Wednesday, July 28, 2010

क्या करने आयें हिन्दी ब्लोग्स में?

कल चौक में मुहल्ले के कुछ युवा आपस में बतिया रहे थे। हमें पता है कि इन लोगों का अधिकतर समय आर्कुट और फेसबुक में विचरण करते हुए ही व्यतीत होता है। हमने सोचा कि ये लोग रोज नेट में सर्फिंग करते ही हैं तो क्यों ना इन्हें हिन्दी ब्लोग्स के प्रति आकर्षित किया जाये? यही सोचकर हम भी उनकी मण्डली में पहुँच गये। उम्र में बड़े होने के कारण वे सब हमें भैया सम्बोधित करते हैं। उन्होंने सम्मानपूर्वक हमें आसन दे दिया।

हमने पूछा, "तुम लोग सारा दिन नेट पर बैठते हो तो हिन्दी ब्लोग्स में क्यों नहीं आते?"

"दो-चार बार गये तो हैं भैया हिन्दी ब्लोग्स में, पर हमें कुछ जँचा नहीं।" महेन्द्र ने हमारे प्रश्न का उत्तर दिया।

हमने फिर पूछा, "क्या नहीं जँचा?"

इस पर कृष्ण कुमार ने कहा, "अब आप ही बताइये भैया क्या करने जायें हम हिन्दी ब्लोग्स में? यह जानने के लिये कि कहाँ पर बस और ट्रक की भिड़ंत हो गई है और कितने लोग मर गये हैं या घायल हो गये हैं? या यह जानने के लिये कि कहाँ पर खिलाड़ियों का कोटा कितना हो गया है? जिन बातों को हम दिन में पच्चीस बार टीव्ही में देख चुके होते हैं उन्हों को हिन्दी ब्लोग्स में फिर से पढ़ने आयें क्या?"

कृष्ण कुमार की बात पूरी होते ना होते पिंटू बोल उठा, "या यह पढ़ने के लिये कि कोई ब्लोगर यात्रा कर रहा था तो उसके कपड़े चोरी हो गये? कब और कहाँ पर कितने ब्लोगर आपस में मिले? ब्लोगर मीट में नाश्ते में परोसे गये समोसे कुरकुरे और स्वादिष्ट थे? गाय-भैंस, कुत्ते- बिल्ली के पिल्लों आदि के चित्र देखने आयें क्या?"

महेन्द्र ने बताया, "एक ब्लोग में मैं गया था तो उसमें इतनी जोरदार फिलॉसफी थी कि सिर से ऊपर ही ऊपर से गुजर गई। एक दो पैरा पढ़ने के बाद आगे पढ़ना दुश्वार हो गया।"

किसी ने कहा, "हमें क्या पड़ी है कि किसका जन्मदिन कब है जानने की? और किसने अपना जन्मदिन कैसे मनाया इससे भी हमें क्या मतलब है?"

एक और ने कहा, "भैया, मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ और ये किशन फलाँ विषय में शोधकार्य कर रहा है। आप बताइये कि क्या हेल्प मिल सकता है हमें हिन्दी ब्लोग्स से?"

एक दक्षिण भारतीय युवक भी था वहाँ पर। उसने कहा, "भैया, मैं कामचलाऊ हिन्दी बोल जरूर लेता हूँ पर मुझे ठीक से हिन्दी नहीं आती। मैं हिन्दी सीखना चाहता हूँ। आप मुझे ऐसा ब्लोग बतायें जहाँ जाकर मैं हिन्दी सीख सकूँ!"

अब हम क्या कह सकते थे? वहाँ से खिसक लेने में ही हमने अपनी भलाई समझी और चुपचाप खिसक आये।
Post a Comment