का खेल है।"

"बहुत खराब बात है। कितने रुपये चाहिये उसे?"

"चार सौ माँगता है।"

"और वासुदेव महाराज?"

"उनकी लड़की की शादी है। कहते हैं, जहर खाने को भी पैसा नहीं है। बिरादरी में नाक कट गई तो जान दे देगा।"

"म्याँ, गैरतमन्द आदमी है। उसे कितना रुपया चाहिये?"

"वह छः सौ माँगता है।"

"इस वक्त तहवील में तुम्हारे पास कितना रुपया है?"

"वही एक हजार है, जो चौधरियों के यहाँ से कर्ज आया है।"

"तब तो दोनों का काम हो जायेगा। दे दो।"

"मगर अब्बा हुज़ूर, वह तो हमने सरकारी लगान अदा करने के लिये कर्ज लिया है।"

"उस पाक परवरदिगार की इनायत से हमें कर्जा अभी मिलता है। दे दो, ये गर्जमन्द हैं। पीछे देखा जायेगा।"

"लेकिन हुज़ूर, हम मालगुजारी कहाँ से अदा करेंगे? ये फिरंगी के प्यादे और अमीन तो बादशाह तक की छीछालेदर करने में दरेग नहीं करते हैं। कल ही आ धमकेंगे ड्योढ़ियों पर, और हुज़ूर की शान में बेअदबी करेंगे तो मैं उन्हें गोली से उड़ा दूँगा। पीछे चाहे जो हो।"

"लेकिन ऐसा होगा क्यों? मालगुजारी दे दी जायेगी।"

"कहाँ से दी जायेगी?"

"चौधरी तो हमारे दोस्त हैं। वे क्या कभी नाही कर सकते हैं? वे भी खानदानी जमींदार हैं। इज्जत की इज्जत बचाना वे जानते हैं।"

"तो यह भी खूब रही। कर्जा लिये जाइये और दूसरों को बाँटे जाइये। ये ही क्यों नहीं जाते चौधरी के पास?"

"बेटा, वे गरीब आदमी हैं, मगर इज्जतदार तो हैं। फिर यह तो गाँव की इज्ज़त का सवाल है। हमारे गाँव का आसामी गैर के सामने हाथ पसारेगा तो हमारी इज्ज़त कहाँ रही!"

"लेकिन हुज़ूर, सारी रियासत तो रेहन हो गई। अब कर्जा भी न मिलेगा तब क्या होगा?"

"जो ख़ुदा को मंजूर होगा। जाओ, दे दो बेटे, बहुत देर से बैठे हैं वे, न जाने उनके घर पर क्या बीत रही होगी! पाजी बरकन्दाज़ बड़े बदतमीज़ होते हैं।"

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कल्यान मेहतर आसपास के भंगियों का चौधरी और सरपंच था। उसकी बड़ी इज्ज़त थी। इसलिये उसकी लड़की के ब्याह की धूमधाम भी साधारण न थी। चालीस गाँव के भंगियों को न्योता गया था। बारात आनेवाली थी लखनऊ से। बेटे का बाप भी नवाब का मेहतर था। उसका भी बड़ा रुआब-दबदबा था। बारात में वह लखनऊ की तवायफ़ें, बनारस के भांड, जौनपुर की आतिशबाजी और मिर्जापुर के कव्वाल लाया था ....

कल्यान बफरे शेर की तरह दहाड़ता हुआ आया, और आते ही बड़े मियाँ के सामने पैर फैलाकर बैठ गया। उसने कहा, "सरकार चाहे मारें चाहे बख़्शें, मगर मैं नखलऊ के नकटे को बेटी नहीं देने का।"

"क्यों, क्या हुआ? इस कदर बिगड़ क्यों रहे हो?"

"बस हुज़ूर, मर्द का कौल है। बस, हुक्म दीजिये बज्जातों को गाँव से बाहर किया जाये।"

"आखिर बात क्या है? कुछ कहोगे भी।"

"हुज़ूर, छोटी मुँह बड़ी बात! कहता है, समधी की मिलनी सरकार से करूँगा। सरकार जब यहाँ बैठे हैं तो वे ही लड़की के बाप हैं।"

"तो झूठ क्या कहता है? लड़की का बाप तो मैं ही तो हूँ। तुम्हारी ही क्या गाँव भर की लड़कियों का बाप मैं ही हूँ।"

"आप तो सरकार हमारे भी माई-बाप हैं, सरकार तो परमेसुर के रूप हैं। मेहतर की जाजम पर आकर आप बैठ गये। पर उस साले भंगी के बच्चे की यह ज़ुर्रत कि सरकार से समधी की मिलनी करेगा!"

"बस या और कुछ भी?"

"साला, चोट्टा, नखलऊ जाकर सारी बिरादरी में शेखी बघारेगा कि बड़े गाँव की बेटी ब्याह लाया हूँ, सरकार ने खुद समधी की मिलनी दी है।"

"वह कहाँ है?"

"वह क्या गुड़गुड़ी मुँह में लगाये बैठा है चोट्टा!"

"तो उसे बुलाओ कल्यान मियाँ।"

"हुज़ूर, वह आपके सामने बेअदबी कर बैठेगा तो नाहक खून हो जायेगा। बस हुक्म दीजिये, झाड़ू मारकर गाँव से बाहर करूँ।"

"उसे यहाँ बुलाओ।"

"लेकिन सरकार ....."

"हमारा हुक्म तुमने सुना नहीं कल्यान!"

कल्यान का और साहस नहीं हुआ। जाकर समधी को बुला लाया। उसके आते ही बड़े मियाँ दुशाला छोड़कर खड़े हो गये। दोनों हाथ फैलाकर कहने लगे, "आओ चौधरी, मिलनी कर लें। यह मैं अपनी बेटी तुम्हें दे रहा हूँ, भूलना नहीं।"

लखनऊ का मेहतर मूँछों में हँसता हुआ आगे बढ़ा। सारे भंगी दंग रह गये। चारों ओर भीड़ आ जुटी। कल्यान मोटा लट्ठ लेकर मियाँ और लखनऊ वाले के बीच खड़ा हो गया। उसने जोर से चिल्लाकर कहा, "नहीं हो सकता, जान से ही मार डालूँगा चौधरी जो आगे कदम बढ़ाया। अबे भंगी के बच्चे, तेरी यह मज़ाल, कि तू हमारे बादशाह की मिलनी लेगा, जो लालकिले के शहनशाहे हिन्द के रिश्तेदार हैं!"

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कभी न देखा-सुना दृश्य सामने था, जाजम पर चौरासी बरस के बड़े मियाँ, जिनकी रियासत और बड़प्पन की धूम दिल्ली के लालकिले तक थी, जो बाईस गाँवों का राजा था, शान्त-प्रसन्न मुद्रा में दोनों बाँहें पसारे खड़ा था, मेहतर से बगलगीर होने के लिये। उन्होंने प्रसन्नमुद्रा से कहा, "आओ चौधरी आगे बढ़ो। और तुम कल्यान, मेरे पास आओ, लाठी फेंक दो।"

कल्यान ने नीचे सिर झुका लिया। वह चुपचाप चौधरी के पीछे आ खड़ा हुआ। सहमते-सहमते लखनऊ का मेहतर आगे बढ़ा - और बड़े मियाँ ने दोनों बाँहों में उसे बाँध लिया।

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(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून से सारांशित अंश)

चलते-चलते

आचार्य चतुरसेन जी ने शोध करके विक्रम संवत 1862 में रसद के क्या दाम थे पता किया और अपने उपन्यास "सोना और खून" में उल्लेखित किया हैः

".... साहू पूरा घाघ है। बहुत समझाने-बुझाने से यह रसद देने को राजी हुआ है, मगर भाव बहुत महँगे बताता है ......"

"क्या भाव बहुत महँगे हैं?"

"जी, गेहूँ रुपये का ढाई मन और चना साढ़े तीन मन के हिसाब से देगा।"

"गुड़ और शक्कर?"

"गुड़ सवा मन और शक्कर छत्तीस सेर देता है।"

"धान बाजरा और माश भी चाहिये।"

"धान रुपये का सवा दो मन, बाजरा साढ़े तीन मन और माश रुपये का पौने दो मन देता है।"

5 टिप्पणियाँ:

ajit gupta said...

उपन्‍यास अंश पढ़कर पूरा उपन्‍यास पढ़ने का मन कर गया। बहुत ही श्रेष्‍ठ कथानक है।

मनोज कुमार said...

बेहतरीन। लाजवाब।

वाणी गीत said...

रोचक कड़ी ...!

ललित शर्मा said...

बहुत बढिया गुरुदेव

भुली बिसरी याद दिला दी।

जय हो

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़वाने का आभार।

 
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