Friday, October 15, 2010

यूसुफ मियाँ और नवाब की साहबज़ादी शबनम

लेखकः आचार्य चतुरसेन

(इससे पहले की कहानी - चोर डकैतों के सरदार नवाब)

शबनम नवाब साहब की सबसे छोटी साहबज़ादी थी। साहबज़ादी की उम्र अठारवाँ बसन्त छू रही थी। नर्म सुनहरे बालों का अम्बार सिर पर, शरारतभरी बादाम जैसी आँखें, पतले-पतले गुलाबी होंठों पर थिरकती हुई मुस्कुराहट की लहर। जब हँसती थी खिलखिलाकर - तो हजारों रुपहली घंटियाँ बज उठती थीं। पर्दे की साहबजादी को परवाह न थी। नवाब की लाडली बेटी। चोरों के गुरुघंटाल की साहबज़ादी, मगरूरी और शोखी आँखों और चाल में भरकर जब देखने वालों की आँखों के सामने आती थी, तो वे देखते रह जाते थे। साहबज़ादी की वजातराशी और बरहदरी में जो कुछ थोड़ी-बहुत कमी थी, वह इन बातों से पूरी हो गई थी - कि नवाब साहब ने एक क्रिस्तान अधगोरी मिस को उनकी गार्जियन बना दी थी। पिछली बार जब नवाब साहब कलकत्ता तशरीफ ले गए थे तो वहीं से इस मिसिया को किराये पर ले आए थे। यह मिसिया अब डेढ़ बरस से मुस्तकिल तौर पर नवाब साहब के घर रह रही थी, और साहबज़ादी को तालीम तथा अंग्रेजी एटीकेट-तहज़ीब सिखा रही थी। इसके अतिरिक्त उसने नवाब साहब के घर को भी अंग्रेजी ढंग से सजा दिया था और अब वह इस जुगत में थी कि नवाब साहब और साहबज़ादी दोनों टेबुल पर बैठकर छुरी-काँटे से खाना खाना सीख जाएँ और इस तरह आहिस्ता-आहिस्ता ईसाई बन जाएँ, जैसा कि उन दिनों अक्सर होता रहता था। मिस साहिबा को इस काम में अभी इतनी सफलता मिल चुकी थी कि नवाब साहब के यहाँ बजाय नाश्ता-पानी के छोटी-बड़ी हाज़री और खाने की जगह लंच और डिनर लफ्ज़ इस्तेमाल होने लगा था, हालाँकि टेबुल-कुर्सी की जगह अभी दस्तरखान ही का इस्तेमाल होता था। मगर मिस साहिबा ने एक कमरे में मेज-कुर्सी सजाकर उसे अंग्रेजी ढंग का डिनर रूम बना दिया था। लेकिन इसका इस्तेमाल गाहे-बगाहे तभी होता था जब कोई भूला-भटका अंग्रेज हाकिम-हुक्काम उधर आ निकलता था।

मिस साहिबा की उम्र थी बीस-बाइस साल। रंग गोरा था या जर्द, इस सम्बन्ध में नवाब साहब और उनकी साहबज़ादी की दो राएँ थीं। नवाब साहब उन्हें गोरी-चिट्टी कहते थे परन्तु शबनम उसे पीले रंग की बताती थी। हकीकत तो यह थी कि शबनम का खिलता हुआ गोरा गुलाबी रंग वह करामात रखता था कि उसके सामने ऐसी सौ मिसियाँ फीकी जँजती थीं। सूरत-शक्ल मिस साहिबा की न ऐसी अच्छी ही थी कि उन्हें परी कहा जाए, पर उसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता था। लेकिन थी वह बहुत खुशमिज़ाज, हँसमुख और फुर्तीली, वह उर्दू बहुत सलीस बोल लेती थी। हकीकत यह थी कि उनकी माँ एक तालीमयाफ्ता मुसलमानी थी, जो एक आरमीनियन सौदागर की बीबी थी, बेवा होने पर इसने एक अधेड़ उम्र के अंग्रेज सैनिक से शादी कर ली थी, जो अंग्रेजी सेना में कप्तान के पद पर था। उसी से मिस साहिबा का जन्म हुआ था, और यही कारण था कि वह अंग्रेजी और उर्दू जबान पर एक साथ ही अधिकार रखती थी और  दोनों भाषाएँ बखूबी उम्दगी से बोल लेती थी। इसके अतिरिक्त उन्हें अंग्रेजी एटीकेट का जैसा ज्ञान था वैसा ही मुस्लिम शिष्टाचार का भी ज्ञान था। इसीलिए मिस साहिबा इस घर में हर-दिल अज़ीज हो रही थी।

मिसिया का नाम था रोज़। गज़ब की औरत थी मिस रोज़। हरदम गुनगुनाती और किसी न किसी काम में लगी रहती। उदासी उसके चेहरे पर देखने को न थी। एक आनन्ददायी मुस्कान से सदा उसका चेहरा खिला रहता था। कभी साहबज़ादी को पढ़ाती, कभी कमरे को सजाती, कभी साहबज़ादी के बाल दुरुस्त करती, कभी उनके लिबास पर एक लेक्चर देती। कभी खानसामा के सिर पर सवार। उनके छोटे से छोटे नुक्स को वह बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उन्हें तरह-तरह के अंग्रेजी खाने बनाने बताती। कभी माली से जा उलझती - कहाँ क्यारी में कौन फूल लगाना चाहिए - ये सब बातें मिस रोज़ मालियों को बताती न थकती थी। धोबी का तो मारे नाक में दम था। कपड़े पर इस्त्री करने में जरा लापरवाही हुई, एक सल भी रह गई कि कपड़ा फेंक मारा धोबी के मुँह पर। बेचारा थरथर काँपता था - मिस को देखते ही। ऐसी थी मिस रोज़ जिसने इस घर की काया पलट दी थी और जिसकी तालीम और सोहबत में साहबज़ादी साहिबा नये जीवन की अभ्यस्त हो रही थी, और पर्दा तोड़कर खुलेआम आती-जाती थी। जिन पर नवाब की कोई रोक-टोक न थी।

नौकर-चाकरों को अंग्रेजी ढंग की तहज़ीब, अदब-कायदे तथा बोलियाँ समझा दी गई थीं। अब वे सब उनसे पढ़-सीखकर कहते - हुजूर, गुस्ल लगा दिया है, हुजूर हाज़िरी लगा दी है। और अब वह बड़े यत्न से साहबज़ादी को छुरी-चम्मच का प्रयोग सिखा रही थी। ज्योंही साहबज़ादी रोटी का टुकड़ा सालन में डुबोती, वह कहती - “ना साहबज़ादी, ना! सालन में हाथ न डुबाइये। काँटा लीजिए।” अक्सर काँटा साहबज़ादी के मुँह में चुभ जाता, निवाला वापस प्लेट में गिर जाता, तो साहबज़ादी गुस्सा करती, झुंझलाकर काँटा-छुरी फेंक देती और निवाला हाथ में ले ज्यों ही सालन की ओर बढ़ाती तो तत्काल मिस रोज़ कहती - “ना साहबज़ादी, ना। ऐसा नहीं। काँट लो, चम्मच लो।” मिस रोज़ ने बड़ी बारीकी से शबनम को समझाया था, कि मछली खाने के छुरी-काँटे जुदा होते हैं और गोश्त खाने के जुदा। एक बार शबनम ने गुर्दा खाने के लिए चम्मच जो उठाया, तो तड़ाक से मिस रोज़ ने कहा, “हाय, क्या गज़ब करती हैँ साहबज़ादी, कहीं गुर्दा चम्मच से खाते हैं?” बस, ऐसी चाक-चौबन्द और शीन-काफ से दुरस्त थी मिस रोज़, जो नवाब साहब के घर की गवर्नेस भी थी, और शबनम की उस्तानी या एटीकेट टीचर भी। शबनम कुछ तो अपनी तबियत से और जहीन होने के कारण, तथा कुछ मिस रोज़ की सोहबत और शिक्षा से बाहरी और भीतरी तौर-तरीके में ऐसी निखर गई थी और इस कदर सलीका सीख गई थी कि उससे उसके हुस्न में चार चाँद लग गए थे।

……..

घोड़ी के सिलसिले में मियाँ युसुफ, बल्लभगढ़ के नए नवाब, जो मुज़फ्फरनगर आए तो यहीं फँस गए। नवाब साहब उन्हें रुखसत करते ही न थे। मियाँ भोंपू आदमी थे। बार-बार इसरार करते शर्माते थे। फिर भी जब जाने का कसद करते और नवाब साहब की खिदमत में अर्ज़ करते - तो नवाब साहब अपने दोनों कान पकड़ गालों में तमाचा जड़ कहते, “म्याँ लाहौल पढ़ो। बस, जाने का नाम न लो।” मियाँ कहते, “हुजूर कपड़े गलीज़ हो गए हैं इज़ाज़त मिल जाती तो अच्छा था।”

तब नवाब साहब जरा बिगड़कर कहते, “तो क्या यहाँ के सब धोबी और दर्जी मर गए? म्याँ, अपने पहनो तो धोबी हाजिर और मेरे पहनो तो दर्जी हाजिर, फिर जाने की क्या बात? बस, जाने-आने का कल्मा जबान पर न लाना।”

और मियाँ को जाने की इज़ाज़त मिली ही नहीं। एक दर्जन पोशाक तैयार होकर मियाँ के पास आ गईं। इसी बीच एक दिलचस्प बात हो गई। जिस कमरे में मियाँ यूसुफ का डेरा था, उसी के सामने वाले कमरे में कुछ खास हलचल नज़र आने लगी। मिस रोज़ और शबनम दोनों दिन भर सजाने में जुटी रहीं। कहाँ किस तरह सजाया जाए, इस पर थोड़ी-थोड़ी देर में बहस भी होती जाती थी। शबनम को एकाध बार मियाँ ने दूर से देखा था, पर आज उसे अच्छी तरह देखने का मौका मिल गया। उन्होंने अपनी निशस्त कुछ इस तरह बनाई कि वे खिड़की की राह चुपचाप उधर के सब हालात देखते भी रहें और किसी को मालूम भी न हो। शीघ्र ही उन्हें ज्ञात हो गया कि अब यही कमरा इन दोनों अल्हड़ बछेड़ियों का अखाड़ा बन गया अर्थात् उनका स्टडीरूम बन गया। कहने को मिस रोज़ उस कमरे में रहने लगीं और शबनम वहाँ पढ़ने को आने-जाने लगी। लेकिन पढ़ने पर ही क्या मौकूफ था, दिन के बारह घंटों में सौ काम निकलते, और शबनम उसी कमरे में पहुँच जाती। दोनों विविध विषयों पर हुज्जत करतीं, हँसतीं - चुहल करतीं और नये-नये शगूफे खिलातीं।

एक ही दिन में मियाँ को मालूम हो गया कि वे लाख छिपकर बैठें पर ये खेल सब हो रहे हैं उन्हीं को दिखाने-देखने के लिए। अब अक्सर यूसुफ मियाँ भी अपने कमरे में टहलने लगे। कभी किसी किताब को हाथ में लेकर, कभी चूड़ीदार पायजामा और शेरवानी पहने। कभी जालीदार कुर्ती पर विलायती तनजेब का ढीला कुरता और ढीला पायजामा। वसली का जूता। कभी बाल उलझाए मजनूँ बने, कभी माँग पट्टी से लैस। मकसद सिर्फ यह कि अपने दिखाएँ और उनको देखें। और हकीकत थे कि कुछ उधर से भी ऐसा ही डौल बँधा था। फर्क इतना था - वे दो थीं और मियाँ बेचारे अकेले।

और एक दिन बात जरा बढ़ चली। उस दिन आसमान पर बदली छा रही थी। मौसम पुरलुफ्त था। हवा ठण्डी बह रही थी। यूसुफ मियाँ देर से कमरे में टहल रहे थे - मगर दूसरे कमरे में यह मनहूसियत का सन्नाटा। इतने में मिस रोज़ और शबनम हाथ में किताब लिए हँसती हुई अपने कमरे में आईं। यूसुफ मियाँ के मुँह से हठात् निकल गया, “खुश आमदीद।”

कहा तो था उन्होंने होंठों ही में, पर आवाज वहाँ पहुँच गई। चारों आँखें पहले इधर को उठीं, फिर एक हुईं और तब एक मीठी मुस्कान दोनों लड़कियों के होंठों पर फैल गई, और लीजिए अब दूसरी दुनिया का दौर चला।

उस दिन की बात यहीं खत्म हुई। मियाँ यूसुफ शिकार पर चले गए। शाम को जब लौटे - तो देखते क्या हैं - उनके कमरे में ताजा फूलों के दो गुलदस्ते निहायत खुशनुमा रखे हैं। उनका पलंग भी अब अपनी जगह से खिसका दिया गया है, और समूचे कमरे का नक्शा बदला हुआ है।

लौटकर नक्शा देखा तो हैरान रह गए। नवाब साहब ने मियाँ को एक खिदमतगार दिया हुआ था। निहायत खुर्राट। नाम था अब्दुल्ला। बातचीत में मश्शाक, मशहूर किस्सागो, रईसों की आँखें देखे हुए। जात का नाई था। मालिश और चम्पी में उस्ताद। मियाँ की खिदमत यही अब्दुल्ला करता था। शिकार से मियाँ लौटे और कमरे के नक्शे को बदला देखा तो अब्दुल्ला को बुलाकर कहा, “वाकई आज तो तुमने काबिले इनाम काम किया। कमरे का नक्शा ही बदल दिया। माशाअल्ला बड़े ही वजहदार आदमी हो।”

“हुजूरेवाला, मुग़ालते में न रहिए, जो वजहदार हैं, उन्हीं से फर्माइये।”

“क्या मतलब?”

“बन्दानिवाज, कान पकड़कर अर्ज़ करता हूँ कि यह सब अदल-बदल आज मिस साहिबा ने की है। मैंने टोका, तो कहा - साहबज़ादी का हुक्म है। बस मैं चुपका हो रहा।”

“खुदा खैर करे। तो मिस साहिबा के सब्ज कदम इस कमरे में पढ़ चुके?”

“अये-हये हुजूर! यह क्या कलमा जबाने शरीफ से कहा। खुदा झूठ न बुलवाए। कयाफा शनाशी का कुछ-कुछ इस गुलाम को भी शौक है। अगर मेरा कयाफा सही है, तो हुजूर, कुछ और ही रंग खिलने वाला है, मिठाई और इनाम का बन्दा भी मुस्तहक है।”

“कैसी मिठाई? अमाँ क्या कहना चाहते हो, साफ-साफ कहो, पहेलियाँ न बुझाओ।”

“खैर, तो हुजूर फिलहाल यही समझ लें कि उधर से इधर का शौक जनून की हद तक पहुँच चुका है।”

“क्या? म्याँ क्या बकते हो?”

“माशाअल्ला, हमारी साहबज़ादी भी लाखों में एक हैं। खुदा गवाह है, दोनों की जोड़ी खूब रहेगी।”

“अब तुम पिट जाओगे अब्दुल्ला मियाँ।”

“जैसी हुजूर की मर्जी, मगर मैं तो मिठाई का ही उम्मीदवार हूँ!”

यूसुफ मियाँ हँस दिए। हकीकत तो यह थी कि इस वक्त उनका दिल बाँसों उछल रहा था। उन्होंने कहा, “मुँह धो रखो म्याँ।”

“हुजूर, हमारी साहबज़ादी जब बात करती है, मुँह से फूल झड़ते हैं। हँसती हैं तो घुँघरू बजते हैं। चलती है तो बसन्त छा जाता है। बन्दानेवाज, ऐसी हैं हमारी साहबज़ादी!”

“होंगी भई, खुदा उन्हें सलामत रखे।”

“और पढ़ने-लिखने की बेहद शौकीन, माशाअल्ला, याददाश्त भी गज़ब की है उनकी!”

“तो मेरा सर क्यों खाते हो?”

“यह बात नहीं किबला, कभी आप उनसे बात कीजिए, तो मेरी बात पर यकीन आए।”

“लेकिन यह क्या जरूरी है कि हम साहबज़ादी से बात करें। और क्यों करें? वो हैं परदानशीन शरीफज़ादी!”

“तो हुजूर, क्या मुजाइका है। आप भी रईस हैं। उनके मेहमान हैं। वे आपकी मेज़बान हैं। अब यही देखिए कि उनके हुक्म से ही मिस रोज़ ने आपके कमरे में कदम रंजा फरमाया है। तभी तो मैंने कहा - कुछ और ही गुल खिलने वाला है।”

“देखा जाएगा, फिलहाल तो यह शिकार बावर्चीखाने में पहुँचा दो।”

“या साहबज़ादी की नज़र करूँ?”

यूसुफ मियाँ को हँसी आ गई। बोले, “जो ठीक समझो वही करो - और खुदा के लिए मुझे थोड़ी देर के लिए निजात दो। बहुत थका हूँ, जरा सोउँगा।”

“तो अभी हाजिर होता हूँ। बदन दबाकर तमाम थकान उतार दूँगा।”

और वह शिकार लेकर जनानखाने की ओर चल दिया। यूसुफ मियाँ के मुँह से आप ही निकल पड़ा - खुश आमदीद।

……..

अब तो रोज ही फूलों के गुलदस्ते आने लगे। नये-नये तोहफे भी आने लगे। बावर्चीखाने से जब खाना आता तो साथ ही भीतर से एक स्पेशल मीठी तश्तरी भी आने लगी। यह साहबज़ादी की ओर से दावत होती रहती थी। और एक दिन सुबह-सुबह जब यूसुफ मियाँ नहा-धोकर नाश्ते की तैयारी कर रहे थे - हाथों में एक बड़ा-सा गुलदस्ता लिए मिस रोज़ आ बरामद हुईं। हँसती हुई शीरी जबन में और मिठास पैदा करती हुई बोली, “साहबज़ादा साहब, सुबह की सलाम दोपहर से जरा पहले ही अर्ज़ करती हूँ।”

यूसुफ मियाँ के मुँह से बेसाख्ता निकल गया, “खुश आमदीद, मिस साहिबा, लेकिन अभी तो आठ ही की गजर बजी है। अभी दोपहर कहाँ?”

“खैर, तो आप नाश्ता नोश फरमाने की तैयारियों में हैं। ये फूल साहबज़ादी ने आपके लिए भेजे हैं।”

“बहुत-बहुत शुक्रिया और सलाम मेरा अर्ज़ कर दीजिए, साहबज़ादी साहिबा से। बहुत करम फरमाया इस नाचीज़ यतीम पर।”

“माई गॉड, आप और यतीम? तौबा-तौबा। बड़े सरकार सुनेंगे तो क्या कहेंगे भला?”

“कुछ गलती हुई हो तो माफी का खास्तगार हूँ। मैंने तो जो ठीक बातें थीं वही अर्ज़ कर दीं।”

“बातें बनाने में तो माशाअल्ला आपको कमाल हासिल है। बहरहाल मैं साहबज़ादी से अर्ज़ कर दूँगी - माफी देनी होगी तो देंगी - सजा देंगी तो भुगतिएगा।”

“लेकन माफी तो मैं आपसे माँग रहा हूँ मिस साहिबा, खुदा न करे कि आप इस नाचीज़ से बदज़न हो जाएँ तो फिर बन्दा कहीं का न रहेगा।”

“तौबा-तौबा, बड़े शरीफ हैं आप साहबज़ादा साहब, खामख्वाह मुझे लपेटते हैं।”

“मुझे अफ़सोस है, खैर, तो अब क्या हुक्म है?”

“अर्ज़ करती हूँ, कल के शिकार के सिलसिले में यह फूल साहबज़ादी ने भेजे हैं, साथ ही शुक्रिया।”

“तो मेरा सलाम अर्ज़ कर दीजिए और कहिए - भला इनी क्या ज़रूरत थी!”

“खैर, कहना-सुनना जो हो, वह आप ही कह-सुन लीजिए।”

“क्या मतलब आपका?”

मिस साहिबा ने आँखों में शरारत भरकर कहा, “मतलब यह है कि जोड़ी अच्छी है।”

“यह आप क्या कह रही हैं?”

“वही, जो नवाब साहब को कहते सुना, बस न रत्ती कम, न ज्यादा।”

“आप मुझे बना रही हैं।”

“जी नहीं, बने-ठने तो खुद ही बैठे हैं। मैं तो एक बात कह रही हूँ। अच्छा सलाम।”

मिस रोज़ जाने लगीं, तो यूसुफ मियाँ ने उन्हें रोककर कहा, “खुदा के लिए जरा सुनए तो।”

“फरमाइए।”

“मैंने कहा - मैने कहा - जरा सुनिए तो।”

“बाबा, सुन तो रही हूँ कान खोलकर।”

“देखिए मिस साहिबा, मैं कहता हूँ आप कभी-कभी अजीब बातें करने लगती हैं।”

“बस, कभी-कभी ही न? लेकिन आप शायद ठीक कहते हैं, नवाब साहब जो कुछ फरमा रहे थे - भला क्या जरूर था कि मैं आपसे कहती? लेकिन हज़रत, वे बातें काफी तूल पकड़ गई हैं।”

“आखिर कौन सी बातें, कुछ कहोगी भी।”

“अब गिलहरी रंग लाई। खैर नवाब साहब से अर्ज़ कर देती हूँ कि अब शादी कर ही दी जाए! साहबज़ादा को मंजूर है?”

“तौबा-तौबा, खुदा के वास्ते यह गज़ब न कर बैठना। आपको शायद शक हुआ है।”

“कैसा शक?”

“कि मैं भी इधर कुछ दिलचस्पी रखता हूँ।”

“चेखुश, शक के क्या मानी साहब, कामिल यकीन है। अब मैं जाकर नवाब साहब से भी अर्ज़ किए देती हूँ और साहबज़ादी साहिबा से भी।”

“बड़ी शरीफ हैं आप मिस साहिबा, बात का बतंगड़ बनाने में तो आप यकता हैं।”

“जी ठीक फरमा रहे हैं आप। खैर, तो जरा तशरीफ ले चलिए।”

“कहाँ?”

“नवाब साहब आपको याद फर्मा रहे हैं।”

“बेहतर, तो मैं नाश्ता लेकर आता हूँ।”

“नाश्ता भी वहीं नोश फर्माइए।”

यह कहकर जरा मुस्कुराकर तिरछी चितवन की तीर फेंकती हुई मिस रोज़ चली गई। यूसुफ मियाँ जल्दी-जल्दी कपड़े पहन नवाब साहब की बारहदरी की ओर चल खड़े हुए।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” का अंश)

Post a Comment