Sunday, August 15, 2010

ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू!

हजार से अधिक सालों से लुटती रही है भारत माता। परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी जाने के पूर्व भी अनेक बार उसे यवन और तुर्क लूट कर चले गए, फिर वह परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी गई और उस दौरान मुगलों और मलेच्छों ने लूटा और अब जबकि आजादी मिल चुकी है तो उसे उसके अपने ही (क)पूत उसे लूट कर उसकी धन-सम्पदा को विदेश (स्विस बैंकों) में भेज रहे हैं।

शायद लुटते रहना ही भारत माता की नियति है!

सन् 712 में मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण कर उसे लूटा।

सन् 1000-1027 के बीच महमूद गज़नवी ने सोमनाथ मन्दिर, जो कि सैकड़ों देवदासियों के घुँघरूओं की ध्वनि से सदा गुंजित रहता था और जिसके ऐश्वर्य तथा वैभव की महिमा दिग्-दिगन्त तक फैल गई थी, पर 17 बार आक्रमण कर उसे लूटा।

सन् 1175 में मुल्तान पर आक्रमण कर मोहम्मद गोरी ने उसे लूटना शुरू किया और अन्ततः उसने उसे परतन्त्रता की बेड़ियाँ में ही जकड़ दिया।

अनेक बार लुटने के बावजूद भी भारत माता की अकूत धन सम्पदा में किंचित मात्र भी कमी नहीं आई। सोने की चिड़िया कहलाती थी वह! दूध-दही की नदियाँ बहती थीं उसकी भूमि में! रत्नगर्भा वसुन्धरा थी उसके पास! शाहजहाँ और औरंगजेब का जमाना आने तक न जाने कितने बार लुट चुकी थी वह पर उसकी अपार सम्पदा वैसी की वैसी ही बनी हुई थी। इस बात का प्रमाण यह है कि दुनिया का कोई भी इतिहासज्ञ शाहजहाँ की धन-दौलत का अनुमान नहीं लगा सका है। उसका स्वर्ण-रत्न-भण्डार संसार भर में अद्वितीय था। तीस करोड़ की सम्पदा तो उसे अकेले गोलकुण्डा से ही प्राप्त हुई थी। उसके धनागार में दो गुप्त हौज थे। एक में सोने और दूसरे में चाँदी का माल रखा जाता था। इन हौजों की लम्बाई सत्तर फुट और गहराई तीस फुट थी। उसने ठोस सोने की एक मोमबत्ती, जिसमें गोलकुण्डा का सबसे बहुमूल्य हीरा जड़ा था और जिसका मूल्य एक करोड़ रुपया था, मक्का में काबा की मस्जिद में भेंट की थी। लोग कहते थे कि उसके पास इतना धन था कि फ्रांस और पर्शिया के दोनों महाराज्यों के कोष मिलाकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। सोने के ठोस पायों पर बने हुए तख्त-ए-ताउस में दो मोर मोतियों और जवाहरात के बने थे। इसमें पचास हजार मिसकाल हीरे, मोती और दो लाख पच्चीस मिसकाल शुद्ध सोना लगा था, जिसकी कीमत सत्रहवीं शताब्दी में तिरपन करोड़ रुपये आँकी गई थी। इससे पूर्व इसके पिता जहांगीर के खजाने में एक सौ छियानवे मन सोना तथा डेढ़ हजार मन चाँदी, पचास हजार अस्सी पौंड बिना तराशे जवाहरात, एक सौ पौंड लालमणि, एक सौ पौंड पन्ना और छः सौ पौंड मोती थे। शाही फौज अफसरों की दो हजार तलवारों की मूठें रत्नजटित थीं। दीवाने-खास की एक सौ तीन कुर्सियाँ चाँदी की तथा पाँच सोने की थीं। तख्त-ए-ताउस के अलावा तीन ठोस चाँदी के तख्त और थे, जो प्रतिष्ठित राजवर्गी जनों के लिए थे। इनके अतिरिक्त सात रत्नजटित सोने के छोटे तख्त और थे। बादशाह के हमाम में जो टब सात फुट लम्बा और पाँच फुट चौड़ा था, उसकी कीमत दस करोड़ रुपये थी। शाही महल में पच्चीस टन सोने की तश्तरियाँ और बर्तन थे। वर्नियर कहता है कि बेगमें और शाहजादियाँ तो हर वक्त जवाहरात से लदी रहती थीं। जवाहरात किश्तियों में भरकर लाए जाते थे। नारियल के बराबर बड़े-बड़े लाल छेद करके वे गले में डाले रहती थीं। वे गले में रत्न, हीरे व मोतियों के हार, सिर में लाल व नीलम जड़ित मोतियों का गुच्छा, बाँहों में रत्नजटित बाजूबंद और दूसरे गहने नित्य पहने रहती थीं।

पन्द्रहवीं शताब्दी में वास्को-डि-गामा के भारत पहुँचने के साथ ही भारत के अकूत धन-सम्पदा की ख्याति यूरोपीय देशों में पहुँच गई और हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से भर गया। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दियों में यूरो के सभी देशों के साहसिकवर्गी लोग और व्यापारी हिन्द महासागर में अपने पुश्तैनी डाकेज़नी का धंधा करने लगे। ज्यों-ज्यों भारतीय व्यापार की वृद्धि होती गई, त्यों-त्यों विभिन्न यूरोपीय समुद्री डकैत हिन्द महासागर में भरते चले गए।

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में पुर्तगालियों ने भारत में लूट-खसोट करना शुरू कर दिया और बम्बई के टापू, मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ आदि को हथिया कर उनके मालिक बन बैठे। भारतीय जलमार्ग के नक्शे मिलने के तीस साल बाद सन् 1608 में पहला अंग्रेजी जहाज 'हेक्टर' सूरत की बन्दरगाह पर आकर लगा। उन दिनों सूरत का बन्दरगाह भारतीय विदेशी व्यापार का बड़ा भारी केन्द्र था। जहाज का कप्तान हाकिन्स पहला अंग्रेज बच्चा था जिसने प्रथम बार भारत की भूमि का स्पर्श किया। उसके बाद तो अंग्रेजों ने व्यापार का बहाना कर के भारत में ऐसा लूट-खसोट मचाना शुरू किया की ईस्ट इंडिया कंपनी इस देश की मालिक ही बन बैठी। सही अर्थों में भारत माता को इन फिरंगियों ने ही लूटा और इस अकूत धन-सम्पदा की स्वामिनी को दरिद्रता की श्रेणी में लाकर रख दिया।

बावजूद इस सब के आज भी भारत माता के पास कुछ भी कमी नहीं है किन्तु अब इसे इसके स्वयं के बेटे, जिन्होंने इसके टुकड़े तक कर डाले, ही लूट रहे हैं।

अपनी आजादी को देखकर आज भारत माता के मन में यही विचार उठते होंगे कि "ये आजादी भी कोई आजादी है लल्लू!"

(इस पोस्ट में महत्वपूर्ण जानकारी और आँकड़े आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से साभार लिए गए हैं।)
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