Wednesday, September 29, 2010

सातवीं से अठारहवीं शताब्दी तक का भारत (2)

औरंगजेब के समय तक भारत के अन्दर अंग्रेज व्यापारियों की स्थिति लगभग वैसी ही थी, जैसी हींग बेचने वाले काबुलियों की आपने देखी होगी। औरंगजेब की अनुदार नीति ने चारों ओर छोटी-छोटी परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतें भारत में पैदा कर दी, जिससे केन्द्रीय शक्ति निर्बल हो गई और हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य खण्डित हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही मद्रास और बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के षड्यन्त्र चलने लगे, जिनके फलस्वरूप औरंगजेब की मृत्यु के पचास वर्ष बाद प्लासी का युद्ध हुआ। उस समय अंग्रेजों का हित इस बात में था कि औरंगजेब की अनुदार नीति के कारण जो अव्यवस्था और अनैक्य भारत के हिन्दू-मुसलमानों में स्थापित हो चुका था, वह कायम ही रखा जाए और उन्होंने यही अपनी नीति बना ली।

इस समय भी सभ्यता, शक्ति और व्यवस्था में भारतीय अंग्रेजों से श्रेष्ठ थे। परन्तु उनमें एक बात की कमी थी। वह थी राष्ट्रीयता या देश-भक्ति, जो जनोत्थान और उद्योग-क्रान्ति से प्रभावित थी। अंग्रेजों और दूसरी यूरोपियन जातियों ने यह बात जान ली और उन्होंने इससे लाभ उठाकर एक शक्ति को दूसरी शक्ति से लड़ाने का धन्धा आरम्भ कर दिया। दिखाने के लिए उन्होंने अपना रूप निष्पक्ष का रखा, परन्तु भीतर ही भीतर भाँति-भाँति की साजिशों और चालों को चलकर उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों में ऐसा संग्राम खड़ा कर दिया कि वे शक्तियाँ स्वयं ही एक-दूसरे से टकराकर चकनाचूर होने लगीं।

इंगलैंड के पीछे किसी जातीय सभ्यता का इतिहास न था। किसी प्राचीन संस्कृति की छाप न थी। यद्यपि वह ईसाई धर्म स्वीकार कर चुका था, पर इस समय वह धर्मतंत्र भी साम्प्रदायिक कलह का रूप धारण कर रहा था। पाप-पुण्य, धर्माधर्म, नीति-अनीति के सांस्कृतिक आदर्श जैसे भारत में प्राचीन वैदिक, बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म के वेद, श्रुति, स्मृति, दर्शन और आचारशास्त्र के आधार पर भारतीय जनता में सहस्रों वर्षों से उनकी पैतृक सांस्कृतिक सम्पत्ति के रूप में चले आते थे, वैसा इंगलैंड में एक भी सांस्कृतिक सूत्र न था। इंगलैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक घोर दरिद्रता, निरक्षरता और अन्धविश्वासों का दास बना हुआ था। नैतिक आदर्शों  पर सुसभ्य जीवन का इंगलैंड में जन्म ही हुआ था।

भारत जैसे समृद्ध देश के धन, सम्पदा, वैभव और जाहो-जलाली का हाल जब अंग्रेजों के कानों में पहुँचा तो उनकी लोलुप दृष्टि भारत की ओर गई और उनकी आवारा और साहसिक प्रकृति सत्रहवीं शताबदी के आरम्भ में उन्हें भारत तक खींच लाई। सौ वर्ष तक वे भारत की गलियों में कंधे पर बोझें का थैला लादे माल बेचते, व्यापार करते और धन कमाते फिरते रहे। बंदर की भाँति लाल-लाल चेहरेवाले फिरंगी के मुँह से उनकी अटपटी भाषा सुनने को बालक और स्त्रियाँ आतुर रहते, उनके आने पर उनके काँच के सस्ते सामान को हँसी उड़ाते और उन्हें तंग करते थे।

अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ ही में औरंगजेब की मृत्यु हुई और एकबारगी ही महान मुग़ल-तख्त डगमगा गया। इन सौ वर्षों में इन फिरंगियों की लालस बेहद बढ़ चुकी थी। किसी प्रकार के न्याय-अन्याय और धर्माधर्म का उन्हें विचार-संस्कार था ही नहीं। अब उनकी इच्छापूर्ति में बाधक कोई शक्ति भारत में नहीं थी। उन्होंने तिजारती कोठियों के बदले जगह-जगह किलेबंदियाँ करनी आरम्भ कर दीं। दुर्भाग्य से अपने ही में सीमित भारतीय राजाओं ने इस बात की कुछ परवाह नहीं की। उन्हें अनुमतियाँ और सुविधाएँ मिलती ही गईं। उनका बल बढ़ता गया। वे उचित-अनुचित उपायों से धन कमाते गए और सेना रखते गए। इस सेना के बल पर उन्होंने मद्रास और बंगाल के राजाओं के आपसी झगड़ों में पैर फँसाकर कभी इसका और कभी उसका पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। कूटनीति और साजिशों द्वारा इनका बल बढ़ता गया। दिल्ली का दुर्बल साम्राज्य-केन्द्र अब इस योग्य न था कि वह केन्द्रीय शक्ति के रूप में इस स्थिति को समझे और उसपर नियन्त्रण करे। अतः उन्होंने भारतीय नरेशों को एक-दूसरे से लड़ाकर इलाके दखल करने आरम्भ कर दिए।

एक ही शब्द में यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने आँखें बंद करके भारत को हाथ में लिया।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया अंश)
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