Wednesday, August 11, 2010

साग-सब्जी-तरकारी-भाजी

सोच रहा हूँ कि आज क्या लिखूँ अपने पोस्ट में? कुछ भी नहीं सूझ रहा है और खीझ रहा हूँ खुद पर। क्या हर रोज कुछ ना कुछ लिखना जरूरी है? न लिखूँ तो क्या फर्क पड़ जायेगा? और लिखता हूँ तो भी क्या फर्क पड़ जाता है? कुछ लोग पढ़ लेते हैं तो कुछ लोग 'वाह वाह' भी कर देते हैं। पर फर्क कुछ नहीं पड़ता। हिन्दी की गलतियाँ देख कर अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु के बारे में लिखा तो क्या लोगों ने सही हिन्दी लिखना शुरू कर दिया? सोचता हूँ कि क्या एक मैंने ही हिन्दी का ठेका ले रखा है? अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है क्या?

जब देखो तब किसी ना किसी बात से कुढ़ता रहता हूँ। लोगों को अंग्रेजी के बारह महीनों के नाम याद हैं पर हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम याद नहीं। कितनी ही बार कितने ही लोगों को बता चुका हूँ कि हिन्दू वर्ष के बारह महीनों के नाम हैं - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ (जेठ), आषाढ़ श्रावण (सावन), भाद्रपक्ष (भादों), आश्विन (क्वार), कार्तिक, मार्गशीष (अगहन), पूस, माघ, फाल्गुन (फागुन)। पर क्या फायदा? कोई याद रखने की कोशिश भी करता है क्या? आज के बच्चे हिन्दी की गिनती नहीं जानते, पूछते हैं कि अड़सठ याने कि सिक्सटी एट ही होता है ना? जब हिन्दी की गिनती ही नहीं आती तो पहाड़ा याद रखने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। हमारी संस्कृति दिनों-दिन रसातल में जाती जा रही है। अच्छे संस्कारों में कमी आती जा रही है। ऐसी ही बहुत सारी बातें सोच-सोच कर कुढ़ता हूँ। पूरी तरह से सठिया गया हूँ। अपनी ही हाँकते रहता हूँ। कई बार दूसरों को सीख दी है "जैसी चले बयार पीठ तैसी कर लीजे" पर जमाने के साथ खुद को कभी भी नहीं बदल पाया। जानता हूँ कि खुद को तो बदला जा सकता है, जमाने को नहीं। पर बार-बार जमाने को ही बदलने की नाकाम कोशिश करता हूँ। यह भी जानता हूँ कि ऐसा करना मूर्खता है पर जान-बूझ कर बार-बार मूर्खता करता हूँ और लोगों की नजर में बुरा भी बनता हूँ। अपने पोस्ट में ही नहीं बल्कि अपने मिलने वालों से बात-चीत करते समय भी कुछ न कुछ उपदेश-सा दे दिया करता हूँ। मेरे सामने तो वे मेरी उम्र का लिहाज कर के मेरी हाँ में हाँ मिला देते हैं पर पीठ पीछे जरूर यही कहते होंगे - 'स्साला खूँसट बुड्ढा, हमेशा होशियारी झाड़ते रहता है'।

"अब जरा कम्प्यूटर के सामने से हटिए और जाकर सब्जी ले आइए।"

मेरी सोच का सिलसिला टूटता है। पर क्षण भर बाद सोच का एक नया सिलसिला शुरू हो जाता है। सब्जी शब्द सुनकर याद आ जाता है कि एक फिल्म के किसी संवाद में "आलू की भाजी" का जिक्र था। मराठी में सब्जी को भाजी ही कहा जाता है जबकि हमारे यहाँ पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई आदि को ही भाजी कहा जाता है। भाजी याने कि सिर्फ पत्ते वाली सब्जियाँ। अचानक सोचने लगता हूँ कि आखिर सब्जी शब्द कैसे बना होगा? क्या करना है मुझे यह जानकर कि सब्जी शब्द क्यों और कैसे बना? मैं कोई भाषाविद् हूँ क्या? अपनी सोच को झटकने की कोशिश करता हूँ पर सोच है कि चिपक कर रह गई है। उर्दू में 'हरा' को 'सब्ज' कहा जाता है, जरूर सब्जी शब्द सब्ज से ही बना होगा। सब्जी याने कि हरे रंग की सब्जियाँ - मटर, सेम आदि! तो फिर साग और तरकारी क्या होता है? शायद जो सब्जी नहीं होती याने कि हरे रंग की नहीं होती उसे तरकारी कहते हैं - आलू, टमाटर आदि। और साग? लगता है कि साग शब्द का प्रयोग शायद सब्जी-भाजी-तरकारी सभी के मेल के लिये किया जाता है, मांसाहार के लिए भी। अपने इस विश्लेषण से न तो पूर्णतः संतुष्ट हूँ और न असंतुष्ट।

"अजी, गए नहीं अभी तक?"

मेरी तन्द्रा टूटती है। उठ जाता हूँ सब्जी लाने जाने के लिए। सोच में अभी भी घूम रहा है साग-सब्जी-तरकारी-भाजी!
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