Thursday, October 14, 2010

चोर-डकैतों के सरदार नवाब

लेखक - आचार्य चतुरसेन

(इसके पहले की कहानी यहाँ पढ़ें - चोरों का अद्भुत मेला)

मुज़फ्फरनगर के नवाब इकरामुल्लाखां का नाम सुनकर उन दिनों अच्छे-अच्छों की पंडली काँप जाती थी। नवाब की उम्र अब साठ को पार कर गई थी, पर उनके दमखम अभी वैसे ही बने थे। वे बड़े डीलडौल के आदमी थे। रियासत भर में उनकी सवारी के लायक कोई घोड़ा न था। इसलिए वे हाथी पर ही सवार होते थे। उनका चेहरा भी भयानक था और आँखें हमेशा सुर्ख रहती थीं। तन्दुरुस्ती निहायत अच्छी थी। जात के पठान रुहेले थे। हेस्टिंग्ज के जमाने में जब रुहेलों पर तबाही आई तो इनकी सारी जागीर चौपट हो गई। अब यहाँ मुज़फ्फरनगर में इनकी छोटी-सी जमींदारी थी। मगर रुआब उनका दूर-दूर तक था। हकीकत तो यह थी कि वे अब डाके का धन्धा करते थे। सैकड़ों डाकू अलग-अलग गिरोहों में दूर-दूर तक डाके डालते और माल उनके कदमों पर ला डालते थे। वह जमाना ही ऐसा था, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत थी।

नवाब अपनी कचहरी में बैठे थे। मुसाहिब लोग भी साथ थे। नवाब मोढ़े पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। एक शागिर्द ने आगे बढ़कर कहा, “सरकार, सुरंग घोड़ी है, बहुत नफीस! इस गिर्दनवा में वैसी घोड़ी न होगी।”

“कहाँ है वह?”

“हुजूर, एक लौंडा उसपर सवार है। वह सहारनपुर जा रहा है।”

“कौन है वह?”

“यह तो मालूम नहीं सरकार, उसके साथ सिर्फ दो प्यादे हैं। बस इत्तला देने को दौड़ा आ रहा हूँ।”

नवाब एकदम गुस्से में गरज उठे। उन्होंने कहा, “तो बदबख्त, तू सिर्फ हमें इत्तला देने को ही आया है, घोड़ी अभी तक गैर के ही ताबे में है?”

“हुजूर!”

नवाब फिर गरजे। उन्होंने कहा, “हुजूर के बच्चे, आधे घण्टे में घोड़ी हमारे हुजूर में हाजिर ला।”

शागिर्द सलामें झुकाता हुआ चला गया और आधे घण्टे के अन्दर ही घोड़ी नवाब साहब के अहाते में आ गई।

घोड़ी को देखकर नवाब साहब खुश हो गए। यह उनका शौक था, घोड़ा, घोड़ी, बैल, रथ या कोई भी चीज, जो उम्दा से उम्दा, जहाँ नज़र पड़े नवाब की होनी ही चाहिए। नवाब के आदमी जो शागिर्द कहाते थे और पेशा डकैती करते थे, नवाब की यह तबीयत पहचानते थे। बस, जहाँ कोई उम्दा चीज़ नज़र आई कि वह नवाब की होकर रही। किसी की मज़ाल थी कि उनके इस शौक में हारिज हो!

घोड़ी अभी दाना-पानी खा ही रही थी कि उसका मालिक वह लड़का भी नवाब की ड्यौढ़ी पर आ हाजिर हुआ। उम्र उसकी कोई अठारह साल की होगी, सुन्दर और छरहरा बदन। इत्तला पाकर नवाब ने उसे बुलाया। उसने आकर नवाब को सलाम झुकाया।

नवाब ने कहा, “कौन हो, साहबज़ादे?”

“क्या हुजूर ने पहचाना नहीं?”

“अफसोस साहबज़ादे, लेकिन आँखें बहुत कमजोर हो गई हैं। ठीक तौर पर देख नहीं पाता। याद नहीं आता कि कहाँ देखा है तुमको।”

“हुजूर ने जन्नतनशीन नवाब मुज़फ्फरबेग का नाम सुना होगा?”

“क्या नवाब बल्लभगढ़? हो-हो, अमाँ वे तो मेरे मुरब्बी थे। वाह, क्या फरिश्ता आदमी थे! मगर हाय-हाय, क्या बेरहम मौत पाई। अल्ला-अल्ला।”

नवाब ने कान पकड़कर अपने मुँह पर दो तमाचे जड़े। फिर गहरी साँस लेकर बोले, “नवाब मुज़फ्फरबेग, हाँ तो फिर?”

“मैं हुजूर, उनका नवासा हूँ। मेरा नाम यूसुफ है।”

“अरे वाह साहबज़ादे, इतनी देर से क्यों नहीं कहा! मैं भी कैसा अहमक हूँ, तुम्हें इतनी देर खड़ा रखा। अल्ला-अल्ला। उन्होंने फिर कान पकड़े और फिर दो तमाचे अपने मुँह पर जड़े। फिर मोढ़े से उठकर युवक को अंक में भर लिया।

“बैठो, बैठो साहबज़ादे, देखकर आँखें ठण्डी हो गईं। वाह, वही खसलत पाई है। खुदा ने चाहा तो तुम नवाब साहब का नाम रोशन कर लोगे।” इसके बाद उन्होंने पुकारकर कहा, “कोई है, साहबज़ादे के लिए नाश्ता लाओ।”

युवक ने कहा, “एक अर्ज़ करने को हाज़िर हुआ था।”

“देखो साहबज़ादे, धांधली की सनद नहीं। पहले नाश्ता करो, फिर इत्मीनान से बातें होंगी।”

खिदमतगार एक गिलास दूध और पराँठे दे गया। नौजवान ने नाश्ता किया। नवाब ने हुक्के पर नई चिलम चढ़ाकर कश लिया। फिर बोले, “क्या करते हो साहबज़ादे?”

“हुजूर, फिरंगियों के स्कूल में पढ़ रहा हूँ।”

“अच्छा करते हो। भई, सच तो यह है कि ये अंग्रेज हैं औलिया, देख लेना कुछ दिनों में हिन्दुस्तान कि काया पलट कर रख देंगे। खैर, अब कहो, क्या काम है?”

“हुजूर, मैं सहारनपुर जा रहा था कि बदमाशों ने मेरा पीछा किया और मेरी घोड़ी छीन ली। मेरे आदमियों को भी ज़ख्मी कर दिया।”

“अरे, कब, कब? बड़ी खराब बात है।”

“हुजूर, बस कोई एक घण्टा हुआ। मैंने सोचा, आप के ही हुजूर में अर्ज करूँ। अब और कहाँ फरियाद करता?”

“अच्छा किया, साहबज़ादे, तुम मेरे पास चले आए। आजकल शरीफों का राह-बाट में निकलना ही मुश्किल है। घोड़ी कैसी थी?”

“सुरंग थी, हुजूर।”

नवाब ने आवाज दी, “कोई है?”

वही शागिर्द आ हाज़िर हुआ। लड़के ने डाकू को पहचान लिया। उसने आती बार घोड़ी को बँधे दाना खाते भी देख लिया था। पर उसने ऐसा भाव बनाया कि जैसे न वह घोड़ी को पहचानता है, न डाकू को।

नवाब ने शागिर्द से कहा, “सुना तुमने, साहबज़ादे का किस्सा?”

“हुआ क्या सरकार?”

“हुआ क्या? दिन-दहाड़े डाका पड़ गया। मियाँ को अकेला जानकर बदमाश घोड़ी लेकर यह जा, वह जा।”

“बड़ी खराब बात है हुजूर।”

“खराब? मैं कहता हूँ जब तक दो-चार को गोली से न उड़ाया जाएगा, ये वारदातें बन्द नहीं होंगी। और फिर मेरे ही हल्के में! कितनी बदनामी और शर्म की बात, तौबा-तौबा।” उन्होंने फिर दोनों कान पकड़कर गालों पर तमाचे जड़ दिए।

शागिर्द सिर झुकाए खड़ा रहा।

नवाब ने कहा, “खड़े-खड़े क्या देखते हो? घोड़ी का पता लगाओ।”

“हुजूर …”

“बस-बस, मै एक लफ़्ज नहीं सुनना चाहता। चाहे आसमान में उड़ जाओ, या धरती फोड़कर उसमें घुस जाओ। घोड़ी मिलनी चाहिए, जाओ।” इतना कहकर नवाब साहब ने यूसुफ मियाँ से कहा, “तब तक साहबज़ादे तुम आराम करो। घोड़ी मिल जाएगी। खातिर जमा रखो।”

“हुजूर का इकबाल ही ऐसा है।”

नवाब साहब ने मियाँ यूसुफ के ठहरने, आराम करने और शिकार-तफरीह का पूरा बन्दोबस्त कर दिया। यूसुफ मियाँ मजे से चोरों के शहनशाह की मेहमान नवाजी का लुत्फ लेने लगे।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” का अंश)
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