Wednesday, September 8, 2010

संसार में रुपया ही सबसे बड़ा नहीं है किन्तु

ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि इन सभी वस्तुओं को केवल रुपये अदा करके ही प्राप्त किया जा सकता है। आज के जमाने में हर चीज बिकाऊ हैं, पानी तक तो बिकने लगा है फिर शिक्षा हो या चिकित्सा की बात ही क्या है।

यदि आपके पास रुपया नहीं है तो क्या आप अपने औलाद को, उच्च शिक्षा तो दूर, साधारण शिक्षा ही दिलवा सकते हैं? मैं उन दिनों के मुंबई, कलकत्ता जैसे महानगरों की बात तो नहीं करता किन्तु हमारे समय कम से कम रायपुर में तो लोग के.जी., पी.पी. क्या होता है नहीं जानते थे और न ही म्युनिसिपालटी के स्कूलों अलावा अन्य खर्चीले प्रायवेट स्कूल हुआ करते थे। पिताजी हमें म्युनिसिपालटी के स्कूल में ले गये थे जहाँ हमें अपने सीधे हाथ को सिर पर से घुमा कर उलटे कान को छूने के लिये कहा गया (ऐसा माना जाता था कि छः वर्ष की उम्र हो जाने पर हाथों की लंबाई इतनी हो जाती है कि हाथ को सिर पर से घुमाते हुये दूसरी ओर के कान को छूआ जा सकता है, छः वर्ष से कम उम्र में नहीं) और हम भर्ती हो गये थे पहली कक्षा में। कपड़े की एक थैली में एक बाल-भारती पुस्तिका और स्लेट पेंसिल, यही था हमारा बस्ता। आज यदि आप किसी तरह से अपने बच्चे को किसी स्कूल में भर्ती करा भी लें तो उसके बस्ते का खर्च उठाते उठाते ही बेदम हो जायेंगे और बच्चा उसका बोझ उठाते उठाते।

उन दिनों प्रायमरी स्कूल में पढ़ने के लिये कोई फीस नहीं पटानी पड़ती थी। मिडिल स्कूल के लिये आठ आना और हाई स्कूल के लिये भी कुछ ऐसा ही मामूली सा फीस पटाना होता था। चिकित्सा के लिये बड़े बड़े अस्पताल न हो कर गिनी चुनी डिस्पेंसरियाँ ही थीं किन्तु उनके मालिक डॉक्टर की फीस नियत नहीं थी, जहाँ पैसे वालों से अधिक फीस ले लेते थे वहीं गरीबों का मुफ्त इलाज भी कर दिया करते थे। आज आप गरीब हैं या अमीर, इससे डॉक्टर को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी नियत फीस आपको देना ही होगा।

सोचता हूँ कि पचास सालों में जमाना कहां से कहाँ पहुँच गया। सब कुछ बदल चुका है। अधिक वय के लोगों को अतीत की यादें बहुत प्रिय होती हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ इसीलिये आज मेरे विचार भी अतीत में भटकने लग गये थे।

पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। खैर यह मानव प्रकृति है। क्या शिक्षा और चिकित्सा का व्यापार उचित है? क्या इन पर सभी का समान अधिकार नहीं होना चाहिये चाहे वह अमीर हो या गरीब?

11 टिप्पणियाँ:

anshumala said...

@पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। खैर यह मानव प्रकृति है।

नहीं ऐसा नहीं है की पुराने लोगों को दकियानुसी समझा जाता है परेशानी वहा होती है जब वो समय के साथ नहीं चलते है और अपनी पुरानी बात को आज के युवाओ पर थोपते है | समय के साथ लोगों के सोचने का और जीने का तरीका बदल जाता है | एक समय था जब अपने शहर से बाहर जा कर काम करना अच्छा नहीं माना जाता था और समुन्द्र पार करना तो पाप मना जाता था पर आज क्या सबकी सोच ऐसी है |

आपने सही कहा की शिक्षा और चिकित्सा को पैसे के लिए नहीं करना चाहिए पर जब आज सभी पैसे के पीछे भाग रहे है तो हम इस दो वर्ग को कैसे कह सकते है की तुम ये मत करो वो भी वही कर रहे है जो सभी पैसे के लिए करते है | वैसे आज भी ये दोनों चीजे आप को मुफ्त में सरकारी जगहों पर मिल सकती है |

ललित शर्मा-ললিত শর্মা said...

@पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस।

गजब कह दिए गुरुजी, मेरे दिल की बात आप कैसे जान लेते हैं? अभी मेरी खोपड़िया में भी यही चल रहा था।
डोकरा सठियाए हे तेखरे सेती लटपटिआए हे। अइसने सोचत रहेंव। तभे पोस्ट ला देख डारेंव।
बने केहे हस। एकदम जोरदार लिखे हस।

पोरा तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई।
अब गाँव जाके तेलहा रोटी खाई।

संगीता पुरी said...

बहुत सही विश्‍लेषण !!

AlbelaKhatri.com said...

zabardast aalekh.....badhaai !

प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो जो चीज भी बेची जा सकती, बेची जा रही है।

honesty project democracy said...

दरअसल उस समय सरकार में बैठे ९०% लोग हरामियों की औलाद नहीं थे और सरकार में बैठे हरामी ,भ्रष्ट और लूटेरों को सुरक्षा देने वाली ये इलेक्ट्रोनिक मिडिया भी नहीं थी इसलिए इंसानियत जिन्दा थी | आज सरकारी खजाने के लूट का २५% हिस्सा इन तथाकथित मिडिया वालों के जेब में जाता है | अगर इनमे इंसानियत आ जाय तो सरकारी खजाने की लूट,शिक्षा और चिकित्सा का व्यापार भी सही रास्ते पे आ जाय | बेचारी जनता वो तो कहीं की नहीं है परेशान होकर रिश्वत दे तो दोषी और ना दे तो उसका जीना मुहाल ...? ऐश तो मनमोहन सिंह जी और प्रतिभा पाटिल जी कर रहीं हैं जनता के पैसों से ...

अशोक बजाज said...

प्रशंसनीय पोस्ट !

पोला की बधाई .

मो सम कौन ? said...

ये जेनरेशन गैप हमेशा रहा है और रहेगा भी।
शिक्षा एवम स्वास्थ्य के मामलों में आपसे सहमत भी हूं और असहमत भी। बहुत बड़ी जनसंख्या के चलते इन दोनों को निजी क्षेत्र के लिये भी खोला गया था, जिससे कुछ लाभ भी जरूर हुआ है। अपेक्षित न सही, लेकिन लोगों के पास विकल्प तो है।
अच्छा विषय छेड़ा है आपने, आभार।

ललित शर्मा said...


बेहतरीन लेखन के बधाई

356 दिन
ब्लाग4वार्ता पर-पधारें

ali said...

अपनी सहमति मो सम कौन ? के साथ !

Vivek Rastogi said...

शिक्षा और चिकित्सा दोनों ही सरकार के हाथों में होना चाहिये जिससे सभी को समान मिले।

आपकी बातों से बिल्कुल सहमत।

 
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