Saturday, October 16, 2010

यूसुफ मियाँ और शबनम की शादी तय

लेखकः आचार्य चतुरसेन

(इससे पहले की कहानी यहाँ पढ़ें - यूसुफ मियाँ और नवाब की शहज़ादी शबनम)

नाश्ते की तैयारी बड़े ठाठ की थी। अगलम-बगलम बहुत-सी चीजें खाने के दस्तरखान पर सजी थीं। नबाव साहब खुद खड़े होकर सब इन्तजाम कर रहे थे। बात-बात पर बिगड़ रहे थे। अब्दुल्ला था कि फिरकी की तरह नाच रहा था। एक तो नवाब साहब का हाथी-सा डीलडौल, दूसरे घनी काली दाढ़ी, तिस पर शेर के गुर्राने की-सी आवाज। बात क्या करते थे - दहाड़ते थे। ज्यों ही मियाँ यूसुफ ने कमरे में कदम रखा और फर्शी सलाम झुकाया कि नवाब साहब ने बादल की गर्ज की तरह अट्टहास करते हुए कहा, “आओ, आओ मियाँ साहबज़ादे, मैंने कहा - आज तो मैं अपने साथ तुम्हें नाश्ता करने को कहूँ। क्या कहूँ, इस कदर मसरूफियत रहती है कि तौबा ही भली। लेकिन मैं समझता हूँ, तुम्हें कोई तकलीफ यहाँ न होगा। और भाई, हो भी तो - तुम्हारा घर है। यह अब्दुल्ला अहमक है। पता नहीं, कैसी खिदमत करता है। बहरहाल भई, घर में ही हो, अरे हाँ, तौबा-तौबा, मैं भी क्या भुलक्कड़ हूँ।” नवाब साहब ने दोनों कान पकड़कर दो तमाचे अपने मुँह पर रसीद किए। फिर पुकारा, “चली आओ बेटी, यहाँ तो सब घर के ही आदमी हैं।” फिर हँसकर कहा, “भई साहबज़ादे, अजब शर्मीली लड़की है। लाख कहा - कि साहबज़ादे का जरा खयाल रखना, घर में उसकी माँ होती तो क्या बात थी। लेकिन….”

नवाब की बात बीच में ही कट गई। इसी वक्त मियाँ यूसुफ की नज़र उस आनेवाली की ओर उठ गई। और शबनम ने कमरे में आकर मियाँ को एक सलाम झुकाई - नीची नज़र किए। गज़ब का सूफियाना बनाव-सिंगार किया था शबनम ने। सफेद लिबास में संगमरमर की एक परी की सूरत-सी लग रही थी। आमतौर पर मुस्लिम लड़कियाँ रंगीन कपड़े पहनती हैं मगर शबनम के मिज़ाज और उसकी तबियत निराली थी। मिस रोज़ की अंग्रेजी तालीम का तो उसपर असर था ही, खुद भी वह सादगी पसन्द थी। नवाब ने कहा, “आओ, आओ बेटी, शर्माओ मत। निहायत नफीस घोड़ी थी। पता ही नहीं लगता। खैर, भई अब्दुल्ला, लाओ, कबाब गरमा-गरम। मियाँ साहबज़ादे, बैठो तुम इधर मेरी बगल में, और तुम बेटी इधर।”

और इस तरह नाश्ता शुरू हुआ। मिस रोज़ ने दस्तरखान कुछ-कुछ अंग्रेजी ढंग पर सजाया था। एक-दो अंग्रेजी जिन्स नाश्ते में तैयार की थी, तथा वह एक कोने में खड़ी सारा इन्तजाम देख रही थी। मियाँ अब्दुल्ला लपक-लपक कर यह ला - वह ला कर रहे थे।

नवाब साहब ने कहा, “भई साहबज़ादे, तुम भी कहते होगे - अच्छे चचा हैं कि इतने दिन घर में रहते हो गए और अभी तक शबनम से जान-पहचान तक न कराई। मगर भई, खुदा झूठ न बुलवाए, इसकी दुनिया तो ये किताबें हैं। बस, मिस रोज़ है और यह हर वक्त या तो इल्मी बहस या कसीदा। बातें करती है तो अंग्रेजी में। यही देख लो, पर्दा और झालर, इसी ने बनाई है।”

“सुभान अल्लाह, खुदा बुरी नज़रों से बचाए, बहुत ही नफ़ीस दस्तकारी है।”

यूसुफ ने  तारीफ करके झेंपी-सी नज़रों से शबनम की ओर देखा। वह भी मुस्कुराती हुई कनखियों से उन्हें देख रही थी। नवाब साहब ने पुलाव की रकाबी की ओर इशारा करके कहा, “बेटी, जरा यह पुलाव साहबज़ादे को दो।”

इस पर यूसुफ ने कहा, “जी मैं तो दो मर्तबा ले चुका हूँ, तकलीफ न कीजिए।”

नवाब मीठी हँसी हँसकर बोले, “भई, तकल्लुफ की दाद नहीं, लो यह शीरमाल तो जरा चखो। शबनम ने अपने हाथ से बनाया है। बस, यही कमाल है मेरी बेटी में, वह अव्वल तो खाना पकाती नहीं, और कभी पकाती है तो बस - वही चीज लाजवाब होती है।”

यूसुफ मियाँ ने शीरमाल चखकर कहा, “जवाब नहीं है इसका हुजूर, एक टुकड़ा और दीजिए।”

“हाँ, हाँ, बेटी देना जरा, अमाँ साहबज़ादे तकल्लुफ न करो, जरा हाथ दिखाओ। वल्लाह जवान आदमी हो।”

“खा रहा हूँ हुजूर।”

इसी वक्त मिस रोज़ ने गर्मागर्म कहवे के प्याले पेश किए। शबनम ने अपने हाथ से प्याला उठाकर पहले नवाब साहब को, फिर यूसुफ मियाँ को पेश किया। नवाब साहब ने कहवा पीते हुए कहा, “भई, मिस रोज़ भी हमारी माशाअल्ला कहवा बनाने में यकता है।”

यूसुफ ने मिस रोज़ की ओर देखकर कहा, “खुदा उन्हें सलामत रखे।”

इस पर नवाब साहब ने एक फर्माइशी कहकहा लगाया और कहा, “भई साहबज़ादे, यह तो मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों के तौर-तरीके हैं ला-जवाब। यही मिस रोज़ को देखिए - महज़ किताबें ही नहीं रटातीं, यह भी खयाल रखती हैं कि किस वक्त कैसा लिबास पहना जाए! खाना किस तरह खाया जाए! बैठने, उठने, बात करने, गरज हर तरीके में करीना।”

मियाँ यूसुफ ने कनखियों से मिस रोज़ की ओर देखते हुए कहा, “वाकई हुजूर, यही बात है। मगर लिबास उन लोगो् का कुछ अजीब-सा है, उसे पहनकर तो दस्तरखान पर बैठना ही मुश्किल है।”

“तो क्या जरूर है कि अंग्रेजी लिबास पहनो और दस्तरखान पर बैठो। उनका लिबास पहनकर तो फिर मेज-कुर्सी पर बैठकर खाना खाओ। अमाँ, हमने देखा है, बड़े-बड़े रईस अब दस्तरखान पर खाना नहीं खाते।”

“तो हुजूर, अपने मुल्क का लिबास ही क्या बुरा है? आखिर हिन्दुस्तानी लोग क्यों अंग्रेजी लिबास पहनें?”

“यह न कहो मियाँ साहबज़ादे, अंग्रेजी लिबास में चुस्ती तो खूब आती है। हाँ, जरा भोंडा जरूर है, खड़े-खड़े हाजत रफा करनी पड़ती है।”

“सुना है वैतुलफा जाते हैं तो वहाँ पानी का इस्तेमाल भी नहीं करते।”

“भई, सर्द मुल्क के रहने वाले ठहरे। पानी के नाम पर उनकी नानी मरती है।”

यह बात मिस रोज़ ने सुन ली। उसने हँसकर कहा, “नानी नहीं मरती है, नवाब साहब! सफाई का खयाल है। हिन्दुस्तानियों की गन्दी आदतें तो हुजूर बखूबी जानते हैं।”

“लेकिन भई, यह खुश्क सफाई तो जरा मेरी मोटी अक्ल में कम ही बैठती है - और छुरी-काँटे से खाना?”

“तौबा, तौबा, खुदा बचाए। एक बार मैं फँस गया, जनाब चीफ कमिश्‍नर साहब बहादुर ने दावत दी थी। मिस रोज़ ने एक हफ्ते तक छुरी-काँटे से खाने की मश्क कराई मगर बेकार, खुदा की पनाह - मुँह काँटे से छिलकर छलनी हो गया। लुत्फ यह कि जिस चीज को उठाना चाहें वह काँटे में बिंधकर प्लेट ही में रह जाए, हाथ पल्ले खाक नहीं पड़े। भूखे ही आए दावत से। तौबा-तौबा।” नवाब साहब ने दोनों कान पकड़कर गालों पर तमाचे जड़ लिए।

मियाँ यूसुफ ने कहा, “हुजूर अपनी-अपनी तहजीब है, अंग्रेजी लिबास भी सलीके से पहना जाए तो बुरा नहीं जँचता।”

“तो मियाँ साहबज़ादे, आज एक सूट सिलवाता हूँ तुम्हारे लिए। क्यों मिस रोज़, कैसा फबेगा इन पर अंग्रेजी सूट?”

“क्या कहने हैं हुजूर, मगर पहले इन्हें टाई बाँधना सीखना होगा।” मिस रोज ने मुस्कुराकर कहा।

“तो वह तुम सिखा देना। साहबज़ादे, मिस साहिबा टाई बाँधने में बहुत मश्शाक हैं। मुझे भी सिखाया था, पर मैं तो न सीख सका। मगर ये रोज़ तो इस सफाई से फन्दा डालती है कि देखते ही बनता है। मेरे लिए भी एक सूट इन्होंने सिलवाया था, जब कमिश्‍नर साहब से मिलने जाता हूँ तो वही लिबास पहनता हूँ, मगर टाई बाँधती हैं मिस रोज़, लेकिन कयामत यह है कि खोलती भी यही हैं दूसरे दिन।”

“तो रात-दिन आप टाई बाँधे रहते हैं?”

“क्या किया जाए, हमसे वह फन्दा न लगाते बनता है न खोलते, अब तुम जरा सीखना।”

“बस हुजूर मुझे तो बख्शा ही जाए। हमारा यह हिन्दुस्तानी लिबास क्या बुरा है?”

इसी वक्त अब्दुल्ला ने पानों का तश्त पेश किया और नवाब साहब ने तपाक से दो बीड़े पान लिए। एक यूसुफ को पेश किया, दो अपने मुँह में ठूँसे और नाश्ते का सिलसिला खत्म किया।

अलसुब्बह मिस रोज़ मुस्कुराती हुई आई और मियाँ यूसुफ से कहा, “मियाँ साहबज़ादे, सुबह का सलाम मुबारक हो।”

“खुदा खैर करे, यह मुबारकबादी सुबह-सुबह?”

“मुँह मीठा कराइये तो खुशखबरी सुना दूँ।”

“आपका मुँह तो वल्लाह खुद ही मीठा है।”

“चलिए बातें न बनाइए, साहबज़ादी नाश्ते पर आपको बुला रही हैं, तशरीफ ले चलिए।”

“इस कदर ज्यादती! दावत तो कल हो चुकी। अब हस्बमामूल यहीं नाश्ता भिजवा दीजिए।”

“कल तो नवाब साहब ने दावत दी थी।”

“और आज?”

“हस्बमामूल अब नाश्ता और खाना आप वहीं खाया कीजिए।”

“यह आपका हुक्म है?”

“जी नहीं, साहबज़ादी साहिबा का हुक्म है।”

“नवाब साहब से अर्ज़ कीजिए…..”

“जी, नवाब साहब नहीं हैं, सहारनपुर तशरीफ ले गए हैं।”

“खैर, तो इतनी मोहलत दीजिए, जरा कपड़े बदल लूँ।”

यूसुफ मियाँ ने आबेरखा का अंगरखा और जामदानी की नीमास्तीन पहनी, पैरों में ढीला पायजामा।

शबनम ने मुस्कुराते हुए कहा, “खुश आमदीद।”

“आपने नाहक तकलीफ की, नाश्ता मैं वहीं कर लेता।”

“यहाँ आने में क्या ज्यादा तकलीफ हुई?”

“तकलीफ कैसी? राहत हुई।”

“माशाअल्लाह बड़े नेक मालूम होते हैं आप।”

“माफ कीजिए, नेक तो चुगद होते हैं।

“खूब, दाद देती हूँ आपकी खुशमज़ाकी की। लिल्लाह तशरीफ रखिए!”

“नवाब साहब कहाँ तशरीफ ले गए हैं?”

“सहारनपुर गए हैं, खालाजान को सलाम करने।”

“यह खालाजान कौन हैं?”

“फिरंगी कमिश्‍नर साहब बहादुर।”

“क्या जरूर था सलाम करना?”

“जी, फिरंगी का हुक्म और हिन्दुस्तानी टाल दे!”

“तो गोया आप भी कायल है फिरंगियों की इस आदत की!”

“क्यों नहीं, अब्बा हुजूर का चौहद्दी में डंका बजता है। पर फिरंगी की सूरत देखकर उनकी भी पिंडली काँपती है।”

“यह तो मैं पहली मर्तबा ही सुन रहा हूँ।”

“खुदा करे, सुनते-सुनते कान न पक जाएँ आपके। माशाअल्लाह अभी आप बच्चे जो ठहरे।”

“सुनकर तसल्ली हुई। बच्चों पर तो आपकी हमेशा ही नज़रे इनायत रहती है।”

“अब जनाब शायरी फरमा रहे हैं।”

“जी नहीं, एक आरज़ू है…..”

“खैर, यह आरज़ू अपनी जगह दुरुस्त है। लीजिए ये गुर्दे, कैसे बने हैं, जरा चखिए, मुई उँगलियाँ जला डालीं आज मैंने इनको बनाने में।”

“कमाल के बने हैं। लेकिन क्या जरूर है, आप बनाएँ और उँगलियाँ जलाएँ?”

“क्या खूब बने हुए हैं आप!”

“जी क्या फरमाया आपने?”

“जी, लिबास आप पर फूट निकला है, माशा अल्लाह, दर्जी ने सिया खूब है। सिवैयाँ तो लीजिए।”

“लेकिन आप भी कुछ लेंगी या बातों से ही पेट भरेंगी?”

“कानों में चुभने लगीं न, खैर साहब, अब न बोलेंगे।”

“सुभान अल्लाह, खैर, एक बात पूछूँ, बशर्तें कि आप शर्माने का इरादा न करें।”

“खैर, आप पूछिए।”

“शुक्रिया, मैं सिर्फ यह जानना चाहता हूँ कि आपने तसव्वुर में अब तक किस खुशनसीब ने जगह पाई है?”

“जी नहीं।”

“देखिए, सच बोलिए!”

“सच बोलने का वायदा तो मैंने किया नहीं।” शबनम ने शरारत भरी नज़रों से यूसुफ को देखा।

“अर्ज़ करता हूँ कि मैं आज दुनिया का सबसे बड़ा खुशनसीब आदमी हूँ। आप मुझे मुबारकबाद दे सकती हैं!”

“मुबारक हो साहब!” शबनम ने निहायत संज़ीदगी से कहा। यूसुफ ने तश्त से एक डली बर्फी उठाकर कहा, “तो साहब, जरा मुँह मीठा कर लीजिए।” और उन्होंने बर्फी का वह टुकड़ा शबनम के मुँह में ठूँस दिया। बर्फी मुँह में रखकर शबनम एक तितली की भाँति वहाँ से भाग गई। यूसुफ मियाँ ठगे से खड़े रह गए।

……..

और कुछ दिन बीते। नवाब साहब अब ढूँढ-ढूँढ कर शबनम और यूसुफ मियाँ को ऐसे अवसर दे रहे थे, कि दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझ-बूढ लें। यूसुफ मियाँ भी अब घर जाने का खयाल भुला बैठे थे। घर के बूढ़े दीवान के खत-रुक्के आते, बुलावा आता, मगर यूसुफ मियाँ अब खुद ही जाने का मौका टाल जाते। मुज़फ्फरनगर में रहते अब उन्हें अरसा चार माह का हो चुका था। आखिर एक दिन उन्होंने नवाब साहब से फिर अर्ज़ की कि घर से दीवान साहब का रुक्का आया है। कम्पनी सरकार की मालगुजारी अदा करनी है - मेरा जाना जरूरी है।

नवाब ने कहा, “साहबज़ादे! मेरा मन तो अभी तुम से भरा नहीं, खैर, तुम शबनम से रुखसत ले लो। वह इजाजत दे दे तो चले जाना। यूसुफ मियाँ ने शबनम से बातें कीं। बातें बड़ी लम्बी-चौड़ी थीं। परन्तु अन्त में शबनम से उन्हें इजाजत मिल गई, और यूसुफ मियाँ की रुखसती की घड़ी आ ही पहुँची।

वही सुरंग घोड़ी नए साज में सजाकर लाई गई। नवाब ने कहा, “मियाँ साहबज़ादे! तुम्हारी घोड़ी न मिली न सही! यह घोड़ी भी एक नायाब जानवर है - इसी पर सवार होकर चले जाओ।”

यूसुफ मियाँ मन की हँसी रोककर घोड़ी पर सवार हुए। एक बार चिलमन पर नज़र फेंकी और चल दिए।

घर जाकर उन्होंने घोड़ी नवाब साहब को वापस भेज दी, एक रुक्का भी लिख दिया। और नवाब साहब की दरियादिली, मेहरबानी और मेहमाननवाजी का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया।

लेकिन घोड़ी नवाब ने नहीं रखी। रुक्के का जवाब दिया, “घोड़ी मैंने वापस करने नहीं भेजी थी। अब इसे तुम्हीं रखो। और जरा हमारे पास दीवान साहब को भेज दो।”

बूढ़े दीवान पुराने नवाब के कारिन्दे थे। उन्होंने आकर नवाब से बातें कीं - बातों का अभिप्राय शबनम के साथ यूसुफ की शादी का तय होना था। सब बातें तय हो गईं। और शादी का पैगाम लेकर बूढ़े दीवान घर लौटे। यूसुफ मियाँ भी मतलब समझ गए थे। अब सुना तो खिल उठे। बारात की तैयारी होने लगी। मेहमानों को रुक्के लिखे गए। नवाब जबर्दस्त खां ने शादी में सबसे ज्यादा दिलचस्पी ली। और आखिर वह मुबारक दिन आया, जब बल्लभगढ़ से बारात मुज़फ्फरनगर रवाना हुई।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” का अंश)

5 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

sundar prastuti

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

शादी तो हो गयी
दावत-ए-वलीमा कब है?

नवमी के गाड़ा गाड़ा बधई

Unknown said...

@ ललित शर्मा

अभी शादी कहाँ हुई है महाराज? अभी तो शादी सिर्फ तय हुई है, हाँ कल के पोस्ट शादी हो जाएगी। आप निमन्त्रित है उस अनोखी बारात में।

दुर्गा नवमी की आपको तथा सभी को बधाई!

राज भाटिय़ा said...

अजी मंगनी की मिठाई तो खिला दे, शादी की मिठाई कल मांगेगे. बहुत सुंदर.
दशहरा की हार्दिक बधाई ओर शुभकामनाएँ!!!!

Unknown said...

बहुत सुंदर.
दशहरा की हार्दिक बधाई ओर शुभकामनाएँ...