Friday, August 13, 2010

हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र

इतिहास गवाह है कि हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र हमेशा था और आज भी है! इस प्रेम और सौहार्द्र का एक बेमिसाल मिसाल देते हुए आचार्य चतुरसेन जी अपने उपन्यास "सोना और खून" में लिखते हैं:

रात को मियाँ पलंग पर दराज़ हुए तो उनका खास खिदमतगार पीरू पलंग के पाँयते बैठकर उनके पैर दबाने लगा। हमीद ने पेचवान जँचा कर रख दिया। मियाँ ने हुक्के में एक-दो कश लिए और हमीद को हुक्म दिया कि छोटे मियाँ जग रहे हों तो उन्हे जरा भेज दो।

बड़े मियाँ का सन्देश पाकर छोटे मियाँ ने आकर पिता को आदाब किया। बड़े मियाँ ने हुक्के की नली मुँह से हटाकर कहा, "अहमद, कल अलसुब्बह ही मुक्तेसर चलना है। तुम भी चले चलना जरा।"

"मेरा वहाँ क्या काम है?"

."काम नहीं, चौधरी बहुत याद करते हैं तुम्हें। जब-जब जाता हूँ तभी पूछते हैं। भई एक ही नेक-खसलत रईस हैं।"

"लेकिन अब्बा हुजूर, मुझे तो वहाँ जाते शर्म आती है।"

"शर्म किसलिए बेटे?"

"हम लोग उनके कर्जदार हैं, और इस बार भी आप इसी मकसद से जा रहे हैं।"

"तो क्या हुआ! सूद उन्हें बराबर देते हैं और रियासत पर कर्जा लेते हैं। फिर चौधरी ऐसे शरीफ हैं कि आँखें ऊँची कभी करते देखा नहीं। हमेशा 'बड़े भाई' कहते हैं। ........ और हाँ, एक टोकरा अमरूद और सफेदा, उम्दा चुनकर रख लेना मियाँ पीरू, तुम चले जाओ अभी इसी वक्त बाग में।"

पीरू सिर झुकाकर चला गया। अहमद ने कुछ नाराजी के स्वर में कहा, "आप नौकरों के सामने भी ...."

छोटे मियाँ पूरी बात न कह सके, बीच में ही बड़े मियाँ ने मीठ लहजे में कहा, "पीरू तो नौकर नहीं है। घर का आदमी है। खैर, तो तैयार रहना। और हाँ, वह गुप्ती भी ले चलना।"

"वह किसलिए?"

"चौधरी को नज़र करूँगा। उम्दा चीज है।"

"उम्दा चीजें घर में भी तो रहनी चाहिए।"

"मगर दोस्तों को सौगात भी तो उम्दा ही जानी चाहिए।"

"दोस्ती क्या, चौधरी समझेगा मियाँ कर्ज के लिए खुशामद कर रहे हैं।"

"तौबा, तौबा, ऐसा भला कहीं हो सकता है! चौधरी एक ही दाना आदमी है। चलो तो तुम, मिलकर खुश होओगे।"

छोटे मियाँ जब जाने लगे तो बड़े मियाँ ने टोककर कहा, "अमां जरा रघुवीर हलवाई के यहाँ कहला भेजना - मिठाई अभी भेज दे। कल ही मैंने कहला दिया था, तैयार रखी होगी। सुबह तो बहुत देर हो जाएगी।

बड़े मियाँ देर तक हुक्का पीते रहे। पीरू मियाँ आकर फिर पैर दबाने लगे। पैर दबाते-दबाते पीरू ने कहा हुजूर बस, अब तो हज को चल ही दीजिए। आपके तुफैल से गुलाम को भी ज़ियारत नसीब हो जाएगी।"

"मियाँ पीरू, हज की मैं दिली तमन्ना रखता हूँ। मगर दिल मसोसकर रह जाता हूँ। सोचता हूँ, साहबजादा घर-बार संभाल लें, उनकी शादी हो जाए तो बस मैं चल ही दूँ।"

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(पीरू बोला) ...... जब तक हुजूर का साया उनके सर पर है, उन्हें किस बात का गम है! इसी से शायद वे बेफिक्रे हैं।"

"लेकिन भई, मैं भी अब पचासी को पार कर चुका। सुबह का चिराग हूँ।"

"तौबा, तौबा, यह क्या कल्मा ज़बान पर लाए हुजूर! जी चाहता है अपना मुँह पीट लूँ। हुजूर का दम गनीमत है।"

बड़े मियाँ हँस दिए। उन्होंने कहा, "तैयारी कर दो पीरू! जरा दिन गर्माए तो बस चल ही दें। ...."

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चौधरी बीमार थे। दिल्ली दे कोई हकीम उनका इलाज कर रहे थे। उन्हें जब बड़े मियाँ की आमद की सूचना दी गई तो उन्होंने अपने पलंग के पास ही बुला लिया। छोटे मियाँ को देखकर चौधरी खुश हो गए। साहब-सलामत के बाद चौधरी ने कहा, "आपको मैं याद ही कर रहा था। शायद आजकल में आदमी भेजकर बुलवाता।"

"तो आपने तो खबर भी नहीं दी, इस कदर तबीयत खराब हो गई। अब इंशाअल्लाताला जल्द सेहत अच्छी हो जाएगी, मगर अहतियात शर्त है। हकीम साहब क्या फर्माते हैं? आदमी तो लायक मालूम देते हैं।"

जी हाँ, बीस सालों से मेरे यहाँ इलाज करते हैं। हज़रत बादशाह सलामत के भी ये ही तबीब हैं हकीम नज़ीरअली साहब।"

"जानता हूँ आलिम आदमी हैं। सुना है बड़े नब्बाज़ हैं।"

"लेकिन वे इलाज ही तो कर सकते हैं, जिन्दगी में पैबन्द तो लगा नहीं सकते।"

"यह आप क्या फर्मा रहे हैं!"

"बस अब मेरा आखरी वक्त है। इस गिदोनवा में सिर्फ एक आप मेरे हमदर्द हैं। बिटिया सयानी हो गई है, इसके हाथ पीले हो जाते तो इतमीनान से मरता। अब भगवान मर्जी।"

"लेकिन चौधरी, आप इस कदर पस्तहिम्मत क्यों हो रहे हैं? आ जल्द अच्छे हो जाएँगे।"

"खैर, तो आपसे मेरी एक आरजू है। आप मेरे बड़े भाई हैं, अब इस घर की देखभाल आप पर ही छोड़ता हूँ। नादान बच्चे हैं, आप ही को उनकी सरपरस्ती करनी होगी। सब भाई समझदार और दाना आदमी हैं, उम्मीद है खानदान को दाग न लगने पाएगा, सिर्फ आपका साया सर पर रहना चाहिए।"

"उस घर से भी ज्यादा यही घर मेरा है चौधरी, आप किसी बात की फिक्र मत कीजिए। क्या साहबजादी की बात कहीं लगी है?"

"अभी नहीं। उसे तो बस पढ़ने की ही धुन लग रही है। बेगम समरू जब से तशरीफ लाई हैं, उसका सिर फिर गया है। बेगम ने ही उसे पढ़ाने को एक अंग्रेज लेडी रखवा दी है। देखता हूँ उसकी सोहबत में वह नई-नई बातें सीखती जा रही है। मगर बिना माँ की लड़की है। सात भाइयों में अकेली! सभी की आँखों का तारा। इसी से हम लोग कोई उसकी तबीयत के खिलाफ काम करना नहीं चाहते।"

"यही हाल छोटे मियाँ का है। हज़रत सलामत के कहने से इसे फिरंगियों के मिशन कालेज में दाखिल किया था। अब अंग्रेजी पढ़कर नई दुनिया की नई बातें करता है।"

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इसी वक्त मंगला हाथ में दूध का गिलास लेकर कमरे में आ गई। ......

कमरे में बाहरी आदमियों आदमियों को देख वह ठिठकी, और मुँह फेरकर लौट चली। पर चौधरी ने क्षीण स्वर में कहा, "चली आओ बेटी, चली आओ; दादाजान हैं, पहचाना नहीं! .... । चाचाजान भी हैं बेटी, उन्हें नमस्कार करो।"

मंगला ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। चौधरी ने कहा, "दो गिलास दूध और ले आ बेटी, दादा और चाचा के लिए।"

मंगला तेजी से चली गई। दोनों हाथों में दो गिलास दूध भरकर ले आई। उसके साथ ही एक खिदमतगार बड़े-से थाल में गुड़ के गिंदोड़े भरकर मियाँ के सामने रख गया।

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(चौधरी ने कहा) ".........खैर, यह कहो इस वक्त तकलीफ कैसे की?"

"यों ही चला आया। बिटिया को देखने को दिल बेचैन था। छोटे मियाँ भी आपको सलाम करना चाहते थे।"

"होनहार हैं, ज़हीन हैं, ईश्वर ने चाहा तो नेकनामी और इज़्ज़त का वह रुतबा हासिल करेंगे कि जिसका नाम .....।" चौधरी ने प्रेम से छोटे मियाँ की ओर देखा। उनका हाथ पकड़कर अपने पलंग के पास खींच गोद में बिठा लिया। बड़े मियाँ ने कहा, "चौधरी चाचा को मुकर्रर सलाम करो बेटे।"

छोटे मियाँ ने अदब से खड़े होकर चौधरी को सलाम किया। 'जीते रहो, जीते रहो!' चौधरी ने प्रेम-विभोर होकर कहा।

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"...... क्या मालगुजारी अदा हो गई?"

"अभी कहाँ, वह रुपया जो आपके यहाँ से उस दिन आया था, दूसरे एक जरूरी काम में खर्च हो गया। लेकिन चौधरी, आप इस वक्त परेशान न हों। कुछ इन्तजाम हो ही जाएगा। अभी तो आप अपनी सेहत पर ध्यान दीजिए।"

लेकिन चौधरी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर इधर-उधर की बातें हुईं। .....

खाने का वक्त हुआ। दोनों ने खाना खाया।

तीसरे पहर जब वे चौधरी के पलंग के पास रुखसत लेने पहुँचे, तो चौधरी ने एक कागज उनके हाथ में थमा दिया। बड़े मियाँ ने देखा - तमाम कर्जे की भरपाई की चुकता रसीद थी। बड़े मियाँ ने आश्वर्यचकित होकर चौधरी की ओर देखकर कहा, "यह क्या चौधरी?"

"बस, दुलखो मत बड़े भाई! साहबज़ादे पहली बार मेरी ड्योढ़ी आए हैं। यह उनकी नज़र है।"

"लेकिन यह तो तमाम कर्जे की भरपाई रसीद है!"

"तो क्या हुआ? आपकी सखावत ने तो सारी रियासत को रेहन रख दिया। अब छोटे मियाँ को मेरी तरफ से यह छोटा-सा नज़राना है।"

"यह न हो सकेगा चौधरी, यह भी कोई इन्साफ है! तौबा, तौबा!"

चौधरी की आँखों में पानी भर आया। उन्होंने कहा, "बड़े भाई, मेरे साथ इस कदर सख्ती! ऐसी बेरुखी! आप तो कभी ऐसे न थे। भला सोचो तो, हमारे आपके बीच कोई फर्क है। मैंने तो कभी उस घर को अपने घर से अलग नहीं समझा। जैसे मुझे अपने बच्चों का ख्याल है, वैसे ही छोटे मियाँ का भी है। फिर यह मेरा आखरी वक्त है। छोटे मियाँ को मैं कैसे छूँछे हाथ रहने दे सकता हूँ।"

"तो जमींदारी पर ही क्या मौकूढ है? खुदा ने चाहा तो उसे कम्पनी बहादुर की कोई अच्छी-सी नौकरी मिल जाएगी।"

"मिल जाएगी तो अच्छा ही है। मगर बाप-दादों की जायदाद से भी तो मियाँ को बरतरफ नहीं किया जा सकता।"

"कौन बरतरफ करता है, चौधरी! तुम्हारा रुपया मय सूद चुकता करके जमींदारी छूट जाएगी, तब वही मालिक होगा।"

"अच्छी बात है, रसीद तो आप रख लीजिए। जब रुपया हो उसे मेरी तरफ से छोटे मियाँ की शादी में दुलहिन को दहेज दे दीजिएगा।"

"यह तो वही बात हुई।"

"तो दूसरी बात कहाँ से हो सकती है!"

"खैर, तो आप जानिए और छोटे मियाँ, मैं तो मंजूर नहीं कर सकता।"

"तो छोटे मियाँ को हुक्म दे दीजिए।"

"नहीं, हुक्म भी नहीं दे सकता।"

"अच्छा साहबज़ादे, यह कागज तुम रख लो।"

".... आप इसरार न कीजिए। और यह रसीद अपने पास ही रखिए। अब्बा हुजूर जब आपका रुपया ब्याज समेत चुकता कर देंगे, तो यह रसीद ले लेंगे।"

"तो बेटे, तुम अपने इस बूढ़े चाचा की इतनी-सी बात टालते हो।"

"चाचाजान, यह ऊसूल की बात है।"

"बेटे, तुम जानते हो, मैं बूढ़ा आदमी हूँ, कमजोर हूँ, बीमार हूँ; मेरा दिल टूट जाएगा। अगर तुम यह कागज न लोगे।"

बड़े मियाँ ने कहा, "चौधरी, छोटी रकम नहीं है, चालीस हजार से ऊपर की रकम होगी। आखिर खुदा के सामने मैं क्या जवाब दूँगा?"

"तो तुमने मेरा दिल तोड़ दिया बड़े भाई," चौधरी ने कातर कण्ठ से कहा।

बड़े मियाँ की भी आँखें भीग गईं, उन्होंने कहा़, "खैर, एक वादा करें तो मैं मियाँ को रसीद लेने की इज़ाजत दे सकता हूँ।"

"कैसा वादा?"

"कि जब भी रुपये का बन्दोबस्त हो जाए, रुपया आप ले लेंगे।"

"खैर यही सही। अच्छा सम्भालिए।"

"यह क्या?"

"यह दो तोड़े हैं, मालगुजारी भी अदा कर दीजिए और हज भी कर आइए। कम हो तो खबर भेज दीजिए, रुपया पहुँच जाएगा।"

"लेकिन ....."

"लेकिन क्या बड़े भाई!" उन्होंने खिदमतगार को पुकारकर कहा, "तोड़े रथ में रख आ। और दो सवार साथ जाकर बड़े मियाँ को पहुँचा आएँ। लो बेटे सम्भाल कर रखो।" उन्होंने ने रसीद छोटे मियाँ के हाथ में दे दी। तीनों ही आदमियों की आँखें गीली थीं। बड़ी देर तक सन्नाटा रहा। छोटे मियाँ ने कहा, "अब्बा हुजूर, वह गुप्ती आप चाचाजान को नज़र करने लाए थे न!"

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.... (चौधरी के बेटे) सुरेन्द्रपाल ने पीछे से पुकारा, "यह क्या तायाजी, आप जा रहे हैं, बिना मेरी इजाजत लिए ही।"

बड़े मियाँ रथ में चढ़ते-चढ़ते ठिठक गए, उन्होने कहा, "बड़ी गलती हुई बेटा! लेकिन इजाजत दे दो। सूरज छिप रहा है और सर्दी की रात है, पहुँचते-पहुँचते अन्धेरा हो जाएगा।"

"आपको इजाजत दे सकता हूँ, मगर भाई साहब को नहीं।"

"ये फिर आ जाएँगे, अभी तो छुट्टियाँ हैं।"

"यह नहीं हो सकता। मैं आज इन्ही के लिए तमाम दिन परेशान रहा हूँ।"

"परेशान क्यों रहे बेटे?"

"शिकार के बन्दोबस्त में। कछार में एक नया शेर आया है। .....। आदमखोर है। उधर गाँवों में उसने बहुत नुकसान किया है। बस, सुबह आप आए तो मैंने तय कर लिया कि भाई साहब और मैं शिकार करेंगे उसका। अब सब बन्दोबस्त हो गया है। और आप खिसक रहे हैं चुपचाप। यह नहीं हो सकेगा।" उसने आगे बढ़कर छोट मियाँ का हाथ पकड़ लिया। शेर की शिकार की बात सुनकर छोटे मियाँ का कलेजा उछलने लगा। कभी शेर का शिकार नहीं किया था। यों बन्दूक का निशाना अच्छा लगाते थे। कभी-कभी शिकार भी करते थे। मगर मुर्गाबियों और हिरनियों का। सुनकर खुश हो गए। उन्होंने मुस्कुराकर बड़े मियाँ की ओर देखा।

बड़े मियाँ ने कहा, "तो बेटे, रह जाओ दो दिन भाई के पास।"

बड़े मियाँ चले गए। छोटे मियाँ को खींचकर सुरेन्द्रपाल अपने कमरे में ले गए। दोनों की समान आयु थी। रात-भर में दोनों तरुण पक्के दोस्त हो गए।

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सुरेन्द्रपाल ने कहा, "शर्त बदो।"

"कैसी शर्त?"

"शेर अगर तुम्हारी गोली से मरे तो मैं यह अँगूठी तुम्हें नज़र करूँगा। लेकिन यदि मेरी गोली सर हुई तो बोलो तुम मुझे क्या दोगे?" सुरेन्द्र ने हँस कर कहा।

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छोटे मियाँ ने हँसकर कहा, "अच्छी बात है। मेरे पास एक चीज है, अगर शेर तुम्हारी गोली से मरा तो मैं वह चीज तुम्हें नज़र करूँगा।"

"वह क्या चीज है? दिखाओ पहले!"

"नहीं, दिखाउँगा नहीं। छोटी-सी चीज है। मुमकिन है तुम्हारी अँगूठी के बराबर कीमती हो। लेकिन तुम्हें वह कबूल करनी होगी।"

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दोनों दोस्त हरबे-हथियार से लैस हो बैठे। हाँका हुआ। शेर की दहाड़ सुनकर छोटे मियाँ के हाथ-पाँव फूल गए, उनसे निशाना नहीं सधा, गोली खता हो गई। सुरेन्द्रपाल की गोली ने शेर का काम तमाम कर दिया। खुशी-खुशी दोनों दोस्त मंच से उतरे। शिकार की नाप-तोल की। घर आए। जब छोटे मियाँ चलने लगे तो उन्होंने कहा, "शर्त नज़राना हाजिर करता हूँ।"

"अरे मैं तो भूल ही गया था। अब जाने दो भाईजान। हकीकत में, अपने यह अँगूठी तुम्हें नज़राने के तौर पर देना चाहता था। शिकार की शर्त का महज बहाना था।"

"यह न होगा, शर्त पूरी करना फर्ज है। यह लीजिए।"

उन्होंने जेब के भीतर हाथ डालकर वह रसीद निकाली ‌र सुरेन्द्पाल के हाथ पर रख दी।
आज भी हिन्दू-मुस्लिम में परस्पर प्रेम और सौहार्द्र के बेमिसाल नमूने देखने को मिलते हैं। वे एक दूसरे के भलाई के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। अलगाववादी और आतंकवादी तो क्या, दुनिया की कोई भी ताकत इस प्रेम और सौहार्द्र को खत्म नहीं कर सकती।
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