Tuesday, August 17, 2010

अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं।

हमारे मोबाइल की घंटी बजी। अरे यह तो गुप्ता जी की काल है। तीन माह पहले हमने तीन दिनों के भीतर वापस करने का वादा करके जो उनसे पाँच सौ रुपये उधार लिए थे, जरूर उसी के लिये फोन किया होगा। हमने लड़के को मोबाइल देते हुए उससे कहा, "बेटे, गुप्ता अंकल को कह दो कि पापा घर में नहीं हैं।"

जी हाँ, अमूमन हम सभी झूठ बोलते हैं। कोई कर्ज के तगादे से बचने के लिए झूठ बोलता है, कोई अपने बॉस या अधिकारी से अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ बोलता है तो कोई महबूबा की नजरों में चढ़ने के लिए झूठ बोलता है। फिल्म "जॉनी मेरा नाम" का एक संवाद याद आ रहा है जिसमें देवानंद ने ऐसा ही एक झूठ बोला थाः

"..... लेकिन जब दरवाजा खुला तो मैं दंग रह गया। दो हसीन आँखें मुझे देख रही थीं और दिल धड़क-धड़क कर कह रहा था कि जॉनी बेटे तरी मंजिल यही पर है, लेकिन याद रख कि अगर इन्हे मालूम हो गया कि तू चोर है, उचक्का है, छोटी छोटी चोरयों के इल्जाम में जेल जा चुका है और हाल ही में जेल तोड़कर आया है तो इन आँखों मे तेरे लिए सिवाय नफरत के कुछ भी ना होगा .... बस फिर क्या था बात बात में मुँह से झूठ निकलने लगा..."

कभी परिस्थितियाँ हमें विवश करती हैं झूठ बोलने के लिये तो कभी हमारे ही बनाये नियम-कायदे हम से झूठ बोलवाते हैं।

हमारे जीवन में ऐसी अनेकों परिस्थितियाँ आती हैं कि झूठ बोलना हमारे लिये मज़बूरी हो जाती है। अब जरा सोचिये कि आप अपनी प्रेमिका (यदि आप महिला हैं तो प्रेमी समझ लें) से छुप कर मिलने जा रहे हैं। इस बीच रास्ते में यदि कोई परिचित मिल जाये और पूछे कि कहाँ जा रहे हो तो क्या करेंगे आप? झूठ ही तो बोलेंगे न?

नियम-कानून का तो कहना ही क्या। ये तो हमसे सबसे ज्यादा झूठ बोलवाते हैं। छुट्टी के लिये आवेदन पत्र में आप कारण 'परिवार के साथ सिनेमा जाना है' तो नहीं लिख सकते न? 'तबियत खराब है' जैसा कोई झूठा कारण ही लिखना पड़ेगा। हम एक ऐसे सज्जन को जानते हैं जिन्होंने छुट्टियाँ लेने के लिये अपने ससुराल पक्ष के अनेकों रिश्तेदारों को मार डाला है। जबकि जानने वाले जानते हैं कि अभी तक उनकी शादी ही नहीं हुई है। पता नहीं जब उनकी शादी होगी तो फिर क्या झूठ बोलकर छुट्टी लेंगे?

कुछ लोगों को दूसरों की परेशानी देख कर मजा आता है। ऐसे लोग दूसरों से इसलिये झूठ बोल देते हैं ताकि वे परेशान हो जायें और उनकी परेशानी का आनन्द उठाया जा सके।

हमारे परिचितों में एक सज्जन तो ऐसे हैं जो सिर्फ झूठ ही बोलते हैं। लगता है कि कभी भूल से वे सच बोल देंगे तो उनका खाना ही हजम नहीं होगा या फिर डॉक्टर ने उन्हें सच बोलने से मना किया हुआ है।

इस झूठ ने तो धर्मराज युधिष्ठिर को भी नहीं छोड़ा था। उन्हें 'अश्वत्थामा हतो' कहना ही पड़ा था। यह बात अलग है कि बाद में 'नरो वा कुंजरो' कह कर उन्होंने अपने झूठ की लीपा-पोती कर दी थी।

झूठ का एक और रूप भी होता है - बात को इस प्रकार से गोल-गोल कहना कि उसका स्पष्ट अर्थ ही न निकले। झूठ के इस रूप का प्रयोग व्यापक तौर से होता है। और भला क्यों न हो। जब देवर्षि नारद जी ने विश्वमोहिनी से ब्याह करने की कामना से भगवान विष्णु से उनका रूप माँगा था तो विष्णु जी ने भी तो झूठ के इसी रूप का प्रयोग किया था -

"कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥"


उपरोक्त सभी झूठों के अलावा एक झूठ और भी होता है - वह है किसी के कल्याण के लिये झूठ बोलना और इस प्रकार के झूठ को पावन झूठ की संज्ञा दी जा सकती है।
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