Friday, September 10, 2010

अन्धे को अंधेरे में बड़े दूर की सूझी

एक मित्र महोदय अक्सर हमारे पास आ धमकते हैं और जो थोड़ा बहुत दिमाग नाम की चीज हमारे पास बची हुई है (पता नहीं बची भी है या नहीं पर हमें तो खुशफहमी है कि बची हुई है) उसे बेतहाशा चाटने लगते हैं। उनसे निजात पाने के लिए हमने सोचा कि क्यों न इन्हें ब्लोगर बना दिया जाए! 'अन्धा बगुला कीचड़ खाय' के जैसे हमारी बात मानकर यदि ये ब्लोगिंग में लग गए तो फिर तो हमें छुट्टी ही मिल जाएगी इनसे; बस एक बार टिप्पणियों का चसका लग भर जाए बच्चू को, हमारे पास आना ही भूल जाएगा!

सो हमने उनसे कहा, "यार, तुम ब्लोगिंग क्यों शुरू नहीं कर देते? बहुत मजेदार चीज है ये ब्लोगिंग!"

"ब्लोगिंग में भला क्या मजा है?"

"येल्लो, तुम्हें ये भी नहीं मालूम कि ब्लोगिंग में क्या मजा है? याने कि 'अन्धा क्या जाने बसन्त बहार'! एक बार ब्लोगिंग शुरू तो करके देखो गुरू! खुद ही पता चल जाएगा कि ब्लोगिंग में कितना मजा है।"

"तुम्हें भी यार 'अन्धे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी' जैसे जोरदार बातें सूझती रहती हैं। हम और ब्लोगर! हा हा हा हा! ब्लोगर बन कर हम लिखेंगे क्या भाई? लिखना तो हमें आता ही नहीं। हमारे ब्लोगर बन जाने का मतलब तो होगा 'आँख के अन्धे नाम देखो तो नैनसुख'! ना भाई ना, हम नहीं बनने वाले ब्लोगर-स्लोगर,  हमें तो बस फेसबुक और आर्कुट ही मजेदार लगता है।"

उनका जवाब सुनकर हमें लगा कि हम 'अन्धे के आगे रोवे अपनी आँखे खोवे' जैसे अपना समय तो बर्बाद नहीं कर रहे हैं। पर यह सोचकर कि शायद 'अन्धे के हाथ बटेर' लग जाए, हमने उन्हें और उचकाना शुरू किया, "अरे लिखने में क्या धरा है? स्कूल में तुमने गाय पर निबन्ध तो लिखा था कि नहीं? बस यहाँ भी वैसा ही कुछ लिख दिया करना। ब्लॉग में कुछ भी लिखो सब चलता है क्योंकि ब्लॉग तो एक निजी डायरी है जिसे लोग सार्वजनिक करना चाहते हैं और निजी डायरी में तो आदमी कुछ भी लिख सकता है ना? 'घरवाली ने समोसे कुरकुरे बनाए थे... चटनी में मिर्ची तेज थी... खाते समय बड़ा मजा आया पर दूसरे दिन भुगतना पड़ा' जैसा कुछ भी लिख सकते हो। वास्तविक जीवन में अन्धे को अन्धा कहने से बुरा लग जाता है पर ब्लोगिंग में तो तुम 'आँख वाले को भी अन्धा बनाना' जैसा काम कर सकते हो हो। बस इतने से ही समझ लो कि हमारे जैसा 'अक्ल का अन्धा' भी ब्लोगिंग के क्षेत्र में 'अन्धों में काना राजा' बना हुआ है और 'अन्धा पीसे कुत्ता खाय' जैसा काम किए जा रहा है।"

"पर निजी को निजी इसलिए कहते हैं कि वह सार्वजनिक करने की चीज नहीं होती और तुम कहते हो कि लोग निजी डायरी को सार्वजनिक करना चाहते हैं। भला ये क्या बात हुई?"

"यही तो गुरू ब्लोगिंग है! इसमें सब कुछ गोल-गोल गोल होता है। निजी चीज सार्वजनिक होती है और सार्वजनिक बातें निजी हो जाती हैं! यही तो मजा है ब्लोगिंग का! बस तुम तो पोस्ट लिख दो। पहली टिप्पणी हमारी ही होगी तुम्हारे पोस्ट में।"

"मैं पोस्ट लिखूँ और तुम टिप्पणी करो। हा हा हा हा! 'अन्धे अन्धा ठेलिया दोनों कूप पड़ंत'!"

"पर मेरे पोस्ट में तुम टिप्पणी क्यों करोगे?"

"इसलिए कि बाद में मेरे पोस्ट पर तुम टिप्पणी करोगे। ये ब्लोगिंग तो टिप्पणियों का ही खेल है गुरू! तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूँ, तुम मुझे प्रोत्साहित करो, मैं तुम्हें प्रोत्साहित करूँ। और फिर टिप्पणियाँ कोई पोस्ट पढ़कर थोड़े ही दी जाती हैं, टिप्पणियाँ तो अपनों को ही दी जाती हैं।"

"याने कि 'अन्धा बाँटे रेवड़ी अपने-अपने को देय'!"

"आगे चल कर देखना प्यारे कि ब्लोगिंग में हमारी तुम्हारी जोड़ी खूब आगे निकलेगी।"

"याने कि 'अन्धा सिपाही कानी घोड़ी,विधि ने खूब मिलाई जोड़ी'!"

"यार तुम शुरू तो करो ब्लोगिंग एक बार, धूम मचा दोगे धूम!

"ठीक है दोस्त, तुम कहते हो तो चलो मैं भी ब्लोगर बन जाता हूँ।"

उनके इस प्रकार से हामी भरने से हम बहुत खुश हुए, 'अन्धा क्या चाहे, दो आँखें'!
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